“जीव हत्या पाप है…”
अच्छा है… चेतना की एक चिंगारी तो जली।
पर सुनो — अधूरा ज्ञान, अंधकार से भी अधिक खतरनाक होता है।
तुम जिस धर्म की बात करते हो,
उसकी जड़ें केवल फूलों और भजन में नहीं…
वह श्मशान की राख, रक्त की धारा और मंत्रों की गूंज में भी बसता है।
तंत्र मार्ग
कोई बच्चों का खेल नहीं…
यह वो अग्नि है, जहाँ साधक खुद को जला कर शक्ति बनाता है।
हाँ… तंत्र में कभी-कभी बलि भी होती है।
पर वो तुम्हारी भूख, स्वाद या क्रूरता के लिए नहीं
वो होती है संकल्प, रक्षा और अदृश्य शक्तियों के संतुलन के लिए।
और अब जरा आईना देखो
तुम्हारे ही युग के डॉक्टर, वैज्ञानिक…
लाखों बंदर, मेंढक, चूहे काट चुके हैं,
उनकी देह को चीरकर ज्ञान निकाला है।
तब वो “प्रगति” कहलाता है…
पर जब कोई सनातन की गहराई की बात करे,
तो अचानक “पाप” याद आ जाता है?
कैसा न्याय है ये?
और सुनो…
जिस दिन तुम्हारे ऊपर काला प्रभाव पड़ेगा,
जब शरीर सूखने लगेगा,
जब खाया हुआ लगेगा नहीं,
जब नींद गायब हो जाएगी और मन भय से भर जाएगा—
तब तुम्हें भजन से ज्यादा,
शक्ति की ज़रूरत पड़ेगी।
तब पुकारोगे उसी अंधकार को,
जिसे आज तुम नकार रहे हो।
तब समझ आएगा—
हर मार्ग का अपना स्थान है।
इसलिए…
“जीव हत्या पाप है” का नारा
उनको दो जो अपने स्वार्थ के लिए लाखों जीवन समाप्त कर देते हैं।
विवेक रखो।
ज्ञान पूरा लो।
और फिर निर्णय करो।
क्योंकि सनातन कोई एक रंग नहीं—
यह सृष्टि की सम्पूर्ण लीला है।
जय माँ काली 🚩
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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