तंत्र के मूल में शिव और शक्ति हैं। परमेश्वर के जितने अवतार हुए हैं, सभी के मूल में आद्याशक्ति की ही लीला रही है। जैसे--राधा-कृष्ण, सीता-राम आदि। लेकिन तंत्र में पहले शिव-शक्ति या शंकर-पार्वती आता है। महादेव का नाम पहले आता है। तंत्र का प्रादुर्भाव करने के लिए और जगत में प्रकाश करने के लिए सर्वप्रथम शिव ने पार्वती को तंत्र का गूढ़ रहस्य बताया था। पार्वती तंत्र की पहली पात्रा हुईं अर्थात् गुरु-शिष्य परम्परा में पार्वती पहली शिष्या बनी और शिव बने प्रथम गुरु। लेकिन विश्वब्रह्माण्ड के विस्तार के लिए शक्ति का ही आश्रय लिया गया। इसलिए शक्ति को पहले बोला जाने लगा। जैसे--लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश और उन्हें लक्ष्मीपति व उमापति कहा जाने लगा।
किसी भी देवी-देवता के मंदिर में सात्विक पूजा-उपासना हो या हो तामसिक साधना, दीपक प्रज्ज्वलित करना आवश्यक है। एक प्रकार से साधना की पूर्णता का प्रतीक है दीपक। जब तक साधना में दीपक का प्रकाश नहीं होगा, पूजा-उपासना, आराधना-साधना का और मन्त्रों के उच्चारण का कोई फल नहीं मिलता है। दीपक की नीली ज्योति साक्षात् शिव है और उसके चारों ओर फैली हुए पीली ज्योति साक्षात् शक्ति है। वह शिव और शक्ति रूपी दीपक की लौ ही हमारी साधना-आराधना-अर्चना आदि की साक्षी है। सायंकाल शुद्ध घी का दीपक जिस घर में जलता है, उस घर में साक्षात् शिव और पार्वती का वास होता है। अगर हमें साधना में आगे बढ़ना है और करनी है प्रगति तो रात्रि-जागरण का अभ्यास करना पड़ेगा। दरअसल दिन गृहस्थों का और रात्रि साधकों की होती है। सच्चा साधक रात में जागता है क्योंकि रात्रि की निस्तब्धता जरुरी है साधक के लिए।
साधना में जल का भी बड़ा महत्व है। जल चाहे प्रकृति के रूप में हो या साधना के क्षेत्र में हो, चाहे श्राप या आशीर्वाद देने में हो, जल का अपना विशेष महत्व है। सर्वप्रथम पृथ्वी पर जल की ही उत्पत्ति हुई। उसी के द्वारा जगत में जलशक्ति का स्वरुप सामने आया। इसीलिए भगवती दुर्गा को 'अम्बा' भी कहा जाता है। जल का पर्यायवाची है अम्बा। अर्थात् जल साक्षात् अम्बास्वरूप है, दुर्गास्वरूप है। जल में असीम प्राण-ऊर्जा है जो मन्त्र की शक्ति को हज़ार गुना बढ़ा देती है।
तंत्र-साधक सर्वप्रथम जल-सिद्धि करता है उसके बाद ही अन्य सिद्धि। तंत्र -साधना का सम्बन्ध यक्षलोक से है। इसलिए महादेव ने जल की रक्षा का उत्तरदायित्व यक्षों को दिया है। वरुण जल के देवता अवश्य हैं पर जल की सुरक्षा का कार्य सदैव यक्ष करते हैं और कभी-कभी वे यह कार्य मनुष्य के माध्यम से करते हैं। इसी प्रकार नृत्य, वाद्य व गान की रक्षा गन्धर्व करते हैं। किन्नर प्रकृति में सन्तुलन बनाने के लिए हैं। साधना में होने वाली त्रुटि, मन्त्रों के उच्चारण के समय होने वाली त्रुटि में विद्याधर साधक की रक्षा करते हैं। इसलिए अपदेवता के रूप में ये पूज्य हैं। इनका निवास यक्ष-लोक है।
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