क्या आपने कभी सोचा है कि जिस किताब को हम सदियों से पूजते रहे हैं, जिस रामचरितमानस की चौपाइयों ने हमारे पूर्वजों को कठिन समय में संबल दिया, उसी के एक अंश को आज हमारे विरुद्ध हथियार क्यों बनाया जा रहा है? आज हम उस नैरेटिव की धज्जियां उड़ाएंगे, जिसने आपके आत्मविश्वास को दीमक की तरह चाटा है।
पूजिअ बिप्र: ब्राह्मण की पूजा करो।
सील गुन हीना: चाहे वह शील (चरित्र) और गुणों से रहित हो।
सूद्र न: शूद्र पूजनीय नहीं है।
गुन गन ग्यान प्रबीना: चाहे वह गुणों की खान और ज्ञान में अत्यंत प्रवीण (Expert) ही क्यों न हो।
हमें चौपाई का अर्थ यही बताया गया कि चरित्रहीन ब्राह्मण पूजनीय है, पर ज्ञानी शूद्र नीच है।"बड़े-बड़े मंचों से हजारों की भीड़ में इस चौपाई को और उसके इसी गलत अर्थ को बोलने में लोग बड़ा गौरवान्वित महसूस करते हैं। यहां ब्राह्मण को आज के जाति वाले शुक्ल, मिश्र, पांडेय आदि बताया जाता है और शूद्र को आज का एससी एसटी। गजबय जोड़ तोड़ है....।
आपने इस चौपाई का यही अर्थ पढ़ा है न...........?
.हां हां यही पढ़ा होगा।
क्योंकि हमें यही पढ़ाया गया...
यही दिखाया गया....
यही समझाया गया और यही हम समझ भी गए...।
रामचरितमानस की वह चौपाई, जिसे वामपंथी और पश्चिमी नैरेटिव ने 'विवाद' का केंद्र बनाया, वह वास्तव में 'समाज की सुरक्षा' का सबसे बड़ा सूत्र है। आइए, इसका ऐसा विश्लेषण करें ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस सत्य पर गर्व करें।
यह चौपाई अरण्यकाण्ड से ली गई है...
यह चौपाई तब कही गई जब भगवान श्री राम ने 'कबंध' नामक राक्षस का उद्धार किया। कबंध असल में एक गंधर्व था, जो अपने रूप और ज्ञान के अहंकार में ऋषियों का अपमान करता था, जिसके कारण उसे राक्षस बनने का श्राप मिला।
जब राम जी ने उसका उद्धार किया, तब कबंध ने पूछा कि प्रभु! आपने मुझ जैसे पापी पर कृपा क्यों की? तब राम जी ने उसे 'मर्यादा' का पाठ पढ़ाया। यह किसी 'जाति' को नहीं, बल्कि एक 'अहंकारी राक्षस' को दी गई सीख थी।
चौपाई का शब्द-विच्छेद और वास्तविक अर्थ समझिए
पूजिअ (Pujia)
भ्रम: इसका अर्थ 'आरती उतारना' या 'पैर धोना' बताया गया।
वास्तविक अर्थ: संस्कृत और अवधि में 'पूज्य' का अर्थ होता है—"सम्मान के योग्य" या "स्वीकार्य" (Acceptable/Authoritative)। इसका अर्थ है कि मार्गदर्शन के लिए उस व्यक्ति की बात को 'प्राथमिकता' देना
बिप्र (Bipra)
भ्रम: ब्राह्मण जाति में पैदा हुआ व्यक्ति।
वास्तविक अर्थ: विप्र का अर्थ जाति नहीं, बल्कि 'डिग्री' है। "वि" (विशेष) + "प्र" (प्राप्ति)। जिसने विशेष ज्ञान (ब्रह्मविद्या) प्राप्त कर ली हो। शास्त्र कहते हैं— "जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते। वेद पाठात् भवेत् विप्रः..."। अर्थात् विप्र वह है जो वेदों का ज्ञाता है।
सील गुन हीना (Seel-Gun Heena)
भ्रम: "चरित्रहीन" या "बुरे आचरण वाला"।
वास्तविक अर्थ: यहाँ 'शील' और 'गुण' का अर्थ 'सांसारिक उपलब्धियाँ' हैं।
शील: सामाजिक चतुरता (Social Etiquette)।
गुण: ऐश्वर्य, रूप, धन या भौतिक कलाएं।
अर्थ: यदि कोई विप्र (ज्ञानी) फटेहाल है, उसके पास चकाचौंध नहीं है, वह दिखने में प्रभावशाली नहीं है, फिर भी वह अपनी 'विद्या' के कारण सम्मान का पात्र है।
सूद्र (Sudra)
भ्रम: दलित या पिछड़ी जाति।
वास्तविक अर्थ: सनातन दर्शन में 'शूद्र' एक 'मानसिक अवस्था' है। जो केवल अपनी 'इंद्रियों' और 'शारीरिक सुखों' (Senses) के अधीन है, वह शूद्र है। "शोचति इति शूद्रः"—जो हमेशा शोक और संसारी प्रपंचों में फँसा रहे।
गुन गन ग्यान प्रबीना (Gun Gan Gyan Prabina)
भ्रम: बहुत विद्वान या जानकार।
वास्तविक अर्थ: यहाँ ज्ञान का अर्थ 'इन्फॉर्मेशन' (सूचना) है।
अर्थ: यदि कोई व्यक्ति सांसारिक जानकारियों में बहुत 'प्रवीण' (Expert) है, लेकिन उसकी चेतना 'शूद्र' (असंस्कारित/स्वार्थी) है, तो वह 'पूजनीय' (Decision Maker) नहीं हो सकता।
जब हम इन शब्दों को जोड़ते हैं, तो अर्थ निकलता है:
"उस तपस्वी का सम्मान करो जो साधनहीन (Seal-Gun Heen) होकर भी ज्ञान की रक्षा कर रहा है, लेकिन उस चतुर बुद्धिजीवी का नेतृत्व कभी स्वीकार मत करो जिसके पास जानकारी (Gyan Prabina) तो बहुत है, लेकिन जिसमें संस्कार और मर्यादा (Sudra Frequency) शून्य है।"
"सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" का अर्थ जाति से है ही नहीं। इसे 'योग' और 'सांख्य' की दृष्टि से देखिए।
यहां 'शूद्र' का अर्थ है वह व्यक्ति जिसकी चेतना केवल 'इंद्रियों' (Senses) तक सीमित है। अगर ऐसा व्यक्ति बहुत ज्ञानी (Information-rich) हो जाए, तो वह 'असुर' बन जाता है। रावण इसका साक्षात प्रमाण है—वेदों का ज्ञाता होने के बावजूद वह पूजनीय नहीं हुआ क्योंकि उसकी चेतना 'शूद्र' (तामसिक) थी। ज्ञान तब तक पूजनीय नहीं होता जब तक वह 'विनय' और 'परंपरा' से न बंधा हो। बिना संस्कार का ज्ञान समाज के लिए एटम बम की तरह है।
लोग यहाँ 'चरित्रहीन' शब्द जबरदस्ती घुसाते हैं। व्याकरण की दृष्टि से इसे समझिए। यहाँ 'शील' और 'गुण' का अर्थ 'सांसारिक उपलब्धियाँ' हैं (जैसे वाकपटुता, धन, या राजनैतिक शक्ति)। यदि एक ब्राह्मण के पास दुनिया भर की चकाचौंध (Glamour) नहीं है, वह दिखने में साधारण है, साधनहीन है, लेकिन वह अपने 'तप' और 'स्वधर्म' में स्थित है, तो वह उस व्यक्ति से श्रेष्ठ है जिसके पास डिग्रियां (Information) तो बहुत हैं लेकिन धर्म की जड़ नहीं है।
यह चौपाई 'Information' (सूचना) के ऊपर 'Wisdom' (बोध) को रखने का सूत्र है। यह कहती है कि नेतृत्व उसे मत दो जो केवल 'स्मार्ट' है, नेतृत्व उसे दो जो 'संस्कारित' है।
"जाति का चश्मा उतारोगे, तभी धर्म का चक्षु खुलेगा। यह चौपाई समाज को बांटने का गड्ढा नहीं, बल्कि भस्मासुरों को रोकने वाली 'लक्ष्मण रेखा' है।"
रावण से बड़ा 'ब्राह्मण' कौन था? वह तो चारों वेदों का ज्ञाता था, 'शील-गुण' से संपन्न था। फिर राम जी ने उसका वध क्यों किया? क्योंकि वह 'विप्र' की मर्यादा भूल चुका था।
अगर राम जी केवल जाति की बात कर रहे होते, तो रावण की पूजा करते और केवट को गले न लगाते। यह चौपाई 'अहंकार के विरुद्ध चेतावनी' है, किसी जाति के विरुद्ध प्रमाण नहीं।
वामपंथी लोगों से पूछिए कि इसी रामचरितमानस में जब कागभुशुण्डि जी (जो जन्म से ब्राह्मण नहीं थे) उपदेश देते हैं, तो बड़े-बड़े ऋषि और स्वयं लोमश ऋषि उनके चरणों में क्यों बैठते हैं?
अगर तुलसीदास जातिवादी होते, तो एक कौवे (कागभुशुण्डि) को परम ज्ञान का अधिकारी कभी न बनाते।
रामचरितमानस में 'भक्ति' ही एकमात्र योग्यता है। जिसके हृदय में राम हैं, वही श्रेष्ठ है। बाकी सब सांसारिक व्यवस्था (Administrative Order) है।
यह चौपाई समाज को जोड़ने वाली है क्योंकि यह 'अनुशासन' सिखाती है। यह बताती है कि:
पद और परंपरा का सम्मान व्यक्ति से बड़ा है।
संस्कारहीन ज्ञान (Information without character) घातक है।
विरोधी कहते हैं कि "चरित्रहीन ब्राह्मण पूजनीय है"। यह सरासर झूठ है!
यहाँ 'शील' और 'गुण' का अर्थ है 'सांसारिक कलाएं' (जैसे धन कमाना, राजनीति करना, या सुंदर दिखना)।
यदि एक विप्र (विद्वान) के पास फटी धोती है, वह गरीब है, उसे दुनियादारी नहीं आती (शील-गुण हीन), लेकिन वह अपनी 'साधना' में पक्का है, तो वह उस 'मल्टी-टैलेंटेड' आदमी से श्रेष्ठ है जो बहुत ज्ञानी तो है पर जिसकी जड़ें परंपरा से कटी हुई हैं। यह 'Inner Worth' बनाम 'Outer Show' की लड़ाई है।
विरोधियों को यह समझाना होगा कि सनातन व्यवस्था में 'विप्र' का अर्थ 'अथॉरिटी' (प्रामाणिकता) से है।
जैसे आज के दौर में अगर कोई जज (Judge) व्यक्तिगत जीवन में कैसा भी हो, लेकिन जब वह अपनी कुर्सी पर बैठता है, तो उसे 'Your Honor' कहा जाता है और उसके आदेश का पालन किया जाता है। क्यों? क्योंकि वह उस संविधान और न्याय प्रणाली का प्रतीक है।
"पूजिअ बिप्र" का अर्थ उस ज्ञान की गद्दी को पूजना है। यदि हम पद (Post) की गरिमा खत्म कर देंगे, तो समाज की पूरी संरचना (Social Order) गिर जाएगी। तुलसीदास जी यहाँ 'संस्थान' (Institution) को बचाने की बात कर रहे हैं।
अंग्रेजों ने 'Divide and Rule' के लिए शब्दों के अर्थ बदले, लेकिन हम 'तत्व' पकड़ेंगे। जो लोग इसे विवादित कहते हैं, वे असल में सनातन की 'मेरिटोक्रेसी' (योग्यता तंत्र) से डरे हुए हैं।
विरोधियों की सबसे बड़ी हार यहीं होती है कि वे 'विप्र' को 'जाति' समझ लेते हैं।
'विप्र' शब्द 'वि' (विशेष) और 'प्र' (प्राप्ति) से बना है। जिसने 'विशेष ज्ञान' (ब्रह्मविद्या) को प्राप्त कर लिया हो।
जैसे एक 'कलेक्टर' कुर्सी पर बैठा हो और उसे कोई व्यक्तिगत रूप से पसंद न करे, फिर भी उस पद को सम्मान दिया जाता है क्योंकि वह 'स्टेट' (State) का प्रतिनिधित्व करता है। वैसे ही 'विप्र' उस 'सनातन ज्ञान परंपरा' का प्रतीक है। राम जी यहाँ व्यक्ति की नहीं, उस 'सीट' (पद) की गरिमा की बात कर रहे हैं। बिना 'प्रोटोकॉल' के समाज अराजक हो जाएगा।
विदेशी नैरेटिव कहता है कि यह "शूद्रों का अपमान" है। उन्हें जवाब दीजिए कि भगवान राम ने स्वयं साक्षात् परशुराम (ब्राह्मण) के क्रोध का सामना किया और उन्हें झुकाया, लेकिन एक केवट (शूद्र अवस्था) से गले मिले। जो नायक खुद केवट से प्रेम कर रहा है, उसी के मुंह से शूद्रों का अपमान करवाएंगे? बिल्कुल नहीं! यह केवल 'अहंकार बनाम विनम्रता' और 'परंपरा बनाम अराजकता' का युद्ध है।
अंग्रेजों और वामपंथियों ने 'डिवाइड एंड रूल' के लिए इस चौपाई को अलग से निकाला। उनसे पूछिए अगर तुलसीदास जातिवादी थे, तो उन्होंने राम जी के मुख से यह क्यों कहलवाया— "जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥" (अर्थात् भक्ति के बिना ऊँची जाति, कुल और धन-बल सब बेकार हैं)।
इसे और गहराई से समझ लीजिए
भ्रम (Narrative): "चरित्रहीन ब्राह्मण पूजनीय है, पर ज्ञानी शूद्र नीच है।"
सत्य (The Reality): यहाँ 'विप्र' और 'शूद्र' जाति नहीं, बल्कि 'चेतना की अवस्थाएं' हैं।
विप्र (The Institution): विप्र का अर्थ है वह 'सॉफ्टवेयर' या 'संस्था' जिसने हज़ारों साल से ज्ञान को सहेजा है। जैसे एक 'न्यायाधीश'(Judge) निजी जीवन में कैसा भी हो, पर जब वह अपनी कुर्सी पर बैठता है, तो पूरा राष्ट्र उसे सम्मान देता है क्योंकि वह 'न्याय के सिद्धांत' का प्रतीक है। राम जी कह रहे हैं कि उस 'ज्ञान की गद्दी' का सम्मान करो, व्यक्ति का नहीं।
सील-गुन हीन (Sacrifice over Luxury): यहाँ 'शील-गुण' का अर्थ चरित्रहीनता नहीं, बल्कि 'सांसारिक सुखों का अभाव' है। एक वैज्ञानिक या संत फटेहाल हो सकता है, उसके पास चकाचौंध (गुण) नहीं हो सकती, लेकिन उसकी 'साधना' पूजनीय है।
राम जी कहते हैं— "सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।"
यहाँ 'शूद्र' का अर्थ है— व्यक्ति की वह अवस्था जिसके पास 'संस्कार' नहीं हैं, जो केवल अपनी भूख और वासना का गुलाम है।
कल्पना कीजिए, एक ऐसा व्यक्ति जो 'एटम बम' बनाने में 'प्रवीण' (Expert) है, लेकिन उसके पास 'संस्कार' शून्य हैं। वह क्या करेगा? वह 'आतंकवादी' बनेगा। वह 'विनाश' करेगा। ओसामा बिन लादेन इंजीनियर था लेकिन चरित्र नहीं था नतीजा वह आतंकवादी बना।
राम जी कह रहे हैं कि 'बिना संस्कार का ज्ञान' (Information without Values) समाज के लिए कैंसर है। ऐसे 'ज्ञानी' को अगर समाज का नेतृत्व (पूजा) दे दिया गया, तो वह पूरी सभ्यता को राख कर देगा। इसलिए, केवल 'ज्ञान' काफी नहीं है, उस ज्ञान का 'मर्यादित' और 'संस्कारित' होना अनिवार्य है।
तुलसीदास जी ने 'जाति' को नहीं, 'भक्ति' को प्रधान माना।
अगर वे भेदभाव करते, तो निषादराज (शूद्र अवस्था)
को राम का 'भाई' क्यों लिखते?
वे शबरी के जूठे बेर क्यों खिलाते?
वे रावण (जो महाज्ञानी ब्राह्मण अवस्था में था) का वध क्यों लिखते ? न राम ने भेदभाव किया न तुलसी ने भेदभाव लिखा।
शबरी को समाज में निम्न स्थान प्राप्त था, लेकिन राम जी ने उन्हें "भामिनी" (प्रतिष्ठित स्त्री) कहा और उनकी भक्ति को सबसे ऊपर रखा।
निषादराज गुह राम जी ने उन्हें गले लगाया और कहा कि वह उन्हें 'भरत के समान' प्रिय हैं।
रावण 'विप्र' था, गुणी था, ज्ञानी था—परन्तु राम ने उसे मारा। क्यों? क्योंकि वह मर्यादाहीन था। केवट 'शूद्र अवस्था' में थे—परन्तु राम ने उन्हें अपना भाई मित्र कहा क्यों? क्योंकि वे भक्त और मर्यादित थे।
यह चौपाई समाज को बाँटने के लिए नहीं, बल्कि 'अनुशासन' (Order)बनाए रखने के लिए है। यह कहती है कि:
त्याग और साधना (विप्र) का सम्मान करो, चाहे वह दरिद्र क्यों न हो।
संस्कारहीन और अहंकारी बुद्धि (शूद्र अवस्था) का नेतृत्व कभी स्वीकार न करो, चाहे वह कितनी ही आकर्षक क्यों न हो।
अंग्रेजों और वामपंथियों ने हमें हमारे ही ग्रंथों से डराना चाहा, ताकि हम अपनी जड़ों को काट सकें। पर आज यह सत्य जान लो—रामचरितमानस 'भेद' का नहीं, 'प्रेम और मर्यादा' का संविधान है। जो इस चौपाई को पढ़कर क्रोधित होता है, वह केवल शब्दों को पढ़ता है; जो इसे समझकर पढ़ता है, उसके भीतर का 'राम' जाग जाता है।
अब अपनी चेतना के कपाट खोलिए। जो लोग इस चौपाई पर सवाल उठाते हैं, वे आपके धर्मग्रंथ की 'स्याही' तो देख रहे हैं, पर उसकी 'गहराई' नहीं। रामचरितमानस 'भेद' का शास्त्र नहीं, बल्कि 'अहंकार के विसर्जन' का मंत्र है। जिस दिन आप शब्द के पीछे छिपे इस सत्य को आत्मसात कर लेंगे, उस दिन दुनिया का कोई भी नैरेटिव आपको झुका नहीं पाएगा।
आप उस संस्कृति के वारिस हैं जहाँ 'त्याग' को 'तख़्त' से ऊँचा रखा गया है। जहाँ फटेहाल खड़ा एक तपस्वी, वैभव में डूबे सम्राट को रास्ता दिखाने का साहस रखता है। यह चौपाई हमें यही सिखाती है कि नेतृत्व उसे मत दो जो केवल 'ज्ञानी' है, नेतृत्व उसे दो जो 'संस्कारित' और 'त्यागी' है।
अपनी जड़ों पर गर्व कीजिए, क्योंकि जहाँ तर्क समाप्त होते हैं, वहाँ से 'राम' की मर्यादा आरंभ होती है।
वामपंथी नैरेटिव यह भूल जाता है कि तुलसीदास जी "सिया राममय सब जग जानी" लिखने वाले कवि हैं। जो व्यक्ति पूरे जड़-चेतन में राम को देखता हो, वह किसी मनुष्य का अपमान कैसे कर सकता है?
यह चौपाई समाज को बांटने के लिए नहीं, बल्कि 'मर्यादा' और 'अनुशासन' सिखाने के लिए है। यह बताती है कि ज्ञान केवल सूचनाओं का ढेर नहीं है, बल्कि वह संस्कार और परंपरा के प्रति निष्ठा भी है।
अस्तु
संदर्भ - https://www.facebook.com/share/18HJxyszSh/
#Ramcharitmanas #SanatanDharma
✍️ Swami Sri Amar Das ji Maharaj
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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