एक-प्राचीन भारतीय दर्शन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि
प्राचीन भारतीय दर्शन कुल नौ हैं। उनमें तीन वेदेतर दर्शन हैं—चार्वाक, जैन और वौद्ध तथा छ: वैदिक दर्शन हैं—जैमिनि का मीमांसा (या पूर्वमीमांसा), गौतम का न्याय, कणाद का वैशेषिक, कपिल का सांख्य, पतंजलि का योग और बादरायण (व्यास?) का वेदांत (या उत्तर मीमांसा)।
चार्वाक दर्शन
चार्वाक दर्शन शुद्ध भौतिकवादी है। उसके अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र प्रमाण है। सभी अप्रत्यक्ष प्रमाण संदिग्ध एवं निराधार हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान से ज्ञेय जड़ जगत् चार भौतिक तत्वों से निर्मित है—वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। संसार के सभी द्रव्य इन्हीं चार मूल तत्वों से बने हैं। आत्मा के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं। चेतन प्राणी और उसके शरीर में कोई भेद नहीं। यह कथन असत्य है कि चेतना की उत्पत्ति भौतिक तत्वों से नहीं हो सकती। भौतिक तत्वों से चेतना की उत्पत्ति शरीर के विशेष गुण का फलित है। कई वस्तुओं के संयोग से नई वस्तु की उत्पत्ति प्रत्यक्ष प्रमाणित है। इस तरह के संयोग से निर्मित वस्तुओं में नवीन गुणों का प्रादुर्भाव हो जाता है। एक ही वस्तु की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं मे नये-नये गुणों का सन्निवेश देखा जाता है। पान, सुपाड़ी और चूने में से किसी में लाल रंग नहीं होता किंतु उन्हें एक साथ चबाने से लाल रंग की उत्पत्ति हो जाती है। गुड़ में मादकता नहीं होती किंतु उसके सड़ने पर मादकता आ जाती है। जिस तरह भौतिक तत्वों के विशेष ढंग से मिश्रित होने पर जीव का शरीर बनता है, उसी तरह उसमें चेतना का संचार भी हो जाता है। मानव-शरीर के नष्ट होने पर चेतना भी नष्ट हो जाती है, उसका कुछ भी अवशिष्ट नहीं रहता। इसलिए मृत्यु के बाद कर्मों के फल-भोग की कोई संभावना नहीं। ईश्वर का अस्तित्व भी प्रत्यक्ष ज्ञान से अप्रमाणित है, इसलिए उसके द्वारा संसार की सृष्टि का प्रश्न ही नहीं उठता। ईश्वर की आराधना और स्वर्ग की कामना निरर्थक हैं। वेदों और पुरोहितों में श्रद्धा रखना भी मूर्खता है। दु:ख से मिश्रित होने के कारण सुख त्याज्य नहीं है। भूसे के कारण अन्न का परित्याग नहीं किया जाता। पशुओं द्वारा चरे जाने के भय से अनाज बोकर फ़सल उगाना बंद नहीं किया जाता। इसलिए जीवन को अधिक से अधिक सुखमय बनाना और दु:ख से अधिक से अधिक बचने का प्रयास करना ही जीवन का लक्ष्य है।
जैन दर्शन
जैन दर्शन प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अनुमान को भी प्रमाण मानता है। इससे और आगे बढ़कर वह ‘शब्द’ को भी प्रमाण मानता है। आध्यात्मिक विषयों का गूढ़ ज्ञान प्रत्यक्ष और अनुमान से संभव नहीं। विश्वासयोग्य पुरुषों के उपदेश ही शब्द प्रमाण हैं जिनसे सत्य का ज्ञान हो सकता है। जैन दर्शन ईश्वर को नहीं मानता किंतु 24 तीर्थंकरों को सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान, इसलिए उनके उपदेशों को शब्द प्रमाण मानता है। जैन दर्शन स्याद्वादी है। उसके अनुसार कोई भी वस्तु एक दृष्टि से भावात्मक है तो दूसरी दृष्टि से अभावात्मक। भिन्न-भिन्न दृष्टियों से विचार करने पर एक ही वस्तु के भिन्न-भिन्न धर्म ज्ञात होते हैं। सभी प्राणियों के प्रति दया तथा अन्य मतों के प्रति आदर भाव जैन दर्शन का विशेष गुण है।
बौद्ध दर्शन
गौतम बुद्ध के उपदेशों पर आधारित बौद्ध दर्शन ईश्वर पर कोई विचार नहीं करता। बौद्ध दर्शन का लक्ष्य अप्रत्यक्ष दार्शनिक प्रमेयों—आत्मा, जगत्, पाप-पुण्य, मोक्ष--पर विचार करना नहीं, मनुष्य के दु:खों के अंत का उपाय ढूँढ़ना है। जन-साधारण के लिये महात्मा बुद्ध के उपदेशों का सार चार आर्य सत्यों में निहित है—एक, सांसारिक जीवन में दु:ख है; दो, दु:खों का कारण है; तीन, दु:खों से निवृत्ति संभव है, और चार, दु:खों से निवृत्ति का उपाय है। दु:खों से निवृत्ति के आठ मार्ग हैं—एक, सम्यक् दृष्टि; दो, सम्यक् संकल्प: तीन, सम्यक् स्मृति; चार, सम्यक् वाक्; पाँच, सम्यक् कर्म; छ:, सम्यक् आजीव; सात, सम्यक् व्यायाम; आठ, सम्यक् समाधि। ये अष्टांग साधन अविद्या तथा तृष्णा को दूर करते हैं। इनके फलस्वरूप निर्मल बुद्धि, दृढ़ संकल्प और शांति की प्राप्ति होती है। इस प्रकार दु:ख का पूर्ण विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म की संभावना समाप्त हो जाती है। इसी अवस्था को निर्वाण कहते हैं। निर्वाण की प्रकृति क्या है, बुद्ध इस पर चुप हैं। निर्वाण सांदृष्टिक है, जिसे प्राप्त हो जाता है उसी को अनुभूत होता है।
मीमांसा दर्शन
छ: वैदिक दर्शनों में जैमिनि-प्रणीत मीमांसा (या पूर्व मीमांसा) वेदों के कर्मकांड पर आधारित है। मीमांसा के अनुसार वेद मानव-कृत नहीं हैं, वे अपौरुषेय और नित्य हैं, ऋषियों द्वारा उनका महज़ प्रकाश हुआ है। ज्ञान के लिए वेद शब्द-प्रमाण हैं। यदि ज्ञान में संदेह हो तो उसे ज्ञान नहीं कहा जा सकता। इसलिए ज्ञान में विश्वास का तत्व अनिवार्य है। ज्ञानेंद्रियों के निर्दोष होने पर वस्तुओं के सम्पर्क से प्राप्त होनेवाला ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान है। भौतिक जगत् की सत्ता प्रत्यक्ष प्रमाणित है। भौतिक जगत् अनादि और अनंत है। न इसकी कभी सृष्टि हुई, न कभी प्रलय होता है। इसलिए जगत्-स्रष्टा परमात्मा या ईश्वर का अस्तित्व नहीं। सांसारिक वस्तुओं का निर्माण आत्माओं के पूर्वार्जित कर्मों के अनुरूप भौतिक तत्वों से होता है। कर्म एक स्वतंत्र सत्ता है जिससे संसार परिचालित होता है। वैदिक विधि-निषेध का अनुपालन ही धर्म है। बिना किसी प्रत्याशा के वेदविहित कर्मों के निष्पादन और वेद-निषिद्ध कर्मों के त्याग से पूर्वकृत दुष्कर्मों एवं उनके फलित का क्षय हो जाता है। वेद-विहित यज्ञादि कर्म एक शक्ति उत्पन्न करते हैं जिसे ‘अपूर्व’ कहते हैं जिसके कारण हर कर्म का फल भविष्य में मिलता है। इसी के चलते मनुष्य द्वारा इस लोक में किये गये कर्मों के फल का उपभोग परलोक में भी संभव है। भौतिक जगत् की तरह आत्मा भी नित्य और अविनाशी है। शरीर से युक्त होकर वह चैतन्य बनती है। मुक्त आत्मा विदेह और चेतना-विहीन होती है किंतु उसमें चैतन्य की शक्ति रहती है (?); यदि आत्मा को मर्त्य मान लिया जाये तो स्वर्ग की कामना (?) निरर्थक हो जाती है जब कि स्वर्ग या विशुद्ध सुख की प्राप्ति ही परम पुरुषार्थ या मोक्ष है।
[शेष पाँच वैदिक दर्शन— न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदांत (या उत्तर मीमांसा)--वेदों के ज्ञानकांड पर आधारित हैं। वस्तुत: वेदांत के मूल सिद्धांत उपनिषदों में सन्निहित हैं, बादरायण ने अपने ब्रह्मसूत्र में इन्हीं को संकलित किया है।]
न्याय दर्शन
न्याय दर्शन ईश्वर की सत्ता को तर्क से सिद्ध करने का प्रयास करता है। इसके लिए वह प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान (सादृश्य) तथा शब्द प्रमाण (वेदवाक्य) का सहारा लेता है। न्याय दर्शन का लक्ष्य समय और काल से अबाधित आत्मा को शरीर एवं जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करना है। इस दर्शन में चेतना आत्मा का नित्य नहीं, आगंतुक गुण है जो मन और इंद्रियों के माध्यम से किसी विषय से संपर्क होने पर उद्भूत होता है। मुक्तात्मा इन संपर्कों से रहित होने पर इनके संज्ञान से, और उससे उपजी आसक्ति से भी, मुक्त हो जाता है। तत्वज्ञान से प्राप्त यह अपवर्ग (मोक्ष के समकक्ष) की अवस्था है जिसमें आत्मा चेतनाहीन होने से सुख-दु:ख दोनों से निरपेक्ष हो जाती है। न्याय के अनुसार जन्म-मृत्यु का चक्र हमारे कर्मों का परिणाम है जो कार्य-कारण सम्बंध से सुख-दु:ख के कारक बनते हैं। व्यक्ति के कर्मों के समुच्चय से ‘अदृष्ट’ की सृष्टि होती है जो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के सौभाग्य-दुर्भाग्य का निर्धारक होता है। किंतु अदृष्ट जड़ और अचेतन है, इसलिए इस कार्य-कारण सम्बंध को सुनिश्चित करनेवाली कोई सत्ता होनी चाहिए। वही ईश्वर है जो जगत् का निमित्त कारण है, उपादान कारण कर्मशील मनुष्य है।
वैशेषिक दर्शन
कणाद का वैशेषिक दर्शन न्याय का सगोत्र है। वैशेषिक का उद्देश्य भी प्राणियों के लिए अपवर्ग की प्राप्ति है जो ईश्वर के निमित्त कारण से बने जगत् के सुख-दु:ख से मुक्ति की अवस्था है। वैशेषिक की विशेषता यह है कि उसमें पदार्थ और गति के सम्बंध में प्रकृति-वैज्ञानिक दृष्टिकोण केंद्रीभूत है। वैशेषिक दर्शन की ब्रह्मांडीय अवधारणा में आधुनिक भौतिकी का ज्ञान अनुस्यूत है। कणाद ने प्रतिपादित किया कि सभी वस्तुओं में लघुतम, अविभाज्य कण परमाणु है जो अन्य परमाणुओं से संयुक्त होकर अणु के रूप में विद्यमान रहता है। उनके अनुसार परमाणु शाश्वत हैं; उन्हें न तो निर्मित किया जा सकता है, न नष्ट किया जा सकता है। कणाद समस्त तत्वों को सात श्रेणियों में वर्गीकृत करते हैं—द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्यता, विशेषता, समवाय और अभाव। फिर वे द्रव्य की नौ श्रेणियों का उल्लेख करते हैं—क्षिति, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन। इनमें से आकाश, काल, और दिक् इस अर्थ में विलक्षण हैं के ये अदृश्य, शाश्वत और विभु (सर्वव्यापी) हैं। कणाद का परमाणुवाद पाश्चात्य भौतिकवादी परमाणुवाद से इस अर्थ में भिन्न है कि जहाँ पाश्चात्य परमाणुवाद में गति किसी चेतन सत्ता से नियमित न होकर स्वत:स्फूर्त होती है, कणाद में उसके पीछे दैवी सत्ता का हाथ होता है। न्याय दर्शन की तरह वैशेषिक में भी दैवी सत्ता सुनिश्चित करती है कि जीव के कर्मों का फल अदृष्ट के रूप में प्रकट हो। और वही दैवी सत्ता सृष्टि तथा प्रलय का कारक है।
सांख्य दर्शन
कपिल का सांख्य दर्शन द्वैतवादी और निरीश्वरवादी है। कपिल के अनुसार संसार दो तत्वों से बना है—पुरुष और प्रकृति। दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे से निरपेक्ष है। पुरुष शुद्ध चेतन है, जो उसका अर्जित गुण नहीं, वास्तविक स्वरूप है। पुरुष मन तथा इंद्रियों से भिन्न है। वह नित्य है। यह स्वयं न कुछ करता है, न उसमें कोई परिवर्तन होता है। वह बस जगत् के व्यापार का अवलोकन करता है। प्रकृति के परिणामों का भोक्ता पुरुष प्रत्येक जीव के शरीर में अभिविनिष्ट है। भोक्ता पुरुष एक नहीं, अनेक हैं किंतु शुद्ध चेतन पुरुष एक ही है। त्रिगुणमयी, जड़ प्रकृति संसार का आदि कारण है। सत्व (शुभ, दया और सकारात्मकता), रज (आवेश, क्रोध और क्रियमाणता) एवं तम (अज्ञान, प्रमाद और नकारात्मकता) इसके तीन गुण हैं। हर व्यक्ति का चरित्र प्रकृति के इन्हीं तीनों गुणों के भिन्न-भिन्न अनुपात और उनकी अंतर्प्रक्रिया का परिणाम है। पुरुष की तरह प्रकृति भी नित्य है किंतु यह निरंतर परिवर्तनशील है। प्रकृति स्वयंभू है, इसलिये उसका कोई बाह्य कारण नहीं है। प्रकृति के तीन गुण ही सृष्टि के आदि कारण हैं। जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष के संयोग से, कार्य-कारण सम्बंध (सत्कार्यवाद) के अनुसार, बिना किसी दैवी हस्तक्षेप के, सृष्टि होती है और चलती है। कपिल ने तत्वों की कुल संख्या 25 बताई है। पाँच तन्मात्र—ध्वनि, स्पर्शानुभूति, आकार, स्वाद और गंध। पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ, पाँच महाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। मन, अहंकार, महत् (बुद्धि), प्रकृति, और पुरुष। इनमें से केवल पुरुष शुद्ध चेतन है जो भोग्य का भोग करता है। पुरुष के अतिरिक अन्य सभी 24 तत्व प्रकृति में ही निहित हैं। कपिल के अनुसार वेदों में केवल प्रकृति का संदर्भ है, ईश्वर का नहीं। इसीलिए निरीश्वरवादी होते हुए भी कपिल का दर्शन वैदिक दर्शन है।
कपिल का सांख्य सूत्र स्पष्ट रूप से निरीश्वरवादी है. वह विस्तार से ईश्वर के अस्तित्व का खंडन करता है. ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करने के लिए कपिल चार ठोस तर्क देते हैं:
1. घड़े के निर्माण में मिट्टी की तरह ईश्वर सृष्टि का उपादान कारण (material cause) नहीं हो सकता। इसलिए कि उपादान अपना स्वरूप और अपनी स्वतंत्र पहचान खोकर ही कार्यरूप में परिणत होता है, जब कि ईश्वर की अवधारणा अविनाशी और अपरिवर्तनीय की है।
2. घड़े के निर्माण में कुम्हार की तरह ईश्वर सृष्टि का निमित्त कारण (functional cause) भी नहीं हो सकता। इसलिए कि ईश्वर की अवधारणा नित्य निर्विकार की है जब कि कार्य-प्रक्रिया और उसके परिणाम के संस्कार से कर्ता निर्विकार नहीं रह सकता।
3. ईश्वर की अवधारणा जीव की स्वतंत्र संकल्प शक्ति के लिए कोई अवकाश नहीं छोड़ती। वह तो ‘ईश्वर’ का दास बन जाता है, ईश्वर की इच्छा या कृपा के बिना वह कुछ भी नहीं कर सकता। ऐसे में न तो वह सत्य का साक्षात्कार कर सकता है, न त्रिगुणमयी प्रकृति का बंधन तोड़कर जीवन के लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त कर सकता है.
4. ईश्वर के अस्तित्व को फ़ौरी तौर मानते हुए कपिल प्रश्न उठाते हैं--वह सृष्टि क्यों करेगा? एक, अपनी ज़रूरत के लिए। वह तो अपने-आप में पूर्ण है, पूर्णकाम है, उसे किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं। दो, जीव के हित के लिए? सृष्टि से जीव का क्या हित हो सकता है? सृष्टि में इतनी अनिश्चितता, इतनी अधमता, इतना तम, इतनी बुराई, इतना अन्याय, इतना असत् और अज्ञान है कि जीव को जड़ किंतु अतिशय मायाविनी प्रकृति का बंधन तोड़कर शुद्ध चेतन बनने और इस तरह मुक्त होने के लिए कठिनतम संघर्ष करना पड़ता है। तो ऐसी सृष्टि का कर्ता ईश्वर कैसे हो सकता है?
इस तरह कपिल का सांख्य निरीश्वर सांख्य है. उसे सत्कार्यवाद भी कहते हैं. इसके अनुसार कार्य कारण में ही विद्यमान होता है. घड़े में मिट्टी विद्यमान है. यदि मिट्टी न होती तो किसी भी सूरत में घड़ा नहीं बन सकता था. बालू से तेल नहीं निकाला जा सकता. आकाश मथने से मक्खन नहीं बन सकता. एक ही वस्तु के व्यक्त और अव्यक्त गुणों के चलते हम उन्हें कार्य और कारण मान लेते हैं. कपड़ा अपने धागों से अलग वस्तु नहीं है. मिट्टी का घड़ा भी अंतत: मिट्टी ही है और पत्थर की मूर्ति अंतत: पत्थर ही है.
योग दर्शन
पतंजलि का योग दर्शन कपिल के सांख्य दर्शन का पूरक है। यह मनुष्य के अपने स्वरूप (शुद्ध चेतन पुरुष) में अवस्थित होने या कैवल्य प्राप्त करने का विस्तृत रोडमैप है, जो सभी वैदिक दर्शनों के लिए प्रासंगिक है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि उसके आठ चरण हैं। इसी को अष्टांग योग कहते हैं। इनमें से ‘आसन’ स्थिर और सुविधापूर्वक बैठने की मुद्रा मात्र है (स्थिर सुखमासनम्--योगसूत्र, 2:46)। पतंजलि के नाम से जिन आसनों की आज व्यावसायिक धूम है उनका कोई संबंध पतंजलि के योगसूत्र से नहीं है, वे हठयोग से आयातित हैं।
पतंजलि के योग और कपिल के सांख्य में एकमात्र अंतर पतंजलि द्वारा ईश्वरीय अवधारणा का उल्लेख है। किंतु पतंजलि न तो इस सम्बंध में कपिल की आपत्तियों का समाहार करते हैं, न ही ईश्वर को सृष्टि का कर्ता, नियंता और संहारक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। उनके अनुसार असंप्रज्ञात समाधि के लिए विश्वास, वीर्य और स्मृति की आवश्यकता होती है जो तीव्र संवेग से प्राप्त होती है। वैकल्पिक रूप से यह संवेग ईश्वर के प्रति समर्पण से भी तीव्र होता है (ईश्वरप्रणिधानाद्वा—1:23)। इस तरह पातंजल योग को सेश्वर सांख्य की संज्ञा दिये जाने के बावजूद वह ईश्वर की मात्र ओष्ठसेवा करता है।
वेदांत दर्शन और अद्वैत वेदांत
वेदों के ज्ञानकांड का चरम वेदांत है। शंकर ने ब्रह्मसूत्र, गीता और प्रमुख उपनिषदों (प्रस्थानत्रयी) के भाष्य से अद्वैत वेदांत को सर्वोच्च प्रतिष्ठा दिलाई। इसके अनुसार समस्त ब्रह्मांड में एक ही परमचेतन तत्व व्याप्त है जो अनादि और अनंत है। पदार्थ के ख़ास समुच्चय में वह अभिनिविष्ट हो जाता है, उससे उत्पन्न नहीं होता। हर व्यक्ति के अभ्यंतर में उसका निवास है. सृष्टि से बाहर उसका कोई पता ठिकाना नहीं कि जाकर उससे मिल लें, उसका साक्षात्कार कर लें.
शंकर ने कपिल के सांख्यसूत्र में प्रतिपादित सत्कार्यवाद को स्वीकार कर लिया जिसके अनुसार कार्य अपनी उत्पत्ति के पूर्व अपने कारण में निहित होता है। कपिल के सत्कार्यवाद में कार्य की उत्पत्ति के पश्चात् कारण के उसमें निहित होने के बावजूद कार्य की भिन्न और स्वतंत्र सत्ता हो जाती है, जिसे परिणामवाद कहा जाता है। शंकर ने इस परिणामवाद के बिंदु पर कपिल से भिन्न मत प्रतिपादित किया। शंकर के अनुसार यदि कारण से कार्य की भिन्नता स्वतंत्र है तो सत्कार्यवाद खंडित हो जाता है। वस्तुत: कारण से कार्य की भिन्नता प्रतीति मात्र है। मिट्टी से बना घड़ा वस्तुत: मिट्टी ही है। इस तरह सृष्टि का आदि कारण हर कार्य में उपस्थित है, वस्तुत: कारण ही कार्य है। उसकी भिन्नता मात्र एक प्रतीति या भ्रम या विवर्त है। इस तरह कपिल का सत्कार्यवाद वास्तविक सृष्टि तक न ले जाकर मात्र सृष्टि की प्रतीति या विवर्त तक ले जाता है। इसी विवर्तवाद के आधार पर शंकराचार्य जगत् के आदि कारण परम चेतन तत्व (ब्रह्म) को सृष्टि की वास्तविक सत्ता मानते हैं और जगत् को प्रतीति या भ्रम मात्र मानते हैं। इस प्रतीति का कारण माया की वह रहस्यमयी शक्ति है जो अनादि तो है किंतु ब्रह्म की तरह अनन्त नहीं। वह ज्ञान से निरस्य है। यह परम सत्ता सच्चिदानंद है। सत्, चित् और आनंद ब्रह्म के गुण नहीं, उसके युगपत् स्वरूप हैं। वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं, एक-दूसरे के कारक नहीं, एक-दूसरे के साथ-साथ हैं। सत् त्रिकालाबाधित है, चित् बोधगम्य है और वैज्ञानिकता का सूचक है, आनंद चेतना की निर्बाध अवस्था है।
शंकर के अनुसार वस्तुजगत् महज़ प्रतीति का विषय है, ज्ञाता-ज्ञेय भेद पर आधारित है। प्रतीति का पर्दा हटने पर केवल ब्रह्म रह जाता है और ज्ञाता, ज्ञेय तथा ज्ञान का एकत्व स्थापित हो जाता है। इस तरह ब्रह्म अनुभूति-जन्य है किंतु तर्क का अविरोधी है। इसलिए वह विज्ञान का भी अविरोधी है। संसार शाब्दिक अर्थ में मिथ्या नहीं है, सदसत्- मिश्रित है, नित्य नाशवान् है। जो नित्य परिवर्तनशील और नाशवान् है वह तात्विक रूप से सत् नहीं है। तात्विक रूप से सत् केवल आदि कारण है जो चेतन है और शाश्वत तथा अविनाशी है। वही being है। सिर्फ़ वही सत्य है, इसलिये वह अद्वैत है। शेष जगत becoming है, अध्यास है, नश्वर है, माया है,जो आदि कारण को, शुद्ध चेतन को, अद्वैत को,आच्छादित कर लेती है। माया भी अनादि है किन्तु अनंत नहीं हैं, ज्ञान से निरस्य है। माया का निरसन ही जीवन्मुक्ति है।
चूंकि कोई भी वस्तु शून्य से उत्पन्न नहीं हो सकती, इसलिये सृष्टि के लिये एक आदि तत्व अनिवार्य है। सिर्फ़ वही सत्य है। वह चेतन है क्योंकि चेतना सृष्टि के आरम्भ से ही उसमें संगर्भित है, प्रकट भले बाद में हो। मानव चेतना में ही माया के निरसन और आदि चेतन की अनुभूति संभव है। वही अनुभूति सत्य की अनुभूति है। इसीलिए श्रुतियों के चार महावाक्य हैं--‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘तत्त्वमसि’, ‘प्रज्ञानम् ब्रह्म, ‘अयमात्मा ब्रह्म’-- जो इसकी पुष्टि करते हैं।
………. ✍️ कमलकांत त्रिपाठी
(Kamalkant Tripathi) संदर्भ -
https://www.facebook.com/share/178XbMRtfA/
क्रमश:
No comments:
Post a Comment