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Thursday, 22 October 2026

आदमी को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

78 सालों में तुम्हें 5 किलो राशन देकर, 500 रुपये गैस में छोड़ कर, 2 हजार खाते में डालकर ऐसे दिखाया जाता है जैसे सरकार ने जनता पर कोई एहसान कर दिया हो। जबकि सच यह है कि एक आम आदमी जिंदगी भर टैक्स देता है। 🤷

पेट्रोल में टैक्स, मोबाइल रिचार्ज में टैक्स, साबुन में टैक्स, कपड़ों में टैक्स, बिजली में टैक्स, घर बनाओ तो टैक्स, मर जाओ तो लकड़ी तक में टैक्स। आदमी पैदा होने से लेकर मरने तक सरकार को पैसा देता रहता है 

बदले में उसे क्या मिलता है। राशन की थैली और चुनावी भाषण में एक नया नारा। लोकतंत्र को भिखारी योजना बना दिया गया है।

अगर कोई पढ़ी-लिखी और मस्तिष्क वाली सरकार हो तो वह जनता को मुफ्त की आदत नहीं लगाएगी बल्कि ऐसा सिस्टम बनाएगी जिससे आदमी स्वयं कमाने लायक बने। असली सरकार वह होती है जो आदमी को लाइन में खड़ा नहीं करती बल्कि उसके हाथ में काम देती है।

भारत की केंद्र सरकार का वार्षिक बजट लगभग 48 से 50 लाख करोड़ रुपये का है। राज्यों का अलग बजट है। उत्तर प्रदेश अकेले लगभग 7 लाख करोड़ का बजट चलाता है। राजस्थान करीब 4 से 5 लाख करोड़ का। 

मतलब पैसा कम नहीं है, सोच छोटी है। नेता जनता को गरीब रखकर राजा बने रहना चाहते हैं। गरीब आदमी 500 रुपये के लिए वोट बेच देता है, आत्मनिर्भर आदमी सवाल पूछता है। यही असली खेल है।

अगर कोई समझदार प्रधानमंत्री हो तो वह हर जिले में कम से कम 200 से 300 सरकारी इंडस्ट्रियल यूनिट खोल सकता है। टेक्सटाइल, मेडिकल इक्विपमेंट, फूड प्रोसेसिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, खेती आधारित फैक्ट्री, डेयरी प्लांट, सोलर पैनल यूनिट। लगा सकता है 

एक जिले में 50 हजार से 1 लाख रोजगार पैदा हो सकते हैं। देश के 700 से ज्यादा जिलों में यह मॉडल लागू हो जाए तो करोड़ों लोगों को सीधा रोजगार मिल सकता है। लेकिन यहां फैक्ट्री खोलने से ज्यादा ध्यान चुनावी रैली में कुर्सी भरने पर है।

केंद्र सरकार चाहे तो हर युवा को 2 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त बिजनेस स्टार्टअप फंड दे सकती है। कोई कपड़े की दुकान खोले, कोई डेयरी, कोई मेडिकल स्टोर, कोई मोबाइल रिपेयर, कोई ट्रैक्टर सर्विस सेंटर। 

10 करोड़ युवाओं को भी 2 लाख दिए जाएं तो 20 लाख करोड़ लगेंगे, लेकिन यह पैसा खर्च नहीं निवेश होगा क्योंकि आदमी कमाएगा तो टैक्स वापस आएगा। और इसकी जगह अभी क्या हो रहा है। बेरोजगार को 2 हजार भत्ता देकर शांत रखो और पांच साल बाद फिर वही फोटो खिंचवा लो।

एक पढ़ी-लिखी सरकार गांव मे मिनी हॉस्पिटल, सरकारी कोल्ड स्टोरेज, खेती, मशीन बैंक, फ्री वाईफाई टावर, स्किल, ट्रेनिंग सेंटर, डेयरी प्लांट, सोलर बिजली , यूनिट, स्पोर्ट्स ग्राउंड, डिजिटल लाइब्रेरी, लड़कियों के लिए हॉस्टल, लोकल फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगा सकतीं हैं 

एक गांव पर साल के 20 से 30 करोड़ खर्च हों तो गांव की पूरी तस्वीर बदल सकती है। लेकिन यहां पंचायत भवन की टूटी कुर्सी पर ही विकास खत्म हो जाता है।

राज्य सरकार चाहे तो हर जिले में फ्री कोचिंग यूनिवर्सिटी खोल सकती है
हर तहसील में 24 घंटे ट्रॉमा सेंटर बना सकती है सरकारी स्कूलों को प्राइवेट से बेहतर बना सकती है किसानों के लिए फसल खरीद की गारंटी दे सकती है हर गरीब परिवार को 300 यूनिट मुफ्त बिजली दे सकती है महिलाओं को लोकल रोजगार मिशन से जोड़ सकती है

हर शहर में सरकारी किराये के मकान बना सकती है सोचो अगर सरकार हर जिले में 1000 करोड़ की इंडस्ट्री लगाए और 50 जिले हों तो 50 हजार करोड़ लगेंगे। नेताओं के कर्ज माफ करने, चुनावी विज्ञापन, फालतू परियोजनाओं और भ्रष्टाचार में इससे ज्यादा पैसा उड़ जाता है।

आज हमें क्या मिल रहा है 5 किलो राशन, गैस सिलेंडर में सब्सिडी, 1000-3000 भत्ता, चुनाव से पहले मुफ्त घोषणा, फिर पांच साल की चुप्पी ..

अगर तुम चाहो तो बहुत कुछ मिल सकता है स्थायी रोजगार, फ्री स्किल शिक्षा, सस्ता इलाज, मजबूत सरकारी स्कूल, लोकल फैक्ट्री, ब्याज मुक्त बिजनेस लोन, गांव में उद्योग, युवाओं को तकनीकी ट्रेनिंग, किसानों के लिए प्रोसेसिंग यूनिट, महिलाओं के लिए घर के पास काम लेकिन यह सब नहीं हो रहा

दुनिया के कई देशों ने यही किया। चीन ने गांव-गांव फैक्ट्री पहुंचाई। जर्मनी ने स्किल सिस्टम मजबूत किया। जापान ने लोकल इंडस्ट्री बचाई। भारत में क्या हुआ। 

यहां नेता हेलीकॉप्टर से उतरकर गरीब के घर खाना खाकर फोटो खिंचवा लेते हैं और अगले दिन वही गरीब आदमी मजदूरी पर चला जाता है।

असल विकास वह नहीं जो पोस्टर में दिखे। असली विकास वह है जिसमें आदमी को किसी नेता के आगे हाथ न फैलाना पड़े। लोकतंत्र का मतलब मुफ्त राशन नहीं, मजबूत नागरिक होता है। 

लेकिन मजबूत नागरिक नेताओं को पसंद नहीं आते। उन्हें भीड़ चाहिए, सोचने वाले लोग नहीं। आदमी को वोटर बना दिया, नागरिक बनाना भूल गए।

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... ✍️Suman Gupta 

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