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Sunday, 4 January 2026

"राम" मनुष्य जीवन में सत्य सनातन वैदिक धर्म आचरण प्रेरणा का मंत्र हैं।

                        🚩जय श्रीराम 🙏
#अयोध्या आने के बाद एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते #श्रीराम से भरत भैया ने कहा , "एक बात पूछूँ" ? भईया !!

माता #कैकेई ने आपको #वनवास दिलाने के लिए मँथरा के साथ मिल कर जो 'षड्यंत्र' किया था , क्या वह #राजद्रोह नहीं था ?

उनके 'षड्यंत्र' के कारण एक ओर #राज्य के भावी #महाराज और #महारानी को (14) चौदह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा तो दूसरी ओर #पिता महाराज की दु:खद मृत्यु हुई ।

ऐसे 'षड्यंत्र' के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो #मृत्युदण्ड दिया जाता है , फिर आपने माता कैकई को #दण्ड क्यों नहीं दिया ?

#राम मुस्कुराए....बोले, "जानते हो #भरत !!

किसी #कुल में एक #चरित्रवान और #धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले , तो उसका जीवन उसके #असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है । जिस "माँ" ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो , उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है ..भरत ?

(भरत सन्तुष्ट नहीं हुए)

कहा , "यह तो मोह है भईया ; और "राजा का दण्डविधान" मोह से मुक्त होता है । कृपया एक #राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दण्ड क्यों नहीं दिया ? यूँ समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है ।

राम गम्भीर हो गए... कुछ क्षण के मौन रहने के बाद कहा , "अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड' है भरत !!”

माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है । वनवास के (14) चौदह वर्षों में हम - चारों भाई अपने - अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं ; पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं ।

अपनी एक भूल के कारण उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख - सम्मान खोया, फिर भी वे उस "अपराध - बोध" से कभी मुक्त न हो सकीं ।

वनवास समाप्त हो गया.... तो परिवार के शेष - सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए ; पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं ।

कोई 'राजा' किसी "स्त्री" को इससे कठोर - दण्ड क्या दे सकता है ?

मैं तो सदैव यह सोचकर दुखी हो जाता हूँ कि "मेरे कारण (अनायास ही) मेरी माँ को इतना कठोर - दण्ड भोगना पड़ा ।"

राम के नेत्रों में पानी उतर आया था ,

और भरत, लक्ष्मण, भरत आदि भाई मौन हो गए थे ।

राम ने फिर कहा...और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत !!....यदि मेरा वनवास न हुआ होता, तो संसार 'भरत' और 'लक्ष्मण' जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृ - प्रेम को कैसे देख पाता ?

मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था , पर तुम - दोनों ने तो मेरे - स्नेह में (14) चौदह वर्ष का "वनवास" भोगा । "वनवास" न होता तो यह संसार सीखता कैसे.......कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है ?"

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे ।

वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए !!


"राम" कोई नारा नहीं हैं, "राम" मनुष्य जीवन में सत्य सनातन वैदिक धर्म आचरण प्रेरणा का मंत्र हैं।
एक चरित्र हैं और "मानव" जीवन जीने की शैली हैं !! 

                           जय श्रीराम 
                     ✍️ संतोष द्विवेदी
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Friday, 2 January 2026

"व्यक्ति की मृत्यु से राष्ट्र की मृत्यु नहीं होती। हम राष्ट्र की दीर्घायु के लिए मर रहे हैं, यही हमारा चयन है।"

॥ॐ॥
मैना!

तेरह वर्ष की उस बालिका को पिता ने आदेश दिया था, "युद्ध में पकड़े गए अंग्रेज बच्चों और स्त्रियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देना। सभ्यता की प्रतिष्ठा का प्रश्न है, इनपर कोई आंच न आने पाए। इन बर्बर लुटेरों के ये वंशज कभी यह न कह पाएं कि भारत के योद्धा स्त्रियों का सम्मान नहीं करते थे।"
      1857 का साल था। कानपुर ही क्या, देश जल रहा था। राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के प्रण के साथ निकली क्रांतिकारियों की सेना कानपुर पर कब्जा जमा चुकी थी। अधिकांश अंग्रेज मारे गए थे और शेष भाग गए थे। भागते समय उन्हें अपनी पत्नियों बच्चों का शायद ध्यान नहीं आया था। पर क्रांतिकारियों को तो भारतीय परम्परा का ध्यान था। सो यह जिम्मेवारी उस बालिका को दी गयी।
       कानपुर जीत चुके क्रांति दल को वहीं रुकना तो था नहीं। वे अपने बलिदान के मूल्य पर स्वतंत्रता की अलख जगाने निकले थे। उनकी यात्रा लम्बी थी। दल का नेतृत्व कर रहे पेशवा नाना साहेब आगे निकले।
      अंग्रेजों को जैसे ही पता चला कि नाना साहब आगे बढ़ गए, वे फिर कानपुर में घुस गए। उसी समय एक टुकड़ी की दृष्टि अंग्रेज स्त्रियों और बच्चों को लेकर चल रही उस बालिका पर पड़ी। पल भर में फिर तलवारें खींच गईं। कुछ मिनटों तक चले युद्ध में बालिका का इकलौता अंगरक्षक वीरगति पा गया और बालिका पकड़ ली गई। घुड़सवार अंग्रेज ने बालिका से पूछा, "कौन है तुम?"
बालिका ने सहज भाव से उत्तर दिया- मैना! पेशवा नाना साहब की बेटी मैना!
     अंग्रेजों को जैसे बड़ी निधी मिल गयी। लगा, अब तो नाना साहब भी पकड़ में आ जाएंगे। इस बच्ची को तोड़ लेना कितनी देर का काम है... उन्होंने बच्ची पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह क्रांतिकारियों का पता बताए। 
    पर वह तो पेशवा की बेटी थी न! महान योद्धा बाजीराव की परम्परा से थी, वह क्या ही टूटती। अंग्रेजों ने उसे बहुत भय दिखाया, पर उसके ऊपर कोई असर नहीं हुआ।
     दुनिया पर अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता थोपने निकले अंग्रेज अपनी औकात पर उतर आए। उन्होंने बालिका को एक पेड़ में बांध दिया और क्रूरता से पीटने लगे। पीड़ा से तिलमिला उठी बच्ची फिर भी शांत रही। अंग्रेज ने कहा- अब से भी अपने साथियों का पता बता दो, हम तुम्हें छोड़ देंगे।
      बालिका के अधरों पर मुस्कान उभरी। कहा, "एक अपने प्राण की रक्षा के लिए असंख्य योद्धाओं के प्राण सङ्कट में डालूँ, जीवन का इतना भी मोह नहीं। आप जो कर रहे हैं कीजिये, मुझे मृत्यु का भय नहीं।"
     अंग्रेज कांप उठा। उसने मृत्यु के भय से धर्म छोड़ते लोगों को तो हजार बार देखा था, पर राष्ट्रधर्म के लिए मृत्यु को इतनी सहजता से स्वीकार करती बालिका को पहली बार देखा था। उसने पेड़ के आसपास सुखी लकड़ियां खड़ी करवाई और आग लगा दिया। स्वयं को सभ्य बताने वाले बर्बर लुटेरे एक नन्ही बालिका को जीवित जला रहे थे। अंग्रेज ने निकट जा कर फिर पूछा- "तुम हमारी ही स्त्रियों को सुरक्षित पहुँचाने आयी थी और अब हम ही तुम्हे जिंदा जला रहे हैं। तुम्हे नहीं लगता कि तुम मूर्ख हो?"
      अग्नि अब बालिका के शरीर को छूने लगी थी। जीवित जलने की पीड़ा उसके चेहरे पर उभर रही थी। उसने साहस बटोर कर कहा- इस प्रश्न का उत्तर अपनी स्त्रियों की आँखों में ढूंढना। मेरा क्या, मेरा बलिदान मुझे और मेरे राष्ट्र दोनों को अमर कर देगा।
      अंग्रेज ने देखा अपनी स्त्रियों की ओर, उन सब की आंखों से अश्रु बह रहे थे। उनके हाथ जुड़े हुए थे, और मस्तक लज्जा से झुका हुआ था।
        अंग्रेज ने पूछा- लेकिन इससे मिला क्या? हमने तो तुम्हे मार ही दिया।
        पीड़ा के चरम में भी मुस्कुरा उठी लड़की। कहा, "व्यक्ति की मृत्यु से राष्ट्र की मृत्यु नहीं होती। हम राष्ट्र की दीर्घायु के लिए मर रहे हैं, यही हमारा चयन है। आज तुम इसे नहीं समझ पाओगे, पर एक न एक दिन दुनिया समझेगी कि हमारा बलिदान कितना आवश्यक था।"
       कुछ देर में ही उस बालिका की केवल राख बची, पर किसी ने उसकी चीख नहीं सुनी थी। वह पेशवा भारत माता की बेटी थी।
✍️ऋषि कण्डवाल
_वयं राष्ट्रे जागृयाम_