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Thursday, 19 February 2026

प्यारा संवेदनशील उपचार - मार्मिक पारिवारिक कहानी

बहुत ही संवेदनशील कहानी। अक्सर जो दिखायी देता है वह असलियत नंही होती। प्रतिक्रिया देने मे संयम बरतें।
प्यार को समझ पाना ही तो कठिन होता है। बहुत भावुक एवं हृदय स्पर्शी रचना है।

"दीपक! अपनी आवाज नीचे रखो," गायत्री आंटी की आवाज में पहली बार वो सख्ती थी जो दीपक ने कभी नहीं सुनी थी। "बड़ों के बीच में बोलने का हक तुम्हें किसने दिया?"
"लेकिन आंटी, मैं आपके लिए ही बोल रहा हूँ..."
"मुझे तुम्हारी वकालत नहीं चाहिए। अपने कमरे में जाओ," गायत्री आंटी ने लगभग उसे डांटते हुए कहा।
दीपक अभी अपनी नई नौकरी के सिलसिले में पुणे शिफ्ट हुआ था। उसने एक शांत सोसाइटी में फर्स्ट फ्लोर पर एक कमरा किराए पर लिया था। मकान मालिक, कर्नल शमशेर सिंह और उनकी पत्नी, गायत्री देवी, ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे।
दीपक के लिए वह घर एकदम सही था, बस एक ही परेशानी थी—कर्नल साहब का गुस्सा।
सुबह हो या शाम, नीचे से कर्नल साहब की गरजती हुई आवाजे आती रहती थीं।
"गायत्री! मेरी दवाई कहाँ है? तुम हर चीज जगह से हटा देती हो!"
"गायत्री! चाय में चीनी कम है, तुम्हें पचास साल में चाय बनानी नहीं आई?"
"गायत्री! यह पंखा इतना धीरे क्यों चल रहा है?"
दीपक अपने कमरे में बैठा-बैठा सोचता कि आखिर यह औरत किस मिट्टी की बनी है? कर्नल साहब पूरा घर सिर पर उठाए रखते थे, लेकिन गायत्री आंटी की आवाज कभी ऊँची नहीं होती थी। वह बस धीमे स्वर में कहतीं, "जी, अभी लाती हूँ," या "माफ कीजिएगा, अभी ठीक कर देती हूँ।"
दीपक को गायत्री आंटी पर तरस आता और कर्नल साहब पर गुस्सा। उसे लगता कि कर्नल साहब एक 'टॉक्सिक' पति हैं जो अपनी पत्नी को पैर की जूती समझते हैं।
एक हफ्ते बाद, दीपक ऑफिस के टूर से लौटा। वह थका हुआ था। उसने अभी बैग रखा ही था कि दरवाजे पर दस्तक हुई।
सामने गायत्री आंटी खड़ी थीं, हाथ में स्टील का एक टिफिन और पानी की बोतल लिए। चेहरे पर वही सौम्य मुस्कान, जैसे नीचे कोई युद्ध न चल रहा हो।
"बेटा, मैंने देखा तू अभी लौटा है। होटल का खाना खाकर पेट खराब हो गया होगा। मैंने आज राजमा-चावल बनाए थे, तेरे लिए ले आई," गायत्री आंटी ने टिफिन मेज पर रखा।
दीपक का दिल भर आया। वह अपनी माँ से दूर था, लेकिन आंटी में उसे माँ की झलक दिखती थी।
उसने टिफिन खोला, खुशबू ने कमरे को महका दिया। खाते-खाते दीपक से रहा नहीं गया।
"आंटी," दीपक ने झिझकते हुए पूछा, "आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूँ?"
गायत्री जी ने स्नेह से देखा, "पूछ बेटा।"
"अंकल आप पर दिन भर इतना चिल्लाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर आपको डांटते हैं। आप पलटकर कभी कुछ नहीं कहतीं? मैंने कभी आपको उनका विरोध करते नहीं देखा। आप यह सब कैसे सह लेती हैं? आज के जमाने में तो..."
गायत्री जी के चेहरे पर एक अजीब सी छाया पड़ गई। वह फीका सा मुस्कुराईं।
"बेटा, हर चिल्लाने वाले इंसान के पीछे नफरत नहीं होती। और हर चुप रहने वाले इंसान के पीछे मजबूरी नहीं होती। तू अभी बच्चा है, जब घर बसाएगा तब समझेगा कि रिश्ते तराजू पर नहीं तौले जाते।"
दीपक को उनका जवाब गोलमोल लगा। उसे लगा आंटी अपनी लाचारी छुपा रही हैं। वह मन ही मन कर्नल साहब को कोसता रहा कि कैसे उन्होंने एक हंसमुख औरत को अपनी दासी बना रखा है।
कुछ दिनों बाद रविवार था। दीपक अपनी बालकनी में बैठा कॉफी पी रहा था। नीचे से फिर कर्नल साहब के चिल्लाने की आवाज आई।
"गायत्री! यह कप यहाँ किसने रखा? तुम्हें दिखाई नहीं देता मैं यहाँ से गुजर रहा हूँ? गिरा दिया न!"
उसके बाद कांच टूटने की जोरदार आवाज आई।
दीपक का सब्र टूट गया। उसे लगा आज हद हो गई है। वह तेजी से सीढ़ियां उतरकर नीचे गया। ड्राइंग रूम का दरवाजा खुला था।
उसने देखा कि कर्नल साहब सोफे पर बैठे हैं और फर्श पर कांच के टुकड़े बिखरे हैं। गायत्री आंटी झाड़ू लेकर सफाई कर रही थीं।
दीपक गुस्से में अंदर घुस गया।
"अंकल, यह क्या तरीका है? मैं रोज देखता हूँ आप आंटी पर चिल्लाते रहते हैं। वो आपकी सेवा करती हैं और आप उन्हें जलील करते हैं। एक कप ही तो टूटा है, उसमें इतना हंगामा क्यों?"
कमरे में सन्नाटा छा गया। कर्नल साहब ने दीपक को देखा, उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी घबराहट और शर्मिंदगी थी। गायत्री आंटी एकदम से खड़ी हो गईं।
"दीपक! अपनी आवाज नीचे रखो," गायत्री आंटी की आवाज में पहली बार वो सख्ती थी जो दीपक ने कभी नहीं सुनी थी। "बड़ों के बीच में बोलने का हक तुम्हें किसने दिया?"
"लेकिन आंटी, मैं आपके लिए ही बोल रहा हूँ..."
"मुझे तुम्हारी वकालत नहीं चाहिए। अपने कमरे में जाओ," गायत्री आंटी ने लगभग उसे डांटते हुए कहा।
दीपक को बहुत अपमानित महसूस हुआ। वह पैर पटकता हुआ वापस ऊपर चला गया। उसे लगा कि "भलाई का तो जमाना ही नहीं है। यह औरत खुद ही गुलामी करना चाहती है।"
शाम को दीपक अपने कमरे में अंधेरे में बैठा था। उसका मन भारी था। तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई।
उसने दरवाजा खोला। सामने गायत्री आंटी खड़ी थीं। उनके हाथ में हल्दी वाला दूध था।
"नाराज है?" उन्होंने पूछा।
दीपक चुप रहा।
गायत्री आंटी अंदर आईं और कुर्सी पर बैठ गईं। "बैठ, आज तुझे बताती हूँ कि मैं 'पलटकर जवाब' क्यों नहीं देती।"
दीपक बिस्तर के किनारे बैठ गया।
गायत्री जी ने गहरी सांस ली। "कर्नल साहब हमेशा से ऐसे नहीं थे, दीपक। वो फौज में थे, उनकी आवाज में वो रोब था कि पूरी बटालियन थर्राती थी, लेकिन मेरे लिए उनकी आवाज हमेशा मखमली थी। हम बहुत खुश थे। हमारा एक बेटा था, रोहन।"
'रोहन' का नाम लेते ही उनकी आवाज कांप गई।
"तीन साल पहले, रोहन अपनी बाइक से कॉलेज जा रहा था। कर्नल साहब ने उसे उस दिन हेलमेट पहनने के लिए नहीं टोका, क्योंकि वो जल्दी में था। और... उस दिन एक्सीडेंट हो गया। रोहन हमें छोड़कर चला गया।"
दीपक सन्न रह गया।
गायत्री जी की आँखों से आंसू बहने लगे। "रोहन की मौत के बाद, शमशेर पूरी तरह टूट गए। वो डिप्रेशन में चले गए। छः महीने तक उन्होंने एक शब्द नहीं बोला। वो बस कमरे में अंधेरे में बैठे रहते थे। डॉक्टर ने कहा कि इनका अंदर का गुबार अगर बाहर नहीं निकला, तो इनका हार्ट फेल हो जाएगा या ये पागल हो जाएंगे। उनका खुद से लड़ना जरूरी था।"
उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे।
"फिर एक दिन, उन्होंने मुझ पर चिल्लाया। वजह थी कि चाय में चीनी कम थी। उस दिन मैं रोई नहीं, दीपक। मैं खुश हुई। क्योंकि मेरे पति छह महीने बाद बोले थे। उनका वो गुस्सा मुझ पर नहीं था, वो उस नियति पर था जिसने उनके जवान बेटे को छीन लिया। वो खुद पर गुस्सा थे कि उन्होंने बेटे को हेलमेट के लिए क्यों नहीं रोका।"
दीपक का गला सूख गया। उसे अपनी सुबह की हरकत पर बहुत पछतावा हो रहा था।
गायत्री जी ने आगे कहा, "डॉक्टर ने कहा है कि उनका यह गुस्सा उनके जीने का सहारा है। वो चिल्लाते हैं, तो उनका मन हल्का हो जाता है। वो भूलने की बीमारी (Alzheimer's) की शुरुआती स्टेज में भी हैं। उन्हें याद नहीं रहता कि उन्होंने चीजें कहाँ रखी हैं, इसलिए वो घबरा जाते हैं और डर के मारे चिल्लाते हैं। उन्हें लगता है कि सब कुछ उनके हाथ से फिसल रहा है—जैसे उनका बेटा फिसल गया।"
गायत्री जी ने दीपक की आँखों में देखा। "बेटा, जब वो चिल्लाते हैं कि 'गायत्री तुम कहाँ हो?', तो वो डांट नहीं रहे होते, वो पनाह मांग रहे होते हैं। उन्हें डर लगता है कि कहीं मैं भी उन्हें छोड़कर न चली जाऊं। उनका यह शोर मेरे लिए संगीत है, क्योंकि यह मुझे बताता है कि वो अभी भी मेरे साथ हैं, जिंदा हैं। जिस दिन यह शोर बंद हो जाएगा... उस दिन मेरा घर सच में वीरान हो जाएगा।"
दीपक की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे। वह जिसे 'अत्याचार' समझ रहा था, वह असल में एक पत्नी की 'तपस्या' थी। वह जिसे कर्नल साहब का 'अहंकार' समझ रहा था, वह एक पिता की 'बेबसी' थी।
गायत्री जी ने दीपक के सिर पर हाथ रखा। "इसलिए बेटा, सुबह मैंने तुझे डांटा। अगर तू उन्हें यह अहसास दिला देता कि वो 'बीमार' हैं या 'गलत' हैं, तो शायद वो फिर से उसी चुप्पी में चले जाते जहाँ से उन्हें निकालना मेरे लिए नामुमकिन हो जाता। मेरा स्वाभिमान इतना कमजोर नहीं है कि उनके दो कड़वे बोलों से टूट जाए। मेरा प्यार, उनके गुस्से से बहुत बड़ा है।"
दीपक उठकर गायत्री आंटी के पैरों में गिर गया। "मुझे माफ कर दीजिये आंटी। मैं बहुत गलत था। मैंने सिर्फ बाहर का शोर सुना, आपके अंदर की खामोशी नहीं सुन पाया।"
गायत्री जी ने उसे उठाया और गले लगा लिया। "कोई बात नहीं। बस अब तू भी अपना घर बसा ले, ताकि जान सके कि जब अपना कोई तकलीफ में होता है, तो उसका थप्पड़ भी प्यार लगता है।"
अगले दिन सुबह, दीपक जब ऑफिस के लिए निकल रहा था, तो नीचे से फिर आवाज आई।
"गायत्री! मेरा चश्मा कहाँ है? तुम मुझे अंधा करके ही मानोगी!"
आज दीपक के चेहरे पर वो खीझ नहीं थी। उसके होंठों पर एक मुस्कान आ गई। उसने मन ही मन कहा, "ईश्वर करे आपकी यह आवाज हमेशा सलामत रहे, कर्नल अंकल।"
उसने देखा, गायत्री आंटी किचन से मुस्कुराते हुए बाहर आईं, उनके हाथ में चश्मा था। उन्होंने कर्नल साहब को चश्मा पहनाया और कर्नल साहब ने, जो अभी चिल्ला रहे थे, चुपके से गायत्री आंटी का हाथ पकड़ लिया और उसे अपने गाल से लगा लिया। वो एक पल का स्पर्श था, जिसमें माफी भी थी और अथाह प्रेम भी। जिसे शायद दुनिया कभी नहीं देख पाती, लेकिन दीपक ने आज देख लिया था।
रिश्ते सिर्फ मीठी बातों से नहीं बनते। कभी-कभी कड़वाहट को पीकर, दूसरे को जहर से बचाने का नाम ही प्रेम है।

कहानी का सार:
दोस्तों, हर घर की चारदीवारी के पीछे एक अलग कहानी होती है। हम अक्सर जो देखते हैं और सुनते हैं, सच उससे बहुत अलग होता है। रिश्तों में धैर्य और त्याग का मतलब गुलामी नहीं होता, बल्कि कभी-कभी यह दूसरे मनुष्य को टूटने से बचाने का एकमात्र तरीका होता है। बड़ों का गुस्सा अक्सर उनकी बेबसी का नकाब होता है, उसे दिल पर लेने के बजाय, उसके पीछे के दर्द को समझने की कोशिश करें।
प्रश्न आपके लिए:
क्या गायत्री देवी का तरीका सही था? क्या प्रेम में इतना धैर्य रखना आज के जमाने में संभव है? क्या आपने भी कभी किसी के गुस्से के पीछे छिपे प्यार या दर्द को महसूस किया है? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया है और दिल के किसी कोने को छू लिया है, तो इसे लाइक करें। कमेंट बॉक्स में 'True Love' लिखें और इस कहानी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर जरूर करें।  धन्यवाद।

साभार - मार्मिक पारिवारिक कहानियां 
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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