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Friday, 24 April 2026

आर्य विद्वान बुद्धदेव का जूता/लात दयानंद जी के चित्र पर

पंडित माधवाचार्य, सनातन धर्म के एक अद्भुत विद्वान थे, प्रकाण्ड पंडित थे। यह 'लोकालोक' नाम से मासिक पत्र निकालकर सनातन धर्म का प्रचार करते थे तथा स्वामी दयानन्द के अवैदिक, वेद-विरोधी सिद्धांतों का खंडन किया करते थे। आर्यसमाज के तत्कालीन विद्वानों से इन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए, और प्रत्येक शास्त्रार्थ में यह विजयी हुए। एक प्रसिद्ध शास्त्रार्थ सन्  १९३६ में इन्होंने किया था, जिसने आर्यसमाजियों में हाहाकार मचा दिया था। यह वह शास्त्रार्थ था, जिसमें इन्होंने न केवल आर्यसमाजी विद्वान को तर्कों व प्रमाणों से निरुत्तर कर दिया, बल्कि उसे ऐसी स्थिति में ला दिया कि उसने न चाहते हुए भी स्वामी दयानन्द के चित्र पर लात दे मारी।

यह शास्त्रार्थ हैदराबाद में हुआ था। आर्यसमाज की ओर से आए थे गुरुकुल काँगड़ी से निकले, आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान व उपदेशक पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार।

4 दिन तक यह शास्त्रार्थ विभिन्न विषयो पर चलता रहा था। चौथे दिन मूर्ति-पूजा के विषय पर शास्त्रार्थ चल रहा था।

पंडित माधवाचार्य, बुद्धदेव को पग-पग पर पराजित कर रहे थे। अंत में पंडित माधवाचार्य ने स्वामी दयानन्द की पुस्तक ‘संस्कार विधि’ से ही आर्यसमाजियों की जड़-पूजा के प्रमाण देने प्रारम्भ कर दिए।

पंडित माधवाचार्य ने कहा -  "हम सनातन धर्मी तो श्रीराम-कृष्ण आदि की प्रतिमाओं की प्रार्थना करके अपना चरित्र ऊँचा बनाना चाहते हैं, तो आप जड़-उपासना का तूफान खड़ा कर देते हैं। किन्तु स्वयं देखिए, जूता, शीशा, छड़ी आदि की पूजा करते हैं - यह क्या माजरा है?"

बुद्धदेव विद्यालंकार ने कहा- "यह आप व्यर्थ दोष लगा रहे हैं आर्यसमाज पर, हम किसी जड़ वस्तु की पूजा नहीं करते हैं।"

तब पंडित माधवाचार्य ने झट से ‘संस्कार विधि’ पुस्तक इनके सामने रख दी और कहा - "बुद्धदेव जी, झूठ न कहिए। यह लीजिए, मेरे पास स्वामी जी की ‘संस्कार विधि’ है, और आपके गुरुकुल काँगड़ी से ही निकले आर्यसमाजी विद्वान रामगोपाल विद्यालंकार का भाष्य भी है। इसमें स्पष्ट है कि आप लोग छुरे, नाई के उस्तरे, छाता, छड़ी और जूते को संबोधित करके प्रार्थना करते हैं।"

आर्यसमाजी बुद्धदेव का चेहरा फक पड़ गया। वे निरुत्तर हो गए। उपस्थित हिन्दू जनता पंडित माधवाचार्य जी का जयघोष करने लगी।

आर्यसमाजी बुद्धदेव इसका कोई उत्तर न सूझता देखकर बोले - "पंडित जी, व्यर्थ ही हम पर जड़-उपासना का दोष लगाते हैं। वास्तव में जड़ के उपासक हम हैं या सनातन धर्मी- इसका निर्णय अभी हो जाएगा। एक जूता पकड़कर मैं खड़ा होता हूँ और एक जूता पकड़कर माधवाचार्य जी खड़े होंगे। और जो-जो हमारी पूज्यनीय चीज बताई जा रही है, मैं उन पर सौ-सौ जूते मारता हूँ। दूसरी तरफ पंडित जी भी ऐसा करके दिखाएँ। बस इससे मामला साफ हो जाएगा।"

यहाँ बुद्धदेव पंडित माधवाचार्य जी की बात का खंडन करने में असमर्थ रहे, तो यह चतुराई दिखाई।

पंडित माधवाचार्य बोले -  "बड़े अफसोस की बात है कि महाशय जी ने वेद-प्रमाण और तर्कों को त्यागकर व्यर्थ ही जूते-पैजार की अशिष्ट बातें आरंभ कर दी हैं। हम तो किसी भी मूर्ति की शान में इस प्रकार के शब्द सुनना गवारा नहीं करते। चूँकि शास्त्रार्थ चालू है, इसलिए हम इन शब्दों को नजरअंदाज करते हैं। किन्तु फिर भी बुद्धदेव अपनी इच्छा पूरी करना चाहते हैं, तो स्वामी दयानन्द की तस्वीर पर जूता मारकर दिखाएँ, क्योंकि इनके अनुसार यह भी जड़ ही है - एक रंग से रंगा कागज का जड़ टुकड़ा है। और बुद्धदेव ऐसा करें, तो मैं इनाम भी घोषित करना चाहता हूँ - आपको प्रति जूता एक रुपया इनाम दिया जाएगा। पाँच सौ रुपये की थैली यहाँ है, अधिक के लिए बैंक का चैक दिया जाएगा।"

आर्यसमाजी बुद्धदेव ने जो चतुराई दिखाई थी, वह उल्टे गले पड़ गई। जनता में शांति छा गई। बुद्धदेव घबरा उठे कि, एक तो वैसे ही यहाँ पग-पग पर आर्यसमाज की पराजय हुई है, अब मैं स्वामी दयानन्द के चित्र पर जूता न मारूँ तो सिद्ध हो जाएगा कि जड़ मूर्ति में हमारी श्रद्धा है।

तब बुद्धदेव ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पुस्तक से स्वामी दयानन्द का चित्र निकालकर मेज पर रखा और बोले -  "लीजिए, यह स्वामी दयानन्द का चित्र है, मैं इसे जूते से मारता हूँ।"

ऐसा कहते हुए बुद्धदेव ने स्वामी दयानन्द के चित्र पर जोरदार लात मारी।

पंडित माधवाचार्य ने मुस्कुराकर कहा - "यद्यपि बुद्धदेव जी ने जूता मारने की शर्त तो पूरी नहीं की है, केवल ठोकर मारी है। तब भी कोई बात नहीं, मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार एक रुपया इनाम देता हूँ।"

बुद्धदेव ने कहा - "मैं एक रुपये पर भी लात मारता हूँ, और अपनी ओर से दस रुपये देता हूँ। यह 11 रुपये पंडित जी संभालें।"

पंडित माधवाचार्य ने कहा - "हमें नहीं चाहिए, ग्यारह का सिलसिला आर्यसमाज को ही मुबारक हो।"

हिन्दू जनता, आर्यसमाजी विद्वान की ऐसी मूर्खता और ऐसी फजीहत देखकर ठहाके मारकर हँस पड़ी, क्योंकि ऐसा मजेदार शास्त्रार्थ पहली बार देखा था, जिसमें आर्यसमाज को तो पराजित किया ही और अंत में आर्यसमाजी विद्वान से ही स्वामी दयानन्द की पिटाई जूते से करवा दी।

इस घटना से देश भर के आर्यसमाज के लोगों में खलबली मच गई। आर्यसमाज के ही एक प्रसिद्ध विद्वान व उपदेशक द्वारा आर्यसमाज के ही प्रवर्तक स्वामी दयानन्द के चित्र की पूजा जूते और लात से किए जाने पर, आर्यसमाजी समझ नहीं पा रहे थे कि इसमें हमने खुद किसी को दे दी है, या हमारी किसी ने बेवकूफ बनाकर ले ली है।

कई महीनों तक आर्यसमाजी समाचार-पत्रों में इस जूते की गूँज उठती रही। आर्यसमाज के विद्वान अपने उपदेशक बुद्धदेव को अधर्मी, पापी आदि कहकर उनकी आलोचना कर रहे थे। बड़ा हंगामा खड़ा हुआ। आर्यसमाज की सभाएँ होने लगीं, अधिवेशन होने लगे, जाँच-समितियाँ बैठा दी गईं।

आर्यसमाज के पंडित नरदेव ने इस कार्य की बड़ी आलोचना की तथा कहा -   
"बुद्धदेव को इसका तीव्र प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसे तो कल को हमारे लड़के यह सिद्ध करने के लिए कि हम मूर्तिपूजक नहीं हैं, अपने बुजुर्गों के चित्रों पर जूते लगवाना आरंभ करेंगे और संसार हम आर्यों की मूर्खता की खिल्ली उड़ाएगा।"

आर्यसमाज के पत्रों में बुद्धदेव के विरुद्ध लेख प्रकाशित किए जाने लगे। बुद्धदेव के विरुद्ध आर्यसमाज ने फतवे पर फतवे जारी किए। उन्हें मृत्यु-दंड देने का आवाहन आर्यसमाजी ही करने लगे। पंडित बुद्धदेव के पिता रो-रोकर इन सभाओं को पत्र लिखते थे कि -  "मैंने तो स्वामी दयानन्द के प्रचार के लिए ही अपने लड़के को आपके गुरुकुल में भेजा था, अब इस बुढ़ापे में मेरे लड़के को कत्ल मत कराओ।"

आर्यसमाज के एक मंत्री श्रीरामचन्द्र जी खन्ना ने लिखा --"यह घटना पढ़कर मेरा तो एक-एक रोंगटा काँप उठा। दफ्तर में काम कर रहा था, कलम हाथ से गिर पड़ा और पाँच मिनट तक मुझसे कोई काम न हो सका। ऐसा दुष्कर्म किसी और ने किया होता तो क्या आर्यसमाज तिलमिला न उठता? किन्तु अफसोस तो यह है कि ऐसा गहरा जख्म लगाने वाला और कोई नहीं, बल्कि हमारा ही अपना एक उच्चकोटि का विद्वान है। पंडित बुद्धदेव जी को याद रखना चाहिए - आर्यसमाज उन्हें इस कुकर्म के लिए कभी क्षमा नहीं कर सकता।"

दरअसल आर्यसमाज इस घटना के कारण बुरी स्थिति में आ गया था। अब जहाँ भी कोई आर्यसमाजी मूर्ति-पूजा का विरोध करता, तो झट से हिन्दू कह दिया करते -- "अगर मूर्ति में तुम्हारी श्रद्धा नहीं है, तो जरा स्वामी दयानन्द के चित्र पर बुद्धदेव की तरह लात जमाकर दिखाओ।"

अब आर्यसमाजी दयानन्द के चित्र पर लात बरसाएँ तो भी भद्द पिटे और न जमाएँ तो भी ताली पिटे।

तो इस प्रकार स्वामी दयानन्द को सबसे पहले जूते का स्वाद, एक आर्यसमाजी विद्वान व उपदेशक द्वारा ही चखाया गया था।

यहाँ सोचने वाली बात यह है कि - सब आर्यसमाजियों के अनुसार स्वामी दयानन्द के चित्र पर जूता-लात बरसाना उनका अपमान होता है, तो फिर राम-कृष्ण आदि की मूर्तियों पर हम पुष्प आदि अर्पित करते हैं, वह उनका सम्मान क्यों न होगा?

साभार शचींद्र शर्मा 
संदर्भ - https://www.facebook.com/share/1BMknjKveL/

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