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भगवान् धन्वन्तरि का उल्लेख चारों वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों और प्राचीन उपनिषदों में नहीं प्राप्त होता।लौकिक संस्कृत में सर्वप्रथम धन्वन्तरि का वर्णन वाल्मीकि रामायण में बालकाण्ड में प्राप्त होता है। विश्वामित्र राम और लक्ष्मण कोसमुद्र मंथन की कथा सुनाते हुए कहते हैं -
अथ वर्षसहश्रेण आयुर्वेदमय: पुमान्।
उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्ड: सकमण्डलु: ।
पूर्वं धन्वन्तरिर्नाम अप्सराश्च सुवर्चस:।
45/31-32
अर्थात् उसके बाद एक हजार वर्ष बीतने पर उस क्षीरसागर से एक आयुर्वेदमय धर्मात्मा पुरुष प्रकट हुए, जिनके एक हाथ में दण्ड और दूसरे में कमण्डलु था।उनका नाम धन्वन्तरि था।
इस प्रकार स्पष्टरूप से आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि का प्राकट्य समुद्र मंथन के समय क्षीरसागर से हुआ था।
इसके पश्चात् महाभारत में आदिपर्व के आस्तीक पर्व में समुद्र मंथन के प्रसंग में दिव्यशरीरधारी धन्वन्तरि देव के प्रकट होने का वर्णन है।
धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत।
श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति।।
18/38
यहां वाल्मीकि रामायण से तीन तथ्यों की भिन्नता उल्लेखनीय है।पहला रामायण में धन्वन्तरि को पुरुष कहा गया था और यहां देव।दूसरा रामायण में केवल कमण्डलु का उल्लेख था और यहां अमृत से भरे हुए कमण्डलु का। तीसरा रामायण में धन्वन्तरि को आयुर्वेदमय बताया गया है और यहां आयुर्वेद का उल्लेख नहीं है।
श्री हरिवंश पुराण, वायु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण जो कि पुराणों में सर्वाधिक प्राचीन पुराण हैं, में धन्वन्तरि की कथा लगभग एक समान प्राप्त होती है।
इन पुराणों के अनुसार जब समुद्र मंथन से धन्वन्तरि प्रकट हुए,उस समय भगवान् विष्णु के नामों का जप और आरोग्य साधक कार्य का चिन्तन करते हुए दिव्य कान्ति से प्रकाशित हो रहे थे। विष्णु ने जल से प्रकट होने के कारण उनका नाम अब्ज दिया।जब उन्होंने विष्णु से यज्ञ भाग की मांग की तब विष्णु ने यज्ञ भाग न देकर दूसरे जन्म में संसार में विख्यात होने और देवत्व प्राप्त करने का वर दिया। गर्भ में ही तुम्हें आठों सिद्धियां प्राप्त होंगी।भगवान् विष्णु ने यह भी कहा कि ब्राह्मण लोग चारु, मन्त्र,व्रत और जप द्वारा तुम्हारा यजन करेंगे। फिर तुम उस जन्म में आयुर्वेद को आठ भागों में विभक्त करोगे।दूसरा द्वापर आने पर काशिराज सुनहोत्र के वंश में उत्पन्न होने वाले राजा दीर्घतपा ( धन्व)के तपस्या से उनके यहां पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए। बाद में चलकर वे महाराजा काशिराज सभी रोगों का विनाश करने वाले हुए । तत्पश्चात् उन्होंने आयुर्वेद को आठ भागों में बांटकर अपने शिष्यों को उसकी शिक्षा दी। इस प्रकार द्वापर युग में ये दूसरे धन्वन्तरि हुए।धन्वन्तरि के पुत्र केतुमान, केतुमान के पुत्र भीमरथ और भीमरथ के पुत्र धर्मात्मा राजा दिवोदास हुए।
हरिवंशपुराण हरिवंशपर्व,अध्याय 29, वायुपुराण अध्याय 92 और ब्रह्माण्डपुराण मध्यभाग अध्याय 67 ।
मत्स्य पुराण के अध्याय 251 में समुद्र मंथन से धन्वन्तरि के प्रकट होने और आरोग्य के प्रवर्तक होने का उल्लेख है -
धन्वन्तरिञ्च जग्राह लोकारोग्यप्रवर्तकम्।
× × ×
धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत।
श्वेतं कमण्डलुं बिभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण में भी प्रथम खण्ड अध्याय 42 में समुद्र मंथन से अमृत से पूर्ण श्वेत कमण्डलु लिए हुए वैद्य धन्वन्तरि के प्रकट होने का उल्लेख है।
आयुर्वेद के प्रवर्तक और आरोग्य के देव भगवान् नारायण के अंशावतार धन्वन्तरि का प्राकट्य आज के दिन समुद्र मन्थन के समय हुआ था। ब्रह्म वैवर्त पुराण में कहा गया है कि -
नारायणांशो भगवान्
स्वयं धन्वन्तरिर्महान्।
पुरा समुद्रमथने
समुत्तस्थौ महोदधेः।।
सर्ववेदेषु निष्णातो
मन्त्रतन्त्रविशारदः।
शिष्यो हि वैनतेयस्य
शङ्करस्योपशिष्यकः।।
(ब्रह्मवै० श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१/२-३)
अर्थात् प्राचीन काल मे समुद्र मंथन के काल मे सभी वेदों में निष्णात, मन्त्र-तन्त्र विशारद, वैनतेय के शिष्य और शंकर के उपशिष्य के रूप में स्वयं भगवान् नारायण के अंश के रूप में भगवान् धन्वन्तरि महोदधि से प्रकट हुए।
विष्णु पुराण 1/9/98में भी लिखा है कि देवासुर संग्राम में समुद्र मन्थन में श्रीलक्ष्मी के प्रकट के पूर्व धन्वन्तरि जी अमृत से भरा हुआ कलश लेकर प्रकट हुए थे।
इस प्रकार अधिकतर पुराणों और काश्यप संहिता आदि में समुद्र मंथन से आयुर्वेद प्रवर्तक धन्वन्तरि के प्रकट होने की कथा प्राप्त होती है। समुद्र मंथन से प्रकट होने वाले धन्वन्तरि प्रथम धन्वन्तरि हैं।
द्वितीय धन्वन्तरि और तृतीय धन्वन्तरि ( दिवोदास) काशिराज के वंश में उत्पन्न हुए थे। इसका उल्लेख ऊपर हरिवंश पुराण, वायु पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण में किया गया है।
सुश्रुत संहिता में इसी तथ्य की पुष्टि प्राप्त होती है -
अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुजामृत्युहरोsमनृणाम्।शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतं प्राप्तोsस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम्।
अर्थात् देवताओं की वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु को नष्ट करने वाला आदिदेव मैं धन्वन्तरि आयुर्वेद के अन्य अङ्गों के साथ शल्यतन्त्र का उपदेश करने के लिए फिर से इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ हूं।
इन्हीं दिवोदास धन्वन्तरि का उल्लेख काठकसंहिता,कौशीतकी उपनिषद् अध्याय 2 मन्त्र 5 में भी मिलता है।
सुश्रुत संहिता में काशिराज दिवोदास भगवान् धन्वन्तरि के शिष्यों औपधेनव,वैतरण,औरभ्र,निमि,करवीर्य और सुश्रुत आदि के शिक्षा ग्रहण करने का भी उल्लेख है -
अथ खलु भगवन्तममरवरमृषिगणपरिवृतमाश्रमस्थं काशिराजं दिवोदासं धन्वन्तरिमौपघेनवैतरणौरभ्रपौष्कलावतकरवीर्यगोपुररक्षितसुश्रूतप्रभृतय: ऊचु: । अध्याय 1.
भगवान् धन्वंतरि के पास आये हुए गालव,गार्ग्य आदि शिष्यों ने सर्व साधारण प्रजा की हितकामना से आयुर्वेद शास्त्र की शिक्षा देने का अनुरोध किया। सुश्रुत संहिता 1/6-7 के अनुसार धन्वंतरि ने उन शिष्यों को शिक्षा देते हुए बताया कि आयुर्वेद अथर्ववेद का उपाङ्ग है और इसके आठ भाग हैं। सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा ने आयुर्वेद को एक लाख श्लोकों और एक हजार अध्यायों के रूप में बनाया था।बाद में उसे आठ भागों में विभक्त कर दिया।वे आठ भाग शल्य, शालाक्य, काय-चिकित्सा,भूत विद्या कौमार भृत्य,अगद तन्त्र,रसायन तन्त्र और वाजीकरण तन्त्र हैं।
भानुमती में धन्वन्तरि की व्याख्या में कहा गया है -
जगदर्थसाधनाद् धनुर्धर्मस्तस्यान्तो व्याधिरकालमृत्युसम्पादकोsधर्मस्तस्यारि: शत्रुर्योsसौ धन्वन्तरि: ।
पद्मपुराण में लिखा है कि सोमनाथ, वैद्यनाथ, धन्वन्तरि और अश्वनीकुमारों का नित्य स्मरण करने से व्यक्ति को कोई व्याधि नहीं होती है और वह नीरोग रहता है।सोमनाथो वैद्यनाथो धन्वन्तरिरथाश्विनौ।
पंचैतान् य: स्मरेन्नित्यं
व्याधिस्तस्य न जायते।
अग्नि पुराण अध्याय 284में धन्वन्तरि भगवान् सश्रुत से कहते हैं कि ओंकार आदि मन्त्र आयु को बढ़ाने वाले तथा समस्त रोगों को दूर कर आरोग्य को बढ़ाने वाले होते हैं। इसी में आगे कहते हैं कि पुष्कराक्ष नाम का जप आंखों के रोगों को दूर करता है। धन्वन्तरि जी कहते हैं कि ओं ह्रूं विष्णवे नमः यह मन्त्र उत्तम औषधि है।
आयुरारोग्यकर्तार ओंकाराद्याश्च नाकदा:।
ओंकार: परमो मन्त्रस्तं जप्त्वा चामरो भवेत्।।
ओं ह्रूं नमो विष्णवे मन्त्रोsयंचौषधं परम्।
अनेन देवा ह्यसुरा: सश्रियो नीरुजोs भवन्।।
औषधि लेते समय भगवान् विष्णु के अच्युत, अनन्त, गोविन्द और हृषीकेश नामों का चिन्तन, स्मरण और जप करना चाहिए।
अग्नि पुराण में धन्वन्तरि ने अनेक अध्यायों में सुश्रुत को औषधियों और विभिन्न रोगों के उपचार के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने ने सभी रोगों की शान्ति के लिए भगवान् विष्णु का ध्यान और पूजन का उपदेश दिया है -
सर्वरोगप्रशान्त्यै स्याद् विष्णोध्यानञ्च पूजनम्।280/48
अन्यत्र भी लिखा है-
औषधे चिन्तयेद् विष्णुं ।
और
अच्युतानन्त गोविन्द नामोच्चारणभेषजात्।
नश्यन्ति सकला रोगाः
सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।
अच्युतानन्त गोविंद विष्णो नारायणा मृत।
रोगान् मे नाशयाsशेषान्नाशु धन्वन्तरे हरे।
यहां विष्णु और धन्वन्तरि से सभी रोगों के विनाश की प्रार्थना की गयी है।
अग्निपुराण में आगे 285 अध्याय में धन्वन्तरि ने अमृत तुल्य अनेक औषधियों का वर्णन किया है।जो मनुष्यों के लिए अत्यन्त आरोग्यकर हैं।
श्रीमद्भागवत पुराण में विष्णु के अवतारों के प्रसंग में धन्वन्तरि को विष्णु के 24अवतारों में बारहवां अवतार बताया गया है।
धान्वन्तरं द्वादशम्।1/3/17
भागवत में समुद्र मंथन से धन्वंतरि के प्रकट होने पर उन्हें परम अद्भुत पुरुष की संज्ञा दी गयी है। यहां उनके शारीरिक रचना और उनके द्वारा धारण किये गये वस्त्राभूषणों का सुन्दर वर्णन है , भागवत 8/8/32-33
धन्वंतरि की भुजाएं लम्बी और मोटी थी।गला शंख के समान और नेत्र लाल लाल थे।शरीर श्यामल वर्ण और तरुण था।गले में माला तथा सभी अंग आभूषणों से सुसज्जित थे।शरीर पर पीताम्बर कानों में मणियों के कुण्डल चौड़ी छाती, सिंह के समान पराक्रम, चिकने व घुंघराले बालों से शोभित अनुपम सौन्दर्य वाले थे।
हमारा सनातन धर्म कितना व्यवस्थित और तर्कसंगत है कि लक्ष्मी जी के आविर्भाव के पूर्व धन्वन्तरि जी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए लक्ष्मी पूजन के पर्व दीपावली के पूर्व त्रयोदशी को धन्वन्तरि जी की जयंती मनायी जाती है। वैसे भी लक्ष्मी -अर्जन के लिए व्यक्ति का नीरोग होना आवश्यक है।
कहा भी गया है -
पहला सुख निरोगी काया
फिर हो घर में माया।
सुदर्शन संहिता के अमृतसंजीवन धन्वन्तरि स्तोत्र में धन्वन्तरि को विष्णु का अवतार बताते हुए उनसे समस्त शोको के विनाश, अरिष्टों के हरने और चिरजीवन की कामना की गयी है -
यो धन्वन्तरिसञ्ज्ञया निगदित: क्षीराब्धितो नि:सृतो
हस्ताभ्यां जनजीवनाय कलशं पीयूषपूर्णं दधत्।
आयुर्वेदमरीरचञ्जनरुजां नाशाय से त्वं मुदा
संसिच्यामृतशीकरैर्हर महारिष्टं चिरं जीवय।।
इसी प्रकार शालिवक्त्रपुरालय धन्वन्तरि स्तोत्र में धन्वन्तरि को रमाकान्त ,हरि और माधव जो भगवान् विष्णु के नाम हैं, कहकर उनसे राग- रोगादि से रक्षा करने की प्रार्थना की गयी है। इससे भी धन्वन्तरि को भगवान् विष्णु का अवतार माना जाना परिलक्षित होता है -
भिषग्वर रमाकांत शालिवक्त्रपुरालय।
रागरोगादिभूतं मां पाहि धन्वन्तरे हरे।।
शङ्खचक्रसुधाकुम्भजलुकाधर माधव।
करुणाकर मामाशु पाहि धन्वन्तरे हरे।।
आदि देव सूर्य आरोग्य के देवता माने जाते हैं। महाभारत में सूर्य के 108 नामों में एक नाम धन्वन्तरि भी है। यह भी उल्लेखनीय है कि मत्स्य पुराण के अनुसार समुद्र मंथन में से प्राप्त रत्नों में धन्वन्तरि को भुवन भास्कर सूर्य ने ग्रहण किया था।
गजेन्द्रं च सहस्राक्षो हयरत्नं च भास्कर: ।
धन्वन्तरिञ्च जग्राह लोकारोग्यप्रवर्तकम्।251/4
आज इस पावन अवसर पर हम भगवान् धन्वन्तरि को नमन करते हुए
सभी के उत्तम आरोग्य की कामना करते हैं। स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। स्वस्थ व्यक्ति ही पुरुषार्थ चतुष्ट्य की प्राप्ति कर सकता है।
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
रोगास्तस्यापहर्तार: श्रेयसो जीवितस्य च।
चरक संहिता अध्याय 1/14
अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल उत्तम आरोग्य ही है।
और भी,
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
कुमारसम्भव 5/33 , महाकवि कालिदास।
शरीर ही सभी धर्मों को सिद्ध करने का प्रथम साधन है। अस्वस्थ व्यक्ति का धन, धर्म,काम और मोक्ष सब नष्ट हो जाता है।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे अमृतकलशहस्ताय धीमहि।
तन्नो धन्वन्तरि प्रचोदयात्।
अब थोड़ी सी चर्चा धन्वन्तरि जयन्ती के दिन आभूषण और वर्तन आदि खरीदने के बारे में। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार समुद्र मंथन से जो विष्णु के अंशावतार धन्वन्तरि प्रकट हुए थे,उनके हाथों में कंगन और अमृत से भरा कलश था।वे सभी प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित थे।
संभवतः ये कंगन, आभूषण और कलश ही आज के दिन बर्तन और आभूषण क्रय किए जाने की शुभ परम्परा के मूल में हैं ।
अमृतापूर्णकलशं बिभ्रद् वलयभूषित:।
स वै भगवत: साक्षाद्विष्णोरंशांशसम्भव:।।
धन्वन्तरिरिति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक्।
8/8/34- 35
आप सभी के उत्तम आरोग्य और पुष्कल समृद्धि की कामना के साथ आपका शुभेच्छु -
महामहोपाध्याय आचार्य डॉ• सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय
( आई ०ए ०एस ०सेवा निवृत्त) प्रयागराज।
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