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Tuesday, 30 June 2026

आचार्य अग्निव्रत जी की पुस्तक " मेरी गौरवशाली परम्परा " पर आर्य समाजी अर्थ और पौराणिक अर्थ पर शचीन्द्र शर्मा जी द्वारा तुलना करते हुए समीक्षात्मक पोस्ट

कल शिवांश जी ने आर्यसमाजी आचार्यअग्निव्रत जी की लिखी एक पुस्तक भेजी - जिसका नाम है "मेरी गौरवशाली परम्परा"। पुस्तक के शीर्षक को देखकर ही बड़ी हँसी आई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई फटेहाल ठग अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी पर बोर्ड लगा रहा हो कि यह प्राचीन राजाओं का महल है।

इसमें अग्निव्रत जी पुराण के लाखों श्लोकों में से अपने काम के आठ-दस श्लोक निकालकर उन्हें लिखते हैं और उसे सनातनी परम्परा बताते हैं, और फिर उन्हीं हमारे ग्रंथों से अपने काम के श्लोक निकालकर उसे अपनी परम्परा बताते हैं। कुछ स्थानों पर तो इनकी मूर्खता दर्शनीय है कि बालकाण्ड के श्लोक लिखकर उसे हिन्दुओं की परम्परा बता रहे हैं, और किष्किन्धाकाण्ड के श्लोक लिखकर उसे अपनी श्रेष्ठ परम्परा बता रहे हैं। ऐसी अद्भुत मूर्खता विरले ही देखने को मिलती है।

जब कि वास्तविकता में, अग्निव्रत जी की गौरवशाली परम्परा यह है कि इनकी परम्परा ब्रह्मा जी से नहीं, बल्कि दयानन्द से शुरू होती है। उन दयानन्द से, जिनके मरने के बाद आर्यसमाजियों को उनके पिता का नाम भी नहीं पता था। फिर जब खोजने निकले तो ऐसा ज़ोर लगाया कि उनके दो-तीन बाप खोज मारे। आधे आर्यसमाजी लड़ते हैं कि दयानन्द के पिता अम्बाशंकर थे और आधे कहते हैं कि कर्शनजी थे। देखिए तो कितनी गौरवशाली परम्परा है। 

अग्निव्रत बताएँ, दयानन्द से पहले उनकी परम्परा कहाँ थी, कौन आचार्य थे, कौन इनके जैसे दयानन्दी मत वाले थे? अरे, तुम्हारे पंथ-प्रवर्तक दयानन्द जो थे, वे स्वयं एक शिवलिंग-पूजक पौराणिक के वीर्य से ही पैदा हुए थे, पौराणिकों से ही सन्यास में दीक्षित हुए थे, पौराणिकों से ही वेद,योग, व्याकरण आदि की शिक्षा पाए थे। और आप , आचार्य अग्निव्रत, भी पौराणिक के ही वीर्य से पैदा हुए हो या नहीं? आपके बाप-दादा राम-राम, कृष्ण-कृष्ण जपने वाले थे या नहीं थे? कहाँ है तुम्हारी परम्परा? इस अनार्यसमाज की स्थापना से लेकर अब तक तुम्हारे जितने भी कथित विद्वान हुए हैं, सब के सब की उत्पत्ति में पौराणिक वीर्य ही है। तुम कहाँ, चार दिन से अपनी दुकान सजाकर उसे ब्रह्मा जी से शुरू बता रहे हो?

अब दयानन्द से शुरू हुई इनकी गौरवशाली परम्परा को भी ज़रा देखिए तो। इनके पंथ-प्रवर्तक विरजानन्द से शिक्षा प्राप्त करके सब पढ़-लिखकर भी मूर्तिपूजा किया करते थे, पुराण को प्रमाण मानते थे, अवतारवाद मानते थे; वह सब मानते थे जिसकी बाद में उन्होंने निन्दा की। इसमें क्या गौरव है? भाँग पी-पीकर दयानन्द दो-दो दिन बेसुध पड़े रहते थे, इतने नशे में रहा करते थे कि बैल की मूर्ति की गुदा से होकर उसके भीतर घुस जाया करते थे, उन्हें खट्टी दही पिलाकर उनका नशा उतारा जाता था। इसमें क्या गौरव है? संन्यासी होकर दयानन्द, मनुष्य-शरीर में नाड़ी खोजने के लिए लाशों की चीर-फाड़ कर रहे थे; इसमें गौरव था क्या?

दयानन्द अधेड़ उम्र तक मूर्तिपूजा में विश्वास करते थे, फिर मुकर गए; पुराण को मानते थे, फिर मुकर गए; ब्राह्मण-ग्रंथ को वेद मानते थे, फिर मुकर गए; अवतारवाद मानते थे, फिर मुकर गए; मुक्ति को सदैव के लिए मानते थे, फिर मुकर गए; श्राद्ध को मानते थे, फिर मुकर गए। अग्निव्रत जी, में आपको चुनौती देता हूँ कि आप दयानन्द के चार ऐसे चार सिद्धान्त नहीं बता सकते, जिन पर दयानन्द ने अपना मत न बदला हो। दयानन्द मांसभक्षण का समर्थन करते थे, कभी गाय की बलि का समर्थन करते थे। कभी कुछ, कभी कुछ। अपने पूरे जीवनकाल में जो व्यक्ति प्रत्येक विषय पर बार-बार अपना मत बदलता रहे, उसे आप्त पुरुष कहा जाएगा या भ्रांत पुरुष कहा जाएगा? क्या इस भ्रांतता को तुम गौरवशाली कहते हो? बताओ, इसमें क्या गौरव है?

दयानन्द ने वेदभाष्य तक तम्बाकू-ज़र्दा खाते हुए, हुक्के के धुएँ के छल्ले उड़ाते हुए, नसवार सूँघते हुए किए थे। यह गौरव की बात थी? दयानन्द की जीवनी में स्पष्ट लिखा है कि पूरे जीवन भर वे नशा तो करते ही रहे, वेदभाष्य करते समय भी नशा किया करते थे। यह परम्परा कौन से ऋषि-मुनियों से जुड़ी है, अग्निव्रत जी? यह तम्बाकू चबाकर कौन तुम्हारे प्राचीन ऋषि-मुनि वेद पढ़ा करते थे, भाष्य करते थे? शर्म नहीं आती दयानन्द को इतिहास का सबसे महान ऋषि कहते हुए?

आचार्य सायण और पुराण से तुम दो-चार कथन खोज लाते हो इन्हें बदनाम करने को, किन्तु दयानन्द से शुरू हुई अपनी गौरवशाली परम्परा में तुम्हें अश्लीलता, अधर्म आदि नहीं दिखता? चलो, थोड़ी-सी झलक हम दिखा देते हैं।

दयानन्द एक स्त्री को ग्यारह पुरुषों तक नियोग करने का आदेश दे गए हैं। अग्निव्रत जी, आपकी शिष्याओं के संतान न हो रही हो तो उन्हें ग्यारह खसम करने को कहोगे क्या? इसमें क्या गौरव है? अगर यही गौरव है तो आप 11 की जगह 110 खसम बनवाकर इस गौरव को दस गुना बढ़ा क्यों नहीं देते? बताओ ज़रा, यह दयानन्द के एकादश-नियोग का प्रमाण कौन-सी प्राचीन परम्परा व शास्त्र में आता है?

इनकी गौरवशाली परम्परा यह है कि दयानन्द नशे में किए गए वेदभाष्यों में इन्हें कहीं बकरे का दूध पीने का आदेश देकर गए हैं, कहीं बैल से संभोग करने को कह गए हैं, कहीं इनकी गुदा में इन्हें अंधे कुटिल सर्प घुसाने को कह गए हैं, कहीं स्त्री के गुप्तांगों पर शहद लगाने का कह गए हैं। अग्निव्रत जी, इसमें आपको अश्लीलता व अधर्म दिखता है या नहीं? इस पर भी गौरव होता है? ज़रा इस परम्परा की प्राचीनता दिखाएँगे क्या? आपके पूर्वज तो साँपो का केवल खेल ही देखा करते थे।

एक उदाहरण इनकी पुस्तक से दिखाते हैं कि ये किस चतुराई से, छल करते हुए, पुराण आदि के इतिहास को दुर्भावना से गलत प्रकार से प्रस्तुत करके सामान्य जनता को भ्रमित करते हैं।

अग्निव्रत अपनी पुस्तक में पुराण का श्लोक लिखते हैं -"पञ्चलक्षगवां मांसैः सुपक्वैर्घृतसंस्कृतैः।" (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

इसका अर्थ करते हैं - "(आयोजन में) पाँच लाख गायों के घृत में भलीभाँति पकाए गए मांस रहते थे।"

अग्निव्रत जी, यह वचन अथर्ववेद के मंत्र "अपूपवान् मांसवान् चरुरेह सीदतु" इस वेदमंत्र की व्याख्या ही है, जैसा कि सिद्ध है कि पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। तब क्या आप वेद के इस मंत्र में भी मांस का अर्थ पशु का मांस मानेंगे?

जो अर्थ अथर्ववेद के इस मंत्र में होगा, वही अर्थ इस श्लोक में भी होगा।

किन्तु अग्निव्रत जी जैसे समाजी, वेद में लिखा हो कि "मांस खाओ", तो कहेंगे कि मांस का अर्थ यहाँ अन्न है, चावल है, औषधि है; लेकिन वेद का ही अनुसरण करने वाले पुराण में ऐसा लिखा दिखे तो वहाँ ये अर्थ नहीं लगाएंगे। वहाँ उस श्लोक को उठाकर दुष्प्रचार करेंगे।

यहाँ मांस परमान्न को कहा गया हैं।परमान्न खीर को कहा जाता है, जैसा कि अमरकोश में लिखा है - "परमान्न तु पायसम्" (अमरकोश)। पुराण में यहाँ मांस शब्द से खीर अर्थ ग्रहण होगा।

अतः श्लोक में पाँच लाख गायों के घृत से निर्मित खीर की बात कही गई है, न कि गाय का मांस खाने या अन्य किसी पशु का मांस खाने की बात है।

अग्निव्रत जी की गौरवशाली परम्परा को भी देखिए - सन् 1932 में प्रकाशित संस्कार-विधि के पृष्ठ संख्या 12 पर लिखा है - "जो चाहे कि मेरा पुत्र पंडित ...... सब वेद-वेदांग विद्या का पढ़ने और पढ़ाने वाला हो, वह मांसयुक्त भात को पका के पूर्वोक्त घृतयुक्त खावे, तो वैसे पुत्र का होना संभव है।"

इसके अतिरिक्त दयानन्द ने अपनी प्रथम सत्यार्थप्रकाश में लिखा था कि - "मांस तथा अन्य खाद्य पदार्थों का यज्ञ में होम करने के पश्चात सेवन किया जाए।" अपनी इस पुस्तक में दयानन्द वन्ध्या गाय और बैल की बलि को भी वेदसम्मत बताने जैसा पाप लिखकर गए हैं।

अग्निव्रत जी निष्पक्ष या सत्यवादी हैं तो इन सबको भी अपनी गौरवशाली परम्परा में क्यों नहीं लिखते? केवल पुराण व हिन्दू धर्म में ही दोष दिखते हैं? आप नहीं लिखते, किन्तु हिन्दू धर्म में दोष ही दोष देखने की, उसका दुष्प्रचार करने की प्रवृत्ति है। इससे व्यथित होकर हमें ही यह सब बताना पड़ता है। तब आपको समस्या होती है कि हमारी गौरवशाली परम्परा क्यों बताई जा रही है, तब फिर गालियाँ देते हैं।
✍️शचीन्द्र शर्मा 
( फेसबुक पोस्ट दिनांक ३० जून २०२६ ईस्वी )
आषाढ़ कृ१ विक्रम संवत २०८३ मंगलवार