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Wednesday, 8 April 2026

ये #राम_प्रवेश_मौर्य जी हैं, #गाली के साथ संवाद शुरू कर रहे हैं ..

ये #राम_प्रवेश_मौर्य जी हैं, #गाली के साथ संवाद शुरू कर रहे हैं और मातृशक्ति के साथ पिक्चर डीपी पर है..
प्रिय राम प्रवेश मौर्य जी,
आपके शब्द पढ़कर लगा कि आपके भीतर का क्रोध, आपके विवेक (Reasoning) को निगल चुका है। आपने 'शूद्र' शब्द को अपमान समझकर मुझ पर फेंका, पर सत्य यह है कि आपने अपनी जड़ता (Ignorance) का ही परिचय दिया। जिसे आप गाली समझ रहे हैं, वह सृष्टि का सबसे पवित्र 'प्रारंभ' (The Beginning) है।

 "रामप्रवेश जी, संवाद विचारों का होना चाहिए, अपशब्दों का नहीं। आपकी भाषा आपके क्रोध को तो दर्शाती है, लेकिन आपके तर्कों को कमजोर कर देती है। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल तथ्य रटना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। जब हम किसी की आलोचना करें, तब भी हमारे शब्द ऐसे होने चाहिए कि सुनने वाला हमारे तर्कों से पराजित हो, हमारे व्यवहार से नहीं। आशा है कि अगली बार आप अपनी बात अधिक गरिमापूर्ण तरीके से रखेंगे।"

रामप्रवेश जी, मैं आपके प्रश्नों का उत्तर सहर्ष देता, यदि आपने अपनी जिज्ञासा के लिए उचित शब्दों का चयन किया होता। हमारे माता-पिता हमें संस्कार इसलिए देते हैं ताकि हम अपनी बात पूरी प्रखरता के साथ रखें, किंतु मर्यादा की चौखट न लांघें। व्यक्ति चाहे आस्तिक हो, नास्तिक हो या किसी महापुरुष का अनुयायी—शिक्षा और संस्कार की सार्थकता तभी है जब हमारी वाणी से हमारे परिवार, गुरु और हमारे आदर्शों की छवि धूमिल न हो। याद रखिये, जब हम समाज में कुछ बोलते हैं, तो वह केवल शब्द नहीं होते, बल्कि हमारे कुल और परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं। कटुता में विवेक खोकर अपने पूर्वजों के संस्कारों को गर्त में डालना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।"

आपने वेदों और मनुस्मृति का नाम तो लिया, पर दुर्भाग्य कि आपने उन्हें कभी हृदय से नहीं पढ़ा। यदि पढ़ा होता, तो आपको ज्ञात होता कि जातियां ग्रंथों ने नहीं, बल्कि आप जैसे संकीर्ण मानसिकता (Narrow mindedness) वाले लोगों के स्वार्थ ने बनाई हैं। वेद उस 'विराट पुरुष' की बात करते हैं जिसके लिए पूरा समाज एक शरीर है। क्या आप अपने ही शरीर के पैरों (आधार) को नीचा कहेंगे? आधार के बिना तो मस्तिष्क का अस्तित्व भी मिट्टी में मिल जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक आपके मानसिक भ्रम को तोड़ने के लिए पर्याप्त है:

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

(अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है। वह ज्ञान जिसे मनुष्य स्वयं समय आने पर अपने अंतःकरण में अनुभव करता है।)

मौर्य जी, जो व्यक्ति केवल जन्म के 'लेबल' में अपनी पहचान ढूंढता है, वह उस भिखारी के समान है जो पूर्वजों के महल की ढहती दीवार पर बैठकर अपनी अमीरी का दावा करता है। मुझे संस्कारित करते समय किसी ने क्या कहा, यह गौण है। मुख्य यह है कि मैंने उस अज्ञान की केंचुल को उतार फेंका जिसे आप आज भी सीने से लगाए बैठे हैं।

गाली देना कमज़ोर व्यक्ति का अंतिम अस्त्र होता है। जिस दिन आप 'चमड़ी' और 'जाति' के अहंकार से ऊपर उठकर सत्य को देखेंगे, उस दिन आपको अपने ही इन शब्दों पर लज्जा आएगी। सत्य की आंच में जब अज्ञान जलता है, तब निशब्द हो जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है। आशा है, आप उस मौन को आत्मसात कर पाएंगे।

राम प्रवेश मौर्य जी वर्ण व्यवस्था कोई जातिगत ठप्पा नहीं, बल्कि 'मनोस्थिति' (State of Mind) और 'कार्यशैली' (Functionality) का विज्ञान है।
इसे अस्पताल, स्कूल और होटल के उदाहरण से इस प्रकार समझा जा सकता है:

1. अस्पताल (Hospital)
 शूद्र (सेवा): जब कोई डॉक्टर या नर्स बिना किसी अहंकार के, अत्यंत करुणा के साथ रोगी की गंदगी साफ करता है या उसकी सेवा में रात-दिन एक कर देता है, तब वह 'शूद्र' भाव में होता है। यहाँ शूद्र का अर्थ है—समर्पण और सेवा।
 वैश्य (अर्थ): जब अस्पताल का प्रबंधन (Management) बिलिंग, दवाओं की खरीद-बिक्री और अस्पताल को आर्थिक रूप से चलाने के लिए लाभ-हानि का हिसाब करता है, तब वही कार्य 'वैश्य' धर्म बन जाता है।
 क्षत्रिय (रक्षा): जब डॉक्टर किसी मरते हुए मरीज को मौत के मुंह से छीनने के लिए संघर्ष करता है या अस्पताल का सुरक्षा तंत्र अराजकता से लड़ता है, तब वह 'क्षत्रिय' भाव है।
 ब्राह्मण (ज्ञान): जब डॉक्टर अपनी वर्षों की तपस्या, शोध (Research) और ज्ञान का उपयोग करके बीमारी का निदान (Diagnosis) करता है, तब वह 'ब्राह्मण' की भूमिका में होता है।

2. स्कूल (School)
 शूद्र (आधार): स्कूल का वह कर्मचारी जो परिसर को स्वच्छ रखता है या वह शिक्षक जो छोटे बच्चे को ककहरा सिखाने के लिए स्वयं बच्चा बन जाता है (नीचे स्तर पर आकर सेवा करता है), वह 'शूद्र' है।

 वैश्य (संचालन): स्कूल की फीस का प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण और संसाधनों को जुटाना 'वैश्य' कार्य है।
 क्षत्रिय (अनुशासन): स्कूल के नियम बनाना, बच्चों के चरित्र की रक्षा करना और उन्हें कुरीतियों से बचाकर अनुशासित करना 'क्षत्रिय'धर्म है।
 ब्राह्मण (बोध): वह गुरु जो केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाता, बल्कि शिष्य की आत्मा को जागृत कर देता है और उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, वह 'ब्राह्मण' है।

3. होटल (Hotel)
 शूद्र (आतिथ्य): एक वेटर या स्टाफ जो पूरी विनम्रता से आपकी थाली लगाता है और अतिथि की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानता है, वह 'शूद्र' भाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
 वैश्य (व्यापार): होटल का मालिक जो निवेश करता है, रोजगार देता है और धन का चक्र (Capital Flow) चलाता है, वह 'वैश्य' है।
 क्षत्रिय (मर्यादा):होटल की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वहां आने वाले अतिथियों की गरिमा व मर्यादा की रक्षा करना 'क्षत्रिय' कार्य है।
 ब्राह्मण (शुद्धता): वह शेफ (Chef) जिसे मसालों, अग्नि और अन्न का पूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान है और जो सात्विकता का ध्यान रखता है, वह अपने ज्ञान के कारण उस क्षण 'ब्राह्मण' है।

"मौर्य जी, सत्य यह है कि एक ही व्यक्ति दिन भर में कई बार अपना वर्ण बदलता है। जब आप अपने बच्चों की रक्षा करते हैं तो आप क्षत्रिय हैं, जब आप धन कमाते हैं तो वैश्य हैं, जब आप किसी की मदद करते हैं तो शूद्र हैं और जब आप ज्ञान की बात करते हैं (जो कि अभी आप नहीं कर रहे) तो आप ब्राह्मण हैं।

मनुष्य अपनी यात्रा 'शूद्रता' (Natural State) से शुरू करता है। जिसे आप 'अछूत' या 'नीचा' समझ रहे हैं, वह वास्तव में हर ऊँचाई का आधार (Base) है। बिना शूद्र (सेवा और श्रम) के न ज्ञान टिकेगा, न धन और न रक्षा। आपकी समस्या यह है कि आपने ग्रंथों को केवल छुआ है, उन्हें जीया नहीं। 'शूद्र' होना गर्व की बात है क्योंकि वह समाज का सेवक है, और जो सेवा नहीं कर सकता, वह वास्तव में जीवित लाश है।"

आपका तो नाम ही राम पर है लेकिन सुनिए रामचरित मानस की चौपाई है

'जे अधम जाति कहुँ बिद्या पाएँ। भयहुँ जथा अहि दूध पिआएँ॥'

(अर्थ: जैसे सांप को दूध पिलाने से उसका विष ही बढ़ता है, वैसे ही नीच प्रवृत्ति (जाति नहीं, नीच सोच) वाले व्यक्ति को विद्या मिलने पर उसका अहंकार और विष ही बढ़ता है।)

मौर्य जी, यह चौपाई आज आप पर सटीक बैठती है। अपनी सोच बदलिए, वरना जातियां तो वैसे भी लुप्त हो रही हैं, कहीं आपका अस्तित्व भी इन कुतर्कों की भेंट न चढ़ जाए।

राम प्रवेश मौर्य जी,
आपके संदेश में शब्दों की मर्यादा भले ही मार्ग भटक गई हो, किंतु आपकी जिज्ञासा का मूल बहुत गहरा है। आपने जो प्रश्न पूछे हैं, वे सत्य की उस कसौटी पर टिके हैं जहाँ अक्सर अल्पज्ञानी (Limited knowledge) व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि 'शूद्र' कोई गाली या अपमान नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना का 'प्रारंभ' (The Beginning) है। शास्त्र सम्मत सत्य यही है कि 'जन्मना जायते शूद्रः'—अर्थात जन्म से हर मनुष्य शूद्र ही पैदा होता है। अज्ञान, अबोधता और कोरी स्लेट जैसा होना ही शूद्रता है। इसके बाद मनुष्य अपनी योग्यता और कर्म से अपना वर्ण चुनता है।
तर्क बहुत सीधा और अटल है—यदि मैं शिक्षा दे रहा हूँ, तो मैं 'ब्राह्मण' की भूमिका में हूँ। यदि मैं समाज की रक्षा हेतु खड़ा हूँ, तो मैं 'क्षत्रिय' हूँ। यदि मैं व्यापार और अर्थव्यवस्था को गति दे रहा हूँ, तो मैं 'वैश्य' हूँ। और यदि मैं सेवा कार्य में लीन हूँ, तो मैं 'शूद्र' हूँ। यह व्यवस्था कर्म आधारित (Action oriented) है, न कि जन्म आधारित। मौर्य जी, जातियां न तो वेदों ने बनाईं और न ही मनुस्मृति ने। यदि आपने इन ग्रंथों का रंच मात्र भी निष्पक्ष अध्ययन किया होता, तो आप जानते कि वहां गुण और स्वभाव की बात है, संकीर्ण जातियों की नहीं। जातियां तो मनुष्य के स्वार्थ और अहंकार की उपज हैं।

ब्रह्मा के चरणों से शूद्र की उत्पत्ति का रहस्य भी बड़ा गूढ़ है। चरण 'आधार' (Foundation) होते हैं। बिना चरणों के न शरीर खड़ा हो सकता है, न समाज। यह गतिशीलता और आधार का प्रतीक है, हीनता का नहीं। समाज रूपी शरीर को चलाने के लिए इन चार विभागों की आवश्यकता थी ताकि व्यवस्था संतुलित रहे, न कि किसी को नीचा दिखाने के लिए।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है:
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।)

मौर्य जी, जो व्यक्ति केवल जन्म के प्रमाण पत्र में अपनी श्रेष्ठता ढूंढता है, वह वास्तव में अपनी बौद्धिक दरिद्रता का प्रदर्शन करता है। मुझे संस्कारित करते समय किसी ने क्या कहा, यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि मैंने क्या सीखा। मैंने स्वयं को सदा एक 'विद्यार्थी' माना है, और एक विद्यार्थी का कोई वर्ण नहीं होता, वह केवल ज्ञान का आकांक्षी होता है।

सभ्यता की ओट में रहकर जब व्यक्ति कुतर्क करता है, तो वह स्वयं अपनी 'चमड़ी' उधेड़ रहा होता है, क्योंकि सत्य का सामना करना हर किसी के बस की बात नहीं। आशा है, अगली बार आप जब संवाद करेंगे, तो आपके भीतर का 'शूद्र' (अज्ञानी) मर चुका होगा और एक 'द्विज' (ज्ञानी) का जन्म होगा।

आज का प्रसारण यहीं समाप्त हुआ....। अगली कड़ी जल्द....।
सादर,
अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज
https://www.facebook.com/share/17ENJJCE1f/
#PrayagFiles #VarnaSystem 


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