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Saturday, 25 October 2025

“एक झुग्गी का बच्चा और लकवाग्रस्त करोड़पति औरत”

मालाबार हिल की हवेली की जगह
विक्टोरिया हर सुबह धारावी आती थी।
आरव और उसकी दादी उसे नीम की मालिश करते,
औषधीय भाप और श्वास साधना कराते,
और सबसे जरूरी —
उसे हर दिन किसी ज़रूरतमंद को खाना बाँटने को कहते।
पहले दिन उसके चेहरे पर झिझक थी,
तीसरे दिन वह मुस्कुराई,
और सातवें दिन जब वह एक बुज़ुर्ग महिला को पराठा दे रही थी —
वह रो पड़ी।
आठ साल में पहली बार उसके अंदर कुछ जागा था।

सातवें दिन शाम को, आरव ने कहा,
“अब एक आखिरी चीज़ करनी है।”
उसने उसे मंदिर के प्रांगण में बैठाया और बोला,
“अपनी आँखें बंद कीजिए।
अपनी टाँगों से मत लड़िए — बस उन्हें महसूस कीजिए।”

विक्टोरिया ने आँखें बंद कीं।
गहरी साँस ली।
और अचानक — एक झनझनाहट…
पहले हल्की, फिर तेज़ —
उसकी उँगलियाँ हिलीं।

लक्ष्मी और आरव ने एक-दूसरे को देखा,
और विक्टोरिया के होंठों से निकला —
“मैं… मैं महसूस कर सकती हूँ…”

उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह रोई — जैसे किसी ने उसके अंदर की बर्फ़ पिघला दी हो।

तीन महीने बाद,
समाचार चैनलों पर सुर्ख़ियाँ थीं:
“मालाबार हिल की लकवाग्रस्त करोड़पति अब चलने लगीं – इलाज किया एक झुग्गी के बच्चे ने।”

विक्टोरिया ने किसी इंटरव्यू में डॉक्टरों को दोष नहीं दिया,
न ही खुद को भगवान बताया।
उसने बस इतना कहा —
“कभी-कभी सबसे बड़ी दवा वह होती है,
जो हमें अपनी ही आत्मा में मिलती है।”

वह अब हर हफ़्ते धारावी आती थी,
जहाँ उसने ‘आरव फाउंडेशन’ के नाम से एक क्लिनिक और स्कूल शुरू करवाया था।
जहाँ झुग्गी के बच्चे सिर्फ़ पढ़ते नहीं थे —
बल्कि दूसरों को ठीक करना भी सीखते थे।

कहते हैं, उस दिन के बाद विक्टोरिया मल्होत्रा फिर कभी अपने व्हीलचेयर पर नहीं बैठीं।
और आरव?
वह अभी भी वही बारह साल का बच्चा था,
जो हर सुबह मंदिर के सामने खड़ा होकर
लोगों को याद दिलाता था कि
“चमत्कार वहीं होते हैं जहाँ इंसान दूसरों के दर्द को देखना सीख जाए।”

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