🙏आदिशंकराचार्य द्वारा रचित भवान्यष्टकम् (भवानी अष्टकम् ) मूल संस्कृत मय हिंदी अर्थ के साथ🙏
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता, न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥1॥
अर्थ ...
न पिता, न माता, न भाई, न दानदाता, न पुत्र , न पुत्री , न नौकर , न पति , न पत्नी , न विद्या , न रोजी-रोटी मेरा कोई नहीं है । हे भवानी ! केवल आप ही मेरी गति हो , आप ही सहारा हो, आप एक ही हो।
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु, प्रपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः। कुसंसारपाश प्रबद्धः सदाहं, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥2॥
अर्थ ...
इस अपार भवसागर में महादुख से डरा हुआ , गिरता पड़ता, कामी , लोभी , पागल , कुसंसार के फंदे में सदा बंधा हूं । हे भवानी! आप ही गति हो।
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं, न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥3॥
अर्थ ....
मैं न दान जानता, न ध्यान-योग, न तंत्र, न स्तोत्र मंत्र, न पूजा , न न्यास-योग। हे भवानी ! आप ही गति हो।
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं, न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥4॥
अर्थ ....
र्मैं पुण्य नहीं जानता, तीर्थ नहीं जानता , कभी मुक्तिलय नहीं जानता , हे माँ ! भक्ति या व्रत भी नहीं जानता । हे भवानी ! आप ही गति हो ।
कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः, कुलाचारहीनः कदाचारलीनः । कुदृष्टिः कुवाक्य प्रबन्धः सदाहं, गतिस्त्वं गतिस्तवं त्वमेका भवानि ॥5॥
अर्थ ...
मैं कुकर्मी, कुसंगी , कुबुद्धि, बुरा दास , कुलाचारहीन, कदाचार में लीन , कुदृष्टि वाला , सदा बुरे वचन बोलने वाला हूं । फिर भी हे भवानी! आप ही गति हो ।
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं , दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये , गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥6॥
अर्थ ...
मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इंद्र, सूर्य, चंद्र किसी को भी नहीं जानता ।
हे शरणागत वत्सला ! दूसरा कुछ नहीं जानता ।
हे भवानी ! आप ही गति हो ।
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे , जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥7॥
अर्थ ...
विवाद में, विषाद में, भूल में , परदेश में , जल में , अग्नि में , पहाड़ पर , शत्रुओं के बीच , जंगल में हे शरण्या ( शरण देने वाली ) ! सदा मेरी रक्षा करो। हे भवानी! आप ही गति हो।
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो, महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥8॥
अर्थ ...
मैं अनाथ, दरिद्र, बुढ़ापा रोग से युक्त, अत्यंत क्षीण-दीन, सदा जड़ बुद्धि , विपत्ति में फंसा, नष्ट हुआ हूं । हे भवानी ! आप ही गति हो, आप ही गति हो, ही एक हो ।
कब क्यों कैसे -
👉कब जपे ....
1. मंगलवार/शुक्रवार रात 9 बजे ...
माँ का समय।
2. अमावस्या की चर्तुदशी/अष्टमी ... शक्तिपीठ जागृत।
3. संकट काल ...
कोर्ट, हॉस्पिटल, श्मशान, कर्ज तुरंत।
👉क्यों जापे ...
1. सब छोड़ दें तब ... श्लोक 1 का पाठ , जब अपना कोई न हो।
2. असाध्य रोग .... शंकराचार्य स्वयं ही प्रत्यक्ष प्रमाण है।
3. तंत्र बाधा/भूत-प्रेत श्लोक 7 -`जले चानले सब जगह रक्षा ।
4. अहंकार नाश - न जानामि विद्या ज्ञान का घमंड तोड़ने हेतु ।
👉जपे कैसे ....
1. स्नान करके रक्त वर्ण वस्त्र पहनो ।
2. माँ भवानी/दुर्गा के सामने घी / तिल के तेल का दीपक।
3. आठ बार पूरा अष्टक जपो।
4. हर श्लोक के बाद बोलो त्वमेका भवानि 3 बार उच्चारण करिए ।
5. अंत में आर्द स्वर में बोलो हे माँ ! मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ , बस आप जानो ।
6. भोग ...
नींबू-मिर्ची, गुड़-चना । शत्रु नाश के लिए ।
💐कथा ...
आदि शंकराचार्य काशी में जलोदर रोग से ग्रस्त। शिष्य भी साथ छोड़ गए । शरीर साथ छोड़ रहा था । तब आंसुओं से ये अष्टक लिखा ।
8वें श्लोक पर माँ भवानी प्रकट हुईं और अपने हाथों से रोग को हर लिया प्रति दिवस रात्री 9 बजे बाद कमसे कम 8 आवृत्ति जरूर करे सभी कष्ट कृत्या प्रयोग स्वतः माँ नष्ट कर देगी ।
रात को सोने से पहले एक बार पढ़ो । डर, बुरे सपने कभी नहीं आऐगे ।
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