भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।।7.4।।
- श्रीमद्भागवत गीता
भगवान कृष्ण गीता के सातवें अध्याय के 4 श्लोक में कहते है कि -
यह प्रकृति
पंच महाभूत (भूमि गगन वायु अग्नि नीर)
मन
बुद्धि
और मेरे अहSकार (DNA)से बना है।
भूमि गगन वायु अग्नि नीर को हम संक्षिप्त में भगवान कहते है।
महाभूत अर्थात महाजीव होता है
अर्थात
इन पंच महाभूतों ने महाजीवों ने मिलकर एक भौतिक ढांचा निर्माण किया
जिसे अणु कहा गया है
इन अणुओ से बने शरीर में जब
मन
बुद्धि
और
अहमsकार (जीवन शुरू करने वाला एक निश्चित आकार अर्थात DNA)
आ जाता है तो फिर जीवन की शुरुआत हो जाती है।
DNA से बनी एक कोशिका टूटकर 2 कोशिका बनाती है
2 टूटकर 4,4 से 8, 8से 16 ऐसे कोशिका बनते चले जाते है।
और यह दिखाई देने वाली प्रकृति बन गई।
सब जीवों में चाहे वह पेड़ पौधे हो या जीव जंतु सबमें DNA का स्ट्रक्चर एक जैसा ही है।
अरबों खरबों DNA से बने इस हमारे
शरीर का संचालन हाथ पैर करते है
लेकिन हाथ पैर को कार्य करने के लिए आंख कान नाक जीभ प्रेरित करते है
इन इंद्रियों को शक्ति मन देता है
मन भी एक पूरा का पूरा इंद्री है,अर्थात अंग है
जैसे नाक कान आंख हाथ पैर जैसे है वैसे ही मन भी शरीर का एक अंग है।
मन का निर्धारण बुद्धि करती है
अगर बुद्धि ने किसी बात को मान लिया तो मन सारे शरीर को उसी काम में लगा देता है
तो
शरीर का सुप्रीम बुद्धि हो गया।
मन सेनापति है तो बुद्धि उसका निर्देशक है
जहां बुद्धि लग जाती है वहां मन भी लग ही जाता है
मन के हारे हार है
मन के जीते जीत
जहां बुद्धि लग जाती है वहां मन को सफलता मिल ही जाती है
बुद्धि हर कार्य को सरल बना देती है,हर इच्छा को पूर्ण करने का उपाय ढूंढ लेती है,
बुद्धि ही आदमी को बाहर अंतरिक्ष तक लेकर जाती है,
बुद्धि ही आदमी को अंदर आध्यात्म तक भी लेकर जाती है
बुद्धि आदमी को सुख की ओर भगाती है
बुद्धि ही आदमी को संतुष्टि भी सिखाती है
बुद्धि ही परम चेतना है
बुद्धि को स्थितप्रज्ञ होने के लिए कहा गया है
बुद्धि स्थिर होगी तो मन स्थिर होगा,
तो इंद्रियां भी स्थिर हो जाएंगी,मन और इंद्रियों का भटकाव विषय वासनाओं में से परे किसी एक कार्य में स्थिर हो जायेगा,इसी लिए प्राचीन ऋषि मुनि मन को स्थिर रखने के लिए ध्यान साधना तप की बात करते थे,आज के साधारण इंसान ध्यान साधना तप नहीं कर सकते तो पूजा करके मन को स्थिर रखने का अभ्यास करना विद्वानों ने सिखाया।
मानव मस्तिस्क को यदि किसी दीवाल पर टांग दिया जाए तो वह भगवान गणेश की तरह दिखाई देता है
बड़ा मस्तक, हाथी वाला सूंड,बड़ा पेट,पद्मासन पैर
सेम
गणेश भगवान के आकार के सदृष्य
क्योंकि
मन यानी कार्तिकेय है
बुद्धि यानी गणेश ही है
दोनों को जन्म दिया है इस प्रकृति के निर्माणकर्ता परम पिता (पुरुष) और प्रकृति (माता) ने,
जिसे हम शिव और शक्ति,शंकर और पार्वती कहते है।
जो मस्तिष्क सब कुछ करवा रहा है
इह लोक (भौतिक दुनिया)से पर लोक (सूक्ष्म दुनिया) तक जाने का मार्ग प्रशस्त करता है उसकी पूजा क्यों न की जाए..?
किस स्वरूप में की जाए
ये तत्कालिक बुद्धि पर निर्भर करती है
जिसकी जैसी बुद्धि होगी वह वैसी स्वरूप में पूजा करेगा।
पर
प्राप्त सबको होगा।
मै देख रहा हूं आजकल के बच्चे सब हाई ब्रीड पैदा हो रहे है
वनवासी या जंगल में रहने वाले माताओं के बच्चों में भी एक अलग ही बुद्धिमत्ता विकसित हो गई है।
या DNA की यात्रा है।
हम अपने 4,5 पीढ़ी पूर्व के पहले के दादा दादी को भूल चुके है पर DNA नहीं भूलता किसी भी नाती पोते में पूर्वजों के नाक कान आंख का अक्श आ जाते है,यह DNA की मेमोरी(बुद्धि) है,एक DNA में इतनी मेमोरी(बुद्धि) है जितनी पूरे गुगल की डाटा में नहीं होगी।
इतना ही नहीं
DNA इस मेमोरी को अगले 7 पीढ़ी तक की यात्रा तक ले जाता है,
जिसे आजकल के वैज्ञानिक DNA डिकोडिंग करके समझने की कोशिश की जा रही है
प्रकृति निर्माण करने वाली 8 सूक्ष्म विधाएं
पंच महाभूत
मन
बुद्धि
अहमSकार (DNA)
इनको जिसमें समझ लिया
समझो उसने मंजिल देख लिया
गणेश चतुर्थी की आप सब फेसबुक मित्रों को शुभकामनाएं
गणेश चतुर्थी पर प्रोफेसर ताराचंद बेलजी की फेसबुक पोस्ट से
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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