पहली तो यह कि जेवर क्षेत्र का संबंध महर्षि जाबालि से माना जाता है, जिनके लिए रामायण में कहा गया - “आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तमः। यदि आर्यसमाज वास्तव में समस्त ऋषि-परम्परा का संवाहक होता, जैसा कि वह दावा करता है, तब इनको महर्षि जाबालि का नाम आगे रखना चाहिए था। किंतु अपने पंथ के प्रवर्तक दयानन्द के नाम की मांग करना स्पष्ट करता हैं कि यह एक बाबा-पंथ है जिसका उद्देश्य है अपने पंथ प्रवर्तक को हर जगह घुसाना।
दूसरा - किसी प्रतिष्ठान का नाम अनुयायी अपने पंथ-प्रवर्तक के नाम पर रखवाना भी चाहे तो उसके कारण बताए जाते हैं कि - वे तो बड़े समाज सुधारक थे या बड़े धार्मिक नेता थे आदि आदि ।
किन्तु आर्यसमाज के नेताओ का "उचित कारण"देखिए, इनका कहना हैं कि - "जेवर में एयरपोस्ट की स्थापना हुई हैं, "इसलिए" इसका नाम महर्षि दयानन्द सरस्वती अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा जाना चाहिए।
यानि इनके हिसाब से - कही भी कुछ भी स्थापित हो, तो चूंकि वह स्थापित हुआ है ये ही अपने आप में बड़ा कारण है कि उसका नाम दयानन्द के नाम पर रख दिया जाए। धन्य हो। :)
बताइये भला ऐसा विलक्षण कारण अन्य कोई वर्ग या समाज दे सकता था क्या ? :) #मूर्ख_अनार्य_समाज
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