भारत की लगभग सभी नदियाँ स्त्रैण हैं। उनके नाम स्त्रीवाचक हैं- गंगा, यमुना, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, सिन्धु, तीस्ता, गोमती, नारायणी। किन्तु कुछ नद पुरुषवाचक भी हैं। अपने आकार-प्रकार के अनुसार वे महानद भी कहलाए हैं। जैसे ब्रह्मपुत्र, शोणभद्र, शिवनाथ, दामोदर। इसी तरह अजय, रूपनारायण, लोहित आदि भी हैं।
नदी का पुरुषवाचक नाम जाने क्यूँ थोड़ा खटकता है!
रोचक यह है कि ये सभी नद-महानद समुद्र के बजाय किसी ना किसी नदी में ही विलीन होते हैं। ब्रह्मपुत्र अपनी यात्रा पूर्ण कर मेघना में, शोणभद्र गंगा में, शिवनाथ महानदी में, दामोदर भागीरथी में जाकर मिल जाता है।
नदी का संगम समुद्र से होता है, नद का नदी से। कोई नद अकेले अपने बूते समुद्र तक चला गया हो, यह भारत में तो देखने को नहीं मिलता। वह नदी में अपने यश को विलीन करके ही बूंद से समुंद बनता है।
समुद्र-संगम की सप्तपदी में पहला क़दम नदी ही आगे बढ़ाती है। नद उसके पीछे-पीछे अनुगामी-सा आता है। नदी नारी है, नद नर। नदी वधू है, नद वर!
भारतीय परम्परा में नदी के प्रति ही स्त्री का यह भाव क्यों जाग्रत हुआ- वृक्ष, अरण्य, पर्वत, समुद्र, मेघ जैसे पुरुषवाचक प्राकृत-तत्त्वों के प्रति क्यों नहीं- यह पृथक से विवेचना का विषय होना चाहिए।
नदी स्त्री है। किन्तु वैसी स्त्री, जिसमें अणिमा और लघिमा नहीं, गरिमा और महिमा है। इसी कारण, नदी माता है, देवी है, पूज्या है, पोषिता है। वह जन्म भी देती है, पोसती भी है, अपने भीतर समा भी लेती है।
इनमें भी नर्मदा सबसे विशिष्ट हैं। वे स्त्री, माता, देवी तो हैं ही- योगिनी भी हैं, वैरागिनी भी हैं, साध्वी हैं, तपस्विनी हैं। शिव की देह से उत्पन्न हुईं। शोणभद्र के विश्वासघात से रूठकर पूर्व दिशा से जो मुँह फेरा तो पश्चिम में सागर-संगम तक फिर किसी से आसक्ति नहीं की। अपने साथ अपनी समस्त सहयोगिनियों-सहचरियों को लेकर समुद्र में वे विलीन हो जाती हैं।
अभी प्रगल्भा, अभी गम्भीरा। कभी किशोरी, कभी प्रौढ़ा। अभी तन्वंगी, अभी सुदीर्घा। कभी अभिमानिनी, कभी अनासक्ता। नर्मदा के कई रूप हैं।
नर्मदा की यात्रा की पूर्णता में नदी और स्त्री का रूपक भी अपनी पूर्णता पा जाता है!
Sushobhit
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