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Thursday, 11 December 2025

नास्तिक और विक्षिप्त मनोरोगी में अंतर

पिछले साल मुझे गर्मियों की छुट्टियों के समय कुछ बेहद पुरानी किताबें पढ़ने का समय मिला। उसी में एक पिछले सदी के महान दार्शनिक जे कृष्णमूर्ति की बुक थी।

बताते चलें जे कृष्णमूर्ति पिछले सदी के एक महान अज्ञेयवादी दार्शनिक थे, अज्ञेयवादी बहुत सारे विषय पर निश्चित निष्कर्ष नहीं निकालते क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से सिद्ध करना कठिन होता होता है, ईश्वर भी उनके लिए एक ऐसा ही विषय है।

खैर मूल विषय पर आते हैं तो उनके बुक में एक चैप्टर था – (नास्तिक और विक्षिप्त मनोरोगी में अंतर)

कृष्णमूर्ति ने अपनी किताब में बताया कि एक बार दक्षिण भारत के कुछ लोग जो एक राजनीतिक मूवमेंट से जुड़े हुए थे संभवतः वह पेरियारवादियों की ओर ही इशारा कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि एक बार उसी पॉलीटिकल मूवमेंट से जुड़े एक व्यक्ति उनके पास आया और जे कृष्णमूर्ति से पूछा कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं तो जे कृष्णमूर्ति ने कहा नहीं।

जे कृष्णमूर्ति का जवाब सुनते ही वह व्यक्ति उग्र होकर देवी देवताओं को गाली देने लगा।

अब जे कृष्णमूर्ति ने उस व्यक्ति से कहा कि वास्तव में आप नास्तिक नहीं एक विक्षिप्त मनोरोगी हैं, क्योंकि अगर आप ईश्वर को मान ही नहीं रहे हैं, आप राम कृष्ण के अस्तित्व को मानते ही नहीं हैं तो आप राम और कृष्ण से नफरत कैसे कर सकते हैं।

मतलब कि क्या कोई व्यक्ति काल्पनिक चरित्रों से नफरत कर सकता है।

फिर इसके बाद जे कृष्णमूर्ति ने कहा कि एक तरफ तो आपको धर्म ग्रंथों पर विश्वास ही नहीं है... लेकिन अपनी मन की भड़ास निकालने के लिए उन्ही धर्म ग्रंथों का संदर्भ विशेष में प्रयोग भी करते हैं!

फिर इतना समझने के बाद मुझे वास्तव में नास्तिक और मनोरोगी के बीच में अंतर समझ में आने लगा कि कौन व्यक्ति वास्तव में नास्तिक है और कौन बस हिंदू विरोधी कुंठा का शिकार है!

संपूर्ण बातों का यह सार था कि पेरियार जैसे लोग वास्तव में नास्तिक नहीं – यह विक्षिप्त मनोरोगी हैं!... क्योंकि अगर राम, कृष्ण का अस्तित्व ही नहीं मानते तो राम और कृष्ण से इन्हें नफरत कैसे हो सकती है!... क्योंकि काल्पनिक चरित्र से किसी को नफरत तो हो ही नहीं सकती!

किताब में आगे जे कृष्णमूर्ति ने यह भी कहा कि आप लोग जब धर्म ग्रंथों पर विश्वास ही नहीं करते तो उन्हें धर्म ग्रंथों के कुछ प्रसंगों का प्रयोग अपने मन की भड़ास निकालने के लिए कैसे कर सकते हैं!

पेरियार ने जो रामायण के नाम पर एक किताब लिखी थी उसमें भी उसने वही किया था। एक तरफ वह कहता था कि हिंदू धर्म ग्रंथ पाखंड है, मनगढ़ंत है लेकिन अपने मन की भड़ास निकालने के लिए उनके संदर्भ विशेष के प्रसंगों का प्रयोग जरूर किया!

कुल मिलाकर जे कृष्णमूर्ति की किताब पढ़ने के बाद मुझे समझ में आया कि वास्तव में हम जिन्हें कई बार नास्तिक समझते हैं वह वास्तव में मनोरोगी लोगों का समूह है!... जो अपनी कुंठा को शांत करने के लिए बस अपने को नास्तिक दिखाता है! लेकिन वह एक मनोरोगी है जिनका स्थान केवल पागलखाना है।

क्योंकि कृष्णमूर्ति के तर्क अकाट्य थे कि कोई व्यक्ति कभी काल्पनिक चरित्रों से नफरत कर ही नहीं सकता! अगर नफरत कर रहा है तो वह कोई नास्तिक नहीं बल्कि कुंठित और मनोरोगी है!

फोटो विक्षिप्त मनोरोगी पेरियार की जिसमें वह भगवान गणेश की प्रतिमा तोड़ रहा है...

वैसे इस धरती पर कई मनोरोगी आए और चले गए , अभी भी मौजूद है और आगे भी आते रहेंगे लेकिन इनके पागलपन से करोड़ आस्थावान समाज की आस्था क्षणिक भी विचलित नहीं होती है।

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साभार -https://www.facebook.com/share/p/1Bjgj8awCx/ 
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