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Friday, 24 October 2025

सूखी तुरी ( लूफा )...

सूखी तुरई (लूफा)....
ये जो सूखी तुरई पड़ी है न, इसे यूँ ही बेकार मत समझो। जब ये हरी रहती है तब सब्ज़ी बनकर थाली सजाती है, और जब सूख जाती है तो घर की काम की चीज़ बन जाती है। यही तो इसकी खूबी है — हर रूप में काम की!
जब हम छोटे थे, तब यही सूखी तुरई नहाने में काम आती थी। साबुन का झाग जमाने में, तन को रगड़ने में — इससे जो नहाते थे, वो दिनभर तरोताज़ा रहते थे। कोई खुजली नहीं, कोई दाने नहीं। त्वचा चमक उठती थी जैसे मिट्टी में निखरा नया अंकुर।
और यही तुरई बर्तन मांजने में भी काम आती थी। दादी कहती थीं — “बेटा, ये धरती की बनाई झाड़न है, इससे बर्तन भी चमकते हैं और हाथों की मेहनत का पुण्य भी मिलता है!”
ना इसमें रासायनिक ज़हर, ना कोई नुकसान।
बस हल्के हाथों से रगड़ो, और तांबे-पीतल के बर्तन चमचम करने लगते थे।
हमारे ज़माने में तो हर घर में ऐसी सूखी तुरई रखी रहती थी — न स्नान का लूफा ख़रीदना पड़ता, न बर्तन साफ़ करने का ब्रश।
धरती माँ से जो मिला, वही सबसे बढ़िया।
ये सूखी तुरई सिखाती है कि ज़िंदगी में कुछ भी व्यर्थ नहीं होता —
जो समय के साथ बदल जाए, वही सबसे उपयोगी बनता है।
हरी अवस्था में स्वाद देती है, और सूखने पर सादगी का सबक —
यही तो प्रकृति की असली शिक्षा है,
आज भले ही शहरों में महंगे लूफा और स्पंज बिकते हो,
गांव में यह प्राकृतिक तुरई की झाड़न अब भी सबसे बेहतर और पर्यावरण हितैषी है ।
मिट्टी से जन्मी और मिट्टी में लोट जाने वाली -यह सूखी तुरई गांव की सादगी , बुद्धिमानी और आत्मनिर्भरता की निशानी है 🙏🏻 
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