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Monday, 12 October 2026

दुर्गा शब्द की आघ्यात्मिक व्याख्या और नवार्ण मंत्र

             दुर्गा शब्द की आघ्यात्मिक व्याख्या

दुर्गा शब्द की आघ्यात्मिक व्याख्या में कई पुस्तकें लिखी गई हैं। इस नाम का इतना माहात्म्य है कि स्वयं नारायण, कृष्ण, भैरव आदि ने दुर्गा कवच की रचना की है।

द, र्, उ, ग, आ ये पाँचों वर्ण अग्नि तत्त्व के हैं। सभी वर्णों की भिन्न भिन्न व्याख्या है जिसे किसी अन्य दिन जानने का प्रयत्न करेंगे । 
दुर्गा नाम की सबसे सरल व्याख्या यही है कि-
                              दुर्+गा 
अर्थात् - दुर् से दुःख, दुर्गति, दुरति, दोष, दुराचार, दुराशा आदि से गा यानि गमन कराती हैं, पार करा देती हैं।

दुर्गा ब्रह्म विद्या हैं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन मेरी महामाया मुझे आच्छादित करके रखती है जिससे भक्त मेरा मूल स्वरूप नहीं देख पाते। जो ब्रह्म को भी आच्छादित कर ले वो महामाया दुर्गा हैं। किसी वस्तु को आच्छादित करने के लिये दूसरी वस्तु को उससे बड़ा होना चाहिए। कुरुक्षेत्र में युद्ध आरम्भ होने से पहले ही भगवान कृष्ण अर्जुन से दुर्गा की स्तुति करवाते हैं और बलि प्रदान करवाते हैं।

दुर्गा महात्म्य में जितना भी लिखा जायेगा अल्प ही होगा। दुर्गा नाम ही अपने में द्वाक्षरीय मंत्र है जिसे जपने से सारे कष्ट दूर होते हैं। निर्गुण स्वरूप के लिये जो महत्त्व गायत्री मंत्र का है वही महत्त्व सगुण स्वरूप के लिये नवार्ण मंत्र का है ।
  नवार्ण मंत्र का सही और प्रामाणिक लिखित रुप हैं - 
             "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"     
इस महामंत्र का शुद्ध उच्चारण करने के लिए इसके प्रत्येक बीज मंत्र और अक्षर को सही तरीके से बोलना आवश्यक है। 
अक्षरों के अनुसार शुद्ध उच्चारण की विधि इस प्रकार है:

* ॐ — इसका उच्चारण 'ओम्' (Om) करें।
* ऐं — इसे 'ऐङ्' या 'ऐम्' की तरह हल्के अनुनासिक (नाक से निकलने वाली ध्वनि) के साथ बोलें। ध्यान रखें कि यह 'ऐन' या 'एंग' नहीं है, बल्कि 'ऐ' के ऊपर बिंदु की शुद्ध ध्वनि है। 
* ह्रीं — इसका उच्चारण 'ह्रीङ्' या 'ह्रीम्' करें। इसमें 'ह', 'र' और 'ई' की संयुक्त ध्वनि के साथ अंत में अनुनासिक स्वर आता है। 
* क्लीं — इसे 'क्लीङ्' या 'क्लीम्' बोलें। इसे 'कलीम' (क-ली-म) अलग करके न बोलें, बल्कि आधा 'क' और 'लीं' को एक साथ मिलाकर बोलें। 
* चामुण्डायै — इसका शुद्ध रूप 'चा-मुन्-डायै' है। कई लोग इसे जल्दबाजी में 'चामुंडाय' बोल देते हैं, जो कि गलत है। अंत में 'यै' (ऐ की मात्रा) का स्पष्ट उच्चारण होना चाहिए। 
* विच्चे — इसका उच्चारण 'विच्-चे' करें। 

उच्चारण के दौरान रखें यह विशेष ध्यान:
जब आप मंत्र का जाप तीव्रता (तेज गति) से करते हैं, तो बीज मंत्रों (ऐं ह्रीं क्लीं) के अंत में आने वाला अनुनासिक स्वाभाविक रूप से 'ङ्' (ng की हल्की ध्वनि) जैसा सुनाई देता है। यदि आप रुक-रुक कर आराम से जाप कर रहे हैं, तो मकार (म) जैसी शुद्ध ध्वनि रख सकते हैं। तंत्र साधना में मंत्रों की अक्षरीय शुद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। 

     जपेत् दुर्गा, स्मरेत् दुर्गा, यजेत् दुर्गा भवनाशिनी।

              🙏🏻जय जय श्री दुर्गा भवानी🙏🏻
           साभार - ✍️ प्रवीण चावला, बीकानेर 
      ( सोमवार अश्विन शुक्ल २ विक्रम संवत् २०८३ )
                   12 अक्टूबर 2026 ईस्वी 
                          वयं राष्ट्रे जागृयाम 

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