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Thursday, 8 October 2026

कर्म और भाग्य

                       कर्म और भाग्य

                  चिंतन करने योग्य कहानी

बहुत समय पहले की बात है - एक गाँव में एक साधारण व्यक्ति रहता था। एक दिन वह लोटा लेकर पानी भरने निकला। पहले वह कुएँ पर पहुँचा, पर मन में विचार आया—
“तालाब कुएँ से बड़ा होता है, वहाँ अधिक पानी मिलेगा।”
वह तालाब की ओर चल पड़ा।
तालाब पहुँचा, तो फिर मन बोला—
“नदी तो तालाब से भी विशाल है, वहाँ तो और अधिक जल मिलेगा।”
वह नदी पर पहुँचा। नदी का बहाव देखकर फिर सोचने लगा—
“समुद्र में तो अनंत जल है, वहाँ चलूँगा तो जीवन भर का पानी मिल जाएगा।”
अब वह समुद्र के किनारे जा पहुँचा।
चारों ओर जल ही जल था— अथाह, अनंत, विराट विस्तार।
लहरें उठ रही थीं, क्षितिज तक नीला फैलाव था।
मन प्रसन्न हो गया— “अब तो कमी नहीं रहेगी।”
उसने लोटा आगे बढ़ाया और पानी भरा।
पर जैसे ही लोटा देखा, वह ठिठक गया।
समुद्र चाहे जितना भी विशाल हो,
लोटे में उतना ही पानी था—
जितना उसमें समा सकता था।
वह देर तक लोटे को देखता रहा…
फिर समुद्र को देखा…
और फिर उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान आ गई।
उसे समझ आ गया—
समस्या समुद्र में नहीं थी,
समस्या पात्र की क्षमता में थी।
उसी क्षण उसे जीवन का सत्य दिखाई दिया—
यह लोटा केवल पानी का पात्र नहीं था,
यह भाग्य का प्रतीक था।
मनुष्य चाहे कुएँ तक जाए,
तालाब तक पहुँचे,
नदी तक पहुँचे,
या समुद्र तक—
मिलेगा उसे उतना ही,
जितना उसके भाग्य-पात्र में समाने की क्षमता है।

वह व्यक्ति अब बदला हुआ था।

पर यह क्या? उसके मन में अब एक प्रश्न उठने लगा—
“अगर सब कुछ भाग्य के अनुसार ही मिलता है, तो फिर कर्म करने का क्या अर्थ?” 

“और अगर कर्म से ही भाग्य बनता है, तो फिर ईश्वर की आवश्यकता क्यों?”

चलते-चलते उसे एक विद्यालय दिखाई दिया।
अंदर एक छात्र पढ़ाई कर रहा था— 
मेहनत से, लगन से, अनुशासन से।
उस व्यक्ति ने सोचा—
“यह लड़का परिश्रम तो कर रहा है, पर क्या केवल पढ़ लेने से उसे जीवन में सफलता मिल जाएगी?”
उत्तर भीतर से आया—
नहीं।
जब तक कोई संस्था उसकी योग्यता को स्वीकार नहीं करेगी,
तब तक फल नहीं मिलेगा।
तभी उसे बोध हुआ—
" कर्म योग्यता बनाता है, लेकिन फल स्वीकृति से मिलता है। "

कर्म तैयारी है,
पर फल कृपा है।
अब उसे ईश्वर का अर्थ समझ में आने लगा।
ईश्वर मनुष्य के कर्मों का निर्माता नहीं है,
ईश्वर मनुष्य के कृत कर्मों को स्वीकार कर न्यायपूर्वक फल दाता है ।
हम कर्म करते हैं,
पर उनका फल तभी मिलता है
जब कोई उन्हें स्वीकार करता है।
और वही स्वीकार्यता—
ईश्वर की करुणा है,
ईश्वर की कृपा है।

वह व्यक्ति समुद्र किनारे बैठ गया।
लोटा उसके हाथ में था,
आँखों में शांति थी,
और मन में गहरी स्पष्टता।
अब वह जान गया था—
दुनिया बड़ी है,
समुद्र विशाल है,
अवसर अनंत हैं,
पर जीवन का सत्य यह है—
मिलता उसी को है, जो पात्र बनकर आता है।
वह घर लौटा तो पहली बार उसने अपने जीवन को नए दृष्टिकोण से देखा—
परिवार को देखा,
शरीर को देखा,
स्वास्थ्य को देखा,
सांसों को देखा,
रिश्तों को देखा,
अवसरों को देखा—
और पहली बार मन से निकला—
“यह सब मेरा नहीं है…
यह सब मुझे मिला है।”
और जिसने दिया है,
वही " ईश्वर " है।

                   -: " कहानी की सीख " :- 
ईश्वर को मानो—
डर से नहीं,
मांगने के लिए नहीं,
सौदे के लिए नहीं,
बल्कि इसलिए कि—
वह हमारे कर्मों को स्वीकार करता है,
और कर्म अनुसार हमारे पात्र को भरता है,
तथा बिना किसी पक्षपात के हमें फल देता है।
यही उसकी कृपा है।
यही जीवन का सत्य है।
और यही भक्ति की वास्तविक परिभाषा है।
                          🙏🏻 🌸 🙏🏻
      साभार - प्रवीण चावला, बीकानेर ( राजस्थान )
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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