अपनी मुक्ति के लिए चिंतित एक अत्यधिक वृद्ध महिला ने श्री महापेरियावा जगद्गुरु चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती स्वामिगल (कांची कामकोटिपीठ के ६८वें जगद्गुरु) के पास जाकर अपनी वृद्धावस्था और शारीरिक कमजोरी के कारण जप के नियमों का पालन करने में असमर्थता व्यक्त की। वृद्धा की आयु समाप्त होने को थी, इसलिए श्री महापेरियावा ने वृद्धा पर दया करके श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् का उपदेश दे दिया, जबकि वह त्रयक्षरी विद्या में दीक्षित थीं।
वृद्धा का युवा पुत्र भी त्रयक्षरी विद्या में दीक्षित था। जब उसने भी पूछा कि क्या वह भी श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् का पाठ शुरू कर सकता है, तब महापेरियावा ने कठोरता से इंकार कर दिया और कहा, तुम्हारे पास पुण्य अर्जित करने के लिए पर्याप्त समय है।
श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् का पाठ करने के लिए पञ्चदशी मंत्र की दीक्षा लेना अनिवार्य है।यह बात भगवान हयग्रीव ने ऋषि अगस्त्य से कही थी, फिर भी वृद्धा श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् पाठ की अधिकारी कैसे हुई? यह हुआ गुरु की करुणा से। करुणानिधि श्री महापेरियावा ने अपने तपोबल का एक अंश उस वृद्धा को देकर उसकी मुक्ति का मार्ग खोलकर गुरु तत्व की महिमा भी प्रकट की और शास्त्रों में जो प्रमाण हैं, उनका सम्मान भी रखा। उस वृद्धा जैसी एकनिष्ठ गुरुभक्ति अगर किसी में हो तभी श्री महापेरियावा समान करुणानिधि के द्वारा इस प्रकार से कल्याण हो सकता हैं।
(संदर्भ-कामकोटि मण्डली वेबसाइट पर करुणानिधि श्री महापेरियावा की यह कथा पढ़ने का सौभाग्य मिला था)
(नोट- परमेश्वरी श्रीललिताम्बिका ने श्रीमन्नारायण के दशावतारों को अपने हाथों के नखों द्वारा उत्पन्न कर भण्डासुर द्वारा उत्पन्न सोमक, हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण, कंस, महिषासुर इत्यादि असुरों का वध करवाया था। इसलिए परमेश्वरी का एक नाम कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः भी है। इसी कथा को चरितार्थ करती तस्वीर साझा की गई है)
चित्र नेट से साभार
श्रीगुरु चरण कमलेभ्यो नमः
इदं गुरू इदं न मम
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