Pages

Sunday, 20 September 2026

पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। इनमें अलौकिक लीलाएँ लौकिक आश्रय से वर्णित हैं।

             पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। 
(इनमें अलौकिक लीलाएँ लौकिक आश्रय से वर्णित हैं। )

आर्यसमाजियों की जहाँ भी पुराण में ऐसी कथाओं पर दृष्टि पड़ती है, तो इनके बाँछें खिल जाती हैं कि - वाह! अब हिन्दुओं को अपमानित करने का मसाला मिल गया है। अब हम इस कथा का प्रचार करके हिन्दुओं को शर्मिंदा करेंगे, उनके मन में हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति घृणा पैदा करेंगे, उनके पुराण आदि धर्मग्रन्थों के प्रति घृणा पैदा करेंगे, हिन्दुओं के पुराण लिखने वाले ऋषियों के प्रति घृणा फैलाएँगे, जिससे कि हिन्दुओं की सनातन धर्म के प्रति निष्ठा व श्रद्धा समाप्त हो जाए और वे हमारे दयानंद-पंथ में आ जाएँ। इनका लक्ष्य यही रहता हैं।

इस कथा में आखिर आपत्तिजनक क्या है? भगवान शिव और पार्वती जी रतिक्रिया कर रहे थे, तो इसमें व्यभिचार या अनैतिकता क्या है? शिव और पार्वती पति-पत्नी हैं, पति-पत्नी तो भोग करेंगे ही। संसार के सब पति-पत्नी भोग किया ही करते हैं। अब भोग करते समय कोई ब्राह्मण अतिथि अकस्मात् आ जाएगा, तो वे इस भोग को रोकेंगे या नहीं? अतः रोकना भी उचित ही था। अब रोकेंगे, तो वीर्य नीचे ही ही गिरेगा। इसमें भी क्या आपत्ति है?

इसे काल्पनिक उदाहरण से समझिए - मान लीजिए कोई आर्यसमाजी अपनी पत्नी के साथ संभोग कर रहा हो। क्या इसमें कुछ अनुचित है? उत्तर है - नहीं। और उसी समय अकस्मात् स्वामी दयानन्द नाम का कोई व्यक्ति द्वार पर आ जाएँ, तो वह आर्यसमाजी रुकेगा या लगा ही रहेगा? स्वाभाविक है, रुकेगा ही। और चरम सुख के समय रुकने के कारण वह अचानक से हटेगा, तो वीर्य शय्या पर ही तो गिरेगा, या कि आर्यसमाजी का वीर्य उड़कर द्वार खटखटा रहे दयानन्द स्वामी के ऊपर जा गिरेगा? ऐसा तो नहीं होगा न! अतः यहाँ तक इस कथा में कुछ अनुचित नहीं है।

अब आगे कथा में आता है कि श्रीकृष्ण उस वीर्य में प्रविष्ट हुए तथा गणेश जी के रूप में प्रकट हो गए। अब विचार करें कि क्या किसी मनुष्य के वीर्य में विशिष्ट रूप से प्रविष्ट होकर परमात्मा प्रकट हो सकता है? यानी मनुष्यों के वीर्य में तो ऐसा सम्भव है नहीं, अन्यथा तो आर्यसमाजियों के वीर्य में उनका परमात्मा व्यापक हो रहा है या नहीं? किन्तु वह आर्यसमाजियों के वीर्य में प्रविष्ट होते हुए भी प्रकट नहीं हो रहा है। अतः इस विषय को तो वेद और पुराण से ही समझना पड़ेगा। वीर्य में प्रविष्ट होना भी कोई आपत्ति का विषय नहीं है, क्योंकि उक्त पुराण में श्रीकृष्ण परमात्मा कहे गए हैं। परमात्मा तो सबके वीर्य में भी व्यापक है ही। अन्यथा क्या आर्यसमाजी यह कहेंगे कि परमात्मा उनके वीर्य को देखकर बचकर निकल जाता है? अतः परमात्म दृष्टि से ही इस कथा पर विचार करना पड़ेगा।

समस्या यह है कि आर्यसमाजी यह नहीं समझ पाए हैं कि जब विषय पारलौकिक हो, तो लौकिक शब्दों के अर्थ और भाव बदल जाते हैं। जैसे कि सृष्टि की उत्पत्ति हेतु प्रकृति और परमात्मा का मैथुन होता है और सृष्टि का सृजन होता है। तब जहाँ-जहाँ परमात्मा का मैथुन, विहार, भोग, समागम आदि कहा जाए, वहाँ वह मैथुन लौकिक स्त्री-पुरुष की भाँति नहीं होता है। वीर्य का भी अर्थ यहाँ लौकिक वीर्य नहीं, बल्कि तेज ही होता है। इसके उदाहरण देते हैं।

आर्यसमाजी कन्याएँ व स्त्रियाँ प्रार्थना करती हैं - "वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि" (यजुर्वेद १९।९) तथा "अन्नम् पयो रेतो अस्मासु धत्त" (यजुर्वेद)। अर्थात् - "हे परमात्मा! आप वीर्य हैं या वीर्यवान् हैं, हममें भी वीर्य का आधान करिए।" तो आर्यसमाजी क्या यहाँ यह समझेंगे कि आर्यसमाजी महिलाएँ अपनी योनि में परमात्मा से वीर्य के स्थापन की प्रार्थना कर रही हैं? यहाँ जो वीर्य का अर्थ होगा, वही पुराण की इस कथा में समझना चाहिए।

यजुर्वेद में आता है - "वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु" (२३।२०)। इस मंत्र में भी वही रेतः शब्द है, जो इस पुराण के श्लोक में है। तब आर्यसमाजी यहाँ भी रेतः का अर्थ मानुषी वीर्य क्यों नहीं करते? यहाँ रेतः का अर्थ अगर तेज करेंगे, तो पुराण में भी परमात्मा शिव के लिए वही अर्थ करना पड़ेगा। अन्यथा दोनों स्थानों पर आर्यसमाजी मान लें कि मानुषी वीर्य ही समझा जाएगा? हम तो मान लेंगे, हमें इस पर भी कोई आपत्ति न होगी, क्योंकि जो परमात्मा शिव समस्त सृष्टि को स्वयं से उत्पन्न कर रहे है, वह मानुषी वीर्य भी स्वयं से निकाल दे, तो कौन-सी असम्भव बात है? किन्तु आर्यसमाजी कैसे समाधान करेंगे कि उनका निराकार परमात्मा, जो कि भोग वाले लिंग से रहित है, वह आर्यसमाजियों की प्रार्थना पर उनके भीतर कैसे वीर्य का स्थापन करेगा? अतः तेज मानने में ही भलाई है।

तो परमात्मा के परिप्रेक्ष्य में वीर्य, लिंग, योनि, मैथुन, रमण, विहार आदि शब्दों के अर्थ सामान्य मनुष्य के अंगों व धातुओं के व्यवहार को ज्यों-का-त्यों लक्षित नहीं करते हैं। अगर पुराण में इसके वर्णन को आर्यसमाजी अश्लीलता व गंदा वर्णन कहते हैं, तब यह तो वेदों में भी है। तब आर्यसमाजी क्या करेंगे? किन्तु हमारे अनुसार अश्लीलता या गंदा वर्णन दोनों में नहीं है, क्योंकि वेद एवं पुराणों में सर्वांगीणता होती है, सर्वांगता में सब कुछ होता है। अर्थात् जो आज के समय के अनुसार, आज की बुद्धि के अनुसार हमें अश्लील लगता है, वह पारलौकिक परिप्रेक्ष्य में अश्लील नहीं है।

जैसे कि यजुर्वेद में मंत्र आता है - "रेतो॒ मूत्रं॒ विज॑हाति॒ योनिं॑ प्रवि॒शदि॑न्द्रि॒यम्" (यजुर्वेद १९।७६)। इस मंत्र का अर्थ आर्यसमाजी आचार्य अपने पास पढ़ने वाली कन्याओं के आगे क्या करते हैं? यह आर्यसमाजियों को अश्लील लगता है या नहीं?

ऋग्वेद में मंत्र आता है -"तां पू॑षञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॒ बीजं॑ मनु॒ष्या॒३॒॑ वप॑न्ति" (ऋग्वेद १०।८५।३७)। इस मंत्र का अर्थ ज़रा आर्यसमाजी अपनी कन्याओं के आगे क्या करते हैं? यह अश्लील लगेगा या नहीं?

ऐसे सैकड़ों उदाहरण यहाँ दिए जा सकते हैं। तुम पुराण में यह क्या खोजते हो? यह सब वेदों में भरा पड़ा है। वहीं से लेकर पुराण में इसका विस्तार है। पुराण वेदों के ही भाष्य हैं।

परमात्मा का शरीर ही पंचभूतों से नहीं बना होता है। दिव्य होता है। "वपुषो मदनुग्रहस्य स्वेच्छामयस्य, न तु भूतमयस्य कोपि" कहा गया है। भगवान शिव परमात्मा (पुरुष) हैं और माता पार्वती प्रकृति हैं। पुरुष और प्रकृति का संबंध नित्य है। यहाँ पति-पत्नीभाव भी मात्र लौकिक पति-पत्नी की भाँति न समझकर प्रकृति-पुरुष की भाँति ही दिव्य समझना चाहिए, भले ही पुराण में उसका वर्णन लौकिक ढंग से किया जाए। क्योंकि पुराण काव्य भी हैं। वे भी वेदों की रीति से वर्णन करते हैं। जैसे कि निरुक्त में "पृथिव्या पर्जन्येन वा वाय्वादित्याभ्यां च संभोगः अग्निना च इतरस्य लोकस्य" कहते हुए पृथ्वी का बादल, वायु, सूर्य आदि से भी संभोग कहा गया है। क्या आर्यसमाजी इसे लौकिक मैथुन मानेंगे? अब ये तो वायु और सूर्य दोनों का अर्थ परमात्मा करते हैं, तब क्या यह मानेंगे कि इनका परमात्मा ही परमात्मा से संभोग करता है?

अतः श्रीकृष्ण उस वीर्य में अर्थात् शिव जी के तेज में प्रविष्ट हुए और गणेशरूपी बालक बन गए। यह किसी एक कल्प की कथा है। हमारे अनुसार सृष्टि पहली बार नहीं हुई है, अनेक कल्प व्यतीत हो चुके हैं। अतः भिन्न-भिन्न कल्पों में इन कथाओं में भेद हो, तो कोई आश्चर्य का विषय नहीं है, कोई समस्या नहीं है।

समझना बड़ा मुश्किल है कि आर्यसमाजियों को आखिर आपत्ति किस बात से है? अगर संभोग से आपत्ति है, तो भाई, हमारे परमात्मा के लिए तो संभोग घृणा का विषय नहीं है। तभी तो उन्होंने सृष्टि को बढ़ाने के लिए यह संभोग की प्रक्रिया दे रखी है। तब संभोग से क्या समस्या है? नहीं, नहीं, इनको संभोग से समस्या नहीं है। इनके प्यारे दयानन्द तो भारत के एकमात्र ऐसे संन्यासी रहे हैं, जो इनकी स्त्रियों को नियोग के नाम पर ग्यारह भिन्न-भिन्न पुरुषों से संभोग करने का आदेश देकर गए हैं। इस एकादश नियोग का आनंद तो आर्यसमाज के आचार्य व अन्य दयानन्दी अवश्य ही लूटते होंगे। अतः समस्या संभोग से तो नहीं है।

फिर किससे समस्या है? क्या ऐसी इनको अप्राकृतिक लगने वाली कथाओं से है? किन्तु यह तो वेदों में भी हैं। देखिए - 

ऋग्वेद में आता है - "सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम्" (७।३३।१३)। यह पूरा प्रकरण ऋग्वेद में है। मित्र और वरुण ने ऊर्वशी को देखा, तो उनका वीर्य गिर गया। उन्होंने क्षरित हुए वीर्य को कुम्भ (घड़े) में डाल दिया, जिससे अगस्त्य और वसिष्ठ ऋषि ने जन्म लिया। ऐसी अलौकिक उत्पत्तियाँ तो वेदों में भी हैं। उन्हें भी अश्लील और गप्प मानोगे क्या?

 समझो इसे - देवताओं को किसी को उत्पन्न करने के लिए अथवा स्वयं उत्पन्न होने के लिए गर्भाशय की आवश्यकता नहीं होती है। वे संकल्प से ही सृजन कर लिया करते हैं। ये सब वेदों व वैदिक ग्रन्थों में भरा पड़ा है। तुम क्यों केवल पुराण की ही निंदा करते हो? अरे, स्वामी जी एकमुँहे साँप का आदेश दे गए हैं, दो मुँहे साँप का नहीं देकर गए हैं? क्या उसके कारण बुद्धि भी दोमुँही हो गई है कि ऐसी कथा वेदों में है, तो मुँह छिपाओगे और पुराण में है, तो पुराण को गाली दोगे?

अतः इससे भी आर्यसमाजियों को समस्या नहीं होनी चाहिए। फिर बचता है कि क्या इस विषय पर आपत्ति है कि परमात्मा भी संभोग कर रहे हैं? किन्तु इस पर भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वेदोक्त ब्रह्म को तो संभोग से कोई आपत्ति नहीं है। इसे वेद से ही दिखाते हैं - 

 स्वामी दयानन्द ने एक वेद मंत्र का अर्थ करते हुए लिखा है कि - "उस पुरुष (परमात्मा) के सामर्थ्य से घोड़े, ऊँट, गधे, गाय आदि उत्पन्न हुए हैं।" (यजु. ३१।८, दयानन्द भाष्य)

तब क्या कभी दयानन्दियों ने यह विचार किया कि निराकार ईश्वर ने ये सब जीव-जंतु आदि सृष्टि के समय कैसे उत्पन्न कर दिए? स्वामी दयानन्द के पास इसका उत्तर तो था, क्योंकि इसी मंत्र की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण में लिखी है, किन्तु स्वयं के लज्जित होने के कारण उन्होंने यह वर्णन नहीं किया। हम दिखा देते हैं।

स्वामी दयानन्द द्वारा वेदों का भाष्य माने जाने वाले, प्रामाणिक माने जाने वाले एवं ऋषिकृत ग्रन्थ माने जाने वाले शतपथ ब्राह्मण में इसी वेदमंत्र की व्याख्या में लिखा है - "आत्मैव इदमग्रे आसीत् पुरुषविधः" (१।४।१)। अर्थात्, सृष्टि के आरंभ में परमात्मा पुरुषाकृति था। इस पहले ही वाक्य से आर्यसमाज का ईश्वर का शरीर न मानने का ही सिद्धान्त खंडित हो जाता हैं।  

परमात्मा ही प्रथम था। वह पुरुष के समान आकृति था। उसने अपने चारों तरफ देखा, अपने से अन्य किसी को न पाया।"

उसने दूसरे की इच्छा की (स द्वितीयमैच्छत)।

उसने अपने दो भाग किए, अर्थात् अपने से स्त्री को उत्पन्न किया। (स ह एतावान् आस, यथा स्त्री-पुमांसौ संपरिष्वक्तौ स इममात्मानं द्वेधाSपातयत्।)

उस परमात्मा ने सृष्टि-उत्पत्ति हेतु अपने को ही पुरुष और स्त्री बनाया, फिर उस स्त्री से संयोग किया। उससे मनुष्य उत्पन्न हुए (_ _ ततो मनुष्या अजायन्त _ १।४।४-५)।

तब स्त्री ने विचार कर कि यह मुझे अपने से उत्पन्न कर मुझी से संयुक्त होता है, मैं अपना रूप बदल लूँ—वह गाय बन गई, परमात्मा बैल बन गया। और उनके समागम से गाय-बैल आदि उत्पन्न हुए। (सा गौरभवद् वृषभ इतरः _ _ ततो गावोऽजायन्त। (१४।४।२।६-७))

क्यों दयानन्दियों! यहाँ तो वेद के अनुसार ही परमात्मा मनुष्य रूप, बैल रूप सहित सभी जीवों के रूप रखकर संभोग कर रहा है या नहीं? अतः वेद के अनुसार तो परमात्मा को संभोग से कोई आपत्ति नहीं है।

हमने इस पर आर्यसमाज के एक विद्वान पंडित शिवशंकर के हिन्दी अनुवाद को भी देखा, जो कि वैदिक यंत्रालय, अजमेर आर्यसमाज से प्रकाशित है। उसमें वे लिखते हैं - "सो यह विचारने लगी कि मुझको अपने से ही उत्पन्न करके मेरे साथ सहवास करता है। वह 'गौ' हो गई। परमात्मा साँड हो गया। उससे इसने सहवास किया, तब गाय की जाति उत्पन्न हुई। पुनः वह स्त्री घोड़ी हो गई, वह घोड़ा हो गया। वह खच्चरी हो गई, वह खच्चर हो गया, वह गधी हो गई, वह गधा हो गया। _ _ पिपीलिकाओं से लेकर जो भी कुछ जोड़ा दिखता है, उस सबको उसने इसी प्रकार से रचा।"

"एवमेव यदिदं कृञ्च मिथुनम् आ पिपीलिकाभ्यः, तत्त सर्वमसृजत्" (शत. १४।४।२।९)—इस तरह पिपीलिका तक समूची सृष्टि परमात्मा ने की।

स्वामी दयानन्द जिस वेदमंत्र से ईश्वर के द्वारा गधा, बैल, घोड़ा, भेड़ आदि का पैदा होना कह रहे हैं, उसी वेदमंत्र की व्याख्या का यह जो शतपथ में विस्तार है, क्या इसे भी अश्लील मानेंगे दयानन्दी? क्या इसे भी गपोड़ा कहेंगे? यहाँ परमात्मा क्या कर रहे है, जो कर रहे है वही पुराणों में शिव-पार्वती करते हैं, वही श्री राधा कृष्ण करते हैं। 

अतः परमात्मा, जिसने कि सभी जीवों को इस प्रकार से रचा कि संभोग से ही प्रजा बढ़े, उसे स्वयं यह करने से कोई आपत्ति नहीं है। वह सृष्टि की उत्पत्ति ही ऐसे करता है। हाँ, उनका संभोग या उनके साकार स्वरूप का संभोग मनुष्य के जैसा नहीं होता है। इसे मनुष्य के समान समझना मूर्खता हैं।

अतः हमारा आर्यसमाजियों से कहना है कि आप लोग पुराण में जहाँ भी अश्लीलता का दर्शन करते हैं, वह अश्लीलता नहीं है, बल्कि वे सभी कथाएँ वेदमूलक हैं और उनमें रहस्य छिपे हैं। पुराण वेद का ही अनुसरण करते हैं। इनमें अलौकिक लीलाएँ लौकिक आश्रय से वर्णित हैं। अतः एक की निंदा करना उचित नहीं है। स्वामी दयानन्द के कहने से जो दोमुँहा साँप दबाए बैठे हो, उसे थोड़ी देर के लिए निकालकर चिंतन करो, समझ में आ जाएगा। नहीं आता है तब दोनों स्थान पर अश्लीलता का दर्शन करो। मनुष्य बनो , दोगले पशु के समान व्यवहार करने से बचो।

✍️ शचीन्द्र शर्मा ( 20 सितंबर 2026 फेसबुक पोस्ट)

No comments:

Post a Comment