यदि कोई भी संप्रदाय स्वयं को वैदिक संप्रदाय कहता है, तो निम्नलिखित बातें स्पष्ट होनी चाहिए—
1. उसकी अपनी वेदशाखा (मन्त्र एवं ब्राह्मण) कौन-सी है? यह स्पष्ट होना चाहिए।
2. उसका गृह्यसूत्र और श्रौतसूत्र कौन-सा है, जिनके आधार पर जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार, नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य कर्म तथा श्रौतयज्ञ सम्पन्न होते हैं? यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
3. उस संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा धारण किए जाने वाले तिलक, माला तथा जप आदि नित्यकर्मों का विधान वेद, वेदाङ्ग, गृह्यसूत्र अथवा श्रौतसूत्र में कहाँ किया गया है? इसका भी स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत होना चाहिए।
जैसे हम शुक्लयजुर्वेदीयों का संप्रदाय आदित्यब्रह्म संप्रदाय है। हमारा गृह्यसूत्र महर्षि कात्यायनकृत पारस्करगृह्यसूत्र तथा हमारा श्रौतसूत्र कात्यायनश्रौतसूत्र है। हमारे धार्मिक कर्मकाण्ड मुख्यतः इन्हीं तथा इनके अन्य परिशिष्ट ग्रन्थों के आधार पर सम्पन्न होते हैं।
इसी प्रकार आज समाज में वैष्णव नाम से अनेक संप्रदाय प्रचलित हैं। उनमें से अधिकांश को अपने मूल आधार का ही ज्ञान नहीं है; वे जिस परम्परा में हैं, उसकी मूल जड़ क्या है, यह भी उन्हें स्पष्ट नहीं है।
वैष्णव संप्रदायों में श्रौत–स्मार्त परम्परा से सम्बद्ध केवल एक ही संप्रदाय है—कृष्णयजुर्वेदीय वैखानस वैष्णव संप्रदाय।
अन्य वैष्णव संप्रदाय, जैसे—पाञ्चरात्र (श्रीवैष्णव), माध्व, निम्बार्क, गौड़ीय, रामानन्दी आदि तथा बाद में उत्पन्न हुए अन्य वैष्णव संप्रदाय, वैदिक मूलधारा से बाहर के अर्थात् तन्त्र, आगम और पौराणिक परम्परा पर आधारित संप्रदाय हैं। यदि वे स्वयं को वैदिक सिद्ध करना चाहते हैं, तो वे प्रमाण सहित यह प्रस्तुत करें कि उनके नित्य धार्मिक अनुष्ठान किस गृह्यसूत्र और श्रौतसूत्र के अनुसार सम्पन्न होते हैं। इस विषय पर शास्त्रार्थ के लिए मंच खुला है।
जिन लोगों को वेदशाखाओं और सूत्रपरम्परा का समुचित परिचय नहीं है, उनके किसी संप्रदाय में दीक्षित होने पर कोई आपत्ति नहीं है; क्योंकि ईसाई या मुसलमान बनने की अपेक्षा हिन्दू सनातन परम्परा में रहकर किसी भी प्रकार के अध्ययन, भजन और भक्ति के मार्ग पर चलना निश्चय ही प्रशंसनीय है।
किन्तु वे लोग जिन्होंने वेदमार्ग का परित्याग कर विविध नवीन संप्रदायों का आश्रय लिया, वैदिक श्रौत–स्मार्त राजमार्ग से हटकर आगम आदि पर आधारित मार्ग अपनाया, वे यदि मूल वैदिक श्रौत–स्मार्त परम्परा के अनुयायियों से यह कहें कि वे अपने कुलाचार का त्याग कर उनके संप्रदाय में सम्मिलित हों और दीक्षा लें, तो यह अत्यन्त निन्दनीय तथा कुलघातक बात है।
नमो रुद्राय!
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