महर्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश (प्रथम संस्करण, प्रथम समुल्लास) में लिखते हैं-
"... 'निर्गतः आकारोयस्मात्स निराकारः " जिसका आकार कोई नहीं, इससे परमेश्वर का नाम 'निराकार' है।"
महर्षि यहाँ स्पष्ट रूप से यह अभिप्राय ग्रहण कर रहे हैं कि परमेश्वर किसी भी प्रकार के आकार, आकृति, रूप वा सीमा से रहित है। इसके पश्चात् भी यदि यह कहा जाए कि "इससे परमात्मा साकार सिद्ध हो जाता है, क्योंकि उसमें पहले आकार था, इसीलिए तो निकल गया। यदि उसमें कोई आकार नहीं था, तो निकल क्या गया?" तो यह अर्थ ऋषि के नाम के तात्पर्य के अनुरूप नहीं है। आप पूरी तरह से पूर्वाग्रह से मेर प्रतीत होते हैं। वस्तुतः आपकी पद्धति शब्दों का केवल शब्दकोश पर आधारित अर्थ करने की है। उदाहरणार्थ यदि निम्न वैदिक मन्त्र का ऐसा ही शाब्दिक अनुवाद कर दिया जाए- चत्वारि श्रृंगा त्रयो अस्य पादा दे शीर्ष सप्त हस्तासी अस्य । त्रिचा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवा मत्यांम् आविवेश।
तो वह कुछ ऐसा होगा इसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर और सात हाथ है। तीन टुकड़ों में बंधा बैल चिल्लाया और महानु देवता नश्वर संसार में प्रवेश कर गए।
ऐसे ही अनुवादों से सनातन धर्म का नाश हुआ।
प्रतीत होता है कि आपने सत्यार्थप्रकाश की भूमिका नहीं पढ़ी और सीधे जो अपने काम की बात लगी, वह ले ली। स्वयं महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में स्पष्ट चेतावनी दी है-
"जो कोई इस ग्रन्थकर्ता के तात्पर्य से विरुद्ध मनसा से देखेगा, उसको कुछ भी अभिप्राय विदित न होगा.. बहुत से हठी, दुराग्रही मनुष्य होते हैं कि जो वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध कल्पना किया करते हैं, विशेषकर मत बाले लोग। क्योंकि मत के आग्रह से उनकी बुद्धि अन्धकार में फँस के नष्ट हो जाती है।"
यदि उसी समुल्लास में इससे आगे की दो पंक्ति और पढ़ ली होती, तो आप एक ऋषि का उपहास करनेका पाप न करते। वहाँ महर्षि 'निर्गत' शब्द का अर्थ करते हुए 'निरंजन' शब्द की व्युत्पत्ति में लिखते हैं-( 'अञ्जू व्यक्तिम्लक्षणकान्तिगतिषु) इस बातु से 'अञ्जन' शब्द और 'निं' उपसर्ग के योग से 'निरंजन' शब्द सिद्ध होता है।
" अंजनं व्यक्तिर्लक्षणं कुकाम इन्द्रियै: प्राप्तिश्चेत्यस्माद्यो निर्गतः पृथग्भूतः स निरंजनः " जो व्यक्ति अर्थात् आकृति, म्लेच्छाचार, दुष्टकामना और चक्षुरादि इन्द्रियों के विषयों के पथ से पृथक् है, इससे ईश्वर का नाम 'निरंजन' है।
यहाँ महर्षि ने स्पष्ट रूप से 'निर्गत' का अर्थ 'पृथक्' लिया है, न कि 'पहले था और निकल गया'। 'निं' का अर्थ 'अभाव' भी है, जैसा कि 'निर्मक्षिकम्' आदि प्रयोग में है।
इस प्रकार 'निर्गतः आकारो यस्मात्स निराकारः' का अर्थ हुआ-जिससे आकार पृथक् है अर्थात् जगत् से पृथक् होने के कारण 'निराकार' कहलाता है। પૃથજી
द्वितीय संस्करण में महर्षि स्वयं इसे और अधिक स्पष्ट कर देते हैं- 'निर्गत आकारात्स निराकारः' जिसका आकार कोई भी नहीं और न कभी शरीर-धारण करता है, इसलिए परमेश्वर का नाम 'निराकार' है।
यहाँ भी 'निर्गत' का अर्थ 'पृथक्' लें, तो अर्थ इस प्रकार बनेगा जो आकार से पृथक् है, वह 'निराकार' कहलाता है।
यदि गम् धातु का अर्थ 'ज्ञान' और 'प्राप्ति' लें, तब भी यही भाव है कि परमेश्वर निराकार होने के कारण, आकार (भौतिक पदार्थों) से जाना वा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
निराकार = सीमाबद्ध भौतिक रूप का निषेध
जब बुद्धि पर पत्थर पड़ जाते हैं, तो निराकार भी सब जगह साकार ही दिखाई पड़ता है।
आप आगे महर्षि दयानन्द को उद्धृत करते हैं- "जब वह (परमात्मा) प्रकृति से भी सूक्ष्म और उसमे व्यापक है।" (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ८)
जीव का स्वरुप सूक्ष्म है और परमेश्वर अतीव सूक्ष्मात् सूक्ष्मतर स्वरूप है । (सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास ७) इन दोनों से आप कहना चाहते हैं कि महर्षि जी ने परमात्मा को प्रकृति व आत्मा की अपेक्षा सूक्ष्मतर बताकर उसका सूक्ष्मतम आकार स्वयं सिद्ध कर दिया। अर्थात् आप सूक्ष्म से आकार का ग्रहण कर रहे हैं। यहाँ भी आपने वही भूल कर दी, लेखक का आशय नहीं समझा। जब बुद्धि सूक्ष्म न हो, तो ऋषियों के ग्रन्थों को नहीं पढ़ना चाहिए। यहाँ बुद्धि सूक्ष्म होने का अर्थ यह नहीं है कि बुद्धि का आकार हो गया।
सूक्ष्म का अर्थ है-
* किसी प्रकार से ग्राह्य न होना।
* भौतिक मापन के अधीन न होना।
आपने सूक्ष्मता (subtlety) और आकार (form) को एक मान लिया गया है। यहीं से भ्रम प्रारम्भ होता है। मान लें- परमात्मा का सूक्ष्म आकार है। तब यहाँ प्रश्न उपस्थित होगा कि किसी पदार्थ का आकार है, तो उसकी सीमा होगी। सीमा के बाहर कुछ होगा, सीमा के अन्दर कुछ होगा और सीमा भी किसी से बनी होगी। पदार्थ की सीमा है अर्थात् वह संघनित है। इसका अर्थ है कि वहाँ कोई बल कार्य कर रहा है। वह कौनसा बल है? सूक्ष्म आकार है, तो क्या आप परमात्मा को कण रुप में मानेंगे? हवा का आकार बता सकते हैं ? आकाश जो मूल कणों से सूक्ष्म है, उसका क्या आकार हैं? प्रकृति का क्या आकार है? वस्तुतः आकार वाली बात मूल कणों से सूक्ष्मता की ओर जाने पर ही समाप्त हो जाती है। परमात्मा प्रकृति और यहाँ तक कि आत्मा से भी सूक्ष्म है, वहाँ आकार की बात करना मूर्खतापूर्ण है। जिसका आकार है, वह सीमित होगा। जो सीमित है, वह अनन्त नहीं, जो अनन्त नहीं, वह सर्वव्यापक नहीं और जो सर्वव्यापक नहीं, वह परमात्मा नहीं। कठोपनिषद् पढ़ लिया होता, तो मूर्खतापूर्ण बातें न करते।
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ (१.३.१५)
अर्थात् वह 'परतत्त्व' जिसमें न शब्द है, न स्पर्श और न रूप है, जो अव्यय है, जिसमें न कोई रस है और न कोई गन्ध है, जो नित्य है, अनादि तथा अनन्त है, 'महान् आत्मतत्त्व' से भी उच्चतर (परे) है, ध्रुव (स्थिर) है, उसका दर्शन करके मृत्यु के मुख से मुक्ति मिल जाती है।
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥(१.२.२२)
अर्थात् शरीरों में 'अशरीरी', अस्थिर पदार्थों में 'स्थित'-तत्त्व, 'महिमामय' 'विभुव्यापी आत्मा' का साक्षात्कार करके ज्ञानी एवं धीर पुरुष शोक नहीं करते।
मुण्डकोपनिषद् में ऋषि लिखते हैं-
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यज: ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥ (२.१.२)
वह दिव्य अमूर्त 'पुरुष', वही बाह्य तथा आन्तर (सत्य) है एवं वह 'अज' है; वह प्राणों से परे (अप्राण) एवं मन से परे (अमन) है, वह शुभ्र ज्योतिर्मय एवं अक्षर से भी परे 'परमात्मतत्त्व' है।
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर ँ शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदघाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥ - यजुर्वेद ४०/८
आकार के निषेध का अर्थ सत्ता का निषेध नहीं है। क्या भौतिकी के नियमों का कोई आकार है? नहीं, फिर भी उनकी सत्ता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक कण, लोक-लोकान्तर भौतिकी के नियमों के अनुसार कार्य कर रहा है। आकाश निराकार है, पर शून्य नहीं।
यदि परमात्मा का आकार है, तो वह सीमित होगा। जिसका आकार है, वह भौतिक द्रव्य है और जो भौतिक द्रव्य है, वह प्रकृति से निर्मित है। क्या परमात्मा को प्रकृति से निर्मित माना जा सकता है? यदि आकार है, तो कोई न कोई सीमा होगी। यदि सीमा है, तो वह परिभाषेय है। यदि परिभाषेय है, तो 'अनिर्वचनीय' नहीं। अतः 'अनिर्वचनीय आकार' एक self & contradictory concept है।
आप अनिर्वचनीय वस्तु को साकार कैसे कह सकते हैं? निराकार वस्तु ही अनिर्वचनीय हो सकती है, साकार नहीं। जिसे उपनिषद् 'अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य...' कहकर सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं महान् से महान् कहते हैं, वह साकार कैसे हो सकता है? कोई भी आकार या तो सूक्ष्म होगा या महान् होगा, वह सूक्ष्म व महान् दोनों रूपों वाला नहीं हो सकता। केवल निराकार वस्तु ही सूक्ष्म व महानु दोनों रूप वाली हो सकती है।
निं उपसर्ग का अर्थ = पृथक, रहित, परे, अभाव।
जैसे-
निरञ्जन = गुणों से पृथक्
निर्विकार = विकार रहित
निर्गुण = गुणों से परे
निर्बल = बल का अभाव आदि
यहाँ 'अनिर्वचनीय' शब्द से गुण नहीं, गुणातीतता जाननी चाहिये। इसी प्रकार निराकार से आकारातीत समझना चाहिए।
"जैसे "अनुदरा कन्या' का अर्थ 'पेट से रहित' नहीं, बल्कि 'सूक्ष्म पेट वाली' कन्या है।" यह उदाहरण यहाँ अप्रासंगिक है। क्योंकि कन्या एक भौतिक शरीर वा द्रव्य है। द्रव्य में सूक्ष्म-स्थूल का भेद सम्भव है, लेकिन परमात्मा भौतिक द्रव्य नहीं है और भौतिक द्रव्य न होने पर 'सूक्ष्म आकार' का प्रश्न ही नहीं उठता।
अब हम आपसे यह पूछना चाहेंगे कि आपको ईश्वर को साकार कहने की इतनी हठ क्यों है? क्या आप इससे मूर्ति सिद्ध करना चाहते हैं? यदि हाँ, तो बनाइए अपनी दृष्टि में अनिर्वचनीय आकार वाली मूर्ति। बनाइए निम्न वेद मन्त्रों में वर्णित ईश्वर की मूर्ति-
एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥
- यजुर्वेद ३१/३
नाभ्याऽआसीदन्तरिक्ष शीष्णों यौः समवर्त्तत ।
पद्धयां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ २।। ऽअकल्पयन् ॥
- यजुर्वेद ३१/१३
आप तो महापुरुषों की मूर्तियों को ही तथाकथित अनिर्वचनीय ब्रह्म की मूर्ति मानकर उनकी पूजा कर रहे हैं। क्योंकि-
१. इससे आपका व्यापार चलता है?
२. कोई भी स्वयं को ब्रह्म का अवतार घोषित करके भोली-भाली सनातनी जनता को ठग सकता है?
३. इससे कोई नाना ईश्वर की कल्पना करके हिन्दू समाज (वस्तुतः आयों) को खण्ड-खण्ड कर सकता है?
४. वह सच्चे ब्रह्म से लोगों को दूर कर सकता है?
५. वह भारत को और भी दुर्बल व खण्डित कर सकता है?
बोलें ! आप यही चाहते हैं?
आपको निराकार शब्द से इतना विरोध है कि मिथ्या व निराधार लेख लिखने बैठ गये। आपको साकारवादियों द्वारा नाना कल्पित देवी-देवताओं की पूजा के नाम पर निरीह पशुओं का रक्त बहाना तो स्वीकार्य है, देवदासी प्रथा के रूप में दुराचरण स्वीकार है, भगवान् शिव जैसे महान् योगी व वैज्ञानिक की पूजा के नाम पर उपस्थेन्द्रिय की पूजा एवं नाना मादक पदार्थों का सेवन करना-कराना स्वीकार्य है, योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति के नाम पर अश्लील रासलीलाएँ तो स्वीकार्य हैं, परन्तु निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्ता ब्रह्म की पातंजल वेदोक्त अष्टांग योग की पद्धति स्वीकार्य नहीं?
ध्यान रखें कि जिन ऋषि दयानन्द को आप अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उन्हीं की कृपा से आपके मन्दिर, यज्ञोपवीत, शिखा व तिलक सुरक्षित रह गए हैं, अन्यथा आप व हम सब ईसाई व मुसलमान बन गए होते और भारत स्वतन्त्र भी नहीं होता। क्या आप नहीं जानते हिन्दुओं को बचाने के लिए आर्यसमाजियों ने ही सबसे अधिक बलिदान दिये हैं? आपसे जानना चाहेंगे कि अन्य मत-पन्थों के विरुद्ध आपने कितने लेख लिखे ?
जहाँ तक आपके निराकार ईश्वर को काल्पनिक कहने की बात है, तो ब्रह्मा जी के चार सिर, हनुमान जी की पूँछ और उनके द्वारा सूर्य को मुँह में रख लेना, रावण के १० सिर और २० भुजा होना, रीछ जामवन्त का वेदों का विद्वान होना, महादेव शिव की जटाओं से गंगा निकाल देना, महर्षि अगस्त्य द्वारा समुद्र को पी लेना, धरती का शेष नाग पर टिकना, सूर्य के रथ को सात घोड़ों द्वारा खीचना, एक लाख योजन का मत्स्यावतार, एक लाख योजन का शूकर अवतार, ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण जी द्वारा कुब्जा दासी का उद्धार करना और पाँच लाख गौओं के माँस से तीन करोड़ ब्राह्मणों का नित्य भोजन करना, भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी द्वारा स्वपुत्री गमन, शिवपुराण के अनुसार शिव जी के आदेशानुसार भैरव द्वारा ब्रह्मा जी का सिर काटा जाना, विष्णु जी की नाभि से कमल और कमल से ब्रह्मा जी का उत्पन्न होना, गणेश जी द्वारा ब्रह्मा जी का दाढ़ी पकड़कर पिटाई करना, भगवान् शिव द्वारा अपने पुत्र का सिर काटकर हाथी का जोड़ देना, दारुवन में शिव जी क्या लेने गए थे... इनको आप क्या कहेंगे? ये आप पर ही छोड़ते हैं, परन्तु हम इन पाप लीलाओं से अवश्य लज्जित हैं। आर्य समाज इन महापुरुषों को अत्यन्त पवित्र सर्वोच्च कोटि के योगी और वैज्ञानिक मानता है। हमें गर्व है कि हम इन महापुरुषों के वंशज वा अनुयायी हैं।
जय मां वेद भारती ।
✍️- डॉ. मधुलिका आर्या, उप-प्राचार्या
विशाल आर्य, प्राचार्य
वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्थान्यास द्वारा संचालित )
वेद विज्ञान मन्दिर, भागलभीम, भीनमाल
वयं राष्ट्रे जागृयाम
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