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Sunday, 19 April 2026

प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि - “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप हैं।" कहने का आर्यसमाजी विद्वानों का स्वभाव बन गया हैं।

जब किसी आर्यसमाजी को अपनी संकीर्ण बुद्धि से प्राचीन शास्त्रों का कोई विषय समझ न आए, तो वह झट से कह देता है कि - “अरे यह तो अवैदिक है, प्रक्षेप है, गप्प है, असंभव है।” आर्यसमाजियों के एक अवैदिक पाखंडी वर्ग ने तो इसे अपना स्वभाव बना लिया हैं।
 
डॉक्टर मधुलिका आर्या जी ने पुराण से एक आपत्ति लिखी कि -- “ऋषि अगस्त्य ने समुद्रपान कर लिया था। ऐसी पापलीलाओ पर हमें लज्जा आती है "। अन्य भी आर्यसमाजी दशको से इस कथा का मज़ाक उड़ाते रहे हैं। और इन आर्यसमाजियों को देखकर इनके मुसलमान भाई व नीलमानव भी इस व अन्य कथाओ को गप्प कहकर उपहास करते हैं।

किन्तु इसमें आश्चर्य की क्या बात है? विधर्मियों का उद्देश्य तो अंधविरोध हैं, किन्तु आर्यसमाजियों को तो समझना चाहिए कि यह तो ऋषि मुनियो और उनके तप की महिमा का उज्ज्वल उदाहरण है। 

अगस्त्य ऋषि तपस्वी थे, जैसा कि महाभारत में कहा गया है - “तपस्वी तत्र भगवान् अगस्त्यः प्रत्यदृश्यत” (उद्योग पर्व)।

तब तपस्या के बल से असंभव से भी असंभव कार्यों को पूर्ण करने की क्षमता तपस्वी में हुआ करती है। तपस्या के बल से जल पर पत्थर तैराया जा सकता है, हथेली पर सरसों जमाई जा सकती है, समुद्रपान भी किया जा सकता है।

तपस्या की महत्ता मनुस्मृति में कही गई है - “यद् दुस्तरं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुष्करम्। सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥”

अर्थात जो भी कठिनता से पार करने योग्य कार्य हैं, जो कठिनता से प्राप्त होने योग्य कार्य या उद्देश्य है, या जो दुर्गम कार्य है, जो दुष्कर कार्य है - वह सब तप से सिद्ध होता है। तप का अतिक्रमण किसी कार्य में नहीं हो सकता।

यह मनुस्मृति का श्लोक समाजियों के मुँह पर तमाचा है, क्या वे मनु महाराज को नहीं मानते हैं ?

अगर मानते हैं, तब तो ऋषि अगस्त्य ने अपनी तपस्या की शक्ति से यदि दुस्तर, दुष्कर, दुर्गम समुद्र को तीन अंजलि जितना करके पी ले, इसमें क्या आश्चर्य शेष रहा?

दरअसल आर्यसमाजी भारत के इतिहास का सबसे महान ऋषि स्वामी दयानन्द को मानते हैं, और स्वामी जी को एक किलो दूध और दो-चार किलो आम खाकर दस्त का रोग हो जाया करता था, तब ये सोचते हैं कि पहले के ऋषि भी हमारे स्वामी जी जैसे ही रहे होंगे। तो ऐसा नहीं, बालकों! अन्य ऋषियों के तप के बल की तुलना स्वयं या स्वामी दयानन्द से मत करो।

तप की महिमा वेद में लिखी है - “भद्रमिच्छन्त ऋषयः स्वर्विदस्तपो दीक्षामुपनिषेदुरग्रे। ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसन्नमन्तु॥”

शतपथ ब्राह्मण में कहा है - “तपसा वै लोकं जयन्ति।” तो जब तपस्या से सारा संसार जीता जा सकता है, तब समुद्र पर विजय प्राप्त कर लेने में क्या कठिनता शेष रही? क्या समुद्र आर्यसमाजी संसार से बाहर की वस्तु है? या फिर ये वेद के वचन गलत हैं?

तैत्तिरीय आरण्यक में कहा गया है - “तपसा देवा देवतामग्रे आयन्, तपसा ऋषयः स्वरविन्दन्...” यहाँ अंतिम अंश में सिद्ध किया गया है कि तपस्या से सारा जगत परिभूत हो जाता है, अर्थात दब जाता है; तब फिर समुद्र को दबा देने में क्या कठिनाई है?

योगसूत्र के कैवल्यपाद में कहा गया है - “तपसा संकल्पसिद्धिः।” इस प्रकार जब तपस्या से सभी संकल्प सिद्ध हो जाते हैं, तो तपस्वी अगस्त्य ऋषि द्वारा देवताओं के हित के लिए समुद्र के सुखानेरूप समुद्रपानात्मक संकल्प में सिद्धि को कौन योगशास्त्र को मानने वाला नकार सकता है?

ऋषि अगस्त्य का तो जन्म ही अलौकिक है - “ततो हि मान उदियाय मध्यात्।” इस ऋग्वेद के मंत्र में ऋषि अगस्त्य को शमी प्रमाण तथा कुम्भ से उत्पन्न बताया गया है। मधुलिका जी इसका अर्थ बदलने का कुप्रयास करना चाहें, तो इस मंत्र का अर्थ ब्राह्मणग्रंथ में देख लें; वहाँ विस्तार से यह कथा लिखी हुई है।

तो जिसकी उत्पत्ति ही विचित्र है, अलौकिक है, उसकी शक्ति भी विचित्र और अलौकिक क्यों न हो?

ऋषि और देवताओं में अद्भुत सामर्थ्य हुआ करता है। अब देखिए, क्या वाणीमात्र से महारोग की निवृत्ति हो सकती है? आर्यसमाजी कहेंगे - यह तो असंभव है, ऐसा तो होता ही नहीं है। किन्तु देखिए, वेद में लिखा है - “इन्द्रस्य वचसा वयं मित्रस्य वरुणस्य च। देवानां सर्वेषां वाचा यक्ष्मं ते वारयामहे॥” (अथर्ववेद ६।८५।२)।

हम पूछते हैं, क्या वाणीमात्र से विभिन्न प्रकार के कृमियों का नाश हो सकता है? आर्यसमाजी कहेंगे - नहीं। किन्तु वेद में लिखा है -- “दृष्टमदृष्टमतृहामथो कुरूरुमतृहम्। अल्गण्डूंस्त्सर्वान्छलुनान्क्रिमीन्वचसा जम्भयामसि॥” (२।३१।२)।

शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है - “दैवी वाग् आविशति, सा वै दैवी वाग्, यया यद् यदेव वदति, तत् तद् भवति।” अर्थात दैवी वाणी वह होती है, जिससे जो कहा जाए, वही हो जाए।  

महाभारत के वनपर्व में विदर्भ नरेश ने अपनी पत्नी से कहा था - महर्षिवीर्यवानेष क्रुद्ध: शापाग्निना दहेत्‌॥

अर्थात - प्रिए , ये महर्षि अगस्त्य बड़े शक्तिशाली हैं, यदि कुपित हो तो हमें शाप की अग्नि से भस्म कर सकते हैं।

जब इल्विल नामी असुर ने अगस्त्य मुनि को मारने की इच्छा की थी तो महातेजस्वी अगस्त्य मुनि ने अपनी हुंकार से ही उसे भस्म कर दिया था --- भस्म चक्रे महातेजा हुंकारेण महासुरम्‌॥ (महाभारत , तीर्थयात्रा पर्व)

देवता और ऋषि-मुनि लोकोत्तर कार्य तप एवं शक्ति के बल से कर दिया करते हैं।

क्योंकि हमारी लघुशंका भी चींटी के लिए समुद्र है, और वर्षा उसके लिए प्रलय के समान है। ऊँट और हाथी की लघुशंका भी हमारे समाजी मित्रों के स्नान के लिए पर्याप्त है।

अर्थात तपस्यादि से अलौकिक शक्ति से सम्पन्न हमारे पूर्व ऋषि-मुनियों के समक्ष हम चींटी के समान हैं। हम चींटियों के लिए जो समुद्र है, वह तपस्वी अगस्त्य ऋषि के लिए लोटा भर पानी हो जाता है, तपस्या के बल से।

योगदर्शन के कैवल्यपाद में कहा है - “दण्डकारण्यं चित्तबलव्यतिरेकेण कः शारीरेण कर्मणा शून्यं कर्तुमुत्सहेत, समुद्रम् अगस्त्यवद् वा पिबेत्।” अर्थात यदि चित्तबल की सत्ता न होती, तो शारीरिक कर्ममात्र से समृद्ध नगर को कौन दण्डकारण्य बना सकता है? और समुद्र का अगस्त्य की तरह कौन शारीरिक कर्म से पान कर सकता, यदि चित्तबल न होता?

यह व्यास जी के भाष्य में लिखा है। अतः महर्षि व्यास जी भी अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान के इतिहास को सत्य मानते हैं।

स्वामी दयानन्द भी पतंजलिकृत योगसूत्रों पर व्यासमुनि के भाष्य को, अपने सत्यार्थ प्रकाश में, संस्कार विधि तथा भाष्य भूमिका में ग्राह्य तथा प्रामाणिक मान गए हैं।

तब फिर मधुलिका व अन्य आर्यसमाजी यदि स्वामी दयानन्द के मान्य व्यासभाष्य में लिखे इस इतिहास को नहीं मान रहे, तो यह उनकी मूर्खता है। यह तो उनके द्वारा स्वामी जी के मुख पर जूता मारने के समान है, सत्यार्थ प्रकाश,संस्कार विधि, भाष्यभूमिका पर जूता मारने के समान है। बल्कि मैं तो कहता हूँ - यह स्वामी दयानन्द की जीभ को क्यों आए दिन ऐंठते हो, समाजियों?

सत्यार्थ प्रकाश के ११वें समुल्लास में स्वामी दयानन्द लिखते हैं-- “शारीरिक सूत्र, योगशास्त्र के भाष्य आदि व्यासोक्त ग्रंथों के देखने से विदित होता है कि व्यास जी बड़े विद्वान, सत्यवादी, धार्मिक योगी थे।”

तो प्रिय मधुलिका जी, इसी व्यासभाष्य में लिखा हुआ अगस्त्य ऋषि का समुद्रपान गप्प सिद्ध न हुआ, यथार्थ सिद्ध हुआ। तो आपके भी दयानन्द स्वामी का अनुयायी होने से इस घटना को झूठ, गप्प, असंभव कहने का कहाँ अवकाश रहा?

आद्यशंकराचार्य जी ने भी अगस्त्य ऋषि के समुद्रपान को अपने गीताभाष्य में माना है। विचार कीजिए, जिस इतिहास को महर्षि वेदव्यास से लेकर आद्यशंकराचार्य तक मानते हैं, उस इतिहास का निकृष्ट आर्यसमाजी मजाक उड़ाते हैं। क्या यही वैदिकता हैं? यही है ऋषि मुनियो के प्रति प्रेम? मधुलिका जी इसे “पापलीला” बताती हैं, कहती हैं कि उन्हें इन पर लज्जा आती है। मधुलिका जी, आपको लज्जा तो अपनी संकीर्ण बुद्धि पर आनी चाहिए। 

और देखिए, ऋग्वेद में लिखा है - “तपसा ये अनाधृष्याः”- अर्थात तपस्वी को कोई नहीं दबा सकता। तब तपस्वी अगस्त्य को समुद्र की विशालता कैसे दबा सकती है?

महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है - “न तपसा न साध्यं नाम किञ्चन।” तपस्या से कुछ भी असाध्य नहीं है।

महाभारत में अगस्त्य ऋषि के लिए लिखा है - “पीतः समुद्रोऽगस्त्येन अगाधो ब्रह्मतेजसा” (आदि पर्व)। अर्थात अगस्त्य ने ब्रह्मतेज के बल से समुद्रपान कर डाला।  

समुद्रमपिबत्‌ क्रुद्ध: सर्वलोकस्य पश्यत:॥ (महाभारत वनपर्वणि) । महाभारत में तो इस पूरी कथा को विस्तार से लिखा गया हैं।

इस महाभारत के प्रमाण को मानेंगी या नहीं, मधुलिका जी? 

अब भी थोड़ी शंका शेष है, तो श्री यास्क के निरुक्त को देख लो। उसे तो प्रमाण मानते हो न?

निरुक्त में विश्वामित्र ऋषि के विषय में लिखा है कि जब ऋषि सुदास राजा का यज्ञ कराकर बहुत-सा धन प्राप्त करके व्यास और सतलुज नदियों के संगम पर पहुँचे, उस समय चोर उनसे धन हरण करने को पीछे लगे। विश्वामित्र ने नदियों में बड़ा प्रवाह देखकर नदियों को प्रेरित किया - “गाधा भवति” (निरुक्त २।२४।६)। अगाध तुम नदिया गाध हो जाओ, अर्थात थोड़े जल वाली हो जाओ। यही इस वेदमंत्र में कहा गया है - “रमध्वं मे वचसे ऋतावरीः उप” (ऋग्वेद )।

इस वेदमंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं और देवता प्रौच्यमान - नदियाँ हैं।

इस मंत्र का अर्थ निरुक्तकार ने किया है - “उपरमध्वं मे वचसे”, अर्थात हे नदियो, मेरे वचन की पूर्ति के लिए तुम रुक जाओ। पहले तो नदियों ने न माना, अंत में मान लिया; अर्थात विश्वामित्र के वचन से वे थोड़े जल वाली हो गईं। यही निरुक्त में लिखा है - “प्रत्याख्याय अन्तत आशुश्रुवुः।” यह होती है तपस्वी के वचन की महिमा।

तो मधुलिका जी व आप जैसे संकीर्ण बुद्धि के आर्यसमाजी चलिए वेदों को नहीं मानेंगे, ब्राह्मण ग्रंथों को भी नहीं मानेंगे, महाभारत के भी प्रमाण को नहीं मानेंगे;, निरुक्त से भी मुंह फेर लेंगे, किन्तु अपने अलबेले कलयुगी ऋषि दयानन्द की बात तो मानेंगे न?

आर्यसमाज के स्वामी सत्यानन्द के बनाए स्वामी दयानन्द के जीवनचरित्र “दयानन्दप्रकाश” में लिखा है कि एक सज्जन ने स्वामी दयानन्द से निवेदन किया - “भगवन्, पातंजल शास्त्र का विभूतिपाद क्या सच्चा है?”

तब स्वामी दयानन्द ने कहा - “आप यों ही संदेह करते हैं, योगशास्त्र तो अक्षरशः सत्य है।”

यदि ऐसा है, तब इस योगशास्त्र में जलभूत के वशीकरण द्वारा समुद्र को पीना, सुखाना, कम पानी का कर देना या कुछ भी कर देना तो बड़ी सामान्य-सी बात है। और फिर स्वामी दयानन्द के मान्य योगसूत्र के व्यासभाष्य में तो स्पष्ट नाम लेकर “समुद्रम् अगस्त्यवद् वा पिबेत्” कहते हुए इस इतिहास को बताया गया है। 

योगदर्शन के भाष्य में महर्षि वेदव्यास लिखते हैं कि - " महर्षि अगस्त्य का समुद्रपान जलप्रकृति के अवयवो के अपसारण का दृष्टांत हैं। अर्थात समुद्रपान करते समय विशाल सागर स्वल्प परिमाण वाला बन गया और अगस्त्य मुनि ने उसका पान कर लिया। (योगसूत्र, व्यास भाष्य)

आर्यसमाजियों को पुराण आदि में ऋषि-मुनियों के लोकोत्तर कर्मों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि जिन भूतों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता, वे योगी, तपस्वी व ऋषियों के संकल्प के अनुसार चलते हैं।

अतः सब प्रकार से सिद्ध होता है कि तपशक्ति से समुद्रपान असंभव नहीं है। हाँ, ऐसे कर्म सर्वसाधारण नहीं हैं, अपवाद ही हैं अपवाद कदाचित् होता है, सार्वत्रिक नहीं। तो आर्यसमाजियों को पुराण आदि में जहाँ-जहाँ ऋषियों व देवताओं के ऐसे अद्भुत कार्य दिखाई दें, तो इसे समझने का प्रयास करें, न कि अपनी मूर्खता के चलते उनका उपहास उड़ाया करें। अगर नहीं समझ में आते है तो हमारे पास आओ, हम समझाएँगे न।

आशा है मधुलिका जी एवं उनके जैसे दयानन्दी इस सत्य को स्वीकार करेंगे।

एक बात और समझ लें - अनेक मूर्ख हिन्दू (अर्ध-आर्यसमाजी), और नए नवले बने हुये आर्यसमाजी, जो कि आर्यसमाज के दुष्प्रचार से प्रभावित होकर न्याय एवं मीमांसा के सिद्धान्तों के अनुसार बिना विचार किए ही, पुराण, महाभारत, रामायण आदि इतिहास की इन अलौकिक घटनाओं की निंदा करते हैं, इन्हें अपशब्द कहते हैं, वे वास्तव में केवल इन घटनाओं को ही नहीं, बल्कि वेदों को अपशब्द कहने का पाप कर रहे होते हैं। योगदर्शन आदि वैदिक ग्रंथों को अपशब्द कहने का पाप कर रहे होते हैं। ऋषि-मुनियों को अपशब्द कहने का पाप कर रहे होते हैं। वे सोच भी नहीं सकते कि किस प्रकार वे अपने पाप का घड़ा इन आर्यसमाजियों के बहकावे में आकर भरते जा रहे हैं। वे सावधान हो जाएँ, अन्यथा वेदधर्म के ऋषि-मुनियों, शास्त्रों आदि के प्रति ऐसा अपराध करने के कारण सब के सब दुर्गति को प्राप्त होंगे। इस पाप के फल से स्वामी दयानन्द तक न बच सके थे, तुम्हारी क्या औकात है?
✍️शचींद्र शर्मा
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