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Sunday, 19 April 2026

दयानंद नहीं होते तो हिन्दू नहीं बचते .. मधुलिका आर्या वक्तव्य का शचींद्र जी द्वारा उत्तर

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मधुलिका आर्या के उक्त लेख का श्री शचींद्र जी द्वारा उत्तर -

मधुलिका आर्या जी हमारे लिए लिखती हैं --“ध्यान रखें कि जिन ऋषि दयानन्द को आप अपमानित करने का प्रयास करते हैं, उन्हीं की कृपा से आपके मन्दिर, यज्ञोपवीत, शिखा व तिलक सुरक्षित रह गए हैं, अन्यथा आप व हम सब ईसाई व मुसलमान बन गए होते और भारत स्वतन्त्र भी नहीं होता। क्या आप नहीं जानते कि हिन्दुओं को बचाने के लिए आर्यसमाजियों ने ही सबसे अधिक बलिदान दिए हैं?”

शचीन्द्र - भारत का पहला स्वतन्त्रता संग्राम 1857 को माना जाता है। मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब, तात्या टोपे, वीर कुँवर सिंह, झलकारी बाई, राव तुलाराम आदि क्या आर्यसमाजी थे? इस स्वतन्त्रता संग्राम में लाखों हिन्दुओं ने बलिदान दिया था। कोई देवी का भक्त था, कोई विष्णु का उपासक, कोई शिव को मानने वाला।

स्वामी दयानन्द की आयु उस समय लगभग 35 वर्ष थी। यानी वे बालक नहीं थे, वृद्ध भी नहीं थे।

अब स्वयं स्वामी दयानन्द द्वारा लिखित अपनी जीवनी में देखें कि वे उस समय क्या कर रहे थे - 

“नदी में बहते शव को देखकर मैं शीघ्रता से भीतर गया और शव को पकड़कर तट पर ले आया। मैंने उसको एक तेज चाकू से, अच्छी प्रकार जैसे मुझसे हो सकता था, काटना प्रारम्भ किया। मैंने हृदय को उसमें से निकाल लिया और ध्यानपूर्वक उसकी परीक्षा की और देखा। फिर हृदय को नाभि से पसली तक काटकर मैंने अपने सामने रखकर देखने का यत्न किया, और जो वर्णन पुस्तक में था उससे समता करने लगा। फिर इसी प्रकार सिर और गर्दन के एक भाग को भी काटकर सामने रख लिया।” (पृष्ठ संख्या ३७, स्व-लिखित जीवन चरित्र)

“दुर्भाग्य से इस स्थान पर मुझको भाँग सेवन का अभ्यास पड़ गया और प्रायः उसके प्रभाव से मैं मूर्छित हो जाया करता था।” (स्वामी दयानन्द द्वारा स्वकथित जीवन चरित्र)

“उस स्थान पर साँड की मूर्ति खड़ी थी, तब मैं उस मूर्ति के भीतर घुस गया और शेष रात वहीं सोता रहा।” (स्वामी दयानन्द द्वारा स्वकथित जीवन चरित्र)

यानी जिस समय कानपुर में मूर्तिपूजक हिन्दू अंग्रेजों से युद्ध करते हुए हजारों की संख्या में अपना बलिदान दे रहे थे, उस समय स्वामी दयानन्द, सन्यासी होकर भी एक लाश को चीरने-फाड़ने जैसा मूर्खतापूर्ण कृत्य कर रहे थे। किसलिए? उसमें नाड़ी खोजने के लिए। यह तो भला हो कि स्वामी दयानन्द ने मुर्दे को चीरकर उसमें आत्मा, मन आदि खोजने का प्रयास नहीं किया, अन्यथा उसे न पाकर कह देते कि - “आत्मा और मन होते ही नहीं हैं”।

जिस समय रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई जैसी महिलाएँ तक अंग्रेजों से लोहा ले रही थीं, उस समय स्वामी दयानन्द भाँग खाकर दो-दो दिन बेसुध पड़े रहते थे।

दिल्ली में नरसंहार हुआ था, अंग्रेज जगह-जगह उनसे लड़ रहे हिन्दुओं की सामूहिक हत्याएँ कर रहे थे। हिन्दू भी बिना पीछे हटे मर रहे थे, उस समय आर्यसमाजियों के स्वामी दयानन्द भाँग खाकर बैल की मूर्ति की गुदा में घुस रहे थे।

क्यों भाई, ये बैल की गुदा में घुसकर, बैल की मूर्ति के भीतर ये तुम्हारे 35 साल के मुष्टण्डे स्वामी दयानन्द कौन से अंग्रेजों से आजादी के लिए लड़ रहे थे? कहते हो कि - ‘हम अपमानित करते हैं’। हम क्या अपमानित करेंगे, ये अपने कर्मों से स्वयं अपमानित हैं।

लाखों हिन्दू इस स्वतन्त्रता संग्राम में मारे गए। हिन्दू ही बड़ी संख्या में थे, उससे कम फिर सिख और मुसलमान थे। स्वामी दयानन्द जो कि इस समय युवा थे, उनका योगदान क्या था? उत्तर है - शून्य।

स्वामी दयानन्द तो इस समय अमर हो जाने के उपाय खोज रहे थे। भाँग पीकर मौज काट रहे थे, गुरु बदलते फिर रहे थे, मुर्दों को चीरने जैसे घृणित कर्म करके वैज्ञानिक बन रहे थे। आर्यसमाज का इस समय अस्तित्व भी नहीं था।

तब मधुलिका जी, ये मूर्तिपूजक हिन्दू किससे प्रेरित होकर लड़-मर रहे थे?

मधुलिका जी का कहना है कि - “उन्हीं की कृपा से आपके मन्दिर, यज्ञोपवीत, शिखा व तिलक सुरक्षित रह गए हैं, अन्यथा आप व हम सब ईसाई व मुसलमान बन गए होते।”

विद्वान मित्र देखें कि जो स्वामी दयानन्द मूर्ति-पूजा को पाप कहते थे, अधर्म कहते थे, मूर्ति को फिंकवाया करते थे, मूर्ति-पूजा का खण्डन करते थे, उनके कारण मन्दिर सुरक्षित रह गए - क्या इससे अधिक मूर्खतापूर्ण बात कोई हो सकती है?

स्वामी दयानन्द अपने आत्मचरित के अन्त में लिखते हैं - “मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि सर्वत्र ‘आर्य-समाज’ कायम होकर मूर्ति-पूजा आदि दुराचार दूर हो जाए।” (योगी का आत्मचरित, पृष्ठ २८१)

स्वामी दयानन्द के जीवनकाल में इस देश में हिन्दू लगभग 75 प्रतिशत थे और मुसलमान लगभग 20 प्रतिशत तथा ईसाई 1 प्रतिशत से भी कम थे।

तब यह कहना कि स्वामी दयानन्द न होते तो ७५ प्रतिशत हिन्दू मुसलमान या ईसाई बन गए होते, यज्ञोपवीत, शिखा, तिलक कुछ न रहता - यह कितनी निराधार एवं मूर्खतापूर्ण बात है?

अन्धभक्ति और मानसिक गुलामी सभी सीमाओं का अतिक्रमण कर डालती है। अपने आराध्य स्वामी दयानन्द को सर्वोच्च दिखाने के लिए मधुलिका जी मूर्खता की सभी सीमाओं को लाँघ जाना चाहती हैं।

इनके अनुसार - स्वामी दयानन्द न होते तो पूरा एक उपमहाद्वीप अनिवार्यतः किसी दूसरे धर्म में बदल जाता?

क्या स्वामी दयानन्द ने स्वतन्त्रता संग्राम में किसी भी तरह भाग लिया था? इसका उत्तर है - “नहीं”। किसी प्रामाणिक इतिहासकार की पुस्तक में इनका नाम तक नहीं मिलता है।

स्वामी दयानन्द का मुख्य कार्य केवल हिन्दू धर्म का प्रमुखता से विरोध करना व कुछ मुसलमान व ईसाई पादरियों से भी दार्शनिक चर्चाएँ करना था, बस इतना भर। स्वतन्त्रता के संघर्ष में उन्होंने किसी भी तरह से भाग नहीं लिया था।

बल्कि स्वामी दयानन्द तो जगह-जगह अंग्रेजी राज्य की प्रशंसा ही किया करते थे, जैसा कि उनकी जीवनी में लिखा है - 

“अनेक अंग्रेज राजकर्मचारी स्वामी जी से मिलने और व्याख्यान सुनने आया करते थे और उनकी प्रशंसा करते थे। स्वामी दयानन्द अंग्रेजी राज्य की बहुत प्रशंसा किया करते थे, इसी कारण बहुत से लोग उन्हें अंग्रेजों का गुप्तचर कहा करते थे।” (स्वामी दयानन्द जीवन चरित - पृष्ठ संख्या २९६)

यह तथ्य स्वामी जी की जीवनी में लिखा हुआ है। वे अंग्रेज सरकार की प्रशंसा किया करते थे, तथा उनकी सभाओं में अंग्रेजों का बड़ा आना-जाना रहा करता था, इसलिए लोग उन्हें अंग्रेजी जासूस तक समझा करते थे।

पंडित लेखराम कृत स्वामी दयानन्द की जीवनी का यह अंश पढ़िए - 

“एक यूरोपियन संवाददाता ने लिखा है - ‘इस व्यक्ति (स्वामी दयानन्द) का यह विचार कदापि नहीं कि सरकार के विरुद्ध किसी प्रकार का कोई आन्दोलन खड़ा करे; प्रत्युत उसने अपनी सभाओं में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ब्रिटिश सरकार का ही शासन है, जिसने मजहबी विवाद में कभी हस्तक्षेप नहीं किया, अपितु पूर्ण और अद्भुत स्वतन्त्रता दी।’” (लेखराम कृत जीवन चरित, पृष्ठ १७७)

स्वामी दयानन्द कहा करते थे कि भारत का बहुत-सा धन विलायत जाता है, परन्तु यह बन्दूक की गोली के समान कार्य करेगा, क्योंकि जितना धन जाएगा, अंग्रेज उतना ही आलसी और भोगी होकर आपदग्रस्त होंगे। (दयानन्द जीवनी, पृष्ठ २९६)

सोचिए, जिस समय अंग्रेज भारत को लूट-लूट कर धन ले जा रहे थे, स्वामी दयानन्द इसके लाभ गिना रहे थे।

अर्थात् स्वामी दयानन्द ने कभी अंग्रेज सरकार का विरोध नहीं किया, अंग्रेज सरकार के विरुद्ध कभी कोई भाषण नहीं दिया।

स्वामी दयानन्द ने इतनी पुस्तकें लिखी हैं - क्या अंग्रेजों के विरुद्ध अथवा स्वतन्त्रता हेतु भारतीयों को प्रेरित करते हुए क्या एक भी लेख उनके द्वारा लिखा गया है? इसका उत्तर है - “नहीं”।

बाद में आर्यसमाजियों ने स्वामी दयानन्द को स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रवर्तक दिखाने के लिए उनकी ओर से कहीं-कहीं कुछ पंक्तियाँ झूठ लिख दीं। झूठी कहानियाँ बनाई हैं। 

जबकि वास्तविकता यह है कि स्वामी दयानन्द ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध कभी किसी पत्र या पत्रिका में कोई लेख नहीं लिखा, कोई भाषण नहीं दिया। बल्कि इसके उलट वे अंग्रेज शासन की प्रशंसा अवश्य किया करते थे।

बल्कि अंग्रेज सरकार से “नियोग” का कानून बनाने के लिए निवेदन किया करते थे। उस पत्र को मैंने एक-दो महीने पहले दिखाया था, उसमें स्वामी दयानन्द की भाषा आप देख सकते हैं कि किस प्रकार वे अंग्रेजों की प्रशंसा में उनकी जी-हुजूरी करते हुए लहालोट हुए जा रहे थे।

तब मधुलिका जी का कहना कि दयानन्द न होते तो हमें स्वतन्त्रता न मिलती, बल्कि हिन्दुओं का अस्तित्व ही खत्म हो जाता - यह निरी पागलपन की बात है।

जब स्वामी दयानन्द का जन्म भी नहीं हुआ था, उससे पहले हम हिन्दुओं ने अपनी शिखाएँ नहीं कटवाईं, गर्दनें कटवा लीं... यज्ञोपवीत उतारने के स्थान पर हम हिन्दुओं ने अपने प्राणों को छोड़ना उचित समझा था। दयानन्द के जन्म से पहले इस देश में अपनी भूमि, अपने धर्म एवं मन्दिरों की रक्षा के लिए लाखों वीर हिन्दुओं ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे।

आर्यसमाजी मजाक उड़ाते हैं कि जब सोमनाथ तोड़ा गया तब देवता क्यों न आए? हिन्दू कहाँ थे? इन दुष्टों ने इतिहास ही नहीं पढ़ा है। अकेले सोमनाथ मन्दिर को बचाने के लिए हजारों क्षत्रिय, महमूद की पचास हजार की सेना से भिड़ गए थे। स्पष्ट मृत्यु को निश्चित जानकर ये क्षत्रिय अपने महलों की औरतों से कहकर जाते थे कि हम मरने जा रहे हैं, तुम भी अपने मरने की तैयारी कर लो।

केवल इस एक मन्दिर की रक्षा के लिए पचासों हजार हिन्दुओं ने, जिनमें अधिकतर क्षत्रिय थे, लड़कर अपने प्राण दिए।

वे अपने धर्म और मन्दिरों की रक्षा के लिए लड़कर मरते थे और उनकी महिलाएँ आग में कूदकर।

सोमनाथ मन्दिर की पुण्य दीवारों का स्पर्श कर-कर के हिन्दू युद्ध के मैदान की ओर दौड़ पड़ते थे। केसरिया बाना सजाकर “हर-हर महादेव” का घोष करते हुए क्षत्रिय यवनों पर टूट पड़ते थे। एक-एक राजपूत दस-दस यवनों को दोज़ख भेज रहा था। गोपा-बापा जैसे योद्धा बन्धु-बान्धवों सहित अपने पूरे कुल सहित बलिदान हो गए। इस मन्दिर की रक्षा के लिए, अपने धर्म के स्वाभिमान के लिए, गौरव के लिए। इधर इनके मरते ही, दुर्ग पर वीर राजपूत वीरांगनाएँ सुहागिन का वेश सजाकर और मंगल गीत गाती हुई, हँसते-हँसते जलती चिता पर चढ़कर अपना बलिदान देती थीं।

मधुलिका जी को यह कहते हुए जरा भी शर्म-लिहाज न आई कि इस देश के लिए सबसे अधिक बलिदान आर्यसमाजियों ने दिए हैं?

ये स्पष्ट बलिदान हुए लाखों हिन्दुओं का, योद्धाओं का, इन वीरांगनाओं का अपमान है या नहीं?

इनका दयानन्द, सत्यार्थ प्रकाश में लिख गया कि सोमनाथ मन्दिर जब तोड़ा जा रहा था तब हिन्दू केवल प्रार्थना कर रहे थे, आक्रमण का प्रतिरोध नहीं किया… और इस झूठे इतिहास को इन मूर्ख कुलकलंकियों ने मान लिया।

और आज के समय ये दयानन्दी चेले इसी बात को जगह-जगह दोहराते हैं।

इन मूर्खों को वास्तविक इतिहास पढ़ना चाहिए… एक धर्मस्थल की रक्षा के लिए ऐसा भीषण युद्ध और प्रतिकार पूरे विश्व में कहीं नहीं हुआ होगा। कई दिन तक भीषण मारकाट होती रही थी। क्या योद्धा, क्या आम हिन्दू - लगभग 60 हजार हिन्दुओं ने इस मन्दिर के लिए लड़कर अपनी जान दी थी।

और अन्त में जब दुर्दान्त महमूद न रुक सका, तो पुजारी शिवलिंग को छोड़कर न भागे… मन्दिर में ही उन्होंने प्राण त्यागे। इसके बाद भी लगातार संघर्ष होता रहा था। महमूद को जान बचाकर भागना भारी पड़ गया था। लेकिन क्या करें, हम ऐसे दुर्दान्त न थे। युद्ध में विजय और पराजय हुआ करती हैं। हमारी पराजय के भी अनेक कारण थे। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या हम लड़े न थे? क्या हम मरे न थे?

हमारे पूर्वजो द्वारा अपने धर्म और मंदिरो के लिए दिये गए ऐसे बलिदानो को आर्यसमाजी 'दुकानदारी' बताते हैं। 

महाराणा प्रताप शिवजी के उपासक थे - ये आर्यसमाजी थे क्या? शिवाजी महाराज माँ भवानी के उपासक थे -ये आर्यसमाजी थे क्या? छत्रसाल कृष्ण भक्त थे - ये आर्यसमाजी थे क्या? दुर्गादास, हेमू आदि - इन सबके नेतृत्व में धर्म और राष्ट्र के लिए लड़ते हुए मरे लाखों हिन्दू - क्या आर्यसमाजी थे?

हल्दीघाटी, चित्तौड़, दक्कन आदि सहित कैसे-कैसे युद्ध हुए हैं? आर्यसमाज 150 वर्ष पहले पैदा हुई संस्था - इसने कौन-सा युद्ध लड़ा है? 

क्या ऐसी एक भी घटना हुई थी कि किसी आर्यसमाजी को धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित किया गया हो? इसका उत्तर है - “नहीं”।

वीर हकीकत राय 12 वर्ष का एक नन्हा-सा बालक था। उस पर आरोप लगा कि उसने इस्लाम का अपमान किया है। काज़ी (इस्लामिक न्यायाधिकारी) के पास यह मामला गया।

हकीकत राय से कहा गया कि दो विकल्प हैं तुम्हारे पास - या तो इस्लाम स्वीकार कर लो, तो बच जाओगे, अन्यथा मृत्युदण्ड दिया जाएगा।

हकीकत राय ने स्पष्ट मना कर दिया।

हकीकत की माँ रोती हुई बोली - “बेटा, बन जा मुसलमान, कम से कम जीवित तो रहेगा, दूर से ही तुझे देखकर मेरी ममता को शीतलता मिलती रहेगी।”

तब हकीकत राय, जो माँ दुर्गा का भक्त था, बोला - “माँ, अपने धर्म को छोड़कर मुसलमान बन जाना क्या यह मृत्यु से कम है? मेरे लिए तो असंख्यों मृत्युओं से भी यह बढ़कर है। राम नाम को छोड़कर कैसे कलमा वाचूँगा? मन्दिर को भूलकर कैसे मस्जिद जा पाऊँगा?”

उस ११-१२ साल के हिन्दू बच्चे ने जान की भीख नहीं माँगी, इस्लाम स्वीकार नहीं किया, सीना चौड़ा करके मरना स्वीकार किया। और मुसलमानों ने उस पर पत्थर बरसाए और अन्ततः गर्दन काट दी। 

क्या दुकानदारी थी इसमें? क्या ये फुसफुसिया जीव था? 

और ऐसे एक-दो किस्से नहीं हैं - हजारो घटनाएँ हैं जब हमारे बच्चों और औरतों तक ने धर्म नहीं छोड़ा, मरना स्वीकार किया। क्या ये आर्यसमाजी थे? क्या इन्हें किसी दयानन्द ने प्रेरणा दी थी?

हिन्दुओं ने बड़े से बड़े भीषण समय में, जब धर्म न बदलने पर शरीर में कीलें ठोंकी जाती थीं, आरे से चीरा जाता था, हमने सबसे लड़कर इस धर्म को बचाए रखा है। दयानन्द स्वामी को क्या किसी अंग्रेज का एक कोड़ा भी पड़ा था? कोई छड़ी खाई थी कभी अंग्रेज से? कहीं कैद किया गया हो? मतलब कुछ भी नहीं। हाँ, अंग्रेजों से लाभ अवश्य स्वामी दयानन्द को खूब मिला है।

हमने इस्लामिक असहिष्णुता का, इस्लामिक घृणा का, भीषण रक्तपात और अमानुषिक अत्याचारों का समय भी देखा है। हमारे मस्तक काटकर लाल किले की दीवारों पर टाँगे गए, हमें खौलते तेल में डालकर जलाया गया और चमड़ी खींच-खींचकर खौलते हुए तेल से हमारे घावों को सींचा गया… जिस भी तरह से अधिकाधिक तड़पाया जा सकता है, उन्होंने वह किया… हम लड़े और मरना स्वीकार किया, धर्म नहीं छोड़ा।

और आज ये झूठे लेख लिख-लिखकर कहते हैं कि दयानन्द न होते तो देश न होता, धर्म न होता… इनसे बड़ा झूठा, मक्कार कोई हो सकता है क्या? ये अपनी दो पंक्तियों से इस देश में धर्म और देश के लिए बलिदान हुए लाखों हिन्दुओं का अपमान कर देते हैं। इन मूर्खों का इतिहास दयानन्द द्वारा आर्यसमाज की स्थापना के समय से ही शुरू होता है।

जाकर पाइक विद्रोह, सन्थाल विद्रोह, भील आन्दोलन, मराठा युद्ध, राजपूत प्रतिरोध पढ़ो। भारत के हर कोने में हजारों लोगों ने बिना किसी एक संस्था के लड़कर बलिदान दिया है। ‘सन्यासी विद्रोह’ को जाकर पढ़ो, जो संघर्ष चालीस वर्षों तक चलता रहा था। सन्यासी साधु आदि लड़-लड़कर मरते रहे थे। कितना बताएँ तुम्हें, क्या-क्या बताएँ?

हिन्दू समाज, हिन्दू धर्म एवं इस देश की रक्षा किसी एक व्यक्ति, एक गुरु, या एक संस्था की देन नहीं है। यह हजारों-लाखों वर्षों से चले आ रहे सामूहिक संघर्ष, त्याग, आस्था और परम्परा का परिणाम है। सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर महाभारत काल तक, फिर गुप्तकाल, मध्यकाल तक हम बिना किसी संस्था या एक व्यक्ति के सभी आन्तरिक व बाहरी चुनौतियों से लड़े हैं। 

यह असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों, साधकों, स्त्रियों और सामान्य जन के निरन्तर संघर्ष, त्याग और आस्था का परिणाम है। इसे बचाने का श्रेय किसी एक को देना, उन सभी अनगिनत बलिदानों का अपमान है।

“यह धर्म किसी एक व्यक्ति या संगठन से नहीं बना, इसलिए किसी एक व्यक्ति या संगठन के बिना मिट भी नहीं सकता।”

तो यहाँ तक आपने देख लिया कि स्वामी दयानन्द का देश और धर्म बचाने में कितना योगदान था। अपने जीवन काल में उन्होंने एक लेख तक अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं लिखा। न ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी स्वतन्त्रता संघर्ष में सम्मिलित हुए। इतिहास में कोई प्रमाण नहीं हैं।

अब आते हैं १९४७ के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर ....................... क्रमशः।
✍️ शचींद्र 
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