1992 की बात है। हमने नया नया घर बनवाया था। दूर दूर तक इक्का दुक्का मकान थे। चोरों से सुरक्षित रहने के लिए हमने एक पिल्ला पाल रखा था और उसका नाम फीमेल होने के कारण लूसी रख रखा था। वह लगभग साल भर की हो पायी होगी। तभी किसी ने उसे रात में जहर दे दिया होगा। सुबह जब हम लोग उठे तो नित्य की तरह उसको अपने आगे पीछे आते नहीं देखा तो उसे ढूँढा। वह बेहोश पड़ी हुई थी। एक दिन पहले ही चार कुत्ते किसी ने जहर खिलाकर मार दिए थे। यह सोचकर हमने तुरन्त उसका मुॅंह खोलकर उसकी जीभ पर आर्सेनिकम एल्ब 30 की दो बूंद डालीं और उसको देखते रहे। दिन के तीसरे पहर तक वह निर्जीव सी लेटी रही। श्वास चलने से उसके ठीक होने की आशा थी। जाड़े के दिन थे। संध्या जल्दी शुरू हो जाती थी। संध्या से पहले वह उठकर बैठ गयी, परन्तु हम लोगों को देखकर भी कुछ बोली नहीं, जैसे वह हमें अजनबी समझ रही हो। हमने उसके आगे थोड़ा सा दूध पीने के लिए रख दिया और संध्या करने बैठ गए। संध्या के बाद वह हल्के से भौंकी और रात भर में बिल्कुल नार्मल हो गयी। उस समय होमियोपैथी में हमारा ज्यादा अनुभव भी नहीं था। मात्र चौदह वर्ष की प्रैक्टिस थी। तब से हमने आर्सेनिकम की महत्ता (importance ) को जाना। उसके बाद तो करोना काल में हमने अनेकों करोना से पीड़ित व्यक्तियों को इसी आर्सेनिकम से ठीक भी किया। एक परिवार को कैम्फर से भी ठीक किया।
अब तो ज्यादातर घरों में हमने इस दवा को रखवा दिया है।
जय अम्बे🌹 🌻🌺🙏
✍️ DrErkk Rustaugi
(Facebook Post 8 July 2026 )
No comments:
Post a Comment