शचीन्द्र - महाभारत में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को एकादशी व्रत का उपदेश दिया, तब पाण्डवों ने यह व्रत किया था। महर्षि वेदव्यास ने भीम को इस एकादशी व्रत का उपदेश दिया था। और दयानन्दी कहते हैं कि इस व्रत का कोई शास्त्र-प्रमाण नहीं मिलता है। आप स्पष्ट देख सकते हैं कि अपने अधर्म के प्रचार के लिए ये सदैव झूठ ही बोलते देखे जाते हैं।
उपवास का वर्णन तो वेद, उपवेद सहित अन्यान्य शास्त्रों में बहुलता से उपलब्ध है। कठोर व्रतों का भी वर्णन है, जैसे बौधायन धर्मसूत्र में अनश्नत्पारायण में उपवास के दौरान ही वेदपाठ किया जाता है। तब क्या दयानन्दी कहेंगे कि यह बकवास है कि गर्मी में भूखा रहकर कोई वेदपाठ करे?
इसी प्रकार अघमर्षण व्रत में तीन दिन का पूर्ण उपवास है, प्राजापत्य व्रत के अन्त में भी तीन दिनों का पूर्ण उपवास, तप्तकृच्छ्र व्रत में भी तीन दिन का उपवास, पाराक व्रत में बारह दिन का पूर्ण उपवास, इसी प्रकार सान्तापन आदि।
मनुस्मृति, गौतम, आपस्तम्ब, बौधायन आदि में ये सब नियमबद्ध उपवास मिलते हैं, जो कि वैदिक हैं। ऐसे उपवासों के लाभ तो आयुर्वेद में भी भरे पड़े हैं, जिन्हें उपवेद कहा जाता है।
महाभारत के ही शान्ति पर्व में ऋषि अंगिरा तो एक माह में एक बार पानी पीने जैसे कठोर व्रत के विषय में बताते हैं। ऐसे असंख्य प्रमाण शास्त्रों में भरे पड़े हैं।
तब यह कहना कि इस व्रत का या ऐसे कठोर व्रतों का वर्णन शास्त्रों में नहीं मिलता, बड़ा धृष्टतापूर्ण असत्य है।
फिर यह इसे विज्ञानविरुद्ध भी बताते हैं। तब तो इनकी स्थिति उन भीमटों जैसी ही है, जो कहते हैं - "शिक्षा शेरनी का दूध है", लेकिन स्वयं अनपढ़ या कुपढ़ ही रहते हैं। जो स्वयं आर्ट्स से दसवीं-बारहवीं किए होंगे, बल आघूर्ण की परिभाषा भी न बता पाएँगे, किन्तु स्वयं को वैज्ञानिक की औलाद समझते हैं। वही हाल इन दयानन्दियों का है।
एक जापानी वैज्ञानिक को तो उस ऑटोफैजी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था, जिसमें क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के पुनर्जनन और शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए 48 घंटे तक के उपवास का समर्थन किया गया हैं। दयानन्दी इसे जाकर पढ़ें, वे स्पष्ट पाएँगे कि जो वह वैज्ञानिक कह रहा है, वे सब बातें आयुर्वेद आदि हमारे ग्रन्थों में लिखी पड़ी हैं। बल्कि विज्ञान में अभी कई विषयों पर कोई विशेष शोध नहीं हुए हैं, उन पर भी हमारे ग्रन्थों में निष्कर्ष लिखे हुए हैं।
एवं हमें अपने धार्मिक कार्यों के पालन के लिए आधुनिक विज्ञान की ओर देखने की क्या आवश्यकता है? क्या आधुनिक विज्ञान ईश्वर को एक स्वर में मानता है? नहीं। तब क्या दयानन्दी ईश्वर को मानना छोड़ देंगे? क्या आधुनिक विज्ञान वेद को अपौरुषेय मानता है? नहीं। तब क्या दयानन्दी वेदों को मनुष्य की रचना मानेंगे? आत्मा का अस्तित्व क्या आधुनिक विज्ञान द्वारा पूर्णतः स्वीकृत है? नहीं। तब क्या दयानन्दी आत्मा का अस्तित्व भी नकारेंगे? आधुनिक विज्ञान तो समय-समय पर अपना मत बदलता रहता है, हमारे अनेकों कर्मकाण्डों को नहीं मानता, तब क्या उनके अनुसार हमें प्रत्येक कार्य देखना होगा? ऐसी क्या बाध्यता है?
दयानन्द के समय में इन उपवासों की निन्दा अंग्रेज़, ईसाई, कम्युनिस्ट आदि किया करते थे। उनसे ही प्रभावित होकर दयानन्द ने भी इन उपवासों की बड़ी निन्दा की। दयानन्द ने तो निर्जला एकादशी का व्रत लिखने वाले महर्षि वेदव्यास को कसाई तक लिख मारा है।
दूसरा कारण था कि दयानन्द बड़े पेटू थे। उनकी ही जीवनी में स्पष्ट वर्णन है कि चार-चार किलो आम एक बार में ठूस जाते थे। जीभ पर ज़रा भी नियंत्रण नहीं था। यहाँ तक कि उनकी मृत्यु के समय डॉक्टर उनसे बार-बार कहते थे कि परहेज़ करो, किन्तु दयानन्द नहीं मानते थे। उनकी मृत्यु भी पेट के रोग और दस्त से ही हुई थी। अतः जीभ, नीयत और पेट के आगे विवश पेटू व्यक्ति को उपवास से चिढ़ होना स्वाभाविक ही है।
यह लोग तब खिल्ली उड़ाया करते थे कि - "उपवास रखने से कोई लाभ नहीं है, व्यर्थ में भूखे मरना पड़ता है" आदि-आदि।
किन्तु बाद में इनके कम्युनिस्ट बापों ने भी उपवास की महत्ता को स्वीकार कर लिया। रूस के बड़े डॉक्टरों ने उपवास की बड़ी प्रशंसा करते हुए इसे अत्यन्त उपयोगी व वैज्ञानिक कहा तथा तत्कालीन रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय ने तो उपवास द्वारा उपचार की पद्धति को भी सरकारी मान्यता दी। सोवियत संघ ने इस पर अनेक शोध किए। 90 के दशक में इगोर नामक एक रूसी डॉक्टर ने निर्जल उपवास पर शोध करके इसके बड़े लाभ गिनाए। उसने स्थापित किया कि निर्जल उपवास का एक दिन, जल सहित उपवास के तीन दिनों के बराबर प्रभावी होता है। तब 100 से अधिक वैज्ञानिक लेख इसकी महत्ता पर प्रकाशित हुए।
दयानन्द के मुख पर कालिख पुत गई। तब ऐसे शोधों को देखकर दयानन्दियों ने कहना प्रारम्भ किया कि हम उपवास की निन्दा थोड़े ही करते हैं, हम तो एकादशी जैसे व्रतों की निन्दा करते हैं। किन्तु यह व्रत भी शास्त्रसम्मत हैं, और इनके कई वैज्ञानिक फूफा भी इसका महत्व स्वीकार कर चुके हैं।
आर्यसमाजी - शास्त्रों में तो पुण्य या पाप की प्राप्ति का कारण व्यक्ति के कर्मों को बताया गया है, अर्थात् शुभ कर्म करने से पुण्य होता है व अशुभ कर्म करने से पाप। विज्ञान व मनुष्य का अनुभव भी यही सिद्ध करता है कि भरी गर्मी में, जब सूर्य अपने प्रचण्ड रूप में रहता है, तब जल के बिना एक घंटा भी रहना कठिन होता है। तब पूरा दिन बिना जल के रहने में अत्यधिक कष्ट व दुःख पहुँचता है।
शचीन्द्र - धन्य हैं इन दयानन्दियों की बुद्धि। क्या जिस कार्य से कष्ट होता है, वह लाभकारी नहीं होता हैं - ऐसा कोई नियम है? यदि गर्मी की चिन्ता है, तब तो गर्मी में आग के सामने बैठकर हवन करना भी कष्टदायक होने से पाखण्ड समझा जाए? और उस पर उसमें घी डालकर आग को और बढ़ाना तो बड़ी महामूर्खता समझी जाएगी? तब कोई नास्तिक दयानन्दियों से कहे कि - "क्यों रे नियोगियों ! जब गर्मी में थोड़े समय भी आग के समीप रहना कठिन होता है, तब उस आग के सामने बैठकर, घी डालकर उसे लगातार बढ़ाते हुए स्वयं को कष्ट व दुःख पहुँचाने की महामूर्खता क्यों करते हो? क्या यह विज्ञानसम्मत है?"। तब दयानंदी आग में घी डालना बंद कर देंगे? अर्थात् दयानन्दियों के तर्क के अनुसार तो प्राचीन काल से लेकर अब तक गर्मियों में होने वाले यज्ञ-हवन सब गलत सिद्ध हो गए। यह है इनकी बुद्धि।
श्रद्धावान व्यक्ति कष्ट सहते हुए भी लौकिक एवं पारलौकिक लाभ की प्राप्ति हेतु जब शास्त्रोक्त कर्म करता है, तब वह कष्ट भी अहितकर नहीं, बल्कि अत्यन्त लाभदायक होता है, लौकिक तौर पर भी और पारलौकिक तौर पर भी। यह कष्ट नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आध्यात्मिक उन्नति और शारीरिक शोधन की एक सार्थक प्रक्रिया है। जो सक्षम है, वह रख लेता है; जो असक्षम है, वह न रखे। जो असक्षम है, उन्हें न रखने का विधान भी हमारे शास्त्रों ने दिया ही है। जैसे कि जो आर्थिक रूप से सक्षम है, वह बड़े-बड़े हवन करे; किन्तु कोई खाने-खराब दयानन्दी हो, तो वह न करे।
आर्यसमाजी - "सभी दिन समान हैं, इसलिए कोई विशेष पुण्य नहीं।" तब तो यह व्रत किसी भी दिन कर ले, एकादशी तिथि का क्या विशेष महत्त्व रहा?
शचीन्द्र - यह बात तो वैदिक कालगणना के ही विरुद्ध है। वैदिक धर्म में सूर्योदय, सूर्यास्त, शुक्ल-कृष्ण आदि चन्द्रकलाओं, ऋतु-परिवर्तन आदि का महत्त्व है। सभी दिन समान मानने से तो ज्योतिषशास्त्र ही व्यर्थ हो जाएगा। कहा गया कि फलाँ कर्म को प्रातःकाल में करे, तब क्या दयानन्दी कहेगा कि सब समय एक समान है, हम तो रात के 11 बजे करेंगे? स्मृतियों में भी संध्या आदि भिन्न-भिन्न कर्मों के लिए भिन्न-भिन्न समय का विधान है। यदि सब दिन व सब समय समान हों, तब तो ये वेद-वेदाङ्ग के कथन सब व्यर्थ हो जाएँ।
दयानन्दी ने कहा कि - "ईश्वर की सृष्टि में सभी दिवस एक जैसे होते हैं।" - ईश्वर की दृष्टि में तो सभी समय भी एक जैसे ही होते हैं, तब क्या दयानन्दी संध्या-वन्दन रात में करेंगे और संभोग ब्रह्ममुहूर्त में?
ऐसी मूर्खतापूर्ण बात तो कोई नास्तिक ही कर सकता है। वैदिक धर्मी ऐसी वेदविरुद्ध बात कैसे कह सकता है कि सब दिन, सब समय एक समान हैं, इसलिए किसी कार्य-विशेष का कोई निश्चित समय शास्त्रों में नहीं कहा गया है?
तैत्तिरीय ब्राह्मण में जैसे कहा गया है कि अमावस्या और पूर्णिमा जैसी तिथियाँ कुछ विशेष कर्मों के लिए निर्धारित हैं। तब दयानन्दी का यह कथन वेदविरुद्ध हुआ या नहीं? यज्ञ आदि अनुष्ठानों के लिए भी शुभ मुहूर्त व उचित समय तथा तिथि का निर्धारण किया जाता रहा है। एकादशी तिथि की विशिष्ट ऊर्जा का वर्णन भी शास्त्रों में विद्यमान है।
एकादशी का अमावस्या, पूर्णिमा एवं दोनों अष्टमियों के साथ विशेष योग होता है। अमावस्या में सूर्य और चन्द्र दोनों एक ही राशि में होते हैं, पूर्णिमा में दोनों समरेखा में होते हैं, अष्टमी में दोनों समान कोण में होते हैं। तब उनके आकर्षण-विकर्षण का प्रभाव जल तथा रसयुक्त वृक्षों तक पर होता है, मनुष्यों का तो कहना ही क्या? यही कारण है कि सदैव से सबसे अधिक ज्वार-भाटा पूर्णिमा में आते हैं और अष्टमी को, जब दोनों कोण समान हों, तब सबसे कम ज्वार आते हैं।
इसी प्रकार सूर्य-चन्द्र के आकर्षण-विकर्षण का प्रभाव मनुष्य के रक्त पर भी पड़ता है। इस पर भी कई अध्ययन हो चुके हैं। महिलाओं के मासिक धर्म तक पर इसके प्रभाव के संकेत मिले हैं, क्योंकि वह जल से पूर्ण हैं। उन तिथियों में मनुष्यों की रक्त, वीर्य आदि धातुएँ विषम होती हैं। उस समय भोजन करने पर होने वाली उत्तेजना हानिकारक होती है। इसी कारण इन तिथियों में विशेषकर ब्रह्मचर्यपूर्वक व्रत आवश्यक कहा गया है। पूर्व समय में इन तिथियों में ही यज्ञ, व्रत आदि होते रहे हैं। ऋषि-मुनियों ने यह विधान ऐसे ही नहीं बना दिए हैं। इस पर कभी विस्तार से लिखेंगे।
आर्यसमाजी - ऐसा नहीं है कि इस एकादशी पर जल पिलाने से किसी विशेष पुण्य की प्राप्ति हो जाती है परन्तु जल पिलाने वाले को जल पिलाने का उतना ही पुण्य मिलता है जितना गर्मी के किसी अन्य दिन प्यासों को पानी पिलाने से प्राप्त होता है
शचीन्द्र - शास्त्रों में 'संकल्प' और 'अवसर' का महत्त्व प्रतिपादित है।शास्त्रों में विशेष तिथियों - जैसे, अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी - पर कर्मों का विधान है। यदि इन दिनों का कोई विशेष प्रभाव न होता, तो ये विधान अर्थहीन होते। जैसे एक ही वस्तु विभिन्न अवसरों पर भिन्न भाव रखती है, उसी प्रकार एकादशी आदि पर किया गया जलदान, जहाँ कि दाता स्वयं प्यासा हो, यह अहंकार-त्याग और करुणा की बड़ी ऊँची अवस्था है। अतः यह तो स्पष्ट ही सामान्य दिन के जलदान से कई गुना अधिक फलदायी होता है। शास्त्र 'भावना' को भी प्रधानता देते हैं। अब आप स्वयं तुलना करके देखें कि कभी घर पर आए रिश्तेदार को पानी पिलाते समय एवं इन विशिष्ट तिथियों पर कोई दान करते समय क्या आपकी भावना एकसमान होती है? यह तो हर व्यक्ति प्रत्यक्ष अनुभव करके देख व समझ सकता है।
आर्यसमाजी - शास्त्रों में तो पुण्य या पाप की प्राप्ति का कारण व्यक्ति के कर्मों को बताया गया है, अर्थात् शुभ कर्म करने से पुण्य होता है व अशुभ कर्म करने से पाप।
शचीन्द्र - जब शास्त्रों में पुण्य या पाप की प्राप्ति का कारण व्यक्ति के कर्म हैं, इसके अतिरिक्त यदि किसी विधान या कर्मकाण्ड का कोई लाभ नहीं होगा, तब तो वैदिक धर्म के सब संस्कार, सब यज्ञ-हवन आदि व्यर्थ सिद्ध हो जाएँगे। इतना विचार यह मूर्ख दयानन्दी नहीं करते हैं। वेद पढ़ने-पढ़ाने का भी तब क्या लाभ? तब तो केवल एक ही उपदेश होना चाहिए कि - "शुभ कर्म करो।" अन्य सब कर्मकाण्डों को त्याग देना चाहिए? ईश्वर की भक्ति, योग, ध्यान, उपासना आदि की भी तब क्या आवश्यकता है? अब इसका जो उत्तर आर्यसमाजी सोचें, वही उत्तर यहाँ भी माना जाएगा।
जबकि वैदिक धर्म में यह सब पुण्यफलदायक ही होते हैं। जैसा कि श्रीकृष्ण कहते हैं - "विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः" - निराहार पुरुष की विषय-निवृत्ति हो जाती है। तब निर्विषयता में ईश्वर-भक्ति, स्मरण, चिन्तन आदि की अनन्यता सिद्ध होती है। तन और मन दोनों शुद्ध होते हैं। तब "स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति" से बुद्धि का संस्फुरण एवं ध्यानैकतानता होती है। इसलिए प्राचीन काल से ही बड़े-बड़े योगी, तपस्वी भी नियम से इन उपवासों को किया करते थे। इसी उपवास को सनातन धर्म में 'व्रत' कहा जाता है। व्रत में उपवास एक नियम होता है। तब क्या इससे पुण्य नहीं, तो पाप अर्जित होगा? ऐसा व्रत रखने वाले भक्त स्वर्ग नहीं, तो क्या नरक जाएँगे?
ऐसे कष्ट तपस्या कहे जाते हैं, जिनसे पिछले पाप भी नष्ट होते हैं। पाप का परिणाम ही दुःख होता है। तब हम जब शास्त्रोक्त दुःख को सहते हैं, तब पाप भी क्षीण होते हैं और पुण्य की अभिवृद्धि होती है। कष्ट सहना ही तप है, इसीलिए शास्त्रों में चान्द्रायण, कृच्छ आदि व्रतों को 'तप' कहा गया है। इस न्याय से एकादशी व्रत भी एक तपस्या ही है।
और सदैव नियम के अनुवर्तन से शरीर भी इसका अभ्यासी हो जाता है तथा स्वस्थ रहता है। तब व्यर्थ ही ऐसे शास्त्रोक्त वैदिक व्रतों के प्रति लोगों में अश्रद्धा उत्पन्न करने वाले, वेदो की, वेद धर्म की निंदा करने वाले दयानन्दी अवश्य ही अपने पाप का घड़ा भर रहे होते हैं।
दिनांक 25 जून 2026 ईस्वी
भारतीय तिथि - ज्येष्ठ शुक्ल ११ विक्रम संवत २०८३
गुरुवार
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