फिर आपने "भरे" को "मेर" लिख दिया है। "धातु" को "बातु" लिख दिया है। "वाले" को "बाले" लिख दिया है। "महान्" को "महानु" लिख दिया है। और भी दर्जनों अशुद्धियाँ हैं।
वेदमंत्र में करने के साथ-साथ अन्य इतनी अशुद्धियों पर कोई बहाना चल सकता है क्या? जबकि आप किसी संस्थान की उपप्राचार्या हैं? और हमारे खंडन में यह लेख आपने और उसी संस्थान के "प्राचार्य" ने मिलकर लिखा था। और अग्निव्रत नैष्ठिक जी इसे देखकर प्रमुदित हो गए और शेयर कर रहे हैं। तो यह हाल है इनका। ये तो केवल लेख के एक अंश की अशुद्धियाँ हैं। धन्य हो।
पर ये बेचारे भी विवश हैं। यह तो इनकी गुरु-परंपरा है। स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लगभग चार से पाँच हजार अशुद्धियाँ करके गए हैं। तब से आज तक ये अपने विद्वानों की, अलग-अलग समय पर कमेटियाँ बनाकर, अनेक बार उसे शुद्ध करने का प्रयास कर चुके हैं, पर कमबख्त यह शुद्ध ही नहीं हो पा रही है। अतः यह तो विरासत है इनकी। अगर ये शुद्ध-शुद्ध लिख देंगी तो गुरुद्रोह न हो जाएगा? अब विषय पर आते हैं -
स्वामी दयानन्द ने संस्कृत विग्रह किया – "निर्गतः आकारः यस्मात् सः निराकारः", और इसका अर्थ या अभिप्राय व्यक्त किया गया – "परमेश्वर किसी भी प्रकार के आकार, आकृति, रूप वा सीमा से रहित है।" अब प्रश्न है कि क्या यह अर्थ अथवा अभिप्राय इस विग्रह से निकलता है? उत्तर है – नहीं।
यहाँ ‘निर्गत’ में भूतकालिक कृदन्त है, जो पहले की उपस्थिति का सूचक है। अर्थात् पूर्वावस्था और निर्गमन इसका स्वभाव हैं। जहाँ ‘निर्गत’ होगा, वहाँ पूर्व में स्थित था, यह अनिवार्य है। यदि आकार पहले से ही ‘नहीं’ था, तो ‘निर्गत’ शब्द का प्रयोग व्याकरणतः व्यर्थ, निरर्थक, अयुक्त है। जब 'निर्गत' होगा तो किसी पूर्वाधार से संबंध मानना ही पड़ेगा। एवं जब धात्वर्थ बाधित नहीं है, तब उसके स्थान पर अन्य अर्थ ग्रहण करना व्याकरणसम्मत नहीं है। यही सब विचार करके ही तो स्वामी जी ने बाद में इसे बदलकर तत्पुरुष बनाया। अर्थात् स्वामी दयानन्द ने अपनी भूल स्वीकार कर सुधारने का प्रयास किया, किन्तु देवी मधुलिका जी मानना नहीं चाहतीं -क्योंकि स्वामी जी का दोष मान लें, तो फिर किस मुख से उन्हें ‘महर्षि’ कहेंगी?
मधुलिका जी कह रही हैं कि – "स्वामी जी का अभिप्राय ऐसा नहीं था, वैसा था।" यह बड़ी हास्यास्पद बात है। क्या ‘अभिप्राय’ बोल देने से अपनी बात सिद्ध हो जाती है?
मधुलिका जी को बताना चाहिए था कि स्वामी जी का अभिप्राय इस शब्द से सिद्ध है या इस विग्रह से सिद्ध है? यह कहना कि "अभिप्राय ऐसा नहीं था, वैसा था" – यह तो प्रामाणिक चर्चा से निकलकर भाग जाना हुआ।
यदि कोई लिखे – "नीलगतो वर्णो यस्मात्" और फिर अर्थ लिख दे – "जिसका कोई वर्ण नहीं है", तो क्या केवल यह कह देने से कि "मेरा या मेरे स्वामी जी का अभिप्राय यह नहीं था, बल्कि यह था" – यह अर्थ मान लिया जाएगा? कदापि नहीं।
तात्पर्य शब्दानुगत होना चाहिए, शब्द तात्पर्यानुगत नहीं बनाए जा सकते। क्या इतनी समझ भी मधुलिका जी में नहीं है?
हमने कहा था कि इस विग्रह से साकार सिद्ध होता है, क्योंकि पहले आकार था, इसीलिए तो निकल गया। यदि कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया? हमारी यह आपत्ति स्वाभाविक थी, क्योंकि ‘निर्गतः’ शब्द ऐसा ही है।
नगरात् निर्गतः , गृहात् निर्गतः , शरीरात् प्राणो निर्गतः ,कोशात् खड्गो निर्गतः - इन सबमें एक ही बात है – पूर्वसंबंध और निष्क्रमण। अतः “निर्गतः” शब्द में यह भाव स्वाभाविक रूप से निहित है कि कोई वस्तु पहले किसी से संबद्ध थी, और फिर उससे पृथक हुई।
तब जब कहा गया – "निर्गतः आकारः यस्मात्", तब प्रश्न उठता है कि – क्या आकार उससे पहले संबद्ध था? यदि नहीं, तो फिर ‘निर्गतः’ क्यों कहा गया? यदि आकार सर्वथा था ही नहीं, तो निर्गत किसका हुआ?
मधुलिका जी ने इस आपत्ति के उत्तर में बस "ऋषि का अभिप्राय" कह दिया। यह कैसा उत्तर है, देवी जी? "ऋषि का अभिप्राय यह था" – कह देने से व्याकरण-दोष नहीं मिटता। केवल अभिप्राय के आधार पर शब्दार्थ परिवर्तित नहीं किया जा सकता। आपको बताना था कि ऐसा अर्थ व्याकरणतः अथवा प्रयोगतः कैसे मान्य है?
किन्तु मधुलिका जी ने ऐसा कोई श्रम करना आवश्यक नहीं समझा, अथवा वे असमर्थ रहीं। इसलिए वे क्या करती हैं? उनका उत्तर है – "ऋषि का अभिप्राय ये था", "आप पूर्वाग्रही हैं", "आप शब्दकोश पर चल रहे हैं।"
मधुलिका जी का यह कहना कि – "आप तो शब्दों का अर्थ ग्रहण कर रहे हैं, स्वामी जी का अभिप्राय ऐसा नहीं था" – इससे हमारा पक्ष आपने स्वयं सिद्ध कर दिया। वस्तुतः यह तर्कदोष है। ऐसा कहने से आपके पक्ष का क्या सिद्ध हुआ? उत्तर है – कुछ भी नहीं।
मधुलिका जी कहती हैं कि – "आपकी आपत्ति शब्दों का केवल शब्दकोश पर आधारित अर्थ करने की है।"
यह भी इनकी मिथ्या आपत्ति है, क्योंकि हमारा तर्क ‘केवल शब्दकोश’ पर आधारित नहीं है। यहाँ अन्य आधार भी हैं –
पहला, व्युत्पत्ति – ‘निर्गत’ का सामान्य निष्क्रमण-बोध। दूसरा, वाक्यबोध – "निर्गतः आकारः यस्मात्" का स्वाभाविक अर्थ क्या निकलता है?तीसरा, दार्शनिक परिणाम – यदि आकार ‘निर्गत’ कहा गया, तो आकार-संबंध की पूर्वकल्पना क्यों न मानी जाए?
मधुलिका जी आगे एक वैदिक मन्त्र का उदाहरण देती हैं और कहती हैं कि यदि शब्दशः अर्थ किया जाए, तो अनर्थ हो जाएगा। यह भी बड़ी हास्यास्पद बात है। यह उदाहरण यहाँ लागू नहीं होता, क्योंकि वहाँ मन्त्र है और यहाँ स्वयं प्रदत्त व्युत्पत्ति है। यहाँ कोई रहस्यमयी मन्त्र नहीं है जो निरुक्तपरक व्याख्या माँगे। अतः यह तुलना अनुचित है। मन्त्र में लाक्षणिकता सम्भव है, किन्तु यहाँ व्याकरणिक विग्रह की चर्चा हैअतः यहाँ वाच्यार्थ को प्राथमिकता मिलेगी।
वैदिक मन्त्र रूपकात्मक है और ‘निर्गत’ शब्द व्याकरणिक है। रूपक में लक्षणा अथवा व्यंजना हो सकती है, किन्तु व्याकरणिक शब्दों में मुख्य अर्थ (वाच्यार्थ) ही प्रथम मान्य होता है। यत्र वाच्यार्थो न बाध्यते, तत्र लक्षणा न गम्यते। अतः यहाँ भी देवी मधुलिका हँसी की पात्र बन बैठीं।
कुल मिलाकर, मधुलिका जी ने यहाँ विग्रह और अर्थ की असंगति के दोष को छिपा लिया और केवल ‘अभिप्राय’ का सहारा लिया, पूर्वाग्रह का आरोप लगाया और अप्रासंगिक वैदिक मन्त्र का उदाहरण दे दिया। इस सबसे उन्होंने कुछ सिद्ध नहीं किया।
आगे मधुलिका जी कहती हैं कि ‘निरंजन’ में ‘निर्गतः’ का अर्थ ‘पृथग्भूतः’ होने से ‘निराकार’ में भी ‘निर्गतः’ का अर्थ ‘पृथक्’ होगा – किन्तु यह अयुक्ति है।
एक पद से दूसरे पद का अर्थ सिद्ध नहीं होता। ‘निरंजन’ और ‘निराकार’ भिन्न शब्द हैं। एक की व्युत्पत्ति दूसरे पर लागू करना शास्त्रीय रूप से असंगत है। निरंजन और निराकार दोनों में उत्तरपद भिन्न है।
‘नि’ का अर्थ ‘अभाव’ भी होता है - यह एक सामान्य कथन है; किन्तु यहाँ यह निर्णायक नहीं है। संस्कृत में अर्थ का निर्णय केवल उपसर्ग देखकर नहीं होता, बल्कि मूल धातु या पद, समास की रचना, वाक्य में प्रयोग, प्रसंग तथा विग्रह आदि को देखकर किया जाता है। जैसे -‘निर्जल’ (जलरहित), ‘निर्गम’ (बाहर जाना), ‘निर्वाह’ (पालन), ‘निर्वचन’ (व्याख्या)।
अतः यह कह देना कि ‘नि’ कभी ‘अभाव’ का बोध भी कराता है, ‘निर्गत’ के अर्थ को निर्धारित नहीं करता।
‘निर्मक्षिकम्’ का उदाहरण भी यहाँ उपयुक्त नहीं है, क्योंकि वह एक विशिष्ट पद है, जहाँ रचना सीधे अभावबोधक है; किन्तु यहाँ ऐसी स्थिति नहीं है, यहाँ तो विग्रह दिया गया है।”
यदि अर्थ यह ग्रहण करना था कि आकार का सर्वथा अभाव हो, तो "नास्त्याकारो यस्य सः निराकारः" अथवा "अविद्यमान आकारो यस्य" – ये सरल विग्रह किए जाते।
स्पष्ट है कि मूल विग्रह दोषयुक्त है और बाद में उसे बचाने के लिए अर्थ बदला जा रहा है। निर्गतः आकारः यस्मात्” में “निर्गत” का मुख्य अर्थ निष्क्रमण (निकला हुआ) ही ग्रहण करना होगा, न कि अभाव या केवल पृथक्करण। इस विग्रह से किसी भी प्रकार से सर्वथा निराकार सिद्ध नहीं होता हैं। ________क्रमशः।
✍️ शचींद्र शर्मा
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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