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Thursday, 5 February 2026

बिल्व फल – शिव का प्रतीक, तंत्र का रहस्य - रक्षा कवच

🌿 बिल्व फल – शिव का प्रतीक, तंत्र का रहस्य 🌿

१. आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व शिव से जुड़ाव

शिव पुराण में बिल्व को शिवद्रुम कहा गया है।
बिल्व फल मोक्ष का प्रतीक है – बाहर से कठोर, अंदर से दिव्य अमृत जैसा।
इसे शिवलिंग पर चढ़ाने या पूजा में रखने से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

तंत्र में इसे रक्षा कवच, लक्ष्मी प्राप्ति, शत्रु नाश, और नकारात्मक ऊर्जा हटाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

२. चमत्कारी तांत्रिक प्रयोग एवं उपाय। अनुभव से युक्त। 

⚡ उपाय १: धन-लक्ष्मी प्राप्ति का सबसे शक्तिशाली बिल्व प्रयोग

एक ताजा बिल्व फल लें।
उसे साफ करके लाल कपड़े पर रखकर उसके सामने बैठकर ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र 11 माला जप करें।

फल को लाल कपड़े में लपेटकर अपने तिजोरी/पर्स/धन स्थान में रखें।

हर पूर्णिमा को इसे बदलें और पुराने फल को किसी मंदिर में दान कर दें।

परिणाम: धन की तंगी दूर होती है, व्यापार में वृद्धि, अप्रत्याशित कमाई के योग बनते हैं। (लक्ष्मी प्राप्ति के लिए प्रसिद्ध उपाय)

⚡ उपाय २: शत्रु नाश + रक्षा कवच

बिल्व फल को आधा काटें (बिना बीज निकाले)।
अंदर थोड़ा कुमकुम/चंदन लगाकर ॐ नमः शिवाय 108 बार जप करें।

इसे किसी सुरक्षित स्थान पर रखें या घर के मुख्य द्वार के पास लटकाएँ।

परिणाम: घर-परिवार पर बुरी नजर, टोटका, शत्रु बाधा से रक्षा मिलती है।

⚡ उपाय ३: संकट निवारण + मनोकामना पूर्ति

सोमवार या प्रदोष काल में बिल्व फल को शिवलिंग पर चढ़ाएँ।

चढ़ाने से पहले बिल्वाष्टकम या ॐ त्र्यम्बकं यजामहे मंत्र का जाप करें।

फल चढ़ाने के बाद उसका गूदा प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।

परिणाम: बड़े से बड़े संकट दूर होते हैं, इच्छाएँ पूरी होती हैं।

⚡ उपाय ४: व्यापार/नौकरी में बाधा दूर करने का उपाय

बिल्व फल का गूदा निकालकर सुखा लें → भस्म बना लें।
इस भस्म को थोड़ा चंदन मिलाकर तिलक लगाएँ या घर के मुख्य द्वार पर लगाएँ।

परिणाम: व्यापार में रुकावटें खत्म, नौकरी में प्रमोशन/स्थिरता।

⚡ विशेष ध्यान रखे: बिल्व फल कभी भी टूटा-फूटा न लें। पूर्ण, स्वस्थ और हरा-भरा ही प्रयोग करें।

 श्री सीताराम विजयते 🚩

संपर्क सूत्र। 
पूजा जी 9111610710
संजील जी 7665650133

श्वास रोग अत्यंत कष्टकारी होता है। बहुत सारे लोग इस रोग से पीड़ित हैं और कोई अच्छा उपचार चाहते हैं। ऐसे में हम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि की बात कर रहे हैं।

श्वास रोग अत्यंत कष्टकारी होता है। बहुत सारे लोग इस रोग से पीड़ित हैं और कोई अच्छा उपचार चाहते हैं। ऐसे में हम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि की बात कर रहे हैं, जिसके बारे में आचार्य वाग्भट ने बहुत स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट दिया है। 

"श्वास और कास यानी पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट की बीमारियों में बाकी सारी दवाइयाँ एक तरफ, और ये एक औषधि एक तरफ।"

अगर आपको सांस फूलने की समस्या है, सूखी या बलगम वाली खांसी रहती है, गले में खराश, बार-बार कफ जमा होना, ब्रोंकाइटिस, पुराना टीबी, निमोनिया के बाद कमजोर फेफड़े, या स्मोकिंग की वजह से सांस की दिक्कत है तो,यह औषधि आपके लिए बहुत गुणकारी है।

आचार्य वाग्भट ने अष्टांग हृदय, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3 के श्लोक 172 में कहा है—

“सर्वेषु श्वासकासेषु केवलं विभीतकी”

अर्थात श्वास और कास की सभी बीमारियों में केवल विभीतकी (बहेड़ा) ही पर्याप्त है।
इतना बड़ी ख्याति आयुर्वेद में बहुत कम दवाओं के लिए मिलती है।
यहां जिस औषधि की बात हो रही है, वह है विभीतकी, जिसे आम भाषा में बहेड़ा कहते हैं।
#लाभ
☑️सांस फूलना
☑️सूखी खांसी या कफ वाली खांसी
☑️गले में बार-बार खराश या भारीपन
☑️ब्रोंकाइटिस
☑️स्मोकिंग के बाद सांस की दिक्कत
☑️पुराने टीबी या निमोनिया के बाद कमजोर लंग्स
☑️रात में कफ जम जाना, सुबह गला पूरी तरह भरा हुआ लगना
☑️नाक से ज्यादा पानी गिरना, साइनस की समस्या

सेवन विधि
✅ गुड़ के साथ गोली बनाकर
बहेड़ा पाउडर एक चुटकी
पुराना देसी गुड़ थोड़ा सा
दोनों मिलाकर चना दाने जितनी छोटी गोली बना लें।
दिन में 4–5 बार, खाने के बाद चूसने की तरह लें।

इसे एक बार में निगलना नहीं है, धीरे-धीरे मुंह में घुलने देना है।
क्योंकि श्वास रोग में आयुर्वेद बार-बार अल्प मात्रा में औषधि लेने को कहता है।

✅पाउडर + गर्म पानी
आधा चम्मच बहेड़ा पाउडर
हल्के गुनगुने पानी के साथ
खासकर रात में सोने से पहले

यह तरीका उन लोगों के लिए खास है जिनका गला रात में बंद हो जाता है और सुबह भारी कफ निकलता है।

अब आयुर्वेदिक लॉजिक समझिए 
श्वास रोग की जड़ कहाँ है?
आयुर्वेद के अनुसार श्वास रोग सीधे फेफड़ों से शुरू नहीं होता।
सबसे पहले गड़बड़ी होती है:

आमाशय (पेट) में
अग्नि (डाइजेस्टिव फायर) कमजोर होती है
रस धातु ठीक से नहीं बनती
रस धातु का मल = कफ, जो ज़्यादा बनने लगता है
यही कफ ऊपर जाकर छाती और लंग्स में जमा हो जाता है
यानी अगर पेट ठीक नहीं, तो सांस भी ठीक नहीं।

बहेड़ा के आयुर्वेदिक गुण 
लघु – हल्का, कफ को तोड़ने वाला
रूक्ष – अतिरिक्त चिकनाई हटाता है
उष्ण – गर्म प्रकृति, वात-कफ शमन

विपाक
मधुर विपाक – यानी पाचन के बाद शरीर को संतुलन देता है

दोषों पर प्रभाव
वात को अनुलोमन करता है
कफ को विशेष रूप से कम करता है
पित्त को संतुलित रखता है

धातुओं पर प्रभाव: क्यों फेफड़ों के लिए खास है?
विभीतकी का प्रभाव इन धातुओं पर बताया गया है:

रस धातु
रक्त धातु
मांस धातु
मेद धातु

आयुर्वेद कहता है कि फेफड़ों (फुफ्फुस) की उत्पत्ति रक्त धातु से होती है।
जब रक्त धातु शुद्ध और मजबूत होती है, तो लंग्स भी मजबूत होते हैं।

बहेड़ा:

पाचन सुधारता है
रस और रक्त धातु को शुद्ध करता है
कफ का एक्सेस प्रोडक्शन रोकता है
सीधे नाक से लेकर लंग्स तक काम करता है

किन मरीजों में असर सबसे ज्यादा दिखता है?
जिनके सीने में भारी कफ भरा रहता है

जिनको पीला या सफेद गाढ़ा बलगम निकलता है
जिनकी खांसी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही
जिनको रात में सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होती है
ऐसे मामलों में बहेड़ा को आयुर्वेद “मोर देन हाफ ट्रीटमेंट” मानता है।
इसे श्वास रोग के लिए बहुत उत्तम माना गया है क्योंकि 
यह पाचन की जड़ से इलाज करती है

कफ को सिर्फ दबाती नहीं, बनने से रोकती है
लंग्स, गला, नाक—पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट पर काम करती है
शास्त्रों में इसका स्पष्ट और स्ट्रॉन्ग उल्लेख है

इसीलिए आचार्य वाग्भट ने कहा—
श्वास रोग में अगर एक औषधि चुननी हो, तो विभीतकी पर्याप्त है।
विशेष परिस्थितियों में कुशल वैद्य के परामर्श से ही सेवन करें।

https://www.facebook.com/100050245279982/posts/1506588404359321/?mibextid=rS40aB7S9Ucbxw6v

Wednesday, 4 February 2026

🌹।।गर्भकवचम्।।🌹

🌹।।गर्भकवचम्।।🌹
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शूलेन पाहिन नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्या निःस्वनेन च । मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामेणनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि । मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। २ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः सौम्यानि यानि रुपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् । मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। ३ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः खड्ग-शूल-गदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके । करपल्लव संगीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः । मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। ४ ।। ।।

गर्भऽर्गला।। 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः, ॐ एतत् ते वदनं सौम्यं लोचनत्रय भूषितम् । पातु नः सर्वभूतेभ्यः कात्यायनि नमोस्तुऽते, मः न च्चे वि यै डा मुं चा क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः, ज्वालाकराल मृत्युग्रमशेषासुर सूदनम् । त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोस्तुऽते, मः न च्चे वि यै डा मुं चा क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। २ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः, हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव । मः न च्चे वि यै डा मुं चा क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। ३ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः, असुरास्रग् वसापंकचर्चितस्ते करोज्ज्वलः । शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् , मः न च्चे वि यै डा मुं चा क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। ४ ।। 

।।गर्भशाप विमोचनमुत्कीलनं च।। मूलमन्त्र से विन्यास, ध्यान व मानसोपचार से पूजन करें । 

मूलमन्त्र:– “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे क्लीं ह्रीं ऐं ॐ नमः स्वाहा”। का यथाशक्ति जाप करें। 

समर्पण पश्चात् शाप विमोचन एव उत्कीलन करें यथा – 
“ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चण्डि सकलमन्त्राणां शापविमोचनं कुरु-कुरु स्वाहा ।” (तीन बार जपें) 
“ॐ श्री ह्रीं क्लीं चण्डि सप्तशतिके सर्वमन्त्राणां उत्कीलनं कुरु-कुरु स्वाहा ।” (तीन बार जपें) 

।।गर्भ रात्रि-सूक्तम्।। 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः ब्रह्मोवाच मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।। 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका । सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिताः ।। मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। २ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः अर्द्धमात्रास्थिता नित्या यानुर्च्चायां विशेषतः । त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ।। मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। ३ ।। ।। 

अथ गर्भचण्डी ।। 
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीगर्भचण्डीमाला मन्त्रस्य श्रीब्रह्मा विष्णु महेश्वरादि ऋषयः । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छंदांसि । श्रीशक्तिस्वरुपिणी महाचण्डी देवता । ऐं बीजं । ह्रीं कीलकं । क्लीं शक्तीः । मम चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । 

ऋष्यादिन्यासः- 
ॐ अस्य श्रीगर्भचण्डीमाला मन्त्रस्य श्रीब्रह्मा विष्णु महेश्वरादि ऋषिभ्यो नमः शिरसि । 
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् छंदोभ्यो नमः मुखे । 
श्रीशक्तिस्वरुपिणी महाचण्डी देवतायै नमः हृदि । 
ऐं बीजाय नमः गुह्ये । 
ह्रीं कीलकाय नमः नाभौ । 
क्लीं शक्तये नमः पादयो । 
मम चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे । 

~~षडङ्गन्यास करन्यास अंगन्यास~~
ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः 
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा 
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् 
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं 
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् 
ॐ ह्रः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् ।।

ध्यानम्।। 
शुद्ध स्फटिक संकाशां रवि विम्बाननां शिवाम् । अनेक शक्तिसंयुक्तां सिंहपृष्ठे निषेदुषीम् ।। 
अंकुशं चाक्षसूत्रं च पाशपुस्तक धारिणीम् । 
मुक्ताहार समायुक्तां चण्डीं ध्याये चतुर्भुजाम् ।। सितेन दर्पणाब्जेन वस्त्रालंकार भूषितम् । जटाकलाप संयुक्तां सुस्तनीं चन्द्रशेखराम् ।। 
कटकैः स्वर्ण रत्नाढ्यैर्महावलय शोभिताम् । कम्बुकण्ठीं सु ताम्रोष्ठीं सर्पनूपुरधारिणीम् ।। 
केयुर मेखलाद्यैश्च द्योतयंतीं जगत्-त्रयम् । 
एवं ध्याये महाचण्डीं सर्वकामार्थ सिद्धिदाम् ।। 

चतुष्टय-मुद्रा का प्रदर्शन करना चाहियेः-
 १- पाश, २- अंकुश, ३- अक्षसूत्र तथा ४- पुस्तक । ।। अथ पाठः ।। 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः ब्रह्मोवाच मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। १ ।। 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः यच्च किञ्चित् क्वचिद् अस्तु सदसद् वाखिलात्मिके । तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा । मः न क्लीं ह्रीं ऐं ॐ ।। २ ।। 

ॐ श्रीं नमः सम्मानिता ननादौच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः। तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नमः । मः न श्रीं ॐ ।। ३ ।। 

ॐ श्रीं नमः अर्द्धनिष्क्रान्तः एवासौ युध्यमानो महाऽसुरः । तया महाऽसिना देव्या शिरश्छित्वा निपातितः । मः न श्रीं ॐ ।। ४ ।। 

ॐ श्रीं नमः दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तोः स्वस्थै स्मृता मतिवमतीव शुभां ददासि । दारिद्रय दुःख भय हारिणि का त्वदन्या सर्वोपकार करणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता । मः न श्रीं ॐ ।। ५ ।। 

ॐ क्लीं नमः इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या । भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः । मः न क्लीं ॐ ।। ६ ।। 

ॐ क्लीं नमः इत्युक्तः सोऽभ्यधावत् तामसुरो धूम्रलोचनः । हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः । मः न क्लीं ॐ ।। ७ ।। 

ॐ क्लीं नमः भृकुटी कुटिलात् तस्याः ललाटफलकाद् द्रुतम् । काली कराल वदना विनिष्क्रान्ताऽसि पाशिनी । मः न क्लीं ॐ ।। ८ ।। 

ॐ क्लीं नमः ब्रह्रेश गुहविष्णुनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः । शरीरेभ्यो विनिष्क्रमय तद्रुपैश्चण्डिकां ययुः मः न क्लीं ॐ ।। ९ ।। 

ॐ क्लीं नमः अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह । तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शम्भुः कोपं परं ययौ । मः न क्लीं ॐ ।। १० ।। 

ॐ क्लीं नमः एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ? पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः । मः न क्लीं ॐ ।। ११ ।। 

ॐ क्लीं नमः सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तुऽते । मः न क्लीं ॐ ।। १२ ।। 

ॐ क्लीं नमः देव्युवाच मः न क्लीं ॐ ।। १३ ।। 

ॐ क्लीं नमः सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः । मनुष्यो मत्-प्रसादेन भविष्यति न संशयः । मः न क्लीं ॐ ।। १४ ।। 

ॐ क्लीं नमः यत् प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन । मत्तस्तत् प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत् । मः न क्लीं ॐ ।। १५ ।। 

।। जय जय श्रीमार्कण्डेय पुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवी महात्म्ये सत्याः सन्तु मनसः कामाः ।। ।।

श्रीगर्भदेवी सूक्तम्।। 
ॐ क्लीं नमः नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणतः स्मताम् । मः न क्लीं ॐ ।। १ ।। 

ॐ क्लीं नमः रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्य्यै धात्र्यै नमो नमः । ज्योत्स्नायै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः । मः न क्लीं ॐ ।। २ ।। 

ॐ क्लीं नमः कल्याण्यै प्रणतां वृद्धयै सिद्धयै कूर्म्यै नमो नमः । नैर्ऋते भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः । मः न क्लीं ॐ ।। ३ ।। 

ॐ क्लीं नमः दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै । ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः । मः न क्लीं ॐ ।। ४ ।। 

ॐ क्लीं नमः अति सौम्याति रौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः । नमो जगत प्रतिष्ठायै देव्यै कृतयै नमो नमः । मः न क्लीं ॐ ।। ५ ।। 

।।गर्भरहस्य त्रयम।। ॐ ह्रीं नमः गुरुपदेशविधिना पूजनीया प्रयत्नतः । मन्त्रोद्धार प्रयत्नेन ज्ञात्वा सा नृपात्मजः । मः न ह्रीं ॐ ।। १ ।। 

ॐ श्री नमः प्रदक्षिणां नमस्कारान् कृत्वा मूर्घ्नि कृताञ्जलिः । क्षमापयेज्जगद्धात्रीं मुहुर्मुहुरतन्द्रितः । मः न ह्रीं ॐ ।। २ ।। 

ॐ क्लीं नमः जगन्मातुश्चण्डिकाया कीर्तिता कामधेनवः । मेधां प्रज्ञां तथा श्रद्धां धारणां कान्तिमेव च । मः न क्लीं ॐ ।। ३ ।। 

।।गर्भ सूत्र त्रयम् ।। 
ॐ ऐं नमः ब्रह्म सरस्वती सूक्तं लक्ष्मीसूक्तं जनार्दनम् ह्रीं ॐ ।। 
इस मन्त्र के एक लाख जप करें तथा सिद्ध करें – “श्रीं श्रीं श्रीं ॐ नमः” 
।। इति श्रीगर्भचण्डी ।।
साभार - पुजारी मनीष भारद्वाज 
https://www.facebook.com/share/p/1D8YwgBeSh/

वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Tuesday, 3 February 2026

व्यास - जो दीर्घतम वा बृहत्तम हैं।

शुचि शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् युक्त्वा सर्वात्मनाऽऽमानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम्।।

सहस्र रश्मि सूर्य, सहल वाक् शिव, सहस्र फण शेष, सहस्रनेत्र इन्द्र, सहस्र कर्ण पृथु सहस्रपात् विष्णु, सहस्र पाश वरुण, सहस्र पक्ष गरुण, सहस्र रूप राम, सहस्र काय कृष्ण का ध्यान करते हुए मैं श्री पं. जी को प्रणाम करता हूँ।

            वेदों पर सर्वप्रथम भाष्य लिखा, व्यास ने यह भाष्य १८ खण्डों में लिखा गया। इन खण्डों को पुराण कहते हैं। वेदों को जीवित रखने का श्रेय व्यास को जाता है। वेद गूढ है। पुराण गूढ़तर हैं किन्तु रोचक हैं। वेद, पुराणों के रूप में जन-जन तक पहुंचे हुए हैं। व्यास की शैली को समझना कठिन है। इस शैली को न जानने के कारण पुराण अबोधगम्य हैं। सत्य की कृपा से यह शैली समझ में आती है। इसको जानने के लिये व्यास को जानना आवश्यक है। व्यास मन इस समीकरण की सिद्धि पर मैं अपना ध्यान केन्द्रित करता हूँ। 'व्यास' का मूल अस् वा आस् धातु है। 

    वि + अस् + घञ् = व्यास।
    व्यस्ति व्यस्यति व्यसति ते व्यासते वियोजन करना विभाजन करना विश्लेषण करना पृथक्-पृथक् करना फाड़ना टुकड़े करना अतिक्रमण करना फेंकना उछालना विखेरना प्रकट करना मन का गुण धर्म है। इस लिये यह व्यास है।

अस् अदादि परस्मै अस्ति 
अस् दिवादि परस्मै अस्यति 
अस् भ्वादि उभय असति-ते 
आस् अदादि आत्मने आस्ते
 वि+ आसू आत्मने व्यासते 
"विण्यास वेदान्यस्मात् तम्माद् व्यास इतिस्मृतः ।'

व्यास का एक विशिष्ट अर्थ है। विश्व को दो समान टुकड़ों में बाँटना। भूगोल खगोल वा ब्रह्माण्ड के केन्द्र से होकर विश्व वा ज्ञान के ओर छोर को स्पर्श करने वाला व्यास होता है। जो दीर्घतम वा बृहत्तम है वह व्यास है।
    मान लिया के केन्द्र वाला कोई है। क केन्द्र से हो कर जाने वाली वृत्त रेखा, जो परिधि को अ और इ बिन्दुओं पर काटती है, व्यास कही जाती है। यदि यह रेखा केन्द्र से हो कर नहीं जाती तो व्यास नहीं होती। तब इसे जीवा कहते हैं। आ ई रेखा केन्द्र क से होकर नहीं जाती, इस लिये जीवा है। आ ई  रेखा केन्द्र क से होकर जाती है, इस लिये व्यास है। जीवा, व्यास से सदैव छोटी होती है। जीवा, जब व्यास के बराबर होती है अर्थात् जब केन्द्र से हो कर जाती है तो जीवा नहीं होती। अपितु व्यास होती है। जीवा, जीव है। व्यास, ईश्वर है। जीव का ईश्वर से तादात्म्य होने पर जीव जीव नहीं रहता- ईश्वर हो जाता है। जीवा, व्यास से सदा छोटी होती है। जीव, ईश्वर से छोटा होता है। जीवाएँ अनेक होती हैं, ईश्वर एक होता है। राम चरित मानस की यह पंक्ति है...

 "परबस जीव, स्वबस भगवन्ता ।
जीव अनेक, एक श्री कन्ता ॥
 -(तुलसीदास) 

 जो ब्रह्मण्ड के केन्द्र से हो कर जाता है, ब्रह्माण्ड को आर-पार करता है, वह व्यास है। महत्व है केन्द्र से हो कर जाने गा । ब्रह्मण्ड के ओर-छोर का पता अनेकों को होता है। केन्द्र को न जानने के कारण वे जीव हैं। इस केन्द्र को जानने के कारण वही जीव व्यास कहलाता है। ब्रह्माण्ड का केन्द्र है- आत्मा। इस ब्रह्माण्ड की परिधि है-माया। जो आत्मा और प्रकृति दोनों को जानता है, वह व्यास है। जो क्षेत्र और क्षेत्री दोनों का ज्ञान रखता है, वह व्यास है। व्यास का एक सिरा अस्ति है, दूसरा सिरा नारित है। व्यास का एक छोर अंधकार है, दूसरा छोर प्रकाश है। व्यास का आदि बिन्दु जन्म है, अन्तिम बिन्दु मृत्यु है। जो द्वैतज्ञ है, वह व्यास है। जो दो आँखों से देखता है, वह व्यास है। जो आत्मा को स्त्री-पुरुष के रूप में देखता है, वह व्यास है। इस संबंध में एक कथा है। व्यास जी अपने पुत्र शुक देव के पीछे-पीछे जा रहे थे। एक सरोवर में स्त्रियाँ नग्न स्नान कर रही थीं। शुकदेव १६ वर्ष के थे। शुक देव को देख कर उन्हें लज्जा नहीं आयी। वे नग्न खड़ी रह कर उन्हें देखती रहीं। जब व्यास जी को उन स्त्रियों ने देखा तो अपने शरीर को ढकने लगीं। व्यास ने इसका कारण उन से पूछा तो उन युवतियों ने कहा- आप का बेटा शुकदेव स्त्री-पुरुष भेद नहीं करता, आप भेद करते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि शुकदेव के पास अद्वैत दृष्टि थी, व्यास के पास द्वैत दृष्टि । शुकदेव समदर्शी थे, व्यास विषमदर्शी । समदर्शी के पास एक आँख होती है, विषमदर्शी के पास दो । यद्यपि एक आँख विषम हैं, दो आँख सम है। व्यास ने एक तत्व को दो भागों में बाँट कर देखा है, शुकदेव ने इन दोनों को एक कर के देखा है। व्यास विश्लेषक मन का नाम है, शुक संश्लेषक मन का नाम है। शुक् धातु भ्वादि गण परस्मैपदी शोकति-जाना हिलना डुलना अर्थ वाली है। शुक् + क = शुक । जो हिलता डुलता है, इधर-उधर जाता रहता है वह शुक है। यही तो मन है। मन चंचल है, शुक्र चंचल है। शुक देव की उत्पत्ति घृताची अप्सरा के रज और व्यास के वीर्य से हुई है। घृत + आ + चि= घृताची। अप इव सरति सा अप्सरा (स्त्री)। जिस मन में घृत की स्नेहन शीलता है, एकत्रीकरण (आचिनोति) की क्षमता है तथा जल की तरह प्रवाह है-वह घृताची अप्सरा है। विश्लेषक मन व्यास है। क्यों कि यह पराशरज है। महर्षि पराशर ब्रह्मा के मानसपुत्र हैं। पर + आ + श् + अच् पराशर परान् आशृणाति पराशरः । जो छिन्न-भिन्न करता है, टुकड़े टुकड़े करता है, खण्डन करता है नष्ट करता है-वह पराशर है। पराशर ने काल का खण्डन किया है। विपल पल घटी मुहूर्त होरा लग्न दिन पक्ष मास अयन अब्द संवत्मर युग मन्वन्तर- ये १४ खण्ड काल के हैं। पराशर ने होराशास्त्र की रचना की। १४ भुवन पर्यन्त इस शास्त्र का सम्मान है। यह पराशर मन ही तो ही एक कथा है- पराशर ने मत्स्यगन्धा के गर्भ से व्यास को उत्पन्न किया। अतिगोप्य सूत्र है, यह शुक्र मीन राशि में उच्च का माना जाता है, इसलिये बलवान होता है। काम का पर्याय है, मीन केतन। इसका भी वही अर्थ है। शुक्र और काम में अनन्यत्व है। गन्ध पृथ्वी तत्व का तन्मात्र है। शुक्र में गन्ध है। मत्स्य चंचल है, शर गतिमान है। यह युवान मन है। यह मन, व्यास है। व्यास + अंबिका धृतराष्ट्र व्यास + अंबालिका → पाण्डु । व्यास + दासी विदुर व्यास शुकी घृताची शुक। ये सब मन को विभिन्न अवस्थाएँ हैं और सब मन हैं। धृतराष्ट्र अन्धामन है। पाण्डु अबुध मन है। विदुर ज्ञानी मन है। व्यास विशाल मन है। शुक निर्गुण मन है। नमोऽस्तु ते व्यास विशाल बुद्धे।'
व्यास व्यष्टि नहीं है, समष्टि है। व्यास वाक्य आप्त वाक्य है। व्यास ने ब्रह्मसूत्र रचा। ब्रह्म = विभु। सूत्र अणु। जिसे विभु और अणु का ज्ञान है, वह व्यास है। जिस का इहलोक और पर लोक दोनों पर समान अधिकार है, वह व्यास है जो भौतिक विश्व एवं आत्मिक विश्व-दोनों का ज्ञान देता है, वह व्यास है। जो इन दोनों को जान कर इन से परे हो जाता है, वह शुक है। भागवत कथा शुक वा व्यास के मुख का प्रसाद है। इस प्रसाद के स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता। पुण्य पुष्यवानों को यह प्रसाद मिलता है। उन पुण्यवानों को मैं प्रणाम करता हूँ।

प्राकृतिक वृक्षों की टहनी ( नीम, बबूल, आम खैर आदि ) से दातून करना भूल चुके हो... तो वापसी कीजिये, तुरंत..... डायबिटीज और हाईपरटेंशन आदि से छुटकारा

डायबिटीज और हाइपरटेंशन है,,,,? यानी दातून करना भूल चुके हो... तो वापसी कीजिये, तुरंत.....

सन 1990 से पहले कितने लोगों को डायबिटीज़ होता था.....?

कितने लोग हाइपरटेंशन से त्रस्त थे......? नब्बे के दशक के साथ हर घर में एक डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर का रोगी आ गया, क्यों? बहुत सारी वजहें होंगी, जिनमें हमारे खानपान में बदलाव को सबसे खास माना जा सकता है। बदलाव के उस दौर में एक चीज बहुत ख़ास थो जो खो गयी, पता है ना क्या है वो...? 

दातून... गाँव देहात में आज भी लोग दातून इस्तमाल करते दिख जाएंगे लेकिन शहरों में दातून पिछड़ेपन का संकेत बन चुका है। गाँव देहात में डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन के रोगी यदा कदा ही दिखेंगे या ना के बराबर ही होंगे। वजह साफ है, ज्यादातर लोग आज भी दातून करते हैं। तो भई, डायबिटीज़ और हाइ ब्लड प्रेशर के साथ दातून का क्या संबंध, यही सोच रहे हो ना....?... तो आज आपका दिमाग हिल जाएगा... और फिर सोचिएगा, हमने क्या खोया, क्या पाया?

ये जो बाज़ार में टूथपेस्ट और माउथवॉश आ रहे हैं ना, 99.9% सूक्ष्मजीवों का नाश करने का दावा करने वाले, उन्हीं ने सारा बंटाधार कर दिया है। ये माउथवॉश और टूथपेस्ट बेहद स्ट्राँग एंटीमाइक्रोबियल होते हैं और हमारे मुंह के 99% से ज्यदा सूक्ष्मजीवों को वाकई मार गिराते हैं। इनकी मारक क्षमता इतनी जबर्दस्त होती है कि ये मुंह के उन बैक्टिरिया का भी खात्मा कर देते हैं, जो हमारी लार (सलाइवा) में होते हैं और ये वही बैक्टिरिया हैं जो हमारे शरीर के नाइट्रेट (NO3-)
को नाइट्राइट (NO2-) और बाद में नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) में बदलने में मदद करते हैं। जैसे ही हमारे शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड की कमी होती है, ब्लड प्रेशर बढ़ता है। ये मैं नहीं कह रहा, दुनियाभर की रिसर्च स्ट्डीज़ बताती हैं कि नाइट्रिक ऑक्साइड का कम होना ब्लड प्रेशर को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है। जर्नल ऑफ क्लिनिकल हायपरेटेंस (2004) में 'नाइट्रिक ऑक्साइड इन हाइपरटेंशन' टाइटल के साथ छपे एक रिव्यु आर्टिकल में सारी जानकारी विस्तार से छपी है। और, नाइट्रिक ऑक्साइड की यही कमी इंसुलिन रेसिस्टेंस के लिए भी जिम्मेदार है। समझ आया खेल? नाइट्रिक ऑक्साइड कैसे बढ़ेगा जब इसे बनाने वाले बैक्टिरिया का ही काम तमाम कर दिया जा रहा है? ब्रिटिश डेंटल जर्नल में 2018 में तो बाकायदा एक स्टडी छपी थी जिसका टाइटल ही ’माउथवॉश यूज़ और रिस्क ऑफ डायबिटीज़’ था। इस स्टडी में बाकायदा तीन साल तक उन लोगों पर अध्धयन किया गया जो दिन में कम से कम 2 बार माउथवॉश का इस्तमाल करते थे और पाया गया कि 50% से ज्यादा लोगों को प्री-डायबिटिक या डायबिटीज़ की कंडिशन का सामना करना पड़ा।

अब बताओ करना क्या है? कितना माउथवॉश यूज़ करेंगे? कितने टूथपेस्ट लाएंगे सूक्ष्मजीवों को मार गिराने वाले? दांतों की फिक्र करने के चक्कर में आपके पूरे शरीर की बैंड बज रही है सरकार... गाँव देहातों में तो दातून का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है, और ये दातून मुंह की दुर्गंध भी दूर कर देते हैं और सारे बैक्टिरिया का खात्मा भी नहीं करते। मेरे पातालकोट में तो आदिवासी टूथपेस्ट, टूथब्रश क्या होते हैं, जानते तक नहीं। अब आप सोचेंगे कि मैंने टूथपेस्ट और माउथवॉश को लेकर इतनी पंचायत कर ली तो दातून के प्रभाव को लेकर किसी क्लिनिकल स्टडी की बात क्यों नही की? तो भई, अब दातून से जुड़ी स्टडी की भी बात हो जाए। 

बबूल और नीम की दातून को लेकर एक क्लिनिकल स्टडी जर्नल ऑफ क्लिनिकल डायग्नोसिस एंड रिसर्च में छपी और बताया गया कि स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटेंस की वृद्धि रोकने में ये दोनों जबर्दस्त तरीके से कारगर हैं। ये वही बैक्टिरिया है जो दांतों को सड़ाता है और कैविटी का कारण भी बनता है। वो सूक्ष्मजीव जो नाइट्रिक ऑक्साइड बनाते हैं जैसे एक्टिनोमायसिटीज़, निसेरिया, शालिया, वीलोनेला आदि दातून के शिकार नहीं होते क्योंकि इनमें वो हार्ड केमिकल कंपाउंड नहीं होते जो माउथवॉश और टूथपेस्ट में डाले जाते हैं। फटाफट इस जानकारी को शेयर करें, गंगा नहा लें।

चलते चलते एक बात और बता दूं, आदिवासी दांतों पर दातून घुमाने के बाद एकाध बार थूकते है, बाद में दांतों पर दातून की घिसाई तो करते हैं और लार को निगलते जाते हैं? लिंक समझ आया? लार में ही तो असल खेल है। ये हिंदुस्तान का ठेठ देसी ज्ञान है बाबू।

ज्यादा पंचायत नहीं करुंगा, मुद्दे की बात ये है कि वापसी करो, थोड़ा भटको और चले आओ दातून की तरफ... कसम से।

बासी पानी जे पिये, ते नित हर्रा खाय।
मोटी दतुअन जे करे, ते घर बैद्य न जाय।।

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ब्रश नहीं, दातून थी असली आयुर्वेदिक मेडिसिन!” 
अगर आप सुबह टूथपेस्ट से ब्रश करते हैं — तो ये थ्रेड आपकी पूरी सोच बदल देगा! 
क्योंकि आयुर्वेद कहता है — "रोगा मुखादारभ्यं",
शरीर के 90% रोग मुँह से शुरू होते हैं…
और उनका इलाज हमारे पेड़ों में छिपा है! 

1️⃣
 आयुर्वेद कहता है — "रोगा मुखादारभ्यं"
 यानी शरीर के 90% रोगों की जड़ है मुँह की गंदगी!

पर आधुनिक टूथपेस्ट ने भुला दिया दादी-नानी की दातून —
वो नीम, बबूल, खैर जो सिर्फ लकड़ी नहीं थे, औषधि थे 

 चलिए जानते हैं — कौन सी दातून आपके लिए सबसे उपयोगी है!
2️⃣
नीम की दातून — मुँह का डॉक्टर!
कड़वा स्वाद, गर्म तासीर 

✅ बदबू गायब
✅ मसूड़े मजबूत
✅ कीड़ा और पायरिया दूर
✅ सूजन और खून का इलाज
✅ इम्युनिटी बढ़ाए

 गर्मी और बरसात में सर्वोत्तम!

>“नीम — कड़वी ज़रूर, पर रोगों की दुश्मन।”

3️⃣
बबूल की दातून — दाँतों का बॉडीगार्ड!
कसैला स्वाद, ठंडी प्रकृति 

✅ दाँतों में चमक
✅ हिलते दाँत संभाले
✅ ब्लीडिंग मसूड़ों में आराम
✅ छालों से राहत

 हर मौसम में उपयोगी, ठंड में बेस्ट!

बबूल — वो प्रहरी, जो दाँतों की रक्षा करता है।”
4️⃣
 खैर की दातून — घाव भरने वाली जड़ी!
तीव्र कसैला, शीतल गुण

✅ मसूड़े बनें चट्टान जैसे
✅ खून तुरंत रुके
✅ बदबू खत्म
✅ टूथ प्रोटेक्शन नैचुरल

“जहाँ खैर है, वहाँ दर्द नहीं ठहरता।”
5️⃣
जामुन की दातून — डायबिटिक फ्रेंडली!
मीठा-कसैला स्वाद, ठंडी तासीर 

✅ शुगर वालों के लिए वरदान
✅ लार का संतुलन बनाए
✅ ताजगी और शक्ति दे

> “जामुन — स्वाद भी, स्वास्थ्य भी।”
 6️⃣
आम की दातून — फ्रेशनेस का राजा! 

✅ दाँतों में चमक
✅ मसूड़ों का खून रोके
✅ मुँह को सुगंधित रखे
✅ आत्मविश्वास बढ़ाए

> “आम की दातून से आती है मुस्कान में आत्मविश्वास की चमक।”
7️⃣
 करंज की दातून — मुँह के रोगों की दुश्मन!

कड़वा-तीखा स्वाद, गर्म तासीर 
✅ बैक्टीरिया साफ
✅ पुरानी बीमारियाँ खत्म
✅ मसूड़ों के घाव में आराम

> “करंज — कड़वाहट में छिपी चिकित्सा।”

8️⃣
दातून करने की सही विधि (आयुर्वेद अनुसार):

1️⃣ ताज़ी, पतली टहनी लें
2️⃣ एक सिरा चबाकर ब्रश जैसा बनाएं
3️⃣ हल्के हाथों से दाँत और मसूड़ों पर घिसें
4️⃣ जीभ पर हल्का मसाज करें
5️⃣ गुनगुने पानी से कुल्ला करें

सूखी या मोटी टहनी मत लो
 ज़्यादा रगड़ना नुकसानदेह
✅ हर दिन नई दातून उपयोग करें

9️⃣
चरक और सुश्रुत संहिता में लिखा है –

 “कटु, तिक्त, कषाय रसयुक्त द्रव्यों से दंतधावन किया जाए।”
👉 यानी जो चीजें तीखी, कड़वी और कसैली हों — वही मुँह की सफाई में श्रेष्ठ हैं।
👉 दातून सिर्फ सफाई नहीं, ये जीवनशैली का आयुर्वेदिक कवच है।
👉 ये न सिर्फ दाँतों को, बल्कि शरीर को भी रोगमुक्त रखता है।
👉 रोजाना दातून = कैमिकल-मुक्त, रोग-मुक्त जीवन!

प्राकृतिक रहो, आयुर्वेद अपनाओ, स्वस्थ जीवन पाओ!”
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#motivation 

बांस का पेड़ - "बेजुबान प्राणी-वृक्ष हमें अपने आचरण से बहुत कुछ सिखाते हैं।"

*🍃                         ॥ॐ॥*                       🍃 
                                कहानी 
                      *💐बाँस का पेड़💐*

एक संत अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। ढलान पर से गुजरते वक्त अचानक शिष्य का पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की ओर लुढ़कने लगा। 

वह खाई में गिरने ही वाला था कि तभी उसके हाथ में बांस का एक पौधा आ गया। उसने बांस के पौधे को मजबूती से पकड़ लिया और वह खाई में गिरने से बच गया।
बांस धनुष की तरह तो मुड़ गया लेकिन न तो वह जमीन से उखड़ा और न ही टूटा, वह बांस को मजबूती से पकड़कर लटका रहा। थोड़ी देर बाद उसके गुरू वहीं पहुंच गए।

उन्होंने हाथ का सहारा देकर शिष्य को ऊपर खींच लिया। दोनों अपने रास्ते पर आगे बढ़ चले।

राह में संत ने शिष्य से कहा- "प्राण बचाने वाले बांस ने तुमसे कुछ कहा, तुमने सुना क्या?"

शिष्य ने कहा- "नहीं गुरुजी, शायद प्राण संकट में थे इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया और मुझे तो पेड-पौधों की भाषा भी नहीं आती, आप ही बता दीजिए उसका संदेश।"

गुरु मुस्कुराए- "खाई में गिरते समय तुमने जिस बांस को पकड़ लिया था, वह पूरी तरह तो मुड़ गया था। फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और तुम्हारी जान बची ली।"

संत ने बात आगे बढ़ाई- "बांस ने तुम्हारे लिए जो संदेश दिया वह मैं तुम्हें दिखाता हूं।"

गुरू ने रास्ते में खड़े बांस के एक पौधे को खींचा और फिर छोड़ दिया। बांस लचककर अपनी जगह पर वापस लौट गया।

"हमें बांस की इसी लचीलेपन की खूबी को अपनाना चाहिए। तेज हवाएं बांसों के झुरमुट को झकझोर कर पूरी तरह से उखाड़ने की कोशिश तो करती हैं लेकिन वह आगे-पीछे डोलता तो है पर मजबूती से धरती में जमा रहता है।"

"बांस ने तुम्हारे लिए यही संदेश भेजा है कि जीवन में जब भी मुश्किल दौर आए तो थोड़ा झुककर विनम्र बन जाना लेकिन टूटना नहीं क्योंकि बुरा दौर निकलते ही पुन: अपनी स्थिति में दोबारा पहुंच सकते हो।"

शिष्य बड़े गौर से सुनता रहा। गुरु ने आगे कहा- "बांस न केवल हर तनाव को झेल जाता हैं बल्कि यह उस तनाव को अपनी शक्ति बना लेता है और दुगनी गति से ऊपर उठता है। बांस ने कहा कि तुम अपने जीवन में इसी तरह लचीले बने रहना।"

गुरू ने शिष्य को कहा-
*"पुत्र पेड़-पौधों की भाषा मुझे भी नहीं आती। बेजुबान प्राणी-वृक्ष हमें अपने आचरण से बहुत कुछ सिखाते हैं।"*

यह कहानी भक्ति, विश्वास, कर्म और ईश्वर की कृपा का सुंदर संगम है।
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               साभार - ✍️ ..._एक कहानी_ 
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Sunday, 1 February 2026

॥ सत्य :- संसार का सर्वोच्च मूल्य ॥

        ॥ सत्य :- संसार का सर्वोच्च मूल्य ॥
सत्य संसार का सबसे बड़ा और अमर मूल्य है। झूठी जीभ स्वभाव से झूठ ही बोलती है, किंतु दृढ़ संकल्प, संयम और साहस के साँचे में ढलकर वही जीभ सत्य की साधिका बन जाती है। झूठ मनुष्य को भीतर से कुंठित करता है और समाज में अनेक प्रकार के भ्रम फैलाता है। वहीं सत्यवादी का प्रत्येक संवाद न्याय की तुला पर सबसे बड़ा और विश्वसनीय उपहार होता है। पितामह भीष्म युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहते हैं:-
सत्येन चाग्निर्दहति स्वर्ग: सत्ये प्रतिष्ठित:।
सत्यं यज्ञस्तपो वेदा: स्तोभा मन्त्रा: सरस्वती॥
( महाभारत, शांतिपर्व १९९/६८ )
अर्थात् - सत्य के कारण ही अग्नि जलती-प्रज्वलित होती है, स्वर्ग सत्य पर ही प्रतिष्ठित है। यज्ञ जैसी महान संस्था, समस्त तपस्याएँ, श्रेष्ठ स्तोत्र, महान मंत्र और वाग्देवी सरस्वती—ये सभी सत्य के साक्षात् स्वरूप हैं।

       प्राचीन काल में सत्य के इस मूल्य को इतना महत्व दिया जाता था कि राजा हरिश्चंद्र की कथा गाँव-गाँव में नाटकों के माध्यम से दिखाई जाती थी। प्रजा से लेकर शासक तक सभी से अपेक्षा की जाती थी कि वे सत्यवादी, सत्यप्रेमी, सत्यानुशील और सत्यमार्गी बनें। सत्य को देवता मानकर सत्यनारायण की कथा-पूजा भी की जाती थी। सत्य को जीवन का आधार, धर्म का मूल और मोक्ष का द्वार माना जाता था।किंतु आज स्थिति विपरीत है। भारतीय संस्कृति और आत्मिक मूल्यों में सबसे अधिक क्षरण यदि किसी का हुआ है, तो वह सत्य का ही हुआ है। झूठ को अब मूल्यवान, चतुराईपूर्ण और सफलता की सीढ़ी मान लिया गया है। राजनीति, व्यापार, सामाजिक संबंध, मीडिया—हर क्षेत्र में सत्य की जगह छल, कपट और माया ने ले ली है।फिर भी सत्य की ज्योति कभी पूरी तरह बुझ नहीं सकती। क्योंकि सत्य ही वह शक्ति है जो अग्नि को जलाती है, स्वर्ग को आधार देती है और सरस्वती को वाणी प्रदान करती है। आज के इस झूठ के युग में हमें पुनः सत्य की साधना करनी होगी—संकल्प से, संयम से और साहस से। क्योंकि सत्य ही वह एकमात्र मूल्य है जो मनुष्य को कुंठा से मुक्त करता है, न्याय की स्थापना करता है और अंततः अमरत्व प्रदान करता है। 
"सत्यमेव जयते"—सत्य की ही सदा विजय होती है।
                साभार - भगवतगीता समूह 
                    वयं राष्ट्रे जागृयाम