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Wednesday, 5 February 2025

पदार्थ विद्या

                  पदार्थ विद्या क्या है ?
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पदार्थ - पद और अर्थ तथा दोनों का सम्बन्ध बताने वाली
            विद्या को 'पदार्थ विद्या' कहते हैं !

           'पद' वेद में हैं और 'अर्थ' लोक में हैं ! 

      परमात्मा पद देता पर अर्थ न देता तो पद का अर्थ कैसे होता ? और अर्थ देता पर पद न देता तो हम क्या कह कर बुलाते ?
      'अश्व' का अर्थ लोग घोड़ा करते हैं पर वास्तव में देखा जावे तो घोड़ा भी तो शब्द है ! शब्द का लक्षण महर्षि पतन्जलि ने इस प्रकार किया है-

       श्रोतोपलब्धिर्बुद्धिनिर्ग्राह्य: प्रयोगेणाभिज्वलित
       आकाश देश शब्द: !

     जो कानों से सुना जाये, जो बुद्धि से पकड़ा जावे, जो वाणी से प्रकट हो और जिसका आकाश में निवास हो उसे शब्द कहते हैं! इस लक्षण द्वारा विद्यालय में जो भी अर्थ बतलाये जाते हैं वे सब शब्द हैं !
शब्द और अर्थ में अन्तर : -
शब्द और श्रोत का वाणी का विषय है  । एक शब्द बोलता है और दूसरा शब्द सुनता है ! उच्चारण और श्रवण ये दोनों शब्द से सम्बन्ध रखते हैं परन्तु अर्थ व्यवहार की वस्तु है उच्चारण की नहीं, अतः जिसका वाणी से उच्चारण हो वह शब्द और जिसका वाणी से उच्चारण न हो सके वह अर्थ होता है !
     अश्व, घोड़ा, घोटक, हॉर्स, अस्प आदि भाषान्तर शब्द हैं और इनका अर्थ लोक प्रसिद्ध चतुष्पाद् विशेष हैं जो अश्वशाला में हिनहिना रहा है ।

   इस प्रकार समस्त पद वेद में हैं और अर्थ लोक में, इन दोनों के सम्बन्ध की विद्या को पदार्थ विद्या कहते हैं !
परमात्मा ने 'पद' प्रथम दिये या 'अर्थ' : -

🔥'पद' परमात्मा के ज्ञान में सदैव वर्तमान रहते हैं ज्ञान रूप से और अर्थ प्रकृति में सदैव वर्तमान रहते हैं अव्यक्त रूप से परमात्मा अपने अन्तर्निहित ज्ञान के अनुसार प्रकृति में आन्तरिक प्रक्रिया द्वारा अव्यक्त सृष्टि को व्यक्त करता है ! 
    इस प्रकार ज्ञान के अनुसार सृष्टि 'अर्थ' और 'अर्थ' के अनुरूप ही ज्ञान 'शब्द' प्रदान किये गये हैं इनको पृथक समझना अपनी नादानी नहीं तो क्या है !
इस विषय में एक दृष्टान्त दृष्टव्य है -
एक कुम्भकार ने मिट्टी से घड़े बनाये, कुम्भकार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण, घड़ा कार्य, मिट्टी में घड़े हैं पर अव्यक्त हैं कुम्भकार के ज्ञान में घड़े अव्यक्त हैं । कुम्भकार चेतन है उसके ज्ञान की सार्थकता तभी है जब अपने ज्ञान को मिट्टी के माध्यम से मूर्तरूप प्रदान करें! न तो अकेले कुम्भकार के ज्ञान से काम चल सकता है और न अकेले मिट्टी के घड़े से जो अव्यक्त हैं । कुम्भकार का घट ज्ञान मृतिका में मूर्तरूप धारण करके ही घट व्यवहार के योग्य हो सकता है !

    परमात्मा ने ज्ञानपूर्वक सृष्टि की, और सृष्टि परक वेद दिया है, दोनों के सम्बन्ध की विद्या को 'पदार्थ विद्या' कहते हैं । पदार्थ, यथार्थ, यथातथ्य, तथ्य शब्दों का अर्थ पद और अर्थ = पदार्थ (अर्थात्) यथा पदम्, तथा अर्थ: इति पदार्थ: जैसा शब्द वेद में वैसा अर्थ लोक में' इसको पदार्थ कहते हैं! क्योंकि 'यथा पदम्' का 'पदम्' शब्द और तथा अर्थ: का अर्थ शब्द! अर्थात् उभय शब्दों के आदि पद यथा और तथा का लोप करने पर पदार्थ शब्द निष्पादन हुआ ! 

     यथा और अर्थ = यथार्थ (अर्थात्) यथा पदम् तथा अर्थ: में पूर्व पद का अन्त्य शब्द पद और द्वितीय पद का आदि शब्द तथा वा लोप हो जाने से पदार्थ शब्द बना! अर्थ वही हुआ जैसा पद वैसा अर्थ ।
 यथातथ्य शब्द में भी यथा पदम् तथा अर्थ: दोनों पदों में अन्त्य पद लोप करके यथा और तथा इन दो शब्दों का 'यथातथ्य' बनाया गया अर्थ वही हुआ यथा पदम तथा अर्थ ।
    जैसा पद वैसा अर्थ ! 
    'तथ्य' शब्द में 'यथा तथा' में पदम् और अर्थ: का लोप आदि शब्द यथा का लोप करके तथा से तथ्य बना अर्थ हुआ वैसे का वैसा ! अर्थात् जैसा पद वैसा अर्थ ।
    इस प्रकार महर्षि दयानन्द ने महर्षि पतन्जलि के शब्दों में -
 'सिद्ध शब्दार्थ सम्बन्धे'  शब्द नित्य:, अर्थो नित्य:, अर्थो नित्य:, तयो सम्बन्धोsपि नित्य: ।
इस प्रकार शब्द राशि वेद और अर्थ राशि जगत् का नित्य सम्बन्ध है! इनको पृथक करके नहीं देखा जा सकता ।

      योगी योग द्वारा शब्दार्थ सम्बन्ध का परिज्ञान करता है! योगी के समाधिस्थ होकर शब्द और अर्थ अर्थात् वेद और लोक के सम्बन्ध का परिज्ञान करता हैं ।
इस बात का स्पष्टीकरण 'तर्क संग्रह' नाम्नी पुस्तिका में किया है -
आप्तवाक्यं शब्द: ! आप्तस्तु यथार्थवक्ता ! वाक्यं पदसमूह:!यथागामानय इति शक्त पदम्! अस्मात्- पदादयमर्थो बोद्धव्य इतीश्वरेच्छा सङकेत: शक्ति:।
इस पद से यह अर्थ जानना चाहिए इस ईश्वरेच्छा का नाम शक्ति है । इस सङ्केत का ज्ञान (यथार्थरूपेण) योगी समाधिस्थ होकर प्राप्त करता है ।
महर्षि दयानन्द ने भी समाधि में वे ही पद और अर्थ नित्य सम्बन्ध वाले सङ्केत प्राप्त किये ! तभी तो वेदार्थ में सृष्टिक्रम को प्रधानता प्रदान की ।
 'वेद और सृष्टि' एक ही कवि के दोनों काव्य हैं !
'काव्य' शब्द की व्युत्पत्ति कु शब्दे धातु से होती है,  कवि से काव्य शब्द तद्धित प्रत्ययान्त निष्पन होता है । 'कवेर्भाव: कर्म वा' काव्य हैं ! वा अव्यय च अर्थ में हैं। अर्थात् कवि का कर्म और भाव दोनों काव्य हैं। 
कवि का कर्म सृष्टि और भाव वेद दोनों ही परमात्मा कवि के काव्य हैं, अन्य समस्त विश्व के काव्यों में यह अन्तर है कि वे भाव रूप में किसी अन्य के हैं और कर्म रूप में किसी अन्य के (भाव और कर्म में समन्वयात्मक दृष्टिकोण नहीं है ) परन्तु वेद में ज्ञान और कर्म का पूर्ण समन्वय है !

        ✍️ दर्शनवाचस्पति आचार्य विश्वबन्धु शास्त्री 
     स्रोत- आर्यसमाज के दस नियमों की व्याख्या
                        प्रस्तुतकर्त्ता- रामयतन
                           वयं राष्ट्रे जागृयाम

समुद्र मंथन एक सनातन प्रक्रिया

            समुद्र मंथन एक सनातन  प्रक्रिया 

      समुद्र मंथन की पौराणिक कथा प्रसिद्ध हैं ‌।  प्रतीक रूप में देखे तो समुद्र-मंथन एक सनातन क्रिया हैं जो मानव सभ्यता के प्रांरम्भ से अब तक यह क्रिया निरंतर होती आई है, व्यक्ति के संदर्भ में भी और मानव समाज के संदर्भ में भी।
       समुद्र है ज्ञान का, जो अथाह है, अपार है। इसके मंथन से मूल्यवान उपलब्कियो और क्षमताओं के रत्न मिलते हैं। मंथन का अर्थ है अध्ययन, चिंतन मनन और (ज्ञान का) सृजन । मंथन किसी द्रव को चक्राकार घुमाने की क्रिया है। ज्ञान जल को भी चक्राकार रूप से मथना पड़ता है। पहले मोटी - मोटी बाते जानी जाती है फिर अर्जित जानकारी के परिप्रेक्ष्य में पहले सीखी हुई बातो का पुनरावलोकन किया जात्य है। यदि आवश्यक है हुआ तो पूर्व अर्जित धारणाओं में संशोधन किया जाता हैं।
विज्ञान के अध्ययन पर तो यह बात विशेष रुप से लागू होती है। 

          मंदरांचल पर्वत - विशालता का प्रतीक 
       समुद्र मंथन के लिए मन्दराचल (मंदार गिरी) को मथानी बनाए जाने का वर्णन हैं तो यहां पर्वत प्रतीक है विशालता का, ऊंचाई का और अचल बने रहने का। ज्ञान सिंधु मंथन के लिए बड़ी इच्छा शक्ति, उच्च आकांक्षा और अडिग निष्ठा की आवश्यकता होती है। इन गुणो को पर्वताकार लक्षण / लगन कह सकते हैं। 

वासुकी सर्प -  ज्ञान मंथन के सतत् प्रयत्न रस्सी का प्रतीक 
       अब देखिए रस्सी के रुप में वासुकी ( सर्प ) का उपयोग किया गया हैं।  सर्प लम्बा और कष्ट साध्य होता हैं तथा कुण्डली का आकार धारण करता है। तो यह प्रतीक हैं उस कष्ट साध्य प्रयत्न का जिसे अटल निष्ठा रुपी मंदरांचल  के इर्द गिर्द लपेट कर ज्ञान सिंधु का मंथन करना होता हैं।  प्रयत्न को कुण्डली की भांति चक्राकार रुप से नियोजित करना पड़ता हैं ताकि उसकी पकड़ अटल निष्ठा रुपी मंदरांचल ( ज्ञान प्राप्ति  के लिए अटल निष्ठा से संकल्पित व स्थिर मन ) पर ढ़ीली न पड़े।

कच्छप - ज्ञानी और अनुभवी सदगुरु रुपी आधार का प्रतीक 
        कथा में मंदरांचल को कच्छप ( कछुए) की पीठ पर टिकाने का वर्णन हैं।  कच्छप की पीठ कठोर होती हैं, और यह प्रायः समुद्र में तथा समुद्र किनारे पाये जाते हैं।
( वहीं का जीव हैं। ) आश्य हैं कि अनुभव ( ज्ञान सिंधु की तटवर्ती भूमि ) से उत्पन्न उन सुस्थापित ( सुदृढ़) सिद्धांतों और प्रमेयों से जो स्वयं ज्ञान का भाग हैं, उसी में विहित हैं - इनका वाहक सदगुरु होता हैं। ऐसे गुरु पर ही अपनी अटल निष्ठा टिका कर उसे अध्धयन ( मंथन ) का आधार बनाना पड़ता हैं । 

                        देवता और दानव 

      समुद्र मंथन देवता और असुर ( दानव ) मिलकर करते हैं। आश्य है दैवी और आसुरी वृत्तियां। मनुष्य में यह दोनों विद्यामान है। तथा ज्ञान मंथन हेतु दोनो की आवश्यकता होती है। दैवी गुण है त्याग निस्पृहता, आस्था, साधना, सत्यान्वेषण विनम्रता सौहार्द इत्यादी। आसुरी गुण है निशा-जागरण, घोर श्रम कुछ हद तक हठधर्मिता, तीव्र लालसा, उन्माद की सीमा तक (अध्धयन) में लिप्तता स्वयंऔर स्वजनों के प्रति अन्याय, काया का उत्पीड़न, तथ्यों का संग्रह, तांत्रिक-अभियोजन अपव्यय दुस्साहस इत्यादि। जीव विज्ञान के अध्ययन में जीव हिंसा भी करनी पड़ती हैं।
       इन दोनो प्रकार की गुणो मे उचित तालमेल की आवश्यकता होती है। ताकि जब एक प्रकार की प्रवृति को बढ़ाने की जरूरत हो तो दूसरे प्रकार की प्रवृतियाँ कुछ ढ़ीली पड़ जाए । जैसा कि मंथन में होता हैं। प्रयत्न रूपी सर्प में दो सिरे वे कारण है जिनसे प्रयत्न छूट सकता है। एक ओर भौतिक कठिनाइयां विपत्तियाँ, असफलता जनित हताशा आदि इनका प्रतीक सर्प का मुख है। इसे पकडे रहने के लिए दुस्साहस हठधर्मिता उत्कट इच्छा और उन्माद जैसे दानवीय गुण चाहिए। इसलिए कथा में सर्प का मुंह दानव‌ पकड़ते हैं। दूसरी ओर सांसारिक सुखो और पलायन वादिता की फिसलन (पूंछ)  है जहां से प्रयत्न छूटता है। इसे पकडे रहने के लिए निस्पृहता त्याग जैसे देवी गुण चाहिए अत: पूंछ देवता पकड़ते है। 

                             चौदह रत्न 

  ज्ञान सिन्धु मंथन से उपलब्धियों के जो रत्न मिलते है उन्हे चौदह श्रेणियों में रखा जा करता हैं - 

(१) लक्ष्मी ( धन की अधिष्ठात्री देवी) - समृद्धि एव संम्पन्नता (भौतिक और मानसिक) । शास्त्रों में विद्या को धन कहा गया है। मानव सभ्यता के संर्दभ में देखे तो जैसे-जैसे ज्ञान विज्ञान की उन्नति हुई हैं मानव समाज अधिक सम्पन्न हुआ हैं उनका जीवन स्तर ऊपर उठा है। 

(२) रंभा ( अप्सरा / गंधर्व ) - सुंदर गुणवान स्त्री-पुरुष का प्रतीक माना हैं। ज्ञान मंथन से समृद्धि प्राप्त मनुष्य को जीवन में गृहस्थ आश्रम हेतु सुंदर गुणवान मनोनुकूल जीवन साथी सहजता से प्राप्त हो जाते हैं । 

(३) कौस्तुकमणि - अलंकरण का प्रतीक । विद्या मनुष्य का आभूषण है। विद्वानों का मानना हैं कि विद्या से व्यक्ति अलंकृत होता हैं । 

(४) कल्पवृक्ष -  भांत- भांति के सुख देने वाला वृक्ष ।
ज्ञान विज्ञान की अनेक शाखाएं - प्रशाखाएं जिनसे वांछित फल मिलते हैं। ज्ञान मंथन से भी नयी नयी विधाएं पनपती हैं, विकसित होती हैं और इच्छित फल देती हैं। इसलिए इस ज्ञान रुपी समुद्र जल के मंथन से प्राप्त इस उपलब्धि को कल्पवृक्ष की उपमा दी गई हैं । 

(५) वारुणी - अभिमान का दंभ रुपी नशा । बहुधा मनुष्य को अपने ज्ञान पर अभिमान होने लगता हैं, जिसके कारण वह विवेक खो सकता हैं। अतः यह दुर्गुण वारुणी ( शराब ) हैं। 

(६) धनवंतरि (वैद्यराज) - रुग्ण मनोवृत्तियों को सुधारने का गुण ज्ञान मंथन से रुग्ण मानसिकता मनोवृत्तियां ठीक होने लगती हैं और सद्गुण ( स्वास्थ्य ) होता है। 
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार स्वस्थ मन से शरीर भी स्वस्थ अर्थात् रोगमुक्त रहता है। 

(७) चंद्रमा - सौम्य प्रकाश ( विवेक ) का प्रतीक हैं। विद्या को प्रकाश की उपमा दी गई हैं। यह प्रकाश प्रकृति के रहस्य देख पाने की दृष्टि प्रदान करता हैं। 

(८) कामधेनु - मन चाहा करने की क्षमता। कहते हैं कि कामधेनु से जब चाहो जितना चाहो दूध दुहा जा सकता हैं । ज्ञान मंथन से मनुष्य में वह क्षमता आ जाती हैं कि वह मन चाहा कर सकता हैं । 

(९) ऐरावत ( इंद्र का हाथी ) - मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और उच्च पद का प्रतीक । ऋषियों और गुरुओं का स्थान शासक से भी ऊंचा होता हैं। ब्रह्मर्षि पद के सामने विश्वामित्र जी ने राजर्षि पद को नीचा समझा था । 

(१०) उच्चैश्रवा अश्व ( सात मुखों वाला घोड़ा ) - बल शक्ति शोर्य आदि सात गुणों का प्रतीक। ज्ञान के मंथन से बुद्धिबल, आत्मबल, तपोबल, मनोबल, नैतिकबल, बाहुबल (भौतिक बल ) और चरित्रबल ये सप्त-बल मनुष्य के पुष्ट होते हैं, इन्हें सात मुख वाला अश्व समझना चाहिए।
( टिप्पणी - उच्चैश्रवा - उपर की ओर मुख या चलने का अर्थ भी माने तो ज्ञान मंथन से मन की उर्ध्व गति होती हैं) 

(११) कालकूट विष - घातक शक्तियां (जैसे परमाणु बम आदि ) दूसरों को हानि पहुंचाने की क्षमता । इस पर समाज कल्याण की भावना (शिव तत्व) द्वारा नियंत्रण रखना चाहिए। कालकूट विष का शिव के द्वारा पान किये जाने का यही तात्पर्य हैं। 

(१२) शार्ड़्न्ग धनुष - ईश्वर का विष्णु नाम सृष्टि के पालन रक्षण और संचालन गुण के लिए प्रसिद्ध हैं । ज्ञान मंथन से उपलब्ध शार्ड़्न्ग धनुष उस क्षमता का प्रतीक हैं जो मानव समाज की सुरक्षा (असुरों से रक्षा ) करती हैं। इससे किसी भी अनिष्टकारी तत्व ( मानवता के शत्रु ) का निराकरण ( वेधन) किया जा सकता हैं। 
( जैसे - मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने राक्षसों का अंत किया) 

(१३) पांचजन्य शंख - नाद एवं उद्घोषणा का प्रतीक। ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्तित्व के नाम वह प्रसिद्धि और प्रमाणिकता जिससे विद्वत्त समाज में आदर और सम्मान पूर्वक पढ़ी सुनी और मानी जाती हैं। ( जैसे - योगीराज श्रीकृष्ण की बात धर्मात्मा - विद्वत्त समाज में सुनी और मानी जाती थी ) ऐसी ज्ञान समुद्र के मंथन से प्राप्त यह उपलब्धि किसी-किसी को युवा अवस्था में मिलती हैं, परंतु अधिकांश को प्रायः मनुष्य जीवन आयु का बहुत समय बीतने के बाद मिला करती हैं । 

(१४) अमृत - वह उपलब्धि कालजयी रचना, कृति या अविष्कार जिससे व्यक्ति का नाम समाज में अमर हो जाता हैं। या जिससे समाज को अमृत तुल्य जीवन मिलता हैं । यह व्यक्ति को ज्ञान मंथन से प्राप्त चरम उपलब्धि हैं। इसलिए यह समुद्र मंथन में सबसे अंत में निकलता है - ज्ञान से भरा हुआ कुंभ (अमृत-कुंभ) पूर्णता का प्रतीक हैं। जिस पात्र (व्यक्ति) में यह अमृत होता है वह मानो हर दृष्टि से परिपूर्ण हैं।                      

                      अमृत के लिए संघर्ष 
       अमृत तुल्य ज्ञान का उपयोग देवता (दैवी गुण) अपने संवर्धन के लिए करना चाहते हैं, और दानव (आसुरी गुण) अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए। इसके लिए दोनों में छीना-झपटी होती हैं परन्तु विजय अंतत: देवत्व की होती हैं। देवता अमृत कुंभ लेकर भागते हैं तो पृथ्वी पर चार स्थानों ( कुंभ तीर्थों) पर यह अमृत छलकता हैं। 

       तात्पर्य यह है कि ज्ञान का अमृत लाभ चार प्रकार के स्थानों पर मनुष्य को प्राप्त हैं। ( हो सकता है ) एक दक्षिण पंथ ( दक्षिण पंथी रचनात्मकता ) में जहां देवत्व की गोदावरी बहती है । इसका प्रतीक "नासिक" हैं‌। दूसरा विशुद्ध ज्ञान के केंद्रों पर जहां तेज ( क्षिप्र ) गति से ज्ञान की अविरल धारा ( क्षिप्रा) बहती है। ( अर्थात जहां सक्रिय शोध कार्य होता हैं ऐसे शोध-संस्थानों पर ) इसका प्रतीक है "उज्जैन" । तीसरा जहां ज्ञान की शाखाओं (विधाओं) का त्रिवेणी संगम होता हैं। इसका प्रतीक है तीर्थराज "प्रयाग" । और चौथा वहां जहां ज्ञान -गंगा बौद्धिक ऊंचाईयों (हिमाचल) से उतर कर जन साधारण के कल्याण के लिए धरातल ( मैदान) पर प्रकट होती हैं । इसका प्रतीक हैं " हरिद्वार " । ये चारों प्रकार के स्थान कुंभ तीर्थ है । 

        दृष्टव्य हैं कि इन चारों स्थानों पर ज्ञान का प्रवाहमान होना आवश्यक हैं। ज्ञान तभी सार्थक होता हैं जब तक वह गति (प्रवाह) बनी रहती हो । रुका हुआ झील रुपी ज्ञान भले ही वह मानसरोवर जैसा विशाल और पवित्र ही क्यों न हो जनसाधारण को अमृत लाभ नहीं दे सकता।
                           <---- ००० ---->
साभार - डॉ एम एल खरे (कादम्बिनी नवंबर १९९३)
                          वयं राष्ट्रे जागृयाम

Thursday, 23 January 2025

मानव शरीर में सप्तचक्रों के प्रभाव

                                   ॥ॐ॥

       मानव शरीर में सप्तचक्रों के प्रभाव का रहस्य

                         1. मूलाधारचक्र : 
यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच 4 पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है। 
                                  मंत्र : लं 
                          चक्र जगाने की विधि : 
मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है- यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना। 
                                प्रभाव : 
 इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

                         2. स्वाधिष्ठानचक्र- 
यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से 4 अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी 6 पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

                                मंत्र : वं
                            कैसे जाग्रत करें : 
जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।
                               प्रभाव : 
इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हों तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

                           3. मणिपुरचक्र : 
नाभि के मूल में स्थित यह शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो 10 कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।
                                मंत्र : रं
                         कैसे जाग्रत करें : 
आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।
                                 प्रभाव : 
इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

                          4. अनाहतचक्र- 
हृदयस्थल में स्थित द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

                                   मंत्र : यं
                             कैसे जाग्रत करें : 
हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।
                                 प्रभाव : 
इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

                           5. विशुद्धचक्र- 
कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो 16 पंखुरियों वाला है। सामान्य तौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
                              मंत्र : हं
                         कैसे जाग्रत करें : 
कंठ पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। 
                                प्रभाव :
सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।
                           6. आज्ञाचक्र -
मस्तिष्क के बीच दोनों नेत्रों पर मोहों के बीच स्थित होता हैं। इस कारण इसे तीसरा नेत्र भी कहते हैं। आज्ञाचक्र स्पष्टता और बुद्धि का केंद्र हैं। यह मानवीय और दैवीय चेतना के मध्य की सीमा निर्धारित करता है। यह तीन प्रमुख नाड़ियों इड़ा ( चंद्र नाड़ी ) पिंगला ( सूर्य नाड़ी ) सुषुम्ना ( केंद्रीय, मध्य नाड़ी ) के मिलने का स्थान है । जब इन तीनों नाड़ियों की ऊर्जा यहां मिलती हैं और आगे ऊपर की ओर उठती हैं तब हमें समाधि - सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती हैं।
                              मंत्र : उ 
                       कैसे जाग्रत करें : 
भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।
                             प्रभाव : 
यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्धपुरुष बन जाता है।

                         7. सहस्रारचक्र :
सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

                                मंत्र : ॐ
                           कैसे जाग्रत करें : 
 मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।
                                प्रभाव :
 शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।

          साभार: श्री ललिता महात्रिपुरा सुंदरी समूह
                          संजीव सिन्हा 
                        वयं राष्ट्रे जागृयाम 

Wednesday, 22 January 2025

शुभ - विवाह के मंगल अवसर पर वर-वधु प्रतिज्ञा

                            ॥ ॐ ॥
            इस मन्त्र वर-वधु प्रतिज्ञा कर रहे है कि :

समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ।
सं मातारिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ ॥
 [ऋग्वेद 10.85.47]
यज्ञशाला में बैठे हुए विद्वान लोगों! हम प्रसन्नता पूर्वक गृहस्थाश्रम में साथ रहने के लिए एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं। हम दोनों के ह्रदय जाल के समान शांत और मिले रहेंगे; जैसे प्राणवायु सबको प्रिय है वैसे हम दोनों एक-दूसरे में सदा प्रसन्न रहेंगे; जैसे सबमें स्थित परमात्मा सारे जगत को धारण करता है वैसे ही हम दोनों एक-दूसरे को धारण करेंगे; जैसे उपदेशक श्रोताओं से प्रीति करता है वैसे हम दोनों की आत्मा एक-दूसरे के साथ दृढ़ प्रेम को धारण करे।

ओम् गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ‌
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं तवादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥ [ऋग्वेद 10.85.56]
हे वरानने! मैं ऐश्वर्य और सुसंतानादि सौभाग्य की वृद्धि के लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू मुझ पति के साथ जरावस्था को सुखपूर्वक प्राप्त हों। तथा; हे वीर! मैं सौभाग्य की वृद्धि के लिए आपके हाथ को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यंत प्रसन्न ए़वं अनुकूल रहिये। आपको मैं और मुझे आप आजसे पति-पत्नी भाव से प्राप्त हुए हैं। परमात्मा और सभामंडप में। बैठे हुए विद्वान लोग गृहस्थाश्रम-कर्म के अनुष्ठान के लिए मुझे तुमको देते हैं।  

अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाःसुवर्चाः।
वीरसूर्देवृकामा स्योना शं नो भव द्विपदेशं चतुष्पदे ॥ [ऋग्वेद 10/85/44]
परमात्मा की कृपा से हे वरानने! तू पति से विरोध न करने वाली और प्रिय दृष्टी हो। मंगलकारी, सब पशुओं को सुखदाता, पवित्र अंत:करण युक्त, सुन्दर शुभ गुण-कर्म-स्वाभाव और विद्या से सुप्रकाशित, उत्तम वीर पुत्रों को उत्पन्न करनेहारी, परमात्मा की उपासना करानेहारी, हमारे लोगों और गे आदि पशुओं को सुख देने वाली हो।

                  ( ये तीनों ऋग्वेद के मन्त्र हैं। )

अब अथर्ववेद पति-पत्नी को परस्पर प्रेम निर्वाह के लिए
                    इस प्रकार प्रेरणा देता है:-

भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् ।
पत्नी त्वमसि धर्माणाहं गृहपतिस्तव ॥
[अथर्ववेद 14/1/51]
वर वधु से कहता है कि ऐश्वर्ययुक्त! मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ और धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूँ। तू धर्म से मेरी पत्नी है और मैं धर्म से तेरा गृहपति हूँ।

ममेयमस्तु पोष्या मह्य त्वदाद् बृहस्पति: ।
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम् ॥
[अथर्ववेद 14/1/52]
बृहस्पति (परमात्मा) ने तुझको मुझे दिया है कि तू जगत भर में मेरी पोषण कारी पत्नी हो। तू मुझ पति के साथ सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीवन धारण कर।

त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पते: प्रशिषा कविनाम्।
तेनेमन नहीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि …..॥
[ अथर्ववेद 14/1/53 ]
हे शुभानाने! परमात्मा और विद्वानों की शिक्षा से हम दम्पति होते हैं। तू मेरी प्रसन्नता के लिए सुन्दर वस्त्र और आभूषण तथा सुख को प्राप्त हो। हम दोनों की इच्छा को परमात्मा सिद्ध करे। जैसे इस नारी को ईश्वर संतान से सुशोभित करे, इसी प्रकार सूर्य की किरण के समान तुझको मैं भी सुशोभित करूँ।

अहं विष्यामि मयि रूपमस्या वेददित पश्यन्मनस: कुलायम्।
न स्तेयमद्मि मनसोदमुच्ये स्वयं श्रथ्नानो वरुणस्य पाशान्॥
[अथर्ववेद 14/1/58]
जैसे मान से कुल की वृद्धि को देखता हुआ मैं इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूँ, वैसे तू मेरी वधु मुझमें प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल व्यवहार को प्राप्त होवे। जैसे मैं उत्तम पदार्थों का वधु से चोरी से भोग नहीं करता हूँ वैसे ही यह वधु भी किया करे।

वेद मन्त्रों की ये भावनाएँ गुह्यासूत्रों में भी पाई गई है:-

यदैसि मनसा दूरं दिशोऽनुपवमानो वा ।
हिरण्यपर्णो वैकर्ण: स त्वा मन्मनसां करोतु ॥
[पाराoकाo 1 व 4]
जैसे पवित्र वायु और तेजोमय जल आदि को किरणों से ग्रहण करनेवाला सूर्य दुरस्थ पदार्थो और ...।

मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चितं ते अस्तु |
मम वाचमेकमना जुषरच प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् || [पाराoकाo 1 -8/8]
हे वधु! तेरे अन्त:करण और आत्मा को मैं अपने व्रत के अनुकूल धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल सदा तेरा चित्त रहे, मेरी वाणी तू एकाग्रचित्त से सेवन करे। परमात्मा तुझे मेरे अनुकूल रखे।

अन्नपाशेन मणिना प्राणसुत्रेण प्रिश्निना। 
बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते॥
 [मैत्रिय ब्राo 1/3/8]
हे वर या वधु! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न, तथा अन्न और प्राण का अंतरिक्ष के साथ सम्बन्ध हैवैसे तेरे ह्रदय, मान और चित्त को सत्य की गाँठ से बांधती/बांधता हूँ।

यदेत हृदयं तव तदस्तु हृदयं मम ।
यदिदं हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव ॥
[मैत्रिय ब्राo 1/3/9]
हे वर या वधु! तेरी आत्मा या अन्त:करण मेरी आत्मा या अन्त:करण के तुल्य प्रिय हो और मेरी आत्मा, प्राण और मन तेरी आत्मा के तुल्य प्रिय रहे।

वेद के इन मन्त्रों से पुष्टि होती है कि गृहस्थ सुख के लिए पति-पत्नी का प्रेम आवश्यक है।

                     साभार ✍️ सुगम पथ
              ‌             शुभम् स्वस्ति
                       वयं राष्ट्रे जागृयाम

Friday, 17 January 2025

पतंगोत्सव २०२५ पर संदर्भित नाम पतंग संबंधी वेद मंत्र

                पतङ्ग / पतंग उड़ाने का मन्त्र 

                                  (1) 
         सबसे पहले पौराणिक मन्तर :--
 ॐ पतङ्गाय विद्महे, तन्तु धाराय धीमहि, तन्नो पतङ्ग प्रचोदयात् ॥
                                    🌸
यदि आप इस 👆मन्तर का जाप 14 जनवरी पतंगोत्सव के दिन सबेरे-सबेरे करेंगे तो आपकी पतंग उड़ती रहेगी । 
लेकिन
ध्यान रहे, मन्तर पढ़कर अन्त में भूल से भी यदि आपने "इदं न मम" कहा तो पतंग कट जायेगी इसलिए सावधान रहें । 
                        🍂       🌸      🍂
                                    (2)
                   अब पतंग का वैदिक मन्त्र :--

त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् *प॑त॒ङ्गाय॑* धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥                       (यजुर्वेद ३/८)

       (यजुर्वेद का तृतीय अध्याय मन्त्र संख्या 8 )

👆इस मन्त्र का जाप, पाठ व हवन करने से पतंग अच्छी उड़ेगी, मजा आयेगा, 108 बार आहुति दें लेकिन सावधानी वही ऊपर वाली रखनी है । 
                                 🌸
                           😇😇😇😇
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                           😳😳😳😳

       ऊपर दिये दो में से एक पौराणिक मन्तर है और उसका रचनाकार/मन्तर-द्रष्टा मैं स्वयं हूँ । पौराणिकों ने ऐसे अनेक मन्तर कल्पना से बना लिए हैं जिसके कारण लोग भ्रम में रहते हैं, उनकी उलझन उन्हें किसी पण्डत से लुटने तक भी ले जाती है । अतः कृपया किसी भी प्रकार के मनुष्य के द्वारा बनाये मन्तर पर भरोसा न करें, सदा वेद मन्त्र ही पढ़ें, स्वाध्याय करें । 
🌸
दूसरा मन्त्र है यजुर्वेद का परन्तु ध्यान रहे :- वेद में कर्मकाण्ड नहीं है अतः इस मन्त्र के जाप-पाठ से हवन करने पर भी सिद्धि नहीं मिलनी । यजुर्वेद कर्म का वेद है, ज्ञान पा कर कर्म करने से सिद्धि मिलती है । धार्मिक विद्वानों का संग, शिल्पक्रिया सहित विद्याओं की सिद्धि, श्रेष्ठ विद्या-गुण का दान आदि का नाम यजुर्वेद है ।
🌸
तो अब प्रश्न है कि वेद मन्त्र में आये पतंग पद का अर्थ क्या है ??
उत्तर :-
महर्षि दयानन्द जी ने इस पतङ्गाय पद का अर्थ किया है "पतति गच्छतीति पतङ्गस्तस्मा अग्नये (धीयते) धार्यताम्" अर्थात् चलने चलाने आदि गुणों से प्रकाशयुक्त अग्नि के लिए / पतन-पातन आदि गुणों से प्रकाशित एवं गतिशील अग्नि के लिए |  
🌸
मनुस्मृति के श्लोक (1/21) के अनुसार 
“ संसार की सारी वस्तुओं के नाम, कर्मों के नाम का मूल-आदि-स्रोत वेद हैं। " वेद में से ले लेकर सारे पदार्थों वस्तुओं स्थानों का नामकरण हुआ क्योंकि उस-उसमें वह समान गुण था/है ।
वर्त्तमान में जो पतंग दिखती या उड़ती हैं उनका नाम इसलिए है क्यों की उसमें निम्न गुण हैं :-
१) चलने चलाने का गुण / पतन-पातन आदि गुण
२) गतिशील 
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तो आइये ! एक बार फिर मन्त्र पाठ करें 
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त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥ ( यजुर्वेद ३/८)
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कृपया जब भी आप "पतंग" देखें या उड़ायें तो इस मन्त्र का स्मरण अवश्य कीजियेगा | अन्यों को बताइयेगा भी की ये जो पतंग आप उड़ा रहे हैं यह पतंग शब्द वैदिक है ....इस प्रकार छोटी छोटी बातों में भी आप वेद प्रचार कर सकते हैं, आवश्यक नहीं की आप व्याख्यान ही दें |
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       मुझे प्रसन्नता है कि मैंने आपको इस पोस्ट के माध्यम से एक वेद मन्त्र पढ़वाया ।
सादर धन्यवाद🙏
                      साभार ✍️ विश्वप्रिय वेदानुरागी
                              वयं राष्ट्रे जागृयाम

Saturday, 11 January 2025

स्वादिष्ट चाय मसाला


                                  ॥ॐ॥
घर पर बना हुआ चाय का मसाला बनाने मिलावट के जहर से स्वयं को बचायें -

सामग्री 
3 बड़े चम्मच लौंग 
1/4 कप इलाइची 
1/2 कप काली मिर्च 
2 टुकड़े दालचीनी 
1/4 कप सौंठ 
1 चम्मच जायफल 
2 चम्मच सौंफ 
1 चम्मच सूखी तुलसी 
2 बड़ी इलायची 

विधि 
1.चाय का मसाला बनाने के लिए, एक चौड़े नॉन-स्टिक पॅन में लौंग, इलायची, काली मिर्च और दालचीनी डालकर 1 मिनट के लिए मध्यम आँच पर सूखा भुन लीजिए।
2.एक प्लेट में पलटकर उसे पूरी तरह से ठंडा होने के लिए एक तरफ रख दीजिए।
3. ठंडा होने के पश्चात उसमें सौंठ जायफल और तुलसी डालकर मिक्सर में मुलायम होने तक पीस लीजिए।
4.चाय का मसाला हवा-बंद डिब्बें मे भर कर रख दीजिए और आवश्यकतानुसार प्रयोग कीजिए।

महत्वपूर्ण सुझाव
हवा-बंद डिब्बें में भरकर रखा हुआ यह चाय का मसाला 4 महीनों तक ताज़ा रहता है।

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साभार 
वंदे मातृसंस्कृतम्