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Tuesday, 29 September 2026

अदीन अर्थात स्वावलंबी और स्वतंत्र जीवन जियो ।

                               !! ॐ‌ !!
 अदीन अर्थात स्वावलंबी और स्वतंत्र जीवन जियो 

     यजुर्वेद के ३६ वें अध्याय का २४ वाँ मंत्र कर्मप्रधान, पुरुषार्थी और ऊर्जस्वित जीवन की यात्रा का सर्वश्रेष्ठ परिचायक है:-

‘ओ३म् तच्चक्षुर्देवहितम् पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम् शरद: शतं जीवेम् शरद: शतं श्रणुयाम् शरद: शतं प्रब्रवाम् शरद: शतमदीना: स्याम् शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात्॥

• ऋषि: दध्यङ्ङाथर्वण (दधीचि) ऋषि
• देवता: सूर्य देवता
• छंद: भुरिग्ब्राह्मी छंद

 इस मंत्र को हमारे दैनिक संध्या में भी सम्मिलित किया जाता है। ऋषि दध्यङ्ङाथर्वण (दधीचि) के अनुसार यह  मंत्र केवल दीर्घायु प्राप्त करने की कामना का मंत्र ही नहीं बल्कि इस मंत्र को हमें पूर्ण ब्रह्मचर्य, शारीरिक आरोग्यता, मानसिक स्वाधीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक समग्र घोषणा पत्र माना जाना चाहिए।

  ब्रह्मचर्य, शारीरिक आरोग्यता, मानसिक स्वाधीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व का पवित्र भाव संपूर्ण मानवता के लिए हितकारी घोषणा पत्र है। आज संसार में सर्वत्र कोलाहल है। अधिकारों की मारामार है। रोग, शोक, मानसिक पराधीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा पूर्ण दृष्टिकोण मनुष्य को खाता जा रहा है। मानवता सिमट रही है। इसलिए ऋषि दध्यङ्ङाथर्वण (दधीचि) के इस प्रिय मंत्र की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।
    दध्यङ्ङाथर्वण (दधीचि) के अनुसार " वह परमात्मा, जो विद्वानों (देवों) का परम हितैषी है, जो सृष्टि के प्रारंभ से ही न्याय और सत्य के प्रकाश के साथ विद्यमान है, और जो ज्ञान का परम शुद्ध स्वरूप है। व्यावहारिक अर्थ में, यह ब्रह्मांड के भौतिक चक्षु 'सूर्य' और आध्यात्मिक चक्षु 'ज्ञान' दोनों का बोधक है।
 हम सब सौ वर्षों (शरद ऋतुओं) तक अपनी आँखों की पूर्ण ज्योति के साथ संसार को देखते रहें।
हम रोगमुक्त होकर कम से कम सौ वर्षों तक कर्मठ जीवन जिएँ। हमारे कान सौ वर्ष तक सत्य उपदेश और कल्याणकारी ज्ञान सुनते रहें। हमारी वाणी सौ वर्ष तक सत्य, मधुर और विद्यायुक्त वचनों का प्रचार करती रहे। सबसे महत्वपूर्ण पद—हम सौ वर्ष तक किसी के अधीन या दीन-हीन (लाचार) न रहें, बल्कि पूर्णतः आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बने रहें और यदि ईश्वर की कृपा और हमारे पुरुषार्थ से आयु सौ वर्ष से भी अधिक हो, तो वह अतिरिक्त समय भी इसी प्रकार स्वस्थ, ज्ञानयुक्त और स्वाधीन होकर बीते।"
  इस मंत्र में ऋषि ने सौ शरद ऋतुओं की बात की है। सौ शरद ऋतुओं की ही बात क्यों की गई, यह बात विचार करने योग्य है ? बात स्पष्ट है कि शरद ऋतु के काल में ही अनेक प्रकार के रोग समाज में फैलते हैं। यदि शरद ऋतु के समय फैलने वाले उन रोगों को व्यक्ति झेल जाता है तो फिर लगभग एक वर्ष का स्वास्थ्य बीमा उसका बढ़ जाता है। इन सौ शरद ऋतुओं को प्राप्त करने में ब्रह्मचर्य की शक्ति बहुत महत्वपूर्ण काम करती है। बिना इंद्रिय संयम के दीर्घायु को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने आयुर्वेद की खोज की। आंखों की देखने की शक्ति कानों से सुनने की शक्ति और अंग पतंग का स्वस्थ रहना तभी संभव है जब मनुष्य संयमित आहार-विहार रखे और वीर्य रक्षा (ब्रह्मचर्य) के द्वारा अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाए। 
वेद के किसी भी मंत्र का केवल अर्थ कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। केवल अर्थ कर लेने मात्र से तो हम उस मंत्र का एक पक्ष ही देख पाते हैं। वास्तव में अर्थ के बाद मनन और मनन के बाद निदिध्यासन बहुत आवश्यक है। मनन में एक ही मंत्र के अनेक अर्थ निकलकर आते हैं। मनन की इस प्रक्रिया में हमारी अनेक मानसिक शक्तियों का विकास होता है। उनको खुलकर खिलने अर्थात मुखरित होने का अवसर मिलता है।
मंत्र की अलग-अलग और ऊंची से ऊंची भूमियों से हमारा परिचय होता जाता है।
  इस मंत्र की शक्ति पर भी विचार कीजिए। प्रथम दृष्टि या तो ऐसा लगता है कि जैसे हम अपनी इंद्रियों की देखने सुनने आदि की शक्ति को निरंतर बनाए रखने की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से कर रहे हैं परंतु यह शक्ति तभी स्थाई रूप से रह सकती है जब हम उसकी सुरक्षा के लिए स्वयं भी तत्पर होंगे। हमारी यह तत्परता स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की हमारी प्राथमिकता को इंगित करती है। हम अपने अंग प्रत्यंग का ध्यान रखें। उसकी शक्तियों का विकास करते रहें। उसकी शक्तियों में कभी भी क्षरण न होने पाए, इस बात का ध्यान रखें। महर्षि दधीचि महाराज इस मंत्र के बारे में हमें बताते हैं कि यह मंत्र हमें स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा देता है।

 मानसिक और बौद्धिक सक्रियता

मंत्र में प्रयुक्त 'श्रणुयाम् ' और 'प्रब्रवाम् ' अर्थात सुनें और बोलें को केवल भौतिक क्रिया ही नहीं समझना चाहिए। उनके पीछे भी एक मनोविज्ञान काम कर रहा है। वेद के ऋषि की मान्यता है कि मनुष्य एक सौ वर्ष तक बौद्धिक रूप से सक्रिय रहना चाहिए। उसकी कोई भी इंद्रिय शिथिल नहीं होनी चाहिए। उसकी मनन शक्ति भी सक्रिय रहनी चाहिए।
मनुष्य निरंतर वेद-विद्या और सत्य ज्ञान को सुनता रहे, स्वाध्याय करता रहे और सत्संग भी करता रहे। उसका गहन चिंतन मंथन निरंतर जारी रहे। ऋषि-मुनि संत और आर्य महापुरुष कहते हैं कि वेद का पढ़ना और पढ़ाना सुनना और सुनाना आर्यों का परम धर्म है। बात स्पष्ट है कि वेद को पढ़ना तो है ही दूसरों को पढ़ाना भी है और जो पढ़ नहीं सकते दूसरों को पढ़ा नहीं सकते , वे सुनें और दूसरों को सुनाएं। सुने हुए को भी अपने पास नहीं रखना बल्कि उसे भी बांट देना है। इसका एक अभिप्राय यह भी हुआ कि संसार में रहकर जो कुछ भी प्राप्त किया ,वह संसार के लिए कल्याण के लिए लगा दिया। यह तभी संभव है जब हमारी मानसिक शक्तियां काम करती रहेंगी। सोचने समझने की शक्ति काम करती रहेगी अर्थात हम स्वस्थ अनुभव करेंगे। प्रवचन और शिक्षा दोनों अपने पास रखने की वस्तु नहीं हैं। इनको जितना अधिक बांटा जाता है उतना ही इनके कोष में वृद्धि होती है। संस्कृत के नितीकार का वचन है कि :-

न चौरहार्यं न च राजहार्यं न च भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥ 
( सुभाषित )

  अर्थात ' विद्या को न तो चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है। न भाइयों के बीच इसका विभाजन हो सकता है और न ही यह वजन में भारी होती है।इसे खर्च करने (बांटने) पर यह नित्य प्रति बढ़ती है।इसलिए विद्या रूपी धन सभी धनों में सबसे प्रधान (श्रेष्ठ) है। "
  इसी भाव के दृष्टिगत हमारी आश्रम व्यवस्था में चौथा आश्रम संन्यास आश्रम कहलाता है। जिसमें व्यक्ति जीवन भर के संचित सामान को समाज के लिए बांट देता है। भौतिक धन को वह पुत्र पौत्रादिक में विभाजित कर देता है। राजा अपने राज्य को अपने योग्य उत्तराधिकारी को सौंप देता है और जो विद्याध्ययन करके ज्ञानार्जन किया है ,उसे भी हमारे पूर्वज संसार को बांटने के लिए निकल जाते थे। यह बहुत अच्छी परंपरा थी। इसी मंत्र की विस्तृत व्याख्या में यदि जाएंगे तो स्पष्ट पता चलता है कि बांटना हमारा एक मौलिक संस्कार है। हमने निष्क्रिय अथवा निकम्मा जीवन जीने वाले न हों बल्कि सक्रियता के साथ काम करने वाले बने रहें।अंतिम क्षण तक हमारे शरीर में ऊर्जा काम करती रहे।

साभार 
डॉ राकेश कुमार आर्य 
( सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
संक्षिप्त संपादन - पं० चंद्रशेखर शर्मा 


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