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Thursday, 2 October 2025

प्राचीन भारतीय दर्शन और क्वांटम भौतिकी की निष्पत्ति में द्वंद्व एवं साम्य -२

प्राचीन भारतीय दर्शन और क्वांटम भौतिकी की निष्पत्ति में द्वंद्व एवं साम्य

दो 

मानव चेतना का खेल: सभ्यता और संस्कृति का विकास 

चेतना ही हम प्राणियों को जड़ प्रकृति से भिन्न बनाती है। और अन्य प्राणियों की चेतना से अधिक विकसित होने के कारण ही मनुष्य एक विशिष्ट प्राणी है. 

मानव चेतना का एक प्रकृत और विशिष्ट गुण है जिज्ञासा। मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसकी चेतना में अनंत जिज्ञासा भरी हुई है। वह सब कुछ जान लेना चाहता है। प्रकृत्या। 

जानना भी दो तरह का है। एक तो अपनी बेहतरी के लिए उस जानकारी का उपयोग करने हेतु। इस श्रेणी की ज्ञान पिपासा मानव सभ्यता के जन्म और विकास की कारक है. शिकारी और संग्रहकर्ता से पशुपालन एवं पशुचारण का घुमन्तू जीवन, जंगल की घासों के बीज से कृषिकर्म की शुरुआत, गृह निर्माण और उपयोगिता, सुरक्षा एवं सुविधा की दृष्टि से उसमें सतत सुधार, पहिये का आविष्कार इत्यादि मानव सभ्यता के विकास में मील के पत्थर हैं. 

कला और सौंदर्य के उपादानों की खोज और उनके उपयोग से ऐसा सृजन जिसका लक्ष्य किसी बाह्य उपयोग के बजाय सृजन में ही निहित हो, संस्कृति की विकास यात्रा के चरण है. 

दोनों में घालमेल भी है. जैसे गृहनिर्माण में उपयोगिता का तत्व सभ्यता का और सौंदर्य बोध को तृप्त करने का तत्व संस्कृति का घटक है. 

लेकन मनुष्य की बहुत सारी जिज्ञासाएं शुद्ध रूप से ज्ञान पिपासा को शांत करने के लिए होती हैं. ज्ञान के लिए ज्ञान. उनकी देन संस्कृति की घटक होती है क्योंकि उनका लक्ष्य किसी स्थूल उपयोगिता से जुड़ा नहीं होता. 

मानव चेतना की देन सभ्यता एवं संस्कृति दोनों से जुड़ी ज़रूरत के कारण ही मनुष्य ने समाज में रहना सीखा और सामूहिक प्रयास से सभ्यता-संकृति, ज्ञान-विज्ञान का विशाल ताना-बाना खड़ा किया, जो उसे जंगल में रहनेवाले पाषाण-युग के आदिम मानव से इतनी दूर ले आया है। अन्य प्राणी जहां थे, वहीं रह गए।

लेकिन दुनिया में हर चीज़ दोधारी है। मनुष्य की चेतना जितनी विकसित है, उतनी ही भरमाती भी है। इतना भरमाती है कि मनुष्य आजिज़ आ जाता है। इसी का लाभ उठाकर समय समय पर होशियार लोगों ने उसकी जिज्ञासा को दबाने के लिए स्वयं को सर्वशक्तिमान ईश्वर का संदेशवाहक घोषित कर दिया। उन्होंने कहा, तुम्हारी चेतना में उठनेवाली जिज्ञासाएं शैतानी हैं, मेरे द्वारा लाए गए संदेश के अनुसार चलने में ही तुम्हारा निस्तार है। इससे तुम्हें यहां तो सुकून मिलेगा ही, मरने के बाद भी तुम मज़े में रहोगे। 

इसके फ़ायदे-नुक़सान दोनों हुए। वह अलग विषय है। 

चेतना, जिससे हम (अपनी-अपनी सीमा के भीतर) वस्तुजगत को जानते हैं, इतनी रहस्यमय है कि उसे जानना सबसे कठिन है। कारण, जानने का साधन चेतना और जिसे जानना है वह भी चेतना। चेतना जो भी जान पाती है, ज्ञाता और ज्ञेय के पार्थक्य भाव से ही जान पाती है। यदि हम ख़ुद अपने-आप से प्रश्न करें कि मेरी चेतना क्या है, वह कहां है तो भौचक रह जाएंगे। हम अपने शरीर के अंग प्रत्यंग को तो जान सकते हैं किंतु चेतना को नहीं। उसका कोई आकार प्रकार नहीं, शरीर में उसके निवास का पता नहीं। बताया गया कि हमारे मस्तिष्क में उसका निवास है। किंतु मस्तिष्क के टुकड़े टुकड़े में ढूंढ आएं, वह मिलेगी नहीं। कारण, मस्तिष्क सहित शरीर भौतिक है, चेतना अभौतिक। वह अलग कैटेगरी है जिसका हमें प्रत्यक्ष ज्ञान साधारणत: नहीं हो सकता। भौतिक अर्थ में चेतना ''कुछ नहीं" है। ख़ुद में कुछ नहीं किंतु उसी के सहारे हमारा सब कुछ है। मेरी चेतना ही मैं हूं।

इसी पहेली को लेकर पूरब और पश्चिम दोनों के दार्शनिक प्राचीन काल से आज तक दो खेमों में बंटे हुए हैं।

भौतिकवादी मानते हैं कि चेतना जड़ पदार्थों के एक ख़ास समुच्चय से उत्पन्न होती है और (मृत्यु के समय) उस समुच्चय के बिखर जाने से लुप्त हो जाती है। मार्क्सवादी भी भौतिकवादी हैं। वे एक क़दम आगे बढ़कर कहते हैं, चेतना भौतिक पदार्थों का परिणाम ही नहीं, इसमें जितने विक्षेप आते हैं, वे सब भौतिक स्थितियों की देन हैं। उत्पादन-प्रणाली का स्वामित्व और उससे उत्पन्न भौतिक परिस्थितियां ही चेतना की प्रकृति को निर्धारित करती हैं। इस तरह उन्होंने वर्ग-चेतना और वर्ग-चरित्र की अवधारणा दी और वर्ग-संघर्ष की द्वंद्वात्मकता को इतिहास की मूल नियामक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया।

इसके विपरीत अध्यात्मवादी या प्रत्ययवादी चेतना को पदार्थ से स्वतंत्र मानते हैं, बल्कि वे तो यहाँ तक जाते हैं कि बहिर्जगत् की अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता ही नहीं। बहिर्जगत् वही है जिसका बोध हमारी चेतना को होता है, इसीलिए भिन्न-भिन्न व्यक्ति की चेतना बहिर्जगत् को भिन्न-भिन्न देखती है। यदि चेतना न होती तो हमारे लिए बहिर्जगत् का कोई अस्तित्व ही न होता। 

क्वांटम भौतिकी ने परमाणु के भीतर सदा गतिशील इलेक्ट्रॉन के क्वांटम फ़ील्ड का पता लगाया और इलेक्ट्रॉन की गतिशीलता के कारण उसकी स्थिति और गति का वेग दोनों का एक साथ निरीक्षण करने में अक्षम रही। यह भी पता लगा कि ब्रह्मांड के कुछ इलेक्ट्रॉन के क्वांटम फ़ील्ड परस्पर उलझे हुए हैं। तो अब तक ज्ञात सूक्ष्मतम स्तर पर बहिर्जगत् इतनी तेज़ी से बदल रहा है कि दूसरी बार देखने पर पहलेवाला नहीं रह जाता। हम जिस शयन कक्ष को छोड़कर प्रसाधन कक्ष में गए थे, लौटने पर वही शयनकक्ष नहीं रहा। जब दो लोग कोई वस्तु देखते हैं तो वे एक ही वस्तु नहीं देखते।  

इस बिंदु पर अध्यात्मवादी ताल ठोंकते हुए मैदान में कूद पड़े। बोले, हम तो पहले से ही कहते रहे हैं कि बाह्य जगत् वस्तुगत सत्ता नहीं है, वह वही है जो हमारी चेतना देखती है। चेतना भौतिक पदार्थों के समुच्चय से उत्पन्न नहीं हो सकती, यह पदार्थों के उस समुच्चय की अवस्था में केवल अभिनिविष्ट हो जाती है, उसका स्रोत सार्वभौम चेतना है। 

भारतीय दर्शन की आध्यात्मिक परंपरा में वस्तुजगत् को प्रतीत्य समुत्पाद (dependent origination) की संज्ञा दी गई है जिसकी प्रकृति आभासी है। 

श्रोदिन्गर (Schrodinger) जैसे कुछ क्वांटम भौतिकशास्त्री क्वांटम भौतिकी के शिखर पर पहुंचकर निराश होने के बाद उपनिषद् वेत्ता शोपेनहावर की मारफ़त भारतीय वेदांत दर्शन की ओर मुड़ गए। उनके अनुसार चेतना वस्तुजगत् पर निर्भर नहीं करती। सारी वैयक्तिक चेतनाएं अपने आद्य रूप में एक ही हैं; वे सार्वभौम चेतना की भिन्न भिन्न अवस्थितियां हैं। और हर वैयक्तिक चेतना की क्वांटम अवस्था एक विशेष अनुगूंज स्तर (resonance level) पर सार्वभौम चेतना को अभिव्यक्त करने की संभावना से लैस है। 

इतना तो स्पष्ट है कि हमारी चेतना की सूक्ष्मता की धार के भिन्न भिन्न स्तर हैं जो व्यवहार में व्यक्त होते रहते हैं। अनुभूति, भावना, विवेक, अहं आदि आदि।
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(क्रमश:)

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