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Thursday, 19 February 2026

रजस्वला का विज्ञान

रजस्वला का विज्ञान या रजस्वला स्त्री को क्यों विधि निषेध है :-
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काफी लोगों ने मुझसे इस विषय पर लिखने को कहा !! पर ऐसे विषयों पर लिखने से बचता हूँ लेकिन social मीडिया पर जो हाहाकार मचा हुआ है , उसे देखकर लिखना पड़ा !! 

कुछ सिद्धांत एवं विज्ञान के formulaes समझ लीजिए : 

प्रत्येक वस्तु, पदार्थ, अणु, परमाणु से लेकर वह छोटी से छोटी इकाई जो अभी तक ज्ञात नहीं है , सब एक विशेष प्रकार की ऊर्जा या तरंगें निकालती रहती हैं। यह प्रक्रिया निरंतर चलती है । 
हर पदार्थ या वस्तु या तत्व की ऊर्जा भिन्न भिन्न होती है । प्रत्येक के ऊर्जा की frequency, wavelength, intensity अलग अलग प्रकार की होती है जो उस पदार्थ या तत्व की संरचना पर निर्भर करती है । 

ऐसा नहीं है कि मात्र radioactive elements या substance ही किरण या विकिरण या ऊर्जा निकालते हैं। ये तो विज्ञान जहाँ तक पहुँचा है वहीं तक बता रहा है । लेकिन विज्ञान से अनंत गुणा अनंत तरह की बातें हैं जहाँ विज्ञान को पहुँचने में युग युग व्यतीत हो जाएगा । 

तो प्रत्येक कण atom, molecule, god particle etc. सभी निरंतर एक विशेष प्रकार की energy निकालते रहते हैं। यह प्रक्रिया सतत चिरंतन है । 
इसी ऊर्जा को प्रतिक्षण निकालते रहने के कारण प्रत्येक वस्तु का क्षरण होता है जिसे degradation या फिर मृत्यु कहते हैं।  

यह भी ध्यान रखिये - " Energy can neither be created nor be destroyed, it can only be transformed into one form to another." 

अब दूसरा सिद्धांत सुनिए - जिस वस्तु को बनने में जितनी मात्रा की ऊर्जा लगी है , उस वस्तु को बिगड़ने या विध्वंस होने पर उतनी ही मात्रा की ऊर्जा निकलेगी !! 

दूसरी तरह समझिए दर्शन सिद्धांत के अनुसार :- जिस व्यक्ति या वस्तु से अनुकूल होने पर जितनी मात्रा का प्रेम है , उसी व्यक्ति या वस्तु के प्रतिकूल होने पर उतनी ही मात्रा का द्वेष होता है । 

तीसरी तरह समझिए - जिस व्यक्ति या वस्तु से जितनी मात्रा का सुख मिलता है , उसके विपरीत होने पर या उसके अभाव से या उसके खो जाने पर उसी व्यक्ति या वस्तु से उतनी ही मात्रा का दुःख मिलेगा । न एक प्रतिशत कम न एक प्रतिशत ज्यादा । 

मुझे पता है आप लोग bore हो रहे हैं , लेकिन रजस्वला या mensturation को समझने के लिए थोड़ा तो मेहनत करनी पड़ेगी । वरना आप गालियाँ ही देते रहेंगे और सब बकवास कहते रहेंगे । 

अब आते हैं कि ये Mensturation या रजस्वला या periods होता क्या है ??? 
स्त्री को शक्ति का प्रतीक कहा जाता है । ध्यान दीजिए , बहुत ही normal level पर आकर समझा रहा हूँ । 
शक्ति का प्रतीक क्यों कहा जाता है ?? इसको समझाने बैठूंगा तो पुस्तक बन जाएगी , बस थोड़ा सा समझ लीजिए कि जो पुरुष का sperm या वीर्य है वह एकमात्र चेतनता प्रदान करता है , चैतन्य शक्ति है वह , लेकिन जो स्त्रियों में रज है अर्थात ovum है वह sperm को या वीर्य को कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है । वह उसको शक्तिमान बनाता है । 

अगर वीर्य आत्मा है तो रज उसका मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार का निर्माण करता है । उसे शक्तिमान बनाता है ।। 
बड़े साधारण रूप से समझिए कि यह वीर्य को आगे की प्रक्रिया के लिए ( अर्थात वीर्य से बच्चा बनने की प्रक्रिया ) प्रेरित करता है या शक्ति देता है । 

आप ऐसे समझ लीजिए कि जैसे कोई व्यक्ति comma में है । वह जीवित तो है लेकिन जीवित न होकर भी मृतप्राय है। वह अशक्त है चैतन्य होते हुए भी । 
अब रज का कार्य उस चैतन्यता को शक्ति प्रदान करना है । 
वीर्य जब बच्चे में convert होगा तो स्त्री का रज या ovum ही इस प्रक्रिया को संचालित करेगा । 
Ovum is a fuel to Sperm. 
कितनी भी मंहगी गाड़ी हो लेकिन बिना fuel के या पेट्रोल के वह नहीं चलेगी । यही fuel है Ovum. 

यह वीर्य या रज कोई साधारण तत्व नहीं है । यही ध्यान देने योग्य है , यही आप समझ लेंगे तो सब समझ में आ जायेगा । 
वीर्य और रज दो महाशक्ति हैं । इन दोनों महाशक्तियों का मिलन कोई साधारण घटना नहीं है । इन्हीं के संयोग और मिलन से एक नया जीव उत्पन्न होता है और यह पूरा संसार चलायमान है । 

अब mensturation क्या है ?? स्त्रियों में प्राकृतिक तौर पर रज या ovum बनने की प्रक्रिया शुरू होती है जैसे पुरुषों में वीर्य बनने की प्रक्रिया । 
यह Ovum या egg पूर्ण विकसित होकर किसी वीर्य या sperm के द्वारा fertilization या मिलन होने की प्रतीक्षा करता है । 
जब इसे 7 दिन के भीतर कोई वीर्य या sperm नहीं मिलता है तो यह स्वतः ही क्षरण प्रक्रिया या degeneration प्रक्रिया में आ जाता है । इस ovum को धारण करने के लिए या जहाँ यह egg या ovum या रज बना होता है , उस specific area या ovary में cells की मोटी layer बन जाती है जो ovum के degeneration के साथ ही वह lining भी degenerate होने लगती है । इस पूरी प्रक्रिया में 3 से 4 या 5 दिन लगते हैं जिसमें रक्त ( ध्यान रखिये कि यह सामान्य रक्त नहीं है ) , तरह तरह के cells, elements, minerals, electrolytes इत्यादि का मिश्रण बाहर निकलता है । 

इस बनने बिगड़ने की प्रक्रिया को पूरे 28 दिन लगते हैं । 14 14 दिन के अंतराल पर जैसे चन्द्रमा बनता बिगड़ता है ( शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष ) , ठीक उसी तरह । 

चूँकि रज ही मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का निर्माण करता है इसीलिए चन्द्रमा को मन का कारक माना जाता है । 
ज्योतिष विज्ञान में इसीलिए जिसका चन्द्रमा ...

खैर छोड़िए हम फालतू चीजों पर न जाकर मुद्दे पर focus करते हैं ! 

अब ऊपर वाले सिद्धांत पर आईये । मैंने ऊपर बताया है कि जिस तत्व को बनने में जितनी ऊर्जा लगती है उसके क्षरण या नष्ट होने पर उतनी ही ऊर्जा , तरंग , इत्यादि निकलती है।  

यह रज कोई सामान्य तत्व नहीं है। शक्ति का प्रतीक है । ऐसे समझिए जैसे nuclear energy ( आणविक शक्ति ) । अब इसके नष्ट होने पर उतनी ही मात्रा की energy या तरंग या विकिरण पैदा होगी या निकलेगी । 

जैसे atom bomb को बनाने में जितनी शक्ति या ऊर्जा लगती है उतनी ही शक्ति उसे नष्ट होने में लगेगी । और वह nuclear bomb पूरी तरह radioactive होता है । उसके प्रभाव या संपर्क में आने वाले का नुकसान होना ही है । 

आपको ज्ञात होगा कि radium के आविष्कारक pierre currie और madam currie दोनों ही रेडियोधर्मिता का शिकार होकर खत्म हो गए थे । 

तो यह रज इसी प्रकार की ऊर्जा है । यह विज्ञान के पैरामीटर या मापनी पर प्रदर्शित नहीं होगा । 
हर विषय सभी के वश का नहीं है । कान का कार्य केवल सुनना है , वह देख नहीं सकती चाहे कितनी भी गुह्यतम machine या technology fit कर लीजिए । इसी तरह आंख, कान , नाक , जीभ, त्वचा आदि का कार्य उन्हीं के अनुरूप है । कोई लाख कोशिश के बावज़ूद एक दूसरे का कार्य नहीं कर सकता । 

विज्ञान का ज्ञान भौतिक वस्तुओं और तत्वों तक सीमित है । उसका धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में कैसे प्रवेश हो सकता है ??? 
धार्मिक विज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान परे से भी परे है । 
Microscope telescope का कार्य नहीं कर सकता । 

जब आप भौतिक विज्ञान पढ़ने के बाद धार्मिक और आध्यात्मिक विज्ञान की ओर जायेंगे तब आपको समझ में आएगा कि अरे जिसजे सामने तो भौतिक का विज्ञान दो कौड़ी का है।  
यह विज्ञान जितना खोज पाया है , वह इस ब्रह्मांड का मात्र 0.0000001% है । 
जितना आपको आंखों से दिख रहा है उससे कहीं ज्यादा अनंत गुना सूक्ष्म विज्ञान है जो मात्र आध्यात्मिक एवं धार्मिक विज्ञान से समझा जा सकता है।  

तो जब स्त्री रजस्वला होती है तो इसका अर्थ है रज जैसी शक्ति का क्षरण प्रारम्भ हो गया है । उस वक़्त स्त्री के शरीर में भी तरह तरह की problems आती हैं । आप स्वयं पायेंगे कि उस वक़्त स्त्री मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ्य नहीं महसूस करती , mood swings, irritation, शरीर में दूसरी तरह के enzymes और hormones बनना , किसी भी कार्य में मन न लगना इत्यादि है । यह किस कारण होता है ??? क्या रक्त बहने के कारण ??? 
नहीं उस प्रक्रिया में जो विकिरण हो रहा है , ऊर्जा निकल रही है यह सब उसी का side effect है । 
और यह भी ध्यान रखिये कि स्त्रियों का यह रज केवल वही मातृ शक्ति ही धारण कर सकती हैं और कोई नहीं। इसीलिए इन्हें शक्ति का प्रतीक बोला जाता है क्योंकि रज शक्ति धारण करने की क्षमता इन्हीं में है । ये अपना भी धारण करती हैं और पुरुषों के शक्ति वीर्य को भी धारण करने की क्षमता रखती हैं। 
प्रकृति या भगवान ने इनके गर्भाशय , fallopian tube, ovary इत्यादि को इसीलिए बनाया है ताकि ऐसी दो महाशक्तियों को ये धारण कर सकें।  
इसीलिए हमारे शास्त्रों में इनको शक्ति , नवरात्रि में इनकी पूजा , शास्त्रों में इनका निरूपण किया गया है।  

चलिए टॉपिक पर आते हैं वरना ऐसे समझाने लगा तो ......

तो इस दौरान स्त्रियों का शरीर एक विशेष प्रक्रिया से गुजरता है और पूर्ण विकिरण के प्रभाव में रहता है। इसे normal विज्ञान में detoxification भी कहते हैं। ये विकिरण इतना ताकतवर होता है कि तुलसी ( जिसे radiooactive radiations को रोकने की क्षमता प्राप्त है ) वह भी नहीं सहन कर पाती । कोई रजस्वला स्त्री अगर इस दौरान तुलसी के पौधे की सेवा कर दे तो वह मुरझा जाती है । यह कोई गप्प नहीं है practical बात बता रहा हूँ। 
सिर्फ यही नहीं हर देश के हर सम्प्रदाय में रजस्वला स्त्री के लिए नियम व निषेध बनाये गए हैं।  
पूरे विश्व में ग्यारह धर्म चल रहे हैं सभी में घुसिए और आप पायेंगी कि यह विधि निषेध हर धर्म में कम या ज्यादा के रूप में प्रचलित है । 
खाद्य पदार्थ पर इस विकिरण या energy का प्रभाव सबसे ज्यादा होता है और इसी अन्न से ही प्रत्येक जीव का मन, बुद्धि, चित्त, वीर्य आदि का निर्माण होता है। इसीलिए इस दौरान स्त्रियों को खाना बनाने की मनाही होती है । यह विकिरण ऐसे नहीं दिखता , यह दिखता है विचारों के रूप में, बुद्धि के रूप में , सात्विकता के नष्ट होने के रूप में । 
इस दौरान स्त्रियों को कर्मकांड निषेध है लेकिन भगवान का स्मरण , भाव भजन निषेध बिल्कुल नहीं है । 
क्योंकि जैसा मैंने ऊपर बताया है कि हर वस्तु हर पदार्थ की अपनी अपनी energy और तरंग या विकिरण है । 
देव मूर्ति , देव स्थान , धार्मिक पुस्तकों की अपनी अलग ऊर्जा एवम विकिरण है । यह तरंग जब रजस्वला स्त्री के तरंगों से टकराती हैं तो अलग ही प्रकार की तरंगों का प्रवाह होता है जो स्वयं स्त्री के लिए नुकसानदेय है । इसीलिए शास्त्रों ने तो इतना कहा है कि इस समय स्त्रियों को एकांत प्रवास करना चाहिए । किसी से संपर्क तक की मनाही है । 
इसीलिए कुछ विशेष नियम एवं निषेध बनाये गए हैं । 

पहले तो संयुक्त परिवार होता था तो कोई दिक्कत नहीं होती थी । लेकिन आज अर्थजगत में सम्बन्धों से ज्यादा पैसों की महत्ता ने एकल परिवार कर दिया जिससे यह विधि निषेध इनके लिए कोई मायने नहीं रख पाता । 
मायने नहीं रखता तो इसीलिए तो हर परिवार में हर व्यक्ति तरह तरह की शारीरिक और मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं । 
फिर कहते हैं कि हमने तो कुछ नहीं किया फिर हमें यह विशेष रोग कैसे हो गया !!! अरे तुम ही यह जान जाते कि तुमने क्या किया तो इतने दुखों से थोड़ी न गुजर रहे होते !!!! 

अब सभी को समझाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि सभी की बुद्धि का स्तर एक समान नहीं होता इसीलिए शास्त्र प्रतीक के माध्यम से डर, प्रेम , भय के द्वारा समझाते हैं । 
जैसे कानून का ज्ञान सबको नहीं है लेकिन पोलिस और दंड का भय दिखाकर कानून का पालन करवाया जाता है । 

यह मूर्खता है कि स्त्री कुतिया बनेगी या नरक जाएगी या पुरुष बैल बनेगा !!! 😑 लोग अक्सर शास्त्रों की बातों में अपनी बात जोड़कर उटपटांग वक्तव्य देते हैं । 
जो कोई कुछ भी बनेगा एकमात्र अपने शुभ एवं अशुभ कर्मों द्वारा बनेगा । 
जब कम समझ वाले लोग शास्त्र या धर्म का व्याख्यान करते हैं तो ऐसी ही बकवास बातों का उद्गम होता है । 

जो स्त्रियाँ इस प्रक्रिया को साधारण समझती हैं वह अज्ञानी एवं मूर्ख हैं और कुछ नहीं । वह इसका विरोध कर यह जता देती हैं कि उनके अंदर बनने वाला रज बिल्कुल साधारण है और यह कोई शक्ति नहीं है । यह बेकार का खून है । 
मतलब वह स्वयं ही अपने आप को कमजोर बनाती हैं । 

क्या आवश्यक है कि हर बात में रोना गाना हो और स्त्री स्त्री चिल्लाया जाय ?? 
अरे यह तो अच्छा है कि 3 4 दिन आपको rest दिया जा रहा है तो भी उसमें आपको पुरुषवाद नज़र आ रहा है !! 
मतलब वह ठीक होता कि मरते मरते भी जबरदस्ती आपसे काम करवाया जाता । 
अरे किसी में तो महिलावाद और पुरुषवाद से ऊपर उठकर सोचा करिये । 
अगर इन 4 5 दिनों में आपको कुछ विधि निषेध हैं तो वह उसमें पुरुष को कहाँ लाभ मिल रहा है ???? 
उसमें तो लाभ आपको ही मिल रहा है और आपका स्वास्थ्य ठीक रहे और इन विकिरणों के side effect से आपकी रक्षा हो सके , इसीलिए बनाया गया है न । 

गलत क्यों लेना ??? 

कुछ स्त्रियों का तर्क मैंने देखा कि पुरुष इसी रक्त से ही तो हुआ है । 
अरे हद्द है !!!!  

 मल मूत्र भी तो खाना और पानी है तो क्या उसको पीया जा सकता है ???? 
उल्टी ( vomit ) आपका भोजन ही तो है । बहुत राजशाही व्यंजन की भी उल्टी होगी तब भी उसको कोई यह कहकर नहीं खा सकता कि यह तो भोजन ही तो है जिससे हमें ऊर्जा और शक्ति मिलती है । 

प्रारूप बदल गया । यही रज वीर्य के संसर्ग में एक नए जीव का निर्माण करता है लेकिन इसी रज का प्रारूप बदलने से इसमें दोष और विकिरण का प्रभाव बन जाता है । 

इसलिए रोना गाना छोड़कर कुछ शास्त्रों की बातों को मानना शुरू कीजिए । आपके पूर्वज गधे और मूर्ख नहीं थे जिन्होंने यह सब बनाया । आप उन मूर्खों की संतान नहीं हैं । आप ऐसे महापुरुषों की सन्तति हैं जिन्होंने विज्ञान से अनंत गुना खोज कर आपको सफल एवं सुंदर जीवन जीने का मार्ग निष्कंटक किया है । 
आपको गर्व होना चाहिए उन पर और उनके दिए हुए विरासतों पर । उसके सहेज कर रखिये और उसे अपनी आने वाली सन्तति में प्रत्यारोपण कीजिये । 

आप स्त्री हैं , शक्ति स्वरूप हैं। अपनी शक्तियों को स्त्री स्त्री का रोना रोकर बेकार मत कीजिये । 
स्वयं पर गर्व करना सीखिए लेकिन बिना पुरुष को गालियाँ दिए हुए और उनको बिना नीचा दिखाते हुए । न समझ आये शास्त्रों की बात तो समझने का प्रयत्न कीजिये उनसे जो विज्ञान और शास्त्र दोनों में समन्वय करके चलते हों । 
लेकिन विज्ञान का संसार अलग है और धर्म अध्यात्म का संसार बिल्कुल अलग । 
बस एकमात्र आध्यात्म के संसार में प्रवेश करिये धर्म और भौतिक विज्ञान स्वयमेव आपके समक्ष हाथ बाँधे खड़े हो जायेंगे । 
बहुत ही ऊपरी सतह पर समझाने की कोशिश किये जाने के बावज़ूद भी पोस्ट लंबा हो गया है । 
लेकिन इससे कम में भी समझाया नहीं जा सकता था । 

साभार - Shwetabh Pathak (श्वेताभ पाठक)

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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