इस पर हमारा कहना यह है – आचार्य अग्निव्रत जी! जब हमने मधुलिका आर्या जी के लेख का व्याकरणशास्त्र, तर्कशास्त्र एवं आर्यसमाज के ही साहित्य के प्रमाणों से खंडन किया था, तब क्या हमने उनका फोटो व पता माँगा था? हम तो उनसे परिचित ही नहीं थे। क्या हमने उन्हें कोई अपशब्द कहा था? क्या हमने उन्हें मुसलमान आदि कहा था? हमने व्याकरण से आपका खंडन कर दिया। आपने प्रतिउत्तर में ऐसा क्यों नहीं किया?
आचार्य अग्निव्रत जी ने यहाँ स्वयं ही सिद्ध कर दिया है कि वे हमारे खंडन का प्रतिउत्तर देने में सर्वथा असमर्थ हैं।
इनका विषय तो होना चाहिए था – "निर्गतः आकारः यस्मात्" का जो अर्थ स्वामी जी लिखकर गए हैं, उसे सिद्ध करना। क्योंकि वह अर्थ पूर्णतः गलत था। हमने तो व्याकरण से सिद्ध कर दिया था। किन्तु आचार्य अग्निव्रत मुख्य विषय से पलायन कर गए।
यहाँ वे अप्रासंगिक प्रतिपादन के दोष से ग्रसित हो गए। कहा गया है – अप्रस्तुतप्रसङ्गो दोषः। विषय से हटकर अप्रासंगिक, अनावश्यक प्रलाप प्रारम्भ कर दिया गया।
आचार्य अग्निव्रत कह रहे हैं – "व्याकरण पर्याप्त नहीं है, अन्तःप्रज्ञा चाहिए।"
यह कथन भी आचार्य ने अपनी लाज बचाने के लिए, अपने समर्थकों को मूर्ख बनाने के लिए लिखा है। ऐसा कहकर वे महर्षि पाणिनि को ही गलत सिद्ध कर रहे हैं, क्योंकि किसी शब्द का अर्थ तो व्याकरण से ही निश्चित होता है – शब्दानुशासनं व्याकरणम्।
जैसे लिखा हो – "बालकः फलम् खादति"। व्याकरण के अनुसार इसका अर्थ होगा – बालक फल खाता है। अब आचार्य अग्निव्रत कहें कि व्याकरण नहीं, अन्तःप्रज्ञा चाहिए, और अपनी अन्तःप्रज्ञा से कहें कि इसका असली अर्थ होगा – "बालक और फल दोनों एक-दूसरे को खा रहे हैं", तब क्या यह अर्थ सत्य कहा जाएगा? यहाँ पर सत्यार्थ कौन सा होगा? व्याकरण वाला या आचार्य जी की अन्तःप्रज्ञा वाला?
या फिर ऐसे अर्थ क्या जाएगा कि --- "बालक का अर्थ हुआ – विकासशील जीव, और 'फल' यहाँ प्राकृतिक पोषक द्रव्य का प्रतीक है, और 'खादति' का अर्थ है – ऊर्जा-रूपान्तरण की जैव-रासायनिक प्रक्रिया। अतः इस वाक्य में विज्ञान छिपा हुआ है और वह है – "विकासशील शरीर को प्राकृतिक आहार से ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे वृद्धि, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और चयापचय क्रिया पुष्ट होती हैं।" तो यह है अन्तःप्रज्ञा? जिससे आचार्य जी वैज्ञानिक भाष्य करते हैं? ऐसी ही अन्तःप्रज्ञा का सहारा लेकर आर्यसमाजी वेद-भाष्यकारों ने वेदों पर असुर की भाँति प्रहार किया है। जो वास्तविक अर्थ है, उसे छिपाते हैं और एक ही मन्त्र के छह-छह, सात-सात प्रकार के अलग-अलग अर्थ कर डालते हैं। जैसा कि पूर्व के लेखो में दिखाया था, आगे भी दिखाएंगे।
अरे आचार्य जी, 'निर्गत' शब्द का अर्थ आप अपनी प्रज्ञा से करेंगे या व्याकरण से? अतः स्पष्ट है कि आचार्य अग्निव्रत और मण्डली ने यह अपनी पराजय स्वीकार कर ली कि हम व्याकरण से सिद्धि नहीं कर सकते। अतः अन्तःप्रज्ञा को ले आए।
आपने किस आधार पर कहा कि मेरा नाम छद्म है? क्या आपके पास कोई प्रमाण है इसका? यहाँ सोशल मीडिया पर किसी का नाम सही है या नहीं, यह कैसे ज्ञात होगा? अगर हमने कोई भी नाम रखा होता, तो वह आपको नकली क्यों नहीं लगता? यहाँ कैसे पता चलेगा कि किसी व्यक्ति ने जो फोटो लगाया है, वही उसका असली फोटो है? बाकी यह अपनी इच्छा है कि कोई व्यक्ति अपना फोटो लगाए या न लगाए, अपना पता लिखे या न लिखे। इस बात का शास्त्रीय चर्चा से क्या सम्बन्ध है यहाँ?
और फिर प्रश्न यह भी है कि हम फोटो लगा दें, तब आप कहेंगे – यह असली फोटो नहीं है। तब हम क्या करेंगे? आप कहेंगे – "हमारे सामने आओ।" फिर अगर हम आपके सामने आ जाएँ, तो भी आप सन्देह करेंगे कि – तिलक, यज्ञोपवीत और शिखा तो छद्म मुसलमान भी रख सकता है। तब तो आप कहेंगे कि आपको हमारा लिंग देखकर परीक्षा करनी है कि हम हिन्दू हैं या मुसलमान। मतलब खतना तो नहीं हुआ, यह देखना है? तब क्या हम आप शंकालु आर्यसमाजियों को अपना लिंग खोल-खोलकर दिखाते फिरेंगे? और फिर आप देखकर भी सन्तुष्ट होंगे, इसकी भी क्या गारण्टी है? आप तो न जाने कैसी-कैसी अनर्गल माँगें रखते रहेंगे। हम क्या यहाँ आपको सन्तुष्ट करने के लिए बैठे हैं?
आचार्य अग्निव्रत जी, आप एक प्रतिष्ठित आर्यसमाजी विद्वान हैं। आपको ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें करना शोभा देता है क्या? अगर आप उत्तर देने में असमर्थ हैं, तो इससे बेहतर था कि आप अपना मुँह छिपा लेते, कुछ भी न कहते।
फेसबुक जैसे सार्वजनिक मंच पर अपना पता, फोटो आदि न देना क्या अपराध है? यह तो व्यक्तिगत इच्छा का विषय है। आप क्या केवल इस आधार सबको मुसलमान बताएँगे? यह कहाँ तक उचित हैं?
शास्त्रीय चर्चा में व्यक्तिगत आक्षेप करना – यह सब निन्दनीय कार्य आपके चेले-चपाटे या नन्हें-मुन्हे, छोटे-मोटे दयानन्दी आसुरी सैनिक करते, तो यह बड़ी बात न होती। किन्तु आपको तो ऐसा करने से बचना चाहिए।
आपने तो व्याकरण, शास्त्रीय समाधान को हटाकर सारा श्रम हमको विधर्मी, वामपंथी, मुस्लिम आदि सिद्ध करने में तथा स्वयं के स्वामी जी व स्वयं का महिमामण्डन करने में ही लगा डाला। किन्तु इससे तो आपका कोई पक्ष सिद्ध न हुआ।
सिद्धान्त तो यह है कि – वादे वादे जायते तत्त्वबोधः – अर्थात तर्क से सत्य निकलता है, व्यक्ति से नहीं। किसी के मत का खण्डन तर्क से होता है, व्यक्तिगत झूठे आक्षेपों से नहीं। विषये प्रमाणं, न तु वक्तुः गुणदोषः – सत्य का निर्णय तर्क और प्रमाण से होता है, न कि वक्ता के चरित्र पर झूठे दोषारोपण करके।
तब यहाँ आपको हमारे फोटो का क्या करना है? हमारे फोटो से बातें करेंगे आप? पते का क्या करना है? हमने तो आपको हलवा-पूरी खिलाने का निमन्त्रण नहीं दिया है। आपने हमारे लेख का खण्डन किया, हमने उसका कर दिया। अब जब आप असमर्थ हुए, तब ये सब आक्षेप और निरर्थक माँगों की क्या आवश्यकता है?
आपको तो केवल मेरे तर्कों और दिए गए प्रमाणों को देखकर उनका उत्तर देना चाहिए। किन्तु आपने तर्कहीन, भावनात्मक, निरर्थक प्रलाप के अतिरिक्त कुछ नहीं किया।
मैंने अपने पाँच माह पूर्व के एक लेख में मुसलमानों के मोहम्मद को एक अपराधी, क्रूर हत्यारा, बच्चीबाज, लौंडेबाज, जाहिल, जंगली, लुटेरा कहा है। कुरान को वाहियात किताब कहा है। कुरान की आयतों को कुत्सित कहा है – यह सब एक सार्वजनिक लेख है।
क्या कोई मुसलमान ऐसा कह सकता है? क्या कोई वामपन्थी ऐसा कह सकता है?
मैं इनको मुसलमान लगता हूँ? तब तो इनकी बुद्धि किस हद तक भ्रष्ट है, इसका अनुमान आप इस कथन से लगा सकते हैं। जिस व्यक्ति ने आज तक मुसलमानों के समर्थन में एक शब्द नहीं बोला, इस्लाम की प्रशंसा या समर्थन में एक शब्द नहीं बोला, बल्कि गालियाँ दी हैं। सदैव मैंने सनातन धर्म के शास्त्रों और देवताओं का महत्त्व ही बढ़ाने का प्रयास किया है, तथा आर्यसमाज द्वारा हिन्दू धर्म, हिन्दू देवी-देवताओं तथा शास्त्रों पर लगाए जाने वाले आक्षेपों का ही उत्तर दिया है। उसे यह मुसलमान बता रहे हैं। यह तो इनके आचार्यों का हाल है, तब दयानन्दी सैनिक कैसे गालीबाज व मूर्ख होंगे, यह आप अनुमान लगा सकते हैं।
और आचार्य अग्निव्रत जी, बताइए ज़रा – कौन-सा मुसलमान ऐसा व्याकरण जानता है? आपका कोई परिचित मुसलमान हो तो उसे यहाँ लेकर आइए। हम तो समझते हैं कि इस धरती का कोई मुसलमान हमारे ही व्याकरण में हमारा खण्डन करने में असमर्थ है। आपमें इतना अविश्वास क्यों है? अगर आपको लगता है कि कोई मुसलमान व्याकरण सीखकर आपको ही व्याकरण में पराजित कर रहा है, तब तो आपको लज्जित होना चाहिए।
अरे ठीक है। अपना इस प्रकार खण्डन देखकर आप अपना होश खो बैठे, विवेक ने कार्य करना बन्द कर दिया। तब भी आप इतना तो कर सकते थे न कि हमसे आकर पूछ लेते। हम आपको अपना आधार कार्ड, पैन कार्ड, दसवीं की मार्कशीट, गत माह हुई रक्तजाँच – आदि जो भी कागज हमारे पास है, वह सब आपको दिखा देते? या आप कहें तो अब भी आपको दिखा देंगे। किन्तु क्या आप अपने द्वारा लगाए गए इन घृणित, झूठे आरोपों के लिए सार्वजनिक तौर पर क्षमा माँगेंगे कि आपसे भूल हुई?
आचार्य अग्निव्रत जी, आज के समय में हिन्दू लड़कियाँ जेहादियों के चक्कर में फँसती हैं, हर जाति की लड़कियाँ। किन्तु अब भी इस देश में करोड़ों हिन्दू हैं जो अपने धर्म एवं अपनी जाति पर गर्व करते हुए अपनी नस्ल को शुद्ध बनाए हुए हैं। हम लाखों वर्षों से चली आ रही परम्परा को टूटने नहीं दे रहे हैं। हम बेशक कम होते जाएँगे, लेकिन प्रलय तक अपनी नस्ल को बचाकर रखेंगे। हम ऐसे धर्म से आते हैं, जो किसी व्यक्तिविशेष के द्वारा नहीं, स्वयं परमात्मा द्वारा प्रवर्तित है।
किन्तु आप आर्यसमाजी तो मुसलमानों का शुद्धिकरण करते हैं न? मुसलमानों से एक छोटा-सा हवन कराकर, उन पर पानी छिड़ककर उन्हें आर्यसमाजी बना लेते हैं। फिर उनका विवाह अपनी बहन-बेटियों से ही तो करते हैं न? या उन धर्मान्तरित मुसलमानों के लिए सूर्यलोक से लड़कियाँ लाते हैं? क्या हमने आपसे पूछा कि आप या विशाल आर्य भी किसी मुसलमान से आर्यसमाजी बने मुस्लिम की सन्तान तो नहीं हैं? अर्थात सन्देह की सीमा से तो आप घिरे हैं, क्योंकि आपके यहाँ तो मुसलमानों को आर्यसमाजी बनाकर उनसे ब्याह करने का स्थापित प्रचलन है – हमारे यहाँ तो नहीं है। तो हमने आपसे या विशाल आर्य से या मधुलिका आर्या से यह पूछा था क्या कि अपनी पिछली दस पीढ़ियों के नाम बताओ। कहीं गोमांस खाने वाले किसी फुरकान मियाँ को किसी आर्यसमाजी ने फूलकुमार आर्य बना दिया हो और उसी से आपका वंश चला हो। हमने माँगा क्या यह सब? हमने तो शास्त्रीय आधार पर खण्डन किया, आप भी वही करते। हमने मधुलिका आर्या जी के केवल शब्दों का खण्डन किया। उनका नम्बर माँगा था क्या कि वीडियो कॉल करके दिखाएँ कि आप असली हैं या नकली? कहीं विशाल आर्य ने ही साड़ी पहनकर यह लेख तो नहीं लिखा है? नहीं पूछा था न।
फिर इसके आगे अग्निव्रत जी ने पुनः वही सब कहा है कि – "कोई पौराणिक विद्वान अर्थात हिन्दू धर्म के विद्वान इस्लाम पर नहीं बोलते हैं" – आदि-आदि। और ले-देकर वही दो-चार नाम गिना दिए हैं, जिन्हें हर आर्यसमाजी गिनाता है। पण्डित लेखराम ने अपने प्राण गँवाए, श्रद्धानन्द ने गँवाए... अरे ठीक है भाई! हमने पिछले लेख में बताया था कि इतिहास में लाखों हिन्दुओं ने इस देश और धर्म के लिए अपने प्राण गँवाए हैं। आपके भी कुछ लोगों ने गँवा दिए, तो क्या आपको इसी हिन्दू धर्म का विरोध करने का अधिकार मिल गया है?
अनेक हिन्दू भ्रम में रहते हैं कि आर्यसमाज मुसलमानों के विरुद्ध जो बोलता है, वह हिन्दुओं के लिए ऐसा करता है। किन्तु ऐसे लोगों को विचार करना चाहिए कि क्या सच में ये हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए ऐसा करते हैं? इसका उत्तर है – नहीं, बिल्कुल नहीं। ये मुसलमानों का खण्डन करते हैं। फिर उन मुसलमानों में से कुछ मुसलमान अगर अपना धर्म छोड़ते भी हैं, तो ये उसे हिन्दू नहीं, बल्कि आर्यसमाजी बनाते हैं। तब वह मुसलमान आर्यसमाजी बनकर यही सब करता है – "राधा काल्पनिक है", "कृष्ण ने कुब्जा से व्यभिचार किया", "फलाने ऋषि ने यह कुकर्म किया", "तुम्हारे देवता दुष्ट हैं, बलात्कारी हैं", "पुराण पाखण्ड हैं", "मूर्ख हिन्दू अवतारवाद मानते हैं", "मूर्ख हिन्दू श्राद्ध करते हैं", "मूर्ख हिन्दू देवी-देवताओं को मानते हैं" – आदि-आदि। अर्थात वह पहले कुरान के नाम से हिन्दू धर्म से द्वेष रखते हुए इसका विरोध करता था, और फिर आर्यसमाजियों की सत्यार्थप्रकाश के नाम पर हिन्दू धर्म से द्वेष रखते हुए विरोध करता है। तब इनके इस्लामिक खण्डन से हिन्दुओं को क्या लाभ होता है? और चलिए, यह सब छोड़ भी दें। हम स्वीकार कर लें कि आप इस्लाम का खण्डन करके हिन्दुओं के लिए अच्छा कार्य कर रहे हैं, तो ठीक है। आप अपने इस कार्य के लिए प्रशंसा के पात्र हैं। किन्तु क्या इससे आपको हिन्दू धर्म का खण्डन करने का अधिकार मिल जाता है? एवं क्या ऐसा करके आप यह कहना चाहते हैं कि आप तो मुसलमानों का भी खण्डन करेंगे और हिन्दुओं का भी, किन्तु कोई हिन्दू आपके झूठे आक्षेपों का उत्तर भी न दे?
यह तो स्पष्ट इस्लामिक प्रवृत्ति है कि आप चाहते हैं कि आप हमारे धर्म का खण्डन करें, किन्तु आपका खण्डन न किया जाए। अगर कोई आपका खण्डन करे, तो आप उसे गालियाँ देंगे, विधर्मी बताएँगे, एजेंट बताएँगे। आपके दयानन्दी चेले गालियाँ देंगे, एफ.आई.आर. से लेकर "देखे लेने" तक की धमकी देंगे। क्या यह समझा जाए कि आप लोग भी इस्लामी खण्डन कर-करके उनके जैसे ही होते जा रहे हैं?
सत्यार्थप्रकाश नामी बन्दूक को सब हिन्दुओं की खोपड़ी पर रखकर आप चाहते हैं कि इसे ही सब अन्तिम सत्य मानें, पाक किताब मानें और दयानन्द को अन्तिम ऋषि मानें। और जो न मानें, उसे आप गाली दें। आप स्वयं को बेशक आर्य करते फिरें, वैदिक कहते रहें। किन्तु सत्य यही है कि आपमें आर्यत्व का एक भी लक्षण नहीं, वैदिक होने का एक भी लक्षण नहीं। अगर होता, तो आपके इस पूरे लेख में केवल हमारे वचनों का खण्डन करने का प्रयास किया जाता, न कि हमें गाली देने का।
आचार्य अग्निव्रत लिखते हैं कि – "हमने यह निश्चित किया है कि आगे इसके लेखों का कोई उत्तर नहीं देना चाहिए।"
आप उत्तर नहीं दे सकते। आक्षेप लगा सकते हैं, अपना महिमामण्डन करते हुए सम्मुख पक्ष को अपशब्द कह सकते हैं। क्योंकि जहाँ और जब भी आप उत्तर देने का प्रयास करेंगे, तब भला असत्य को कोई कहाँ तक सिद्ध कर सकेगा? अतः आपकी असमर्थता हम समझ सकते हैं। हमने तो आपसे उत्तर देने का निवेदन ही नहीं किया था। हमारे एक व्याकरण से स्पष्ट सिद्ध खण्डन का आपने व्यर्थ ही मूर्खतापूर्ण तर्कों के साथ खण्डन करने का प्रयास किया। हमने उसके प्रतिउत्तर में आपके व्याकरणिक ज्ञान की पोल खोलकर रख दी। तब आप आक्षेप लगाते हुए उत्तर न देने की प्रतिज्ञा करते हैं – तब इस पर केवल हँसा जा सकता है।
फिर आचार्य अग्निव्रत लिखते हैं कि – "हमने इनके लिखे वेदमन्त्र में जो अशुद्धियाँ बताई हैं, वे सब सही नहीं हैं; केवल एक ही अशुद्धि है। ऐसा नहीं है। हमें जिन्होंने इस लेख के विषय में सूचित किया, उन्होंने जिस ब्लॉग का लिंक दिया, उस ब्लॉग पर अभी भी वह वेदमन्त्र इन्हीं सब अशुद्धियों के साथ लिखा हुआ है जो हमने बताई हैं। अतः इसके लिए हम दोषी नहीं। तब भी आप एक ही माने, तो एक प्राचार्य, उपप्राचार्य और आप महान वैज्ञानिक भाष्यकार वेदमन्त्र में एक भी गलती कैसे कर सकते हैं?"
फिर अग्निव्रत लिखते हैं कि – "हमने अपनी पोस्ट को सामान्य व्यक्तियों की टिप्पणी के लिए प्रतिबन्धित कर रखा है।" – तो यह भी झूठ ही है।
हमने अभी तक आर्यसमाज के खण्डन में पचासों लेख लिखे हैं। वे सब पब्लिक हैं, उन पर कोई भी कमेन्ट कर सकता है। किन्तु कुछ पोस्ट जो अधिक लोगों तक पहुँची और उन पर आकर सैकड़ों आर्यसमाजी अपशब्द लिखने लगे, तब हमने उन्हें केवल ओन्ली फ्रेंड कर दिया – इसमें क्या गलत है? अब हर ऐसे गैरे दयानन्दी आसुरी सैनिक की गालियों का उत्तर थोड़े ही देते फिरेंगे।
अन्त में फिर अग्निव्रत आचार्य हमें वेद और भारत का विरोधी व विधर्मी कहते हुए अपनी बात समाप्त करते हैं। :) बाकी अन्य जो लिखा है – वेद में इतिहास है या नहीं, कितने क्रान्तिकारी आर्यसमाजी थे – इस पर तो बाद के लेखों में विस्तार से लिखेंगे ही।
बाकी यहाँ अधिकतर आर्यसमाजियों को गालियों के अतिरिक्त कुछ नहीं आता। किन्तु आर्यसमाजी विद्वानों की धूर्तता व झूठ आप स्पष्ट देख सकते हैं। भला, भारत-विरोधी हमने कौन-सा वचन यहाँ आज तक कहा है? वेद का विरोध भला हमने कहीं किया है या कर सकते हैं?
ऐसे निराधार आरोप लगाकर आर्यसमाजी आचार्य अपने चेलों-चपाटों की भावनाओं को सहलाकर अवश्य उत्तेजित व स्खलित कर सकते हैं। किन्तु कोई भी विद्वान, चाहे वह हिन्दू हो या आर्यसमाजी, यहाँ स्पष्ट देख सकेगा कि – "आर्यसमाजी विद्वान ने हमारे शास्त्रीय रीति से लिखे प्रमाणयुक्त खण्डन का प्रतिउत्तर न देकर, निराधार झूठ लिखकर अपनी विद्वता नहीं, अपनी अल्पज्ञता, असमर्थता, मूर्खता व धूर्तता का ही नग्न प्रदर्शन किया है।"
अभी तो यह प्रारम्भिक चरण ही है महाराज! इतने व्याकुल मत होइए, होश मत खोइए। अभी तो आपको बहुत कुछ देखना है। यह समझिए कि अभी तो हमनें अपने अस्त्र शस्त्र पैनाने ही प्रारम्भ किए हैं।
तब तक के लिए – राम राम।https://www.facebook.com/61556300201732/posts/122310456956210006/?mibextid=rS40aB7S9Ucbxw6v
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