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Friday, 31 October 2025

" कभी-कभी जिंदगी शब्दों से नहीं, मौकों से गरीब बना देती है।"

"मैं हज़ार डॉलर में अनुवाद करूंगा" — भिखारी बोला, अमीर हंसा… फिर जो हुआ, सब दंग रह गए 

सड़क किनारे ठंडी हवा चल रही थी। शहर की रात रोशनी से भरी हुई थी, लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं उदासी फैली हुई थी। गाड़ियों के हॉर्न, कैफे की रौनक और लोगों की हंसी के बीच एक कोना ऐसा था, जहां एक बूढ़ा आदमी अखबार के टुकड़े में लिपटा बैठा था। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था, और आंखों में थकान थी। लेकिन गहराई में कोई ऐसी चमक थी जो बाकी सबसे अलग थी। वह आदमी जिसे लोग बस भिखारी कहकर निकल जाते थे, हाथ में एक पुरानी डायरी और टूटी हुई पेंसिल लिए कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था।

भाग 2: अर्जुन का आगमन

उसके आसपास फटे हुए कागज बिखरे थे। कुछ में अंग्रेजी, कुछ में लैटिन, कुछ में फ्रेंच के शब्द थे। कोई नहीं जानता था कि वह क्या करता है। बस सब उसे सड़क का पागल कहते थे। उसी वक्त एक चमकदार काली कार सड़क किनारे रुकी। उसमें से एक सूट पहने व्यक्ति उतरा, महंगे जूते, घड़ी की चमक और चेहरे पर वह आत्मविश्वास जो सिर्फ अमीरी से आता है। उसका नाम था अर्जुन कपूर, शहर का मशहूर व्यवसायी।

अर्जुन के लिए यह सड़क बस एक रास्ता थी और उस बूढ़े भिखारी के लिए यही दुनिया। अर्जुन फोन पर किसी से बात कर रहा था। "हां, ट्रांसलेशन चाहिए। लेकिन मुझे कल सुबह तक रिपोर्ट पूरी चाहिए। कोई भरोसेमंद प्रोफेशनल चाहिए। कोई गलती नहीं चलेगी।" उसी वक्त उस भिखारी की आवाज सुनाई दी। "मैं अनुवाद कर सकता हूं किसी भी भाषा का।"

भाग 3: भिखारी का प्रस्ताव

अर्जुन मुड़ा, भौहे सिकोड़ते हुए। "क्या कहा?" भिखारी ने मुस्कुराकर कहा, "मैं अनुवाद करूंगा। $500 में।" अर्जुन हंस पड़ा। जैसे उसने कोई मजाक सुना हो। "तुम $500 में? तुम्हें तो शायद पता भी नहीं कि डॉलर की कीमत क्या है।" भिखारी ने शांत स्वर में कहा, "मुझे पता है क्योंकि मैंने इसे कमाया है। मांगा नहीं।"

अर्जुन का चेहरा थोड़ा बदल गया। वह कुछ सेकंड उस आदमी को देखने लगा। उसके चेहरे की झुर्रियों में एक कहानी थी। उसकी आवाज में अनुभव का भार। "अच्छा," अर्जुन ने कहा, "तो बताओ क्या-क्या भाषाएं आती हैं तुम्हें?"

भाग 4: भाषाओं का ज्ञान

भिखारी ने बिना सोचे कहा, "अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, लैटिन, ग्रीक और थोड़ा रूसी।" अर्जुन ने भौहें उठाई। "इतनी भाषाएं और तुम यहां सड़क पर भीख मांग रहे हो।" उस आदमी ने हल्के से हंसते हुए कहा, "कभी-कभी जिंदगी शब्दों से नहीं, मौकों से गरीब बना देती है।"

अर्जुन एक पल के लिए रुक गया। उसकी जिज्ञासा बढ़ गई थी। "ठीक है, मान लो तुम्हें मौका दिया जाए तो साबित कर सकते हो?" भिखारी ने कहा, "मुझे साबित करने की जरूरत नहीं। बस एक पन्ना दो।"

भाग 5: चुनौती का सामना

अर्जुन ने जेब से एक दस्तावेज निकाला। एक विदेशी अनुबंध था जिसमें कानूनी शब्दावली इतनी जटिल थी कि बड़े-बड़े प्रोफेशनल भी हिचकिचाते थे। "ठीक है," अर्जुन ने कहा, "इसे अनुवाद कर दो। अगर सही निकला तो तुम्हें $500 मिलेंगे।" भिखारी ने कागज को सावधानी से पकड़ा जैसे वह किसी पवित्र चीज को छू रहा हो।

उसने पुराने कागज के पीछे लिखना शुरू किया। उसकी पेंसिल टूटी हुई थी, लेकिन उसकी लिखावट अद्भुत सुंदर और सटीक थी। कुछ ही मिनटों में उसने पूरा अनुबंध अनुवादित कर दिया। फिर उसने कागज अर्जुन की ओर बढ़ाया और बोला, "लो, यह रहा।"

भाग 6: अर्जुन की प्रतिक्रिया

अर्जुन ने हल्के से मुस्कुराकर कागज लिया। जैसे उसे भरोसा नहीं था कि इसमें कुछ भी सही होगा। उसने पढ़ना शुरू किया। पहली लाइन पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया। दूसरी लाइन पर उसकी भौहें सिकुड़ गईं। तीसरी लाइन पर उसके होठों से निकला, "यह बिल्कुल सटीक है।"

भिखारी शांत बैठा था। उसने कुछ नहीं कहा। अर्जुन ने पूरा अनुवाद पढ़ा। ना एक भी त्रुटि, ना कोई शब्द गलत। और सबसे बड़ी बात, भाषा में वही टोन और भाव जो मूल दस्तावेज में थे। अर्जुन ने विस्मित होकर पूछा, "तुम कौन हो?"

भाग 7: भिखारी की कहानी

भिखारी ने बस कहा, "कभी मैं वहीं था जो आज तुम हो। लेकिन एक हादसे ने सब छीन लिया। घर, नौकरी, पहचान। बस ज्ञान नहीं गया।" अर्जुन के पास जवाब नहीं था। उसके भीतर कुछ हिला। उसने जेब से वॉलेट निकाला और $500 का नोट निकालकर उसकी ओर बढ़ाया।

भिखारी ने हाथ नहीं बढ़ाया। "क्यों नहीं ले रहे?" अर्जुन ने पूछा। भिखारी ने धीमे से कहा, "मैंने कहा था, 'मैं $500 में अनुवाद करूंगा।' अब बताओ क्या तुम मुझे काम दोगे?"

भाग 8: अर्जुन की दुविधा

अर्जुन चुप हो गया। उसके चेहरे की हंसी गायब थी। उसने पहली बार उस आदमी को सिर्फ एक भिखारी नहीं बल्कि एक इंसान की तरह देखा, जो कभी किसी दफ्तर में किसी सम्मानजनक कुर्सी पर बैठा होगा। "मुझे तुम्हारा नाम बताओ," अर्जुन ने कहा।

"नाम की जरूरत नहीं," भिखारी बोला, "नाम तब मायने रखता है जब लोग तुम्हें याद रखें। मैं अब बस अनुवाद करता हूं भाषाओं का और कभी-कभी लोगों की सोच का भी।"

भाग 9: सन्नाटा और समझ

अर्जुन ने सिर झुका लिया। कुछ देर तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा। वह सन्नाटा जिसमें अहंकार और विनम्रता दोनों का आमना-सामना हुआ था। "कल मेरे दफ्तर आना," अर्जुन ने कहा, "मैं तुम्हें नौकरी दूंगा।"

भिखारी ने हल्के से मुस्कुराया। "अगर मैं आया तो समझना कि मुझे जरूरत है। अगर नहीं आया तो समझ लेना। मुझे बस यह साबित करना था कि ज्ञान कभी सड़कों पर नहीं मरता।"

भाग 10: अर्जुन का नया दृष्टिकोण

अर्जुन ने कुछ कहना चाहा पर शब्द नहीं मिले। वह कार में बैठा और चला गया। अगले दिन दफ्तर में उसकी नजरें उस बूढ़े आदमी को ढूंढती रही, लेकिन वह नहीं आया। अर्जुन ने उस अनुबंध को फ्रेम करवाया और अपने केबिन में टांग दिया।

उसके नीचे उसने खुद लिखा, "Respect Every Mind You Meet; Wisdom Doesn’t Always Wear a Suit." शाम को जब वह उसी सड़क से गुजरा तो उस जगह की धूल में वही पुराना अखबार पड़ा था। लेकिन बूढ़ा आदमी कहीं नहीं था। उसके मन में बस एक आवाज गूंजती रही, "कभी-कभी जिंदगी शब्दों से नहीं, मौकों से गरीब बना देती है।"

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साभार - PC's Enthusiastic 

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