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Thursday, 23 October 2025

प्राचीन भारत की शिल्प कला विलुप्तप्राय: हो गई ! क्यों? और बची हैं तो किसके कारण विचार करें 🙏

प्राचीन भारत में ताँबा के ++++ वनस्पति के रस में सात बार डुबो कर और सात बार गर्म कर रीठा के जल से सफाई कर सोना बनाया जाता था। सुनार ताँबा का आभूषण बनाकर उसे सोना में बदल देते थे। अनेक छोटे छोटे मोती को जोड़कर बड़े आकार की मोती बनाने की विद्या उनके पास थी। शंख के चूर्ण से, सीपी के चूर्ण से ऐसे मोती बना लेते थे कि पहचान करने वाले भी धोखा खा जाए। यह विद्या कहाँ गयी? 
#लुहार के पास ऐसी कला थी कि उसका बनाया हुआ लोहे का हथियार और दूसरे घरेलू औजार में जंग नहीं लगता था। लुहार ऐसे बाण बनाते थे, जो लक्ष्य पर जाते ही मिसाइल की तरह फट जाते थे, उनमें बारूद का प्रयोग होता था। गंधक, सुहागा, अभ्रक, नोनी मिट्टी इन सबसे वे अपनी #फैक्टरी में बारूद बनाते थे।

#धुनियाँ रूई धुनने के लिए सेमल का बीज इकट्टा करते थे। ऊँचे-ऊँचे पेड़ से एक साथ सेमल के फल को गिराने के लिए पेड़ की जड़ में ++++ का लेप करते थे और चुटकियों में यह काम हो जाता था। 

#ठठेरे #अष्टद्रव्य के बर्तन बनाते थे, #त्रिलौह ढालने की विद्या उनके पास थी। 

#कुम्हार के पास ऐसी कला थी कि मिट्टी के बर्तन में कभी नोनी नहीं लगती थी और वह लोहे के जैसा मजबूत हो जाता था। उत्तरी भारत का कृष्ण-लेपित मृद्भाण्ड NBPP. की तकनीक कहाँ गयी, किसी ने उसे भूल जाने की जिम्मेदारी ली है?
#शिल्पी एक प्रहर के लिए पत्थर के चट्टान को गीली मिट्टी की तरह कोमल बना देने के लिए वनस्पति से लेपित करने की तकनीक जानते थे। तभी तो इतनी महीन कलाकारी कर चुके हैं।

सबके पास अपनी-अपनी #विद्या थी, अपना-अपना #वेद था, वे उन वेदों को भूल चुके हैं, बरबाद कर चुके हैं। इन बातों पर सोचना सबसे जरूरी है। प्राचीन भारत की समृद्धि को इन जातियों ने बरबाद की है और अब कहते हैं कि उन्हें पढ़ने नहीं दिया गया? 

अपनी पढ़ाई भूल कर, अपना वेद भूलकर अब सारा ठीकरा ब्राह्मणों के सर फोड़ रह हैं!! 
ब्राह्मणों ने आज तक सबकुछ बचा कर रखा है!!

✍️ पं भवनाथ झा जी

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