- अर्थात धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार से होता है।
(मृत्यु उपरांत 12-13 दिन तक के क्रियाकर्म)
वो विलाप-अचानक नहीं था।
वो 11 दिनों से भीतर जमा हुआ शोक था-
जो आखिरी दिन बाहर आया।
मैं पिछले तीन दिन से दरभंगा के महथौर में हूं -
नाना जी की 12वीं-13वीं के क्रियाकर्म में।
मिथिला - वह भूमि - जहां जनक ने जन्म दिया था ज्ञान को। जहां सीता की मिट्टी है। जहां याज्ञवल्क्य ने कहा था - "नेति नेति"। जहां आज भी - धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः - अर्थात धर्म का निर्णय मिथिला के व्यवहार से होता है।
इसी मिथिला में - मैंने हर रीति को देखा। हर विधान में सवाल उठे। और हर जवाब - या तो शास्त्र में मिला - या उस गांव की मिट्टी में।
आज यह पोस्ट उसी यात्रा का लेखा-जोखा है।
नाना जी के जाने के बाद से-
नानी, जिनके लिए शोक सर्वाधिक था -
सामान्य दिख रही थीं। बात करती रहीं। घर में रिश्तेदार मेहमान आते रहे। पर कहीं-एक दरवाजा बंद था। और कल- उस आखिरी दिन -वो दरवाज़ा खुला।
मां, मौसी- सब रो रही थीं।
पर नानी का विलाप-
मेरे रूह को हिला रहा था
मैं - जो पेशे से पत्रकार हूं -
जो रोज़ दूसरों के दर्द को शब्द देता है -
वो भी - उस रुलाई में - बह गया।
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मृत्यु के बाद - एक यात्रा शुरू होती है
क्योंकि मृत्यु सिर्फ अंत नहीं है
यह एक संरचित यात्रा है- जो जीवित और मृत - दोनों के लिए होती है:
दाह संस्कार से पहले शरीर को गंगाजल से स्नान कराया जाता है। तिल, तुलसी, चंदन लगाए जाते हैं।
यह केवल शुद्धि नहीं -
यह उस शरीर के प्रति सम्मान है - जिसने जीवन जिया।
कुछ लोग इसे वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखते हैं -
गंगाजल में बैक्टीरिया मारनेवाला वायरस-
बैक्टीरियोफेस पाया जाता है
तुलसी आदि में भी एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए जाते हैं-ताकि देह जीवाणुओं से मुक्त हो
लेकिन मूल अर्थ- सम्मान और संस्कार ही है।
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अर्थी -अंतिम विदाई
बांस की अर्थी - कंधे पर उठाकर।
“राम नाम सत्य है” का उच्चारण।
यह घोषणा सिर्फ दूसरों के लिए नहीं -
बल्कि खुद को याद दिलाने के लिए है -
कि अंततः सत्य क्या है।
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चिता बनाई जाती है - ईशान से आग्नेय दिशा में। उत्तर से दक्षिण।
शव को चिता पर रखते समय पुरुष का मुंह नीचे और स्त्री का मुंह ऊपर - यह भी विधान है।
कर्ता -जो बेटा होता है - अपसव्य होता है। यानी जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखता है। सामान्यतः जनेऊ बाएं कंधे पर होता है - देवकार्य में। पर मृत्युकार्य में दाहिने - क्योंकि यह पितृकार्य है। पितृ लोक - यम का लोक - वह दक्षिण में है।
अग्नि देते हुए मंत्र पढ़ा जाता है -
ॐ कृत्वा सुदुष्करं कर्म जानता वाप्यजानता।
मृत्युकालवशं प्राप्तं नरं पञ्चत्वमागतम्।।
धर्माधर्मसमायुक्तं लोभमोहसमावृतम्।
दहेयं सर्वगात्राणि दिव्यान् लोकान् स गच्छतु।।
अर्थ : "जाने-अनजाने में किए गए कर्मों के साथ - काल के वश में आए - धर्म-अधर्म से युक्त - लोभ-मोह से आवृत - इस शरीर को मैं जलाता हूं - यह आत्मा दिव्य लोकों को जाए।"
यह मंत्र - एक क्षमायाचना है। एक मुक्तिप्रार्थना है।
चिता की तीन परिक्रमा - तीनों ऋणों का - देव ऋण, पितृ ऋण, ऋषि ऋण का - निवेदन। और मुंह में अग्नि - क्योंकि जीवनभर जो मुंह बोला, खाया, जिया - उसी से यात्रा का अंत हो।
हिंदू शास्त्र में शरीर पंचभूत से बना है - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। दाह संस्कार उन्हें वापस करता है। पृथ्वी को मिट्टी, जल को नमी, अग्नि को ताप, वायु को वायु, आकाश को आकाश।
शास्त्र कहता है - मंत्रोच्चार से दी गई-अग्नि की धधक - अस्थियों में आकाश और तेज तत्त्वों की संयुक्त तरंगों का संक्रमण -
यह तीन दिन बाद न्यून होने लगती है। इस कारण -
तीसरे दिन अस्थि संचयन आवश्यक है।
अस्थियां - दूध और गंगाजल में धोई जाती हैं। फिर लाल कपड़े में बांधकर -
मिट्टी के घड़े में। नदी में प्रवाहित करने के लिए।
जल में प्रवाहित करने का तर्क -
लिंग देह (सूक्ष्म शरीर) - जो मृत्यु के बाद बचता है - उसके आसपास जलतत्त्व की प्रबलता होती है। नदी का वातावरण - उस सूक्ष्म देह को परिचित लगता है। इसीलिए - पिंडदान से लेकर अस्थि विसर्जन तक - नदी के किनारे।
और व्यावहारिक सत्य - अस्थियां नदी में जाकर कैल्शियम और मिनरल्स बनकर जलचरों का पोषण करती हैं। वापस प्रकृति को।
घाट (श्मशान) पर क्रियाकर्म में सहयोगी -
एक ब्राह्मण होते हैं - महापात्र।
वह हर दिन मृत्यु के साथ रहते है।
समाज के उस हिस्से का प्रतिनिधि-
जिसके बिना सभ्यता चल ही नहीं सकती।
उसे दिया गया दान -
केवल परंपरा नहीं - बल्कि उसकी भूमिका का सम्मान भी है।
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मृत्यु के दिन से 10 दिन तक -
घर में सूतक रहता है।
क्या नहीं होता -
देव पूजा नहीं
अभिवादन नहीं
पलंग पर शयन नहीं
बाहर का खाना नहीं
उत्सव नहीं
मिथिला में इसे "सोग" कहते हैं।
यह अलग थलग करना नहीं -
यह एकाग्रता है। उस मृत आत्मा के प्रति -
जो अभी भी आसपास है- भटक रही है -
यात्रा के लिए तैयार हो रही है।
जब घर के लोग उत्सव करें -
खाएं-पिएं - तो वह आत्मा क्या अनुभव करे?
शास्त्र कहता है - वह और भटकती है।
सूतक एक सामूहिक शोक है। जब पूरा परिवार एक ही दर्द में होता है- तो वह शोक शक्ति बन जाता है।
आहार का विधान भी गहरा है -
सात्विक भोजन - नमक कम - तला हुआ नहीं।
कोर्टिसोल का स्तर - जो शिक में बढ़ता है -
वह भरी भोजन से और बढ़ता है।
हल्का, सात्विक आहार उसे इस कोर्टिसोल को व्यवस्थित करता है।
आधुनिक विज्ञान यही कहता है -
अंत में जलन हो तो मन में भी बेचैनी होता है।
हमारे पूर्वज - बिना किसी लैबोरेट्री के - यह समझ चुके थे।
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10 दिनों तक - किसी योग्य पंडित से गरुड़ पुराण सुनाया जाता है।
गरुड़ पुराण - 18 महापुराणों में से एक -
भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच संवाद।
इसमें वर्णित है -
मृत्यु के बाद की पहली 24 घंटे की यात्रा - यमलोक।
वहां सभी कर्मों का लेखा-जोखा। फिर -आत्मा वापस घर। परिजनों के बीच। 13 दिन।
यह क्यों सुना जाए?
क्योंकि हम सभी - एक दिन - मरेंगे।
गरुड़ पुराण की सबसे बड़ी देन - वह हमें मृत्यु से डरना नहीं सिखाता।
वह हमें मृत्यु को समझना सिखाता है। जब हम जानते हैं कि बाद में क्या होगा - तो अभी कैसे जीना है -
यह साफ हो जाता है।
एक बड़े विचारक ने लिखा है -
"जो अपनी मृत्यु का सामना कर सकता है -
वह जीवन को सबसे गहरे अर्थ में जी सकता है।"
गरुड़ पुराण - हजारों साल पहले - यही कह रहा था।
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पिंडदान : सूक्ष्म शरीर का निर्माण
यह क्रियाकर्म का सबसे गहरा रहस्य है।
पहले दिन से दसवें दिन तक -
प्रतिदिन पिंड दिया जाता है।
पिंड - चावल, जौ, तिल और जल से बना एक पिंड -
जो आत्मा को अर्पित किया जाता है।
गरुड़ पुराण बताता है -
पहले दिन - सिर (मूर्धा) का निर्माण
दूसरे दिन - गर्दन और कंधे
तीसरे दिन - हृदय
चौथे दिन - पीठ
पांचवें दिन - नाभि
छठे-सातवें दिन - कमर और नीचे का भाग
आठवें दिन - पैर
नौवें-दसवें दिन - भूख-प्यास की अनुभूति
ग्यारहवें-बारहवें दिन - मांस और त्वचा का निर्माण - भोजन
इस तरह - 12 दिनों में - एक अंगूठे के बराबर - सूक्ष्म शरीर तैयार होता है। यही यमलोक की यात्रा करेगा।
भौतिक विज्ञान कहेगा - यह माइथोलॉजी है।
हर दिन एक कर्मकांड करना - शोकाकुल परिवार को उबरने की राह देता है।
जब दुख इतना भारी हो कि सांस लेना मुश्किल हो -तब एक छोटा-सा कार्य - "आज पिंड देना है" - उस दुख को उबरने योग्य बना देता है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोध यही कहते हैं -
व्यवस्थित शोक प्रक्रिया,
जिनमें रोज कोई न कोई कर्म कांड हों -
वे शोक से उबरने में सबसे तीव्र कारगर होता हैं
हमारे पूर्वजों ने - बिना किसी हार्वर्ड डिग्री के -
यह 5000 साल पहले लिख दिया था।
सपिण्डीकरण की तैयारी
दसवें दिन - नदी तट पर या घाट पर - पिंडदान की विशेष विधि।
यहां कर्ता दक्षिण मुख होकर -
जल में खड़े होकर - तिल और जल लेकर - मंत्र पढ़ता है।
दक्षिण में मुख - क्योंकि पितरों का लोक दक्षिण में। जब हम पिंड देते हैं - हम उनसे संवाद करते हैं - उनकी दिशा में।
अग्नि देने वाला बेटा - उत्तरी पहनता है।
यह पवित्र धागा - जनेऊ की तरह - उसे याद दिलाता है कि वो अब गृहस्थी का मुखिया है।
13 दिन तक। हर पल।
जब भी वह उत्तरी को छुए - वह याद करे - "पिता गए। अब यह घर मेरी ज़िम्मेदारी है।"
यह शोक के बीच में उद्देश्य याद दिलाना है।
आखिरी दिन - उत्तरी तोड़ी जाती है।
यह यह सांकेतिक समाप्ति है। शोक यात्रा आधिकारिक रूप से समाप्त। अब जीवन आगे बढ़ना है।
12वें दिन का महाकर्म
यह मिथिला की अपनी विशेषता है।
धर्मस्य निर्णयो ज्ञेयो मिथिलाव्यवहारतः मिथिला में किसी एक स्मृति की पूर्ण मान्यता नहीं। यहां निबंधकारों की पद्धति है - लगभग 800 वर्ष पूर्व जो पद्धति निर्मित हुई - वही मान्य है।
सपिण्डीकरण - यानी मृत आत्मा का पितृगण में विलय।
इस विधि में - चार पिंड रखे जाते हैं - पिता (वसु रूप), पितामह (रुद्र रूप), प्रपितामह (आदित्य रूप) और मृतक।
फिर - एक विशेष विधि से - मृतक का पिंड - पितृ पिंडों में मिला दिया जाता है।
यह संदेश है - "आप अब प्रेत नहीं। तुम अब पितर हो। आप पितृ लोक में हो। हम आपका स्मरण करेंगे। आप हमारी रक्षा करो।"
गोदान, भोज और विसर्जन
गोदान- गाय का दान। मंत्र -"ॐ यमद्वारे महाघोरे कृष्णा वैतरणी नदी। तां सन्तर्तुं ददाम्येतां कृष्णां वैतरणीं च गाम्।।"
अर्थ - "यमद्वार पर जो वैतरणी नदी है - उसे पार करने के लिए - यह काली गाय दान करता हूं।"
यह प्रतीकात्मक है -पर इसके पीछे आर्थिक सच्चाई भी है।
दान में दिया गया धन -समाज के जरूरतमंद तक जाता था। जो परिवार समृद्ध था -उसने मृत्यु कर्म पर -
गरीब को गाय दी - दूध, दही, घी - पोषण।
भोज -
तीन दिन तक - गांव को भोजन।
यहां दो विचार टकराते हैं।
प्रगतिशील कहते हैं - जिसके घर में कोई गया -
वो टूटे हुए हैं। उन पर भोज का भार - क्रूरता है।
कर्ज होता है। खर्च होता है। दिखावा होता है।
परंपरावादी कहते हैं - भोज सामाजिक संबंध मजबूत करता है।
जब गांव साथ बैठे खाए - परिवार जाने - "हम अकेले नहीं।" एकल परिवार के जमाने में -यह कम्युनिटी स्पोर्ट - बेशकीमती है।
दोनों सही हैं।
समाधान बीच में है - भोज हो - पर उतना जो परिवार झेल सके। गरिमा बने - बोझ न बने।
शास्त्र में भी यही है - "वित्तशाठ्यं न समाचरेत्" - कंजूसी मत करो। पर यह भी नहीं कहा - कर्ज लेकर करो।
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रुदाली : सामूहिक रुदन का विज्ञान
महिलाओं का एकत्रित होना।
यही मैंने कल देखा।
सभी महिलाएं एकत्रित हुईं। और एक साथ - रोईं।
नाना जी का नाम लेकर। उनकी यादें बोलकर।
तंत्रिका विज्ञान कहती है -
जब हम अकेले रोते हैं - कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) कम होता है।
जब साथ रोते हैं - ऑक्सीटॉसिन भी रिलीज होता है।
ऑक्सीटॉसिन - बॉन्डिंग हार्मोन - जो कहता है -"तुम अकेले नहीं।"
इससे भी गहरा - मिरर न्यूरॉन्स जागृत होते हैं। जब एक रोती है -दूसरी को भी उसी दर्द की अनुभूति होती है। यह सहानुभूति का जैविक मैकेनिज्म है।
रुदाली - वह परंपरा जिसे हम कभी-कभी पुरानी कहकर हंसते थे - वह शोक थेरपी का सबसे एडवांस फॉर्म है।
मनोवैज्ञानिक शोध कहती है -“सामाजिक संदर्भों में भावनात्मक अभिव्यक्ति शोक के समाधान (या शोक से उबरने की प्रक्रिया) को तेज करती है।”
हमारे पूर्वजों ने - बिना किसी रिसर्च जर्नल के - हजारों साल पहले - यह समझ लिया था।
नानी - जो 13 दिन "ठीक" दिख रही थीं - वो कल टूटीं।
और टूटना - जरूरी था।
क्योंकि जो शोक भीतर रहती है -वह शरीर को खाती है।
जो शोक बाहर आती है - वह हीलिंग की शुरुआत होती है।
जीवन की वापसी
मिथिला की अनूठी परंपरा।
कर्म कांड खत्म होने के बाद
मछली खाई जाती है।
"अगर इस दिन नहीं खाई - तो साल भर मछली नहीं।"
यह प्रतीकात्मक वापसी है -सामान्य जीवन में।
13 दिन - सात्विक। पवित्र। शोक।
13 वें दिन -एक आनंद देने वाला भोजन पसंदीदा भोजन -
जो कहता है - "जीवन चलता है।"
और एक और सत्य -
मछली प्रोटीन और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स से भरपूर है। 13 दिनों के इमोशनल और शारीरिक नुकसान के बाद — शरीर को न्यूट्रिशन चाहिए।
ओमेगा-3 - दिमाग के रसायन को स्थिर करता है — अवसाद और शोक से उबरने में मदद करता है।
जो लोग शाकाहारी हैं, मछली सेवन नहीं करते हैं वो कढ़ी बड़ी, दही बड़ी, ओल की सब्जी इत्यादि खाते हैं।
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अब - वह प्रश्न जो मन में उठा
नाना जी - हिंदू थे। उनका पूरा क्रियाकर्म - मिथिला की परंपरा के अनुसार - हुआ। सही हुआ। क्योंकि यही उनकी आस्था थी।
पर कुछ दिनों से मेरी पोस्ट अंगदान को प्रोत्साहित करनेवाली थी। अब ये पोस्ट। ऐसे में क्या हिंदू धर्म अंग दान की अनुमति देता है?
हां।
भागवत गीता कहती है, "न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।"
आत्मा न जन्मती है न मरती है। शरीर नश्वर है।
अगर शरीर नश्वर है- तो उसे किसी और की ज़िंदगी बचाने में लगाना - सबसे बड़ा धर्म है।
गरुड़ पुराण कहता है - "परोपकाराय पुण्याय।"
परोपकार ही पुण्य है।
कई धर्माचार्यों ने स्पष्ट कहा है - अंग दान में कोई बाधा नहीं। आत्मा शरीर छोड़ देती है - जो बचता है वह मैटर है। उस मैटर से - किसी की ज़िंदगी बचे - इससे बड़ा पुण्य क्या।
यह आस्था के विरुद्ध नहीं -
यह आस्था का सबसे बड़ा प्रकटन है।
अंत में - महथौर, दरभंगा की मिट्टी से
नाना जी -
आपके जाने के बाद - मैंने यहां - उस मिट्टी में - हजारों साल की बुद्धिमत्ता देखी।
हर विधि में - एक तर्क।
हर मंत्र में - एक विज्ञान।
हर रीति में - एक मानवीय सत्य।
हम जिसे "अंधविश्वास" कहकर खारिज करते थे -वह दरअसल - पौराणिक विरासत है। जिसे हमारे पूर्वजों ने - हजारों वर्षों के अनुभव से - तैयार किया।
हां-समय के साथ -कुछ रीतियां खत्म हो गईं। कुछ में दिखावा आ गया। कुछ में शोषण घुस गया।
पर मूल में - वह बुद्धिमता ज्ञान अभी भी है।
जो रोना मैंने कल देखा - वह यथार्थ था।
जो दर्द था -वह असली था।
और वह परंपरा - जो हजारों साल से चली आ रही है - उसमें - बहुत कुछ वास्तविक है।
🙏
अंत - एक व्यक्तिगत सत्य
नाना जी के जाने के बाद -
मैंने महसूस किया:
हर परंपरा अंधविश्वास नहीं होती
या समाज का दबाव भी नहीं होता
लेकिन मूल में -
यह परंपरा इंसान को टूटने से बचाती है।
✍️राहुल मिश्रा
संदर्भ - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid06wSHuJQU7ftHi3qLV84pUH77K1nvPmxUCykPAdXVQCPjeacuhW95jQRsiUA1mPual&id=100000573083171&mibextid=CDWPTG
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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