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Thursday, 2 October 2025

साधना पुरुषोत्तम श्रीराम

                    साधना पुरूषोत्तम श्रीराम 
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भगवान श्रीरामभद्र न केवल मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, बल्कि वह साधना पुरूषोत्तम भी हैं। श्रीगुरूदेव बारम्बार कहते थे कि साधना के तीन शलाका पुरुषों का नाम लेना हो तो श्रीकृष्णचन्द्र, श्रीपरशुराम और श्रीरामभद्र के ही नाम लेने होंगे। इनमें भी श्रीरामभद्र की साधना सामान्य मानवी और जनसाधारण की नैतिकता के लिए अधिक अनुकूल। 

आगमों में पराम्बा भगवती श्री दुर्गा का स्वयं वचन है कि मेरी उपासना का वास्तविक रहस्य शरीरी जनार्दन श्रीराघव ही तत्वत: समझते हैं, और कोई नहीं।

मदीयोपासनाचारं राघवशरीरी जनार्दनः।
एक एव विजानाति नान्यः कश्चन तत्त्वतः॥
[आगमे]

श्री गुरूदेव के पास एक बार अशोक सिंघल जी पहुंचे थे कि महाराज इतने सारे प्रयासों के बावजूद अयोध्या का श्रीराम मंदिर बनने का कोई मार्ग क्यों नहीं खुल रहा है। गुरूदेव नेत्र मूंदे मौन धारण किए रहे थे कुछ समय। बोले श्रीराम के जीवन से कुछ सीखते हो क्या? राम लंका-विजय से पहले क्या करते हैं? अपने कुलदैवत, दुर्गा, शिव, सूर्य, बगलामुखी की आराधना करते हैं न। इतना कह पुनः मौन हो गये थे। सबरीमला का चालीस दिन के व्रत का उनका अंतिम दिन था। 

तनिक अन्तराल के बाद पुनः कहते गये थे। एक छोटे कुण्ड के पास देवी की शोभा में कुछ न्यूनता है। वहां पवित्रता सुनिश्चित करो। एक साथ बड़ी देवकाली और श्रीरंगनाथ में कुछ अनुष्ठान और कुछ स्वच्छता पवित्रता सौंदर्यीकरण के काम प्रारम्भ हुए थे। 

कहते हैं कि उसके बाद महाप्राण सिंघल जी बहुत निश्चिन्त होते चले गये थे। उसके बाद जो कुछ हुआ वह सम्पूर्ण विश्व ने देखा ही था। 

वसिष्ठ गोत्रोद्भव भगवान श्रीराम गोत्र त्रिप्रवर हैं। वसिष्ठ, मैत्रावरुण, कौडिन्य त्रय ऋषेय प्रवरण्विता रघुकुलतिलक भगवान राम ने आंगिरस गोत्र उत्पन्न जनकनन्दिनी से परिणय किया था। इन दोनों गोत्रों का सत्व भगवान श्रीसीतारामजी के जीवन चरित्र में हर जगह परिलक्षित होता चलता है। भगवान श्रीसीतारामजी बौद्धिक और नैतिक होने के साथ साथ आध्यात्मिक अभ्यास के पथ पर भी चलते हैं। 

'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा', 'अथातो धर्म जिज्ञासा' 'अथातो शक्ति जिज्ञासा' 'अथातो दीक्षा व्याख्यास्याम:' और 'अथातो भक्ति व्याख्यास्याम्' यह सभी सनातन सूत्र भगवान श्रीसीतारामजी के जीवन के आधारभूत तत्व हैं। 

भारतीय शाश्वत सनातन साधना के दो रूप हैं। एक बहिरंग दूसरी अन्तरंग। यह बहिर्मुखी साधना ही निगम कहलाती है और अन्तर्मुखी अन्त:सलिला साधना का ही नाम आगम है। 

भगवान श्रीसीतारामजी की दोनों साधनाएं पुष्ट हैं वह पंचदेव उपासना के सिद्ध हैं, भगवान वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, सिद्धांताचार, दक्षिणाचार, कौलाचार, वामाचार सभी सातों आचारों के सिद्ध आचार्य हैं। त्रिकाल-संध्या अखण्ड है उनकी, और बहिरंग तो वह लोकसेतु हैं ही। 

वह सेतुबंध करते हैं। राज और लोक के बीच सेतु। नगर और वन के बीच सेतु। पुरूष की प्रतिज्ञा और स्त्री के मन के बीच सेतु। देवता और मनुज के बीच सेतु। यहां तक कि पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच भी सेतु। यहां तक कि व्यवहार और मर्यादा के बीच सेतु। यह श्रीसीतारामजी की बहिरंग साधना है। 

आगम इन सात लक्षणों से समवित होता है :- सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, सर्वसाधन, पुरश्चरण, षट्कर्म, (शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण) साधन तथा ध्यानयोग। अधिकारी विद्वानों ने जहां राम को तारा तत्व से जोड़कर देखा है, वहां रामायण के सातों कांडों में इन सातों लक्षणों को क्रमवार उपस्थित माना है।

राम के आगमिक स्वरूप के चिन्तन के क्रम में हमारे आवश्यक सोपान क्या हों, उसमें आगम को परिभाषित करता यह सूत्र हमारी सहायता करता है।
आगच्छंति बुद्धिमारोहंति अभ्युदयनि:श्रेयसोपाया यस्मात्‌, स आगम:।

आरोहण, अभ्युदय और नि:श्रेयस को प्राप्त होना आगम के संकेत हैं। रामचरित इसी आरोहण अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्रयोगात्मक व्याख्या है।

आगम या तंत्र आत्मगोपन की प्रक्रिया है प्रकाशन के लिए। तो जब इसके माध्यम से आत्मगोपन राम को प्रकाशित किया जाए तो इसके स्रोत और अवयव हृदय संवाद की ही शैली में होने चाहिए।

कारण यह कि वेदादि निगम अपौरुषेय अवश्य हैं पर दृष्ट हैं परन्तु आगम उपदिष्ट हैं। हृदय ही प्रश्नकर्ता है और हृदय ही उत्तर देता है। यहां सभी संवाद अभिन्नों के बीच हुए हैं। जैसे शिव-पार्वती। शाश्वत युगल। सर्वथा अभिन्न। ऐसा ही अद्भुत युगल तत्व श्रीसीतारामजी का भी है।

आगमिक राम या राम के तांत्रिक स्वरूप के चिन्तन के क्रम में हम भगवान श्रीराम के जीवन के कम चर्चित प्रसंगों को भी रेखांकित करे चलें। जैसे कि ऋतुविज्ञानी राम, भगवान राम का ज्योतिषीय पक्ष, शाबर की दृष्टि में राम, किरात परम्परा के राम आदि।

श्रीराम का यह बृहद रूप वैष्णव आगम (पांचरात्र तथा वैखानस आगम), शैव आगम (पाशुपत, शैवसिद्धांत, त्रिक आदि) तथा शाक्त आगम सबमें पसरा हुआ है। इसके अतिरिक्त बौद्ध तंत्र, बोधिसत्व कथाओं तथा जैनागमों में भी राम तत्व पर छुपी हुई बृहद विपुल सामग्री उपलब्ध है।

श्रीसीतारामजी भगवान की मर्यादा के साथ साथ साधन भी अनुकरणीय। आज दशहरा है, विजयादशमी। यह भी श्रीभगवान के साधना पक्ष का एक प्रतिबिम्ब।

श्री कुलार्णव तंत्र त्रयोदश उल्लास का कथन है-
यथा घटश्च कलश: कुम्भश्चैकार्थवाचका:
तथा मंत्रो देवश्च गुरुश्चैकार्थवाचक;!!

अब देखें कि मनुष्य का मन ही तो लंका है, जिसकी परिधि पर दशेंद्रियां रावण की तरह उन्मत्त हैं। यही इन्द्रियां जब विषयी हो जाती हैं, तब विभीषण रूपी भक्ति, श्री हनुमान जी जैसे गुरु के अनुग्रह से इष्ट कृपा श्रीराम तक पहुंचती हैं।

रावण को जीतकर ही मोक्षरूपी सीता के साथ सब परमसायुज्य अयोध्या प्राप्त करते हैं।

विजयादशमी की राम राम 

मधुसूदन उपाध्याय

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