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Monday, 6 October 2025

तिवारी जी के कुछ विलक्षण संस्मरण— आर्य समाज और सनातन

नये मित्रों के लिए: 

तिवारी जी के कुछ विलक्षण संस्मरण—बक़ौल तिवारी जी 

ऐसा होता तो है, किंतु क्यों और कैसे होता है? 

एक 

तिवारी जी पाँच बहनों में अकेले भाई थे। वे सबसे बड़े थे। तीन बहनों का विवाह ज़मींदारी उन्मूलन (1952) के पहले हो गया था और वे ज़मींदार परिवारों में ही ब्याही गई थीं। दो का ज़मींदारी उन्मूलन के बाद हुआ। तिवारी जी के पिता उन्हें भी पूर्व-ज़मींदारों के यहाँ ब्याहना चाहते थे, जो बरबाद हो चुके थे। तिवारी जी के अतिशय आग्रह (बहुत मिन्नत करने) पर पिता जी दोनों का विवाह ग़ैर-ज़मींदार परिवारों में करने को राज़ी हुए। जो हुआ, उनके लिए अच्छा ही हुआ।   

तिवारी जी के जन्म के समय उनके पिता जी (लालजी तिवारी) की उम्र 24 वर्ष थी। वे इलाहावाद विश्वविद्यालय के बी ए, एल एल बी थे किंतु उन्होंने कभी प्रैक्टिस नहीं की। लालजी पाँच भाइयों में तीसरे नंबर पर थे। रामपुर बल्डिहा 22 गाँवों की ज़मींदारी थी, जो लालजी के सबसे बड़े भाई लक्ष्मण प्रसाद तिवारी के मालिकाने में चलती थी, उन्हें तिवारी जी बड़े चाचा कहते थे। वे बड़े शाहख़र्च आदमी और निकम्मे ज़मींदार थे। लक्ष्मण प्रसाद जी के पिता भी वैसे ही शाहख़र्च आदमी और निकम्मे ज़मींदार रहे थे। 

परिवार में अकेले तिवारी जी के पिता आर्यसमाजी हो गए थे। वे केवल वेद को प्रमाण मानते थे। घर में छोटा-सा हवनकुंड बनवाए थे, हवन करते थे, गायत्री मंत्र पढ़ते थे। स्वामी दयानंद सरस्वती के हिंदी में लिखे सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन करते थे। तिवारी जी की माँ इतनी ही पढ़ी थीं कि रामायण (रामचरितमानस) पढ़ और समझ लेती थीं। वे रोज़ रामायण का पाठ करती थीं, कभी-कभी औरतों को बटोरकर रामायण पर वार्ता भी कर लेती थीं। उनके पिता (तिवारी जी के नाना) सुल्तानपुर के प्रतिष्ठित ताल्लुक़ेदार थे। वे रामायण-प्रेमी थे। तिवारी जी के बचपन में उनका आधा समय ननिहाल में और आधा समय घर पर बीतता था। नाना जी ने तिवारी जी को बहुत छुटपन में, जब वे तुतलाकर बोलते थे और स को छ कहते थे, सुंदरकांड रटवा दिया था। लोग उनके विचित्र उच्चारण में सुंदरकांड सुनकर बहुत आनंदित होते थे। कहते थे, सुनाओ तो बतासा देंगे, बस तिवारी जी अपनी तोतली आवाज़ में शुरू हो जाते थे और पूरा सुंदरकांड सुनाकर ही दम लेते थे। 

तिवारी जी के पिता जी चाहते थे कि तिवारी जी की माँ भी आर्यसमाजी हो जाएं। उन्हें सत्यार्थ-प्रकाश पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते थे। सत्यार्थ प्रकाश में अध्याय नहीं हैं, समुल्लास हैं—पहला समुल्लास, दूसरा समुल्लास। तिवारी जी की माँ ने पढ़ना शुरू किया तो बोलीं—ई त कउनो मुसलमानी किताब लागत बा (उन्होंने समुल्लास को अल्लाह से जोड़ लिया)। वे सुल्तानपुर ज़िले की होने से अवधी बोलती थीं जब कि रामपुर बल्डिहा में भोजपुरी बोली जाती थी, बाद में वह भी बोलने लगी थीं। फ़िलहाल उन्हें आर्यसमाजी बनाने का तिवारी जी के पिता का प्रयास जारी रहा।        

नाना के एक घनिष्ठ मित्र उमापति शास्त्री ज्योतिष और तंत्रविद्या के बहुत अच्छे ज्ञाता थे। किंतु उन्होंने कभी ज्योतिष या तंत्रविद्या को जीविकोपार्जन का साधन नहीं बनाया। उनके पास मज़े की सम्पत्ति थी और उसी से उनका काम चलता था। इलाहाबाद में चौक के पास दारागंज जानेवाली सड़क पर बाईं ओर उनका घर था। 

अब असली वृतांत। उमापति शास्त्री ने नाना जी की मित्रता के चलते तिवारी जी के जन्म के पूर्व ही उनकी जन्मकुंडली बनाकर भेज दी थी। उसमें तिवारी जी का जन्मदिन और जन्म-समय भी लिख दिया था--ज्येष्ठ कृष्ण तृतीया, संवत् 1985 (8 मई, 1928) को सूर्योदयोपरांत। तिवारी जी के आर्यसमाजी पिता को न जन्म-समय पर विश्वास था, न जन्मकुंडली पर। 

7 मई, 1928. पहली प्रसूति होने से माता जी का लेबर पेन लम्बा खिंच रहा था। पिता जी ने पास की पंजाब सुगर मिल के मालिक नारंग मजीठिया की कार का बंदोबस्त किया और गोरखपुर गए। [नारंग मजीठिया पंजाबी खत्री थे और रामपुर बल्डिहा के असामी थे। उन्होंने 40 एकड़ ज़मीन 800/- सालाना के रियायती लगान पर लेकर घुघली स्टेशन (रामपुर बल्डिहा से तीन कि. मी.) के पास पंजाब शुगर मिल डाली थी। लगान के अलावा हर साल दो बोरा चीनी भी भेजते थे।] 

गोरखपुर में गायनिक की सबसे अच्छी डॉक्टर मिसिज़ वुड (अंग्रेज) थीं। उनकी विज़िट की फ़ीस 100/- थी। गोरखपुर शहर से रामपुर बल्डिहा की दूरी 34 मील (55 कि. मी.) है। मिसिज़ वुड ने कहा, गाड़ी से चलेंगे और 50/- जाने तथा 50/- आने का ख़र्च अलग से लेंगे। पिता जी ने कहा, हम गाड़ी लेकर आए हैं, उससे चलिए, उसी से वापस भी भिजवा देंगे। मिसिज़ वुड तैयार हो गईं। 

पिता जी जब मिसिज़ वुड के साथ रामपुर बल्डिहा पहुँचे, उसके पहले ही तिवारी जी का जन्म हो गया था। नगाड़ा बज रहा था। मिसिज़ वुड को फ़ीस के 100/- के अलावा 50/- और दिया गया। साथ में एक बोरा बढ़िया काला नमक चावल और एक थान मलमल भी उपहार में दिया गया। वे बहुत ख़ुश हुईं। उन्हें मजीठिया की उसी कार से गोरखपुर वापस भिजवा दिया गया। 

तिवारी जी का जन्म हुआ था 8 मई (1928) को सुबह 6 बजकर 29 मिनट पर। पिता जी के आर्यसमाज-प्रेम को पहला धक्का लगा। और जबर्दस्त लगा। 

वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक मिज़ाज के लोगों को भी धक्का लग सकता है। उनकी पहली प्रतिक्रिया इसे झूठ मानने की होगी। लेकिन मैं जितना तिवारी जी को जानता हूँ, उसकी रोशनी में मेरे लिए तो यह अपराध-जैसा होगा। तिवारी जी युवावस्था में कम्यूनिस्ट रहे थे और छात्र जीवन में ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के काडर सदस्य बन गये थे। उससे मुक्त होने पर मानव चेतना को पदार्थ के ख़ास समुच्चय की उपज तो मानते थे किंतु उसके उन्नयन की सम्भावना को असीम मानते थे। पदार्थ से सर्वथा भिन्न कैटिगरी। ब्रह्मांड की तरह स्थानातीत और कालातीत। लेकिन इसे रहस्यमय मानते थे कि चेतना के उन्नयन का इस्तेमाल जीविकोपर्जन या आर्थिक लाभ के लिए करते ही सारा उन्नयन नष्ट हो जाता है (आगे आयेगा) और अनिष्ट अलग से होता है। 

ऐसा क्यों होता है? मेरे पास भी कोई जवाब नहीं।      
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(क्रमश:) 

तिवारी जी के कुछ विलक्षण संस्मरण—बक़ौल तिवारी जी  

ऐसा होता तो है, किंतु क्यों और कैसे होता है?  

दो 

पाँच वर्ष की उम्र में तिवारी जी का मुंडन संस्कार हुआ। उसके बाद अक्षर-ज्ञान शुरू हुआ। उपनयन (जनेऊ) संस्कार तीन साल बाद, आठ वर्ष की उम्र में हुआ। उपनयन के समय वे कक्षा दो में पढ़ रहे थे। रामपुर बल्डिहा में ही एक प्राइमरी स्कूल था, उसी में पढ़ने जाते थे। अपने उपनयन के समय औरतों द्वारा गाया गया एक लोकगीत उन्हें याद हो गया था—‘आठ बरिस क भए ललन अब बरुआ कइ डारब हो।‘ बरुआ—ब्रह्मचारी वटुक जो शिक्षा के लिए गुरुकुल जाता था। यह अवधी का लोकगीत है; गोरखपुर (सरयूपार) के ब्राह्मणों की अधिकांश बहुएँ अवध क्षेत्र की बेटियाँ होती थीं (संदर्भ—सरयू से गंगा)। 

बात उससे एक साल पहले की है। उस समय तिवारी जी सात साल के थे। बीमार पड़ गए। बुखार और शरीर में तेज़ दर्द। पहले चार-पाँच दिन पंडित रंजीत नाथ वैद्य की दवा चली। पंडित रंजीत नाथ रियासत के पारिवारिक वैद्य थे। रियासत के दिए हुए मकान में रहते थे। उन्हें 5/- महीना नियमित दिया जाता था। इसके अतिरिक्त उन्हें चावल-दाल-आटा रियासत के अन्नागार से मिलता था। वे गाँव में वैद्यक की प्रैक्टिस भी करते थे। उन्होंने आँव, पेचिश और बदहज़मी से जुड़ी अन्य बीमारियों की एक विचित्र और कारगर दवा खोज निकाली थी। वह उन्हें गाँव के चर्मकारों से मिल जाती थी। गेहूँ की मड़ाई के समय बैलों के मुँह पर खोंच नहीं बाँधी जाती थी, इसे अधर्म माना जाता था। मड़ाई के लिए दँवरी चलते समय बैल भूसा मिला गेहूँ भरपेट खा लेते थे। ज़्यादा खाने से चलते-चलते गोबर करने लगते थे। उस गोबर में गेहूँ के अधपचे दाने भरे होते थे। दँवरी हाँकनेवाला भूसा उठाकर, उसी में गोबर रोपकर, कुछ दूर फेंक देता था। वहीं पड़ा-पड़ा वह सूखता रहता था। सूखने पर चर्मकार उसे बटोरकर, पीट-ओसाकर भूसा अलग कर देते थे और गेहूँ ले जाकर खाते थे। [अवध में भी हूबहू यही अमानवीय प्रथा प्रचलित थी जो मेरे बचपन तक चली आई थी।] पंडित रंजीत नाथ वही अधपचा गेहूँ चर्मकारों से सस्ते में ख़रीदकर रख लेते थे। आँव, पेचिश और बदहज़मी के अन्य रोगों के मरीजों को वही गेहूँ देते थे। दो टोकरी साफ़-सुथरे गेहूँ के बदले एक टोकरी गोबर से निकला गेहूँ। ऐसा गेहूँ बैल के पेट में आधा या उससे ज़्यादा पचा होने से मनुष्य के लिए सुपाच्य हो जाता था, उसे धो-पीसकर बने आटे की रोटी पेट के मरीज़ों को भी पच जाती थी। भोजन पचने से धीरे-धीरे ताक़त लौट आती थी और शरीर की बढ़ी हुई प्रतिरोधक क्षमता रोग-निवारण कर देती थी। 

जब रंजीत नाथ की आयुर्वेदिक दवा से चार-पाँच दिन तिवारी जी का बुख़ार नहीं उतरा तो उन्हें गोरखपुर में डॉ. के एन लाहिरी के दवाख़ाने में ले जाया गया। तब निजी प्रैक्टिस करनेवाले डॉक्टरों के नर्सिंग होम नहीं, रोग-निदान के ‘क्लीनिक’ भी नहीं, सिर्फ़ दवाख़ाने (dispensary) होते थे, जहाँ निदान और उपचार दोनों होता था। डॉक्टर प्राय: अपने बनाए हुए घोल (mixture) देते थे, तब तक पेटेंट दवाएँ बहुत कम थीं। मालूम हुआ, तिवारी जी को मियादी बुखार (टाइफ़ॉइड) है। तब तक क्लोरोमाइस्टीन नहीं आई थी और टाइफ़ॉइड का कोई इलाज नहीं था। यह आंतों का रोग है और निराहार से 7, 14 या 21 दिन में ठीक हो जाता था, उससे आगे बढ़ने पर घातक हो सकता था। 

डॉ. लाहिरी के इलाज के लिए अलीनगर मुहल्ले में एक किराए का मकान लिया गया। 10/- महीना किराया। उसमें तिवारी जी के साथ उनकी माँ, पिता जी, एक बुआ, तीन नौकर और दो ब्राह्मण रसोइए रामपुर बल्डिहा से आकर रहने लगे। इक्कीस दिन बीत गए, बुख़ार नहीं उतरा। डॉ. लाहिरी सिर्फ़ 2 चम्मच अंगूर का रस, मूँग का जूस और बार्ली वाटर पर रखते थे। सब बहुत घबरा गए। 

एक आदमी नाना जी के पास संदेश लेकर ‘दौड़ाया’ गया। नाना जी की रियासती कोठी सुल्तानपुर ज़िले की अमेठी तहसील के सुकुलपुरवा गाँव में थी जो सुकुल बाज़ार के पास था। नानाजी की ताल्लुक़ेदारी पोढ़ी थी और यह गाँव उन्होंने ख़ुद ख़रीदा था। सरकार को देय उनकी सालाना मालगुज़ारी (land revenue) 17 हज़ार रु. थी जब कि रामपुर बल्डिहा के 22 गाँवों की 11 हज़ार ही थी। 

तब संदेश-वाहक का एक अलग पेशा होता था। वे बहुत तेज़ चलते / दौड़ते थे। हाथ में एक लाठी होती थी जिसमें छोटे-छोटे घुँघरूँ बँधे होते थे। चलते समय घुँघरूँ बजते थे और अन्य मुसाफ़िर उनके लिए रास्ता छोड़ देते थे। 

नाना जी के पास शेव्रले कार थी। पूरा समाचार सुनकर वे गोरखपुर नहीं आए, अपनी शेव्रले से सीधे इलाहाबाद पहुँच गए, पंडित उमापति शास्त्री के यहाँ। शास्त्री जी ने कहा, सोमवार को यहीं से अनुष्ठान शुरू करेंगे। जहाँ बालक है, गाय की बछिया के गोबर से तीन हाथ चौड़ी और पाँच हाथ लम्बी जगह लीप दी जाए। बालक को निर्वस्त्र कर उसी पर लिटाया जाए। इसके लिए तीन ब्राह्मण स्नान करके, नया यज्ञोपवीत धारणकर बालक को उठाएँगे और लिपी हुई  ज़मीन पर, पैर दक्षिण तथा शिर उत्तर दिशा में करके, लिटा देंगे। सुबह नौ बजे के पहले लिटा दिया जाए और साढ़े दस बजे उठाया जाए। उसी बीच हम एक घंटे अनुष्ठान करेंगे। इस बीच बालक को कोई स्त्री न छुए। तीन दिन अनुष्ठान चलेगा। 

गोरखपुर में, अलीनगर वाले किराए के मकान में अनुष्ठान शुरू हुआ। निर्वस्त्र करके लिपे हुए स्थान पर लिटाए जाने पर पहले से ही कमज़ोर तिवारी जी को बहुत ठंड लगती थी। चिल्लाते थे--यहाँ से उठाओ। नौकर नहीं उठाते थे, वहाँ से हट जाते थे। अम्माँ जी पर कोई असर नहीं, सख़्त अनुशासनप्रिय थीं। लेकिन बुआ जी बहुत मयगर थीं, एक किनारे खड़ी होकर देखती थीं और आँचल से मुँह ढककर रोती थीं। तिवारी जी को एहसास हो गया कि उठाएँगी तो बुआ जी ही उठाएँगी। उन्हें देखकर चिल्लाते थे—‘हे बुआ, हमका उठावा नाहीं त हम मरि जाबै।‘ अनुष्ठान के दूसरे दिन बुआ जी से बर्दाश्त नहीं हुआ। तिवारी जी को लिपी हुई ज़मीन से उठाया और चारपाई पर लिटा दिया। तिवारी जी की माँ को झिड़कीं भी—‘दुलहिन एतना टिटिम्मा करत हईं, बचवा क जान लै लेइ लेइहैं का।‘ अम्माँ परेशान। यह वाक़या मंगलवार, दस बजे दिन का है। 

अगले दिन बुधवार था। डेढ़ बजे इलाहाबाद से शास्त्री जी का टेलीग्राम आ गया। तब और बहुत बाद तक टेलीग्राम अंग्रेजी में हुआ करते थे— 

“Some woman touched the child. Puja spoiled. Start again on Monday.” 

सन्नाटा छा गया। बुआ धार-धार रोने लगीं—बड़ी भारी ग़लती हो गई, मुझे विश्वास नहीं था। 

अम्मां जी ने उन्हें समझाया—‘काहे रोअत अहीं। पुजवा दुबारा होई। इहै लिखल रहा।‘ 

अगले सोमवार को अनुष्ठान फिर शुरू हुआ। तीन दिन की अवधि पूरी होने के बाद तिवारी जी बेहतर महसूस करने लगे। डॉ. लाहरी ने बुख़ार नापा तो नॉर्मल था। तिवारी जी को मूँग के जूस की जगह मूँग की खिचड़ी और अंगूर के रस की जगह अंगूर (उस समय बड़े-बड़े अंगूर आते थे) खाने को मिलने लगा। तिवारी जी ठीक हो गए। 

और पिता जी का सत्यार्थ प्रकाश पढ़ना बंद हो गया। उन्होंने आर्यसमाज से तौबा कर लिया। और इस तरह अम्माँ जी को सत्यार्थ प्रकाश का ‘समुल्लास’ पढ़ने से मुक्ति मिल गई।
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(क्रमश:) 

नये मित्रों के लिए: 

तिवारी जी के कुछ विलक्षण संस्मरण—बक़ौल तिवारी जी  

ऐसा होता तो है, किंतु क्यों और कैसे होता है?  

तीन 

तिवारी जी का बचपन का नाम भुंदल था। जाने किसने और किस प्रसंग में यह नाम रख दिया था। और रख दिया तो उनके साथ चिपक गया। जैसा कि प्राय: होता है, परिवार के बड़े लोग जिस नाम से बचपन में बुलाते हैं, बाद में भी आदतन उसी नाम से बुलाते रहते हैं। 

तिवारी जी रामपुर बल्डिहा के प्राइमरी स्कूल से चौथी कक्षा पास कर (तब प्राइमरी स्कूल में चौथी और मिडिल स्कूल में सातवीं कक्षा फ़ाइनल होती थी) घुघली के ऐंग्लो संस्कृत मिडिल स्कूल पढ़ने गए। [ उस दौर में आर्यसमाजियों के दयानंद ऐंग्लो वैदिक (डी ए वी) स्कूलों के अनुकरण में सनातनियों ने ऐंग्लो संस्कृत स्कूल खोलने शुरू किए थे। घुघली का मिडिल स्कूल रामपुर बल्डिहा रियासत, पंजाब चीनी मिल के मालिक मजीठिया जी, हरपुर मठ के महंत और कुछ अन्य ब्राह्मणों की पहल और  प्रयास से खुला था। बाद में वह हाई स्कूल हुआ, फिर इंटर कॉलेज बन गया।] वहाँ से मिडिल पास करने के बाद तिवारी जी ने सेंट ऐंड्र्यूज़ कॉलेज, गोरखपुर से इंटरमीडिएट किया और 1947 में बी ए करने के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आये। कुछ दिन प्रयाग स्टेशन के पास एक धर्मशाला में रामपुर बल्डिहा से आये अपने नौकर और रसोइये के साथ रहने के बाद हिंदू हॉस्टल आ गए।            

जनवरी 1948.  तिवारी जी बी ए के छात्र थे। वे सेंट एंड्र्यूज़ के दिनों से ही राजनीति में सक्रिय थे। पहले एम एन रॉय की रैडिकल डिमॉक्रेटिक पार्टी में, फिर उसके विघटित होने पर कम्यूनिस्ट पार्टी में आ गए थे। यूनिवर्सिटी आने से पहले ही वे कम्यूनिस्ट पार्टी के मँजे हुए कार्यकर्ता बन चुके थे। यहाँ आकर  कम्यूनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध मार्क्सिस्ट क्लब, स्ट्यूडेंट्स फ़ेडरेशन और प्रगतिशील लेखक संघ, तीनों के सदस्य बन गए थे। छात्र-जीवन में ही उन्हें कम्यूनिस्ट पार्टी की काडर सदस्यता मिल गई (1950)। और 1953 में कम्यूनिस्ट विचारधारा तथा  कम्यूनिस्ट संगठन की विसंगतियों पर एक विस्तृत आलेख लिखकर उसके साथ उन्होंने अपना इस्तीफ़ा भेज दिया जो स्वीकृत हो गया। किंतु आजीवन वे एक आडंबरहीन समतावादी समाज के आधारभूत मूल्यों को जीते रहे।       

इस बीच पंडित उमापति शास्त्री की मृत्यु हो चुकी थी। उनके दो पुत्र थे—विद्यापति (बड़े) और रमापति (छोटे)। मृत्यु के पूर्व उन्होंने दोनों पुत्रों में सम्पत्ति के साथ-साथ अपनी विद्या का भी बँटवारा कर दिया था। विद्यापति को केवल मूक प्रश्न का उत्तर देना सिखाया और शेष विद्या (ज्योतिष और तंत्र) रमापति को सिखा दिया। रमापति से उन्होंने वचन लिया था कि 35 वर्ष की उम्र के बाद ही वे तंत्र की साधना करेंगे। किंतु रमापति ने 35 वर्ष की उम्र तक इंतज़ार नहीं किया। यही नहीं, उन्होंने इसका धंधा शुरू कर दिया,यानी कमाई का साधन बना लिया।  संयोग या कुछ और, कुछ ही दिनों में वे पागल हो गए। छत से कूदने की कोशिश करते। इक्के पर से कूद जाते थे। दरवाज़ा तोड़ देते। विद्यापति उनसे अलग हो गए। रमापति पागल अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हुए। यह भी जीवन का एक पहलू है कि सहज रूप से हम कार्य-कारण सम्बंध खोजते रहते हैं। कभी मिलता है, कभी नहीं।          

विद्यापति केवल मूक प्रश्न का उत्तर देते थे। उन्होंने अपने पिता जी  के सिद्धांत का अक्षरश: पालन किया, इसे कभी व्यवसाय नहीं बनाया। वे आयुर्वेदाचार्य थे और जीविका के लिए आयुर्वेद की प्रैक्टिस करते थे। कविराज कहे जाते थे। इलाहाबाद के बहादुरगंज मुहल्ले में रहते थे। तिवारी जी की माँ स्व. उमापति जी से अपने पिता के घनिष्ठ सम्बंध के नाते विद्यापति को भाई मानती थीं।  

1948 में बारह साल बाद कुंभ लगा था। तिवारी जी के परिवार के कई लोग एक महीने के कल्पवास के लिए प्रयाग आए थे। उल्लेख हो चुका है कि तिवारी जी के पिता पाँच भाई थे। तब तक पाँचों भाइयों में ख़ुदकास्त का ख़ानगी बँटवारा हो गया था किंतु गाँव नहीं बँटे थे। ट्रैक्टर आ गया था जो मुस्तरका (साझे में) था। उसका ड्राइवर तुलसी हर महीने 150/- वेतन, साल में दो जोड़ी कपड़े और सुरती का ख़र्च अलग से पाता था। पाँच भाइयों में जिसका खेत जोत रहा होता, उसी के यहाँ भोजन करता था। ज़मींदारी का शामिलाती काम अब भी बड़े भाई देखते थे जिन्हें तिवारी जी बड़े चाचा कहते थे। 

कल्पवास में आनेवालों में तिवारी जी के पिता जी, माता जी, तिवारी जी की पाँचों बहनें और साथ में तिवारी जी के सबसे छोटे चाचा की पत्नी भी थीं। तिवारी जी की माँ का उनसे बहुत लगाव था। जिठानी-देवरानी होने के बावजूद दोनों में गहरा बहनापा था। 

तिवारी जी की माँ एक साल से कैंसर से पीड़ित थीं। इलाज चल रहा था। बहुत ज़िद करके कल्पवास में आई थीं। दरअसल उन्हें विद्यापति जी से एक 'मूक प्रश्न' पूछना था। उन्होंने अपनी देवरानी से इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा, मुझे भी एक प्रश्न पूछना है। देवरानी की समस्या उनके मायके की थी। उनके दो भाई थे—गौरी शंकर दूबे और विष्णुदेव दूबे। [विष्णुदेव दूबे बाद में तिवारी जी की तरह पहले सेंट एंड्र्यूज़ पोस्ट ग्रैज्युएट डिग्री कॉलेज, फिर गोरखपुर यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हुए।] बडे भाई गौरी शंकर के कोई संतान नहीं थी। गौने के बाद दस साल तक कोई संतान नहीं हुई तो पत्नी के आग्रह पर उन्होंने दूसरी शादी की। दूसरी शादी हुए भी एक अरसा गुज़र गया था किंतु अभी तक संतान नहीं हुई थी। दूसरे भाई विष्णुदेव जी का अभी गौना ही नहीं आया था। 

तिवारी जी के पिता का आर्यसमाज-प्रेम बहुत पहले छूट चुका था किंतु माता जी की हिम्मत नहीं हुई कि उनसे विद्यापति जी के यहाँ मूक प्रश्न पूछने के लिए साथ चलने को कहें। उन्होंने देवरानी से कहा—कल भुंदल आएँगे तो उन्हीं के साथ चलेंगे। 

तिवारी जी रोज़ एक बार इन लोगों के बाड़े का चक्कर लगा आते थे। अक्सर शाम को, इतवार या अन्य छुट्टी के दिन सवेरे। दूसरे दिन सवेरे बाड़े में गए तो माँ ने कहा, हम दोनों बहनों (देवरानी-जिठानी) को विद्यापति भैया के यहाँ चलना है, बहादुरगंज में रहते हैं, हमें वहाँ ले चलो। पूछने पर यह भी बता दिया कि दोनों को मूक प्रश्न पूछना है। मार्क्सवादी तिवारी जी हँसे। उन्हें इस तरह की बातों पर कतई विश्वास नहीं था। उनके जन्म और बचपन में हुए टॉयफ़ायड के वाक़यात उन्हें याद थे किंतु उन्हें 'फ़्रीक' मानकर टाल दिया था। पर वे माँ से कहते तो क्या कहते! फिर उन्होंने सोचा, पंडित जी जब नहीं बता पाएँगे तो अपने-आप पोल खुल जाएगी। पिता जी को यह तो बताया गया कि विद्यापति जी से मिलने जा रहे हैं लेकिन यह नहीं कि मूक प्रश्न पूछने जा रहे हैं। वैसे तिवारी जी का अनुमान था कि इस पर भी उन्हें कोई एतराज़ न होता। 

दोनों महिलाओं के साथ तिवारी जी विद्यापति कविराज के यहाँ पहुँचे। उन्होंने बड़े आदर के साथ कहा—‘बैठल जाइ।‘ तिवारी जी की माँ से बोले—ई तोहार देवरानी हैं न। फिर तिवारी जी की ओर इशारा किया—‘ये तो यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं, कम्यूनिस्ट निकल गए हैं।‘ उन दिनों यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन का वर्चस्व था। मार्क्सिस्ट क्लब और स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन में सक्रिय होने से तिवारी जी का नाम कभी-कभी स्थानीय अख़बारों में छप जाता था। जब मार्क्सवाद के विद्वानों  का भाषण होता था तो उन्हें भी बुलाया जाता था, उनके भाषण की ख़बर भी अख़बारों में छपती थी। 

जब बात आई कि मूक प्रश्न पूछना है तो विद्यापति जी ने तिवारी जी की ओर देखकर कहा—‘इन्हें तो विश्वास होगा नहीं, ख़ैर, कोई बात नहीं, दोनों जनी जाकर पाँच-पाँच फल अलग-अलग ख़रीदिए।‘ फिर मुस्कराए, ‘और अपना-अपना प्रश्न लिखकर इन्हीं (तिवारी जी) को दे दीजिए। फिर फल लाकर यहाँ दे दीजिए।‘  

तिवारी जी दोनों को लेकर चौक घंटाघर गए। माता जी ने ख़रीदा केला, सेब, अमरूद, नाशपाती और संतरा। चाची जी ने ख़रीदा—अखरोट, बादाम, पिस्ता, चिरौंजी और काजू। जब दोनों फल लेकर तिवारी जी के पास आ गईं,  उन्होंने एक काग़ज़ निकाला, उसके दो हिस्से किए और दोनों से बोले—अपना-अपना प्रश्न इसी पर लिख दीजिए। दोनों ने प्रश्न लिखा और तिवारी जी को पकड़ा दिया। इस दौरान तिवारी जी लगातार चौकस थे, चारों ओर देख रहे थे कि कोई उन पर निगाह तो नहीं रखे हुए है। ऐसा कुछ नहीं लगा। 

वहाँ से विद्यापति जी के घर फल देने गए। उन्होंने फल लेकर घर के अंदर बने देवी के छोटे-से मंदिर में मूर्ति के सामने रख दिया। फिर तिवारी जी से बोले—कल सायं चार बजे आकर उत्तर ले जाओ। वहाँ से तिवारी जी दोनों महिलाओं को बाड़े में छोड़कर हॉस्टल आ गए। दोनों के प्रश्नों की पर्चियाँ उनकी जेब में।  

तिवारी जी को रात भर नींद नहीं आई। करवट बदलते रहे। फिर सुबह से चार बजे दिन तक का समय काटना मुश्किल। थोड़ा पहले ही हॉस्टल से निकल लिए और इक्का करके बहादुरगंज पहुँच गए। उस समय बजे थे साढ़े तीन। इधर-उधर चक्कर मारने लगे। आधा घंटा बिताना कठिन हो गया। बार-बार सोचते थे, पंडित जी ज़रूर कोई बहाना बना देंगे। ठीक चार बजे विद्यापति जी के घर पहुँचे।  

‘आओ भुंदल, बैठो। लिखकर रखे हैं। मुझे अनुमान था कि तुम्हारी छुट्टी चार बजे होती है... कुछ खाओगे? केला लाता हूँ।‘ 

तिवारी जी ने केला खाया, पानी पिया। तब विद्यापति जी अंदर मूर्ति के पास गए और वहाँ से दो पुर्ज़े लाकर तिवारी जी को दे दिया। दोनों एक-एक पेज के थे। तिवारी जी ने दोनों को एक-एककर पढ़ा— 

एक: 

सौभाग्यवती बहन गिरिजा देवी (तिवारी जी की माँ) का प्रश्न 

प्रश्न--मेरी कितनी आयु शेष है? 

उत्तर—चार महीने तेईस दिन।  

हस्ताक्षर          

(विद्यापति त्रिपाठी) 

दो: 

सौभाग्यवती ईश्वरी देवी (तिवारी जी की चाची) का प्रश्न 

प्रश्न—मेरे बड़े भाई के लड़का कब होगा? 

उत्तर—इसकी कोई संभावना नहीं है। 

टिप्पणी—प्रश्न अशुद्ध है। इसको निम्नलिखित होना चाहिए था— 

‘मेरे बड़े भाई की दूसरी पत्नी के लड़का कब होगा?’ 

हस्ताक्षर 

(विद्यापति त्रिपाठी)   


तिवारी जी का मार्क्सवाद हिल गया। अगली रात भी ठीक से नींद नहीं आई। 

बाड़ा जाकर दोनों को उत्तर थमाया। उसे देखकर माँ चुप, ग़मगीन हो गईं। पर चाची विद्यापति पर बिफर पड़ीं—‘आगि लागै पंडित कै पत्रा में। जब लड़का होगा तो पियरी लाकर पटक दूंगी।‘  

किंतु गौरीशंकर जी के कोई संतान नहीं हुई। एक साल के भीतर उनका देहांत हो गया। 

और माता जी: 

तीन या चार मार्च (1948) को तिवारी जी का इम्तहान ख़त्म हुआ। वे घर गए। माँ की हालत बिगड़ चुकी थी। बीच-बीच में बेहोश हो जाती थीं। पारिवारिक परंपरानुसार उन्हें लेकर बनारस गए। किराए पर मकान लिया। वहीं एक वैद्य ने देखकर कहा—‘रोग असाध्य है। वेदना उत्कट है। एक दवा दे रहा हूँ। गरम पानी के साथ देते रहें। इससे तकलीफ़ कम होगी। वही किया। होश आ गया। घर के लोग बनारस आए। पिता जी, तिवारी जी की बहनें, छोटी चाची, बुआ--माँ के प्रिय सभी लोग। मृत्यु के पूर्व होशोहवास में सभी प्रिय और आत्मीय जनों के बीच मुतमईन थीं। और मृत्यु जिस दिन हुई वह मूक प्रश्न के उत्तर के एकदम अनुरूप था। 

तिवारी जी के जीवन में ये दो घटनाएँ (सात साल की उम्र में टाइफ़ॉइड और माँ तथा चाची के मूक प्रश्नों के उत्तर जिसके वे साक्षी बने) घटीं जिनके मद्देनज़र उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, जीवन में कभी-कभी कुछ ऐसा घट जाता है, जिसे समझने में बुद्धि जवाब दे जाती है; तब मानना पड़ता है कि कुछ है जो बुद्धि से परे है। 
  
लेकिन यह भी सच है कि शिद्दत से यह एहसास उसी को होता है जिसके जीवन में ऐसा कुछ घटित होता है। दूसरों से सुनकर वैसा एहसास शायद ही होता हो। 

यह भी एक तथ्य है कि बावजूद इसके तिवारी जी कम्यूनिस्ट पार्टी में 1953 तक बने रहे। जीवन जीवन है, उसकी राहें अगम्य और बीहड़ हैं। 

सार्त्र ने लिखा है मनुष्य के होश सँभालते ही उसकी चेतना स्वतंत्र हो जाती है। पूर्ण स्वतंत्र। उसके शरीर से, शरीर के अंग-प्रत्यंग से, उसके मस्तिष्क से भी (जो चेतना का स्रोत माना जाता है)। बाह्य जगत्‌ से भी। मानव-चेतना को हर स्थिति में चयन की, निर्णय की स्वतंत्रता मिल जाती है। इस अर्थ में चेतना पदार्थ से तत्वत: भिन्न होती है। उसमें अजस्र जिज्ञासा होती है जो स्थूल पदार्थ में नहीं होती। पदार्थ समय और स्थान की सीमाओं से सीमित होता है, चेतना नहीं। चेतना की क्षमता का एहसास साधारणत: चेतना को भी नहीं होता। क्या किसी तरह की प्रविधि और अभ्यास से असामान्य रूप से सक्षम हुई चेतना के लिए यह संभव है कि वह समय और स्थान की सीमाओं का अतिक्रमण कर ऐसा कुछ जान सके जो साधारणत: वैयक्तिक चेतना के लिए संभव नहीं लगता? क्या extrasensory perception जैसी कोई चीज़ तत्वत: होती है या यह मात्र छलावा या हॅलूसिनेशन है? क्वांटम भौतिकी, जेनेटिक्स और परामनोविज्ञान की संभावनाएँ अनंत हैं। यानी, विज्ञान की संभावनाएँ अनंत है। कोई, कभी भी नहीं कह सकता और शायद भविष्य में भी न कह सके--बस यहाँ तक, इसके आगे कुछ नहीं। 

(Thus far, no further)।             
………………..
(समाप्त)एफ

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