बिना किसी से पूछे, बिना किसी को दिखाए
वही आज सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- पर्याप्त है।
13 मई 2026।
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने कहा
'इसीलिए हिंदू धर्म को
जीवन जीने का तरीका कहा जाता है।
हिंदू बने रहने के लिए
मंदिर जाना या कोई अनुष्ठान करना
जरूरी नहीं।'
और मुख्य न्यायाधीश ने जोड़ा
'अगर कोई अपनी कुटिया में
एक दीया जलाता है
वह भी अपना धर्म साबित करने के लिए
पर्याप्त है।'
मैंने यह समाचार आज की पोस्ट के लिए चुना
क्योंकि जजों के वाक्य में
हजारों साल का दर्शन था।
मैं पत्रकार हूं।
मैंने यहां बंगाल में हाल में विधानसभा चुनाव देखा है।
अब तक के पत्रकारिता करियर में धर्म के नाम पर
बहुत कुछ देखा।
कभी मंदिर बनाम मस्जिद।
कभी उपासना पद्धति पर विवाद।
कभी किसी को धर्म का ठेकेदार बनते देखा।
और उन्हीं दिनों मैंने यह भी देखा
एक बुजुर्ग किसान
जो कभी मंदिर नहीं गया।
पर खेत में बीज डालने से पहले
जमीन को माथा टेकता था।
एक मां
जो किसी तीर्थ पर नहीं गई।
पर हर रात सोने से पहले
अपने बच्चों के माथे पर हाथ फेरकर
हनुमान चालीसा पढ़ती थी।
क्या वो हिंदू नहीं थे?
हिंदू धर्म की जड़ें
किसी एक पुस्तक में नहीं।
किसी एक 'महापुरुष' या देवदूत में नहीं।
किसी एक अनुष्ठान में नहीं है।
ऋ ग्वेद कहता है
'एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति।'
सत्य एक है
ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
यह वो उदघोष है
जो हजारों साल पुराना है।
और आज भी
उतना ही सच।
उपनिषद पूछते हैं
'अहं ब्रह्मास्मि।'
मैं ब्रह्म हूं।
यानी
परमात्मा को बाहर खोजने की जरूरत नहीं।
वो तुम्हारे भीतर है।
तो फिर मंदिर क्यों?
मंदिर एक माध्यम है।
एकाग्रता का।
समुदाय का।
स्मरण का।
माध्यम
ईश्वर नहीं होता।
भगवद्गीता अर्जुन से नहीं
हम सबसे बात करती है।
'यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं
श्रीमद् ऊर्जितमेव वा।
तत् तदेवावगच्छ त्वं
मम तेजोंऽशसम्भवम्।।'
(अध्याय 10.41)
जो भी श्रेष्ठ है
जो भी सुंदर है
जो भी शक्तिशाली है
वह सब मेरी ही अंशमात्र अभिव्यक्ति है।
यानी
नदी में भी ईश्वर।
पहाड़ में भी।
बच्चे की हंसी में भी।
बीमार की सेवा में भी।
और
उस छोटे से दीये की लौ में भी।
विज्ञान और अध्यात्म
इस बिंदु पर मिलते हैं।
न्यूरोसाइंस कहता है
जब कोई इंसान
नियमित रूप से
कोई भी आध्यात्मिक क्रिया करता है
ध्यान हो, दीया जलाना हो, प्रार्थना हो
तो मस्तिष्क में
डिफॉल्ट मोड नेटवर्क सक्रिय होता है।
तनाव हार्मोन कोर्टिसोल कम होता है।
शांति हार्मोन सेरोटोनिन बढ़ता है।
यानी
वो दीया जो दादी जलाती थीं
सिर्फ आस्था नहीं था।
वो उनका मानसिक स्वास्थ्य भी था।
और सबरीमाला?
यह मामला सिर्फ मंदिर का नहीं।
यह सवाल है
कि परंपरा और समानता
कहां मिलती हैं?
सबरीमाला का तर्क है
भगवान अयप्पा एक नित्य ब्रह्मचारी हैं।
और उनकी उपासना की एक विशेष पद्धति है।
41 दिन का व्रत।
यह परंपरा उनकी पहचान से जुड़ी है।
दूसरी तरफ
वो स्त्रियां
जो कहती हैं
'मेरी आस्था भी उतनी ही गहरी है।
मुझे क्यों रोका जाए?'
दोनों तर्क मानवीय हैं।
दोनों भावनाएं असली हैं।
और यही
नौ न्यायाधीशों की पीठ
तय करने की कोशिश कर रही है।
पर आज की सबसे बड़ी बात
वो एक वाक्य है।
'हिंदू बने रहने के लिए
मंदिर जाना जरूरी नहीं।'
यह वाक्य
किसी विदेशी ने नहीं कहा।
किसी नास्तिक ने नहीं कहा।
यह देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा।
और इस एक वाक्य में
हजारों साल की उस परंपरा की
पुष्टि है
जो हमेशा कहती रही
'अनेकता में एकता।'
मुझे अपने छोटे बेटे की वह बात याद आई।
पिछले हफ्ते उसने पूछा था
'पापा भगवान कहां रहते हैं?'
मैं रुक गया।
फिर मैंने कहा
'जहां तुम हो वहीं।'
वो थोड़ी देर सोचता रहा।
फिर बोला
'तो आप मंदिर क्यों जाते हैं?'
मैंने कहा
'जैसे स्कूल जाते हो इसलिए नहीं कि
घर पर पढ़ नहीं सकते।
बल्कि इसलिए कि वहां और लोग भी होते हैं।
साथ होता है।'
वो मुस्कुराया।
शायद
यही हिंदू धर्म का सार है।
और अब
एक सवाल आपसे।
क्या आपके घर में कोई एक ऐसी परंपरा है
जिसका कोई नाम नहीं
कोई शास्त्र नहीं पर जो हर रोज होती है?
मां का सुबह उठकर तुलसी को जल देना।
दादा का खाने से पहले एक निवाला अलग रखना।
बच्चे के माथे पर रात को काला टीका।
यह सब हिंदू धर्म है।
बिना किसी प्रमाण पत्र के।
बिना किसी अनुमति के।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था
'प्रत्येक आत्मा
अव्यक्त ब्रह्म है।'
हर इंसान के भीतर
ईश्वर का एक अंश है।
तो फिर जब भी तुम
किसी की मदद करते हो
किसी को माफ करते हो
किसी के लिए दुआ करते हो
वो भी पूजा है।
आप भी बताएं
आपके घर में वो एक परंपरा क्या है?
जो किसी किताब में नहीं पर आपके दिल में है?
उसे लिखें। क्योंकि वही तुम्हारा धर्म है।
वही तुम्हारी पहचान है। वही तुम्हारा दीया है।
🪔🙏
(स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड, फ्री प्रेस जर्नल, डेक्कन क्रॉनिकल 13 मई 2026 | सर्वोच्च न्यायालय संविधान पीठ | सत्यापित)
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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