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Tuesday, 14 July 2026

मन की नियमावली ( Manual Of Mind )

                         श्रीमद्भगवद्गीता 
                       मन की नियमावली 
                    ( Manual Of Mind )
           पक्ष और विपक्ष में हम क्यों खड़े होते हैं?

भगवान श्री कृष्ण इसका उत्तर देते हैं :-

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
       ( गीता - ३.३४ )

हमारा मन और बुद्धि सदैव सापेक्ष में काम करते हैं। 
सापेक्ष अर्थात तुलना में। नमक की तुलना मिठास से, दिन की तुलना रात से, आदि आदि। यह नियम है। ऐसे ही हमारा माइंड काम करता है। 

आधुनिक शब्दों में लाइक और डिसलाइक। हम जिसके भी संपर्क में आते हैं, जिनसे भी हमारा साक्षात्कार होता है - व्यक्ति, वस्तु, विचार या भाव, उनको हम या तो पसंद करते हैं या नापसंद। जिनके आप संपर्क में नहीं हैं, उनके लिए यह नियम नहीं लागू होता। 

तो पहली बात जिन विचारों को हम अपना मान लेते हैं वे हमसे नहीं निकले, वरन हमने किसी न किसी से उधार ले रखा है। परंतु उनसे तादात्म्य के कारण हम उन्हें अपना मान बैठते हैं।

और विचार वाष्प की भांति हैं बादल की भांति - उड़ते हुए, हजारों लाखों की संख्या में प्रतिदिन विचार हमारे मन में मंडराते रहते हैं। 

फिर बात आती है भाव की, इमोशन्स की। इमोशन विचारों के घनीभूत रूप हैं, पानी जैसा। आप पहले किसी को पसंद या नापसंद करते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि आप उसे अधिक पसंद या नापसंद करने लगते हैं। और फिर और अधिक, और अधिक। एक समय आता है कि आपको लगता है कि आप उसके बिना जी ही नहीं सकते। 
लेकिन कब तक ऐसा होगा? जब तक वह आपकी अपेक्षाओं के अनुकूल व्यवहार करता है।

देखा है न - सारे समाज और अपने परिवार से द्रोह करके - प्रेम विवाह किया। लेकिन फिर कुछ वर्ष बाद - झंझट झगड़ा शुरू हुआ, और फिर विवाह विच्छेद। जिनके बिना कभी जी नहीं सकते थे, उनके साथ अब जीना संभव नहीं है। 

ठीक ऐसा ही नियम डिसलाइक या नापसंदगी के साथ भी होता है। 

विचार और भाव के स्तर पर हमारे अंदर बदलाव संभव है। जिनको हम पसंद करते थे, उनको कल हम नापसंद कर सकते हैं। जिनके बिना हम जी नहीं सकते थे, उनके साथ जीना जहर के घूंट पीने जैसा लग सकता है।

तीसरे स्तर पर है - अवधारणा - firm believe. एक विचार या विचारधारा से इस तरह चिपक जाना, जैसे बंदरिया का बच्चा अपनी मां से चिपक जाता है। मर जाएगा लेकिन छोड़ेगा नहीं। किसी विचार या भाव को अंतिम सत्य मानकर उसके साथ खड़े होना। प्राण प्रण के साथ। जीवन और मृत्यु को अलग रखकर। अब जो विचार वाष्प से पानी बना था, अब बर्फ बन चुका है। बर्फ कहना भी गलत होगा - हिमखंड कहिए, जो पिघलता नहीं है। पत्थर, शिलालेख। 
जो टस से मस नहीं हो सकता। प्राणों का बलिदान स्वीकार है परंतु विचारधारा को खंडित नहीं होने देंगे। 

प्रायः विचार, विचारधाराओं को, इसी तरह स्थापित किया जाता है, आपके मन में आपकी पहचान बनाकर। 
तभी तो कोई व्यक्ति, भिन्न मत और विचारधारा वालों की हत्या करने हेतु, स्वयं को बम बनाकर आत्महत्या कर लेता है। 
हम प्रतिदिन न सही वर्ष में सैकड़ो दिन इन घटनाओं का साक्षात्कार करते हैं। 

उन्हीं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है यह। 

कहने का तात्पर्य है कि राग और द्वेष हमारे मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति हैं, लेकिन इन्हीं के कारण हम निरंतर पक्ष और विपक्ष में बंटे रहते हैं। हम सापेक्षता (तुलना) में जीते हैं — Like-Dislike, पसंद-नापसंद, प्रेम-घृणा। धीरे-धीरे हल्के विचार भावनाओं में, और भावनाएँ कठोर विश्वासों में बदल जाते हैं। यही विश्वास हमें इतना अंधा बना देते हैं कि हम अपने पक्ष के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं।परिणाम?
व्यक्तिगत जीवन में तनाव, रिश्तों में टूटन, और सामाजिक स्तर पर द्वेष, हिंसा तथा विभाजन।
सच्चा समाधान गीता हमें यही सिखाती है —
राग-द्वेष को जानो, लेकिन उनके वश में मत आओ।
इन्हें अपने शत्रु समझकर उनसे ऊपर उठो। जब मन राग-द्वेष से मुक्त होता है, तभी वह सच्ची शांति और स्पष्ट बुद्धि प्राप्त करता है।

         .... ✍️ साभार - भगवद्गीता समूह
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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