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Saturday, 25 April 2026

भर्तृहरि

श्मशान की राख में रोटियाँ सेंकते उस भूखे संन्यासी ने जब आखिरी कौर भी एक अजनबी को दे दिया, तब मेरी आत्मा काँप उठी—“जिसके पास कुछ नहीं, वही सबसे बड़ा दानी कैसे निकला?”
श्मशान की रात थी।

आसमान पर बादल बहुत नीचे झुक आए थे, जैसे धरती का दुःख सुनने उतर आए हों। उज्जैन के बाहर शिप्रा किनारे बने उस पुराने श्मशान में हवा राख की गंध लेकर घूम रही थी। कहीं अधजली लकड़ियाँ धुआँ दे रही थीं, कहीं दूर कोई कुत्ता रो रहा था, और कहीं किसी पीपल की सूखी डालें कराहती-सी हिल रही थीं। उसी भयावह, सुनसान, काँपती रात में एक आदमी चिता की बुझती अंगारों पर रोटियाँ सेंक रहा था।

वह कोई साधारण आदमी नहीं था।

वह था भर्तृहरि—उज्जैन का वही पूर्व नरेश, जिसने कभी रेशमी बिस्तरों पर रातें काटी थीं, जिसके इशारे पर राजदरबार झुक जाता था, जिसके महल में सोने के दीप जलते थे। आज वही भर्तृहरि फटे गेरुए वस्त्रों में, सूखी देह, धँसी आँखों और शांत चेहरे के साथ मृतक को पिंडदान में दिए गए आटे से चार छोटी रोटियाँ बना रहा था। भूख से उसके हाथ काँप रहे थे, पर चेहरे पर शिकायत नहीं थी। आँखों में कोई हाहाकार नहीं, बस एक गहरा, अद्भुत सन्नाटा था।

कैलाश से यह दृश्य देखती हुई माँ पार्वती का हृदय कसक उठा।

उन्होंने व्याकुल होकर महादेव की ओर देखा, “स्वामी! यह कैसा अन्याय है? आपका इतना बड़ा भक्त, जिसने राज-पाट छोड़ दिया, जिसे आपने वैराग्य का मार्ग दिखाया, वह आज श्मशान में चिता की आग पर रोटियाँ सेंक रहा है? कई दिनों से भूखा है, फिर भी आपकी दया नहीं पिघलती?”

महादेव ने मंद मुस्कान से उन्हें देखा। उनके नेत्रों में करुणा भी थी और रहस्य भी। बोले, “देवि, मेरा द्वार उसके लिए सदा खुला है। मैं चाहूँ तो एक क्षण में उसके सामने सोने के पर्वत खड़े कर दूँ। पर समस्या यह नहीं कि मैं देता नहीं… समस्या यह है कि वह लेता नहीं।”

पार्वती चौंकीं, “लेता नहीं? कौन भूखा व्यक्ति अन्न ठुकराता है?”

शंकर ने धीरे से कहा, “जो भूख को भी साधना बना ले, वह संसार की चीज़ों को पेट से नहीं, दृष्टि से देखता है। तुम चाहो तो परीक्षा ले लो। पर सावधान रहना—तुम्हें उसका अभाव दिखेगा, पर उसका वैभव नहीं दिखेगा।”

पार्वती के मन में जिज्ञासा और करुणा दोनों उमड़ पड़ीं। अगले ही क्षण उन्होंने एक वृद्ध भिखारिन का रूप धारण किया। कमर झुकी हुई, चेहरे पर झुर्रियाँ, हाथ काँपते हुए, पैरों में टूटी चप्पलें—ऐसा दीन रूप कि कोई भी देख कर द्रवित हो जाए।

वे धीरे-धीरे भर्तृहरि के पास पहुँचीं।

भर्तृहरि ने ऊपर देखा। सामने खड़ी बूढ़ी स्त्री का चेहरा थकान और भूख से सूख गया था। उसने काँपती आवाज़ में कहा, “बेटा… तीन दिन से पेट में अन्न का दाना नहीं गया। क्या कुछ खाने को मिलेगा?”

भर्तृहरि ने बिना एक शब्द बोले अपनी चार रोटियों में से दो उठाईं और उसके हाथ पर रख दीं। फिर पास के टूटे हुए घड़े से थोड़ा पानी लेकर उसके आगे बढ़ाया, “माता, पहले पानी पी लीजिए। सूखा कौर गले में अटकता है।”

भिखारिन ने रोटियों को देखा, फिर और भी दीन स्वर में बोली, “बेटा… मैं अकेली नहीं हूँ। मेरा बूढ़ा पति भी कई दिनों से भूखा है। इन दो रोटियों से हम दोनों का क्या होगा?”

एक क्षण के लिए भी भर्तृहरि का हाथ नहीं रुका।

उसने शेष दो रोटियाँ भी उठाईं, बड़े आदर से उसके हाथों पर रख दीं, जैसे दान नहीं, पूजा कर रहा हो। फिर मुस्कराकर बोला, “तो फिर ये भी ले जाइए, माता। आज मेरा पेट पानी से भर जाएगा, पर किसी बूढ़े दंपति का जीवन अन्न से बच जाएगा—इससे बड़ा भोजन क्या होगा?”

भिखारिन ने विस्मित होकर पूछा, “और तुम? तुमने तो कुछ बचाया ही नहीं!”

भर्तृहरि ने कमंडल उठाकर पानी पिया, आँखें बंद कीं और लंबी साँस लेकर कहा, “मैं भूखा हूँ, पर विवश नहीं। जिसे देने का सुख मिल जाए, उसकी आधी भूख उसी क्षण मर जाती है।”

वह उठकर जाने लगा।

तभी पीछे से आवाज़ आई—अब वह आवाज़ काँपती बूढ़ी स्त्री की नहीं, दिव्य तेज से भरी जगदंबा की थी।

“वत्स, ठहरो।”

भर्तृहरि ने पीछे मुड़कर देखा—श्मशान की राख के बीच, अंगारों की लाल रोशनी में माँ पार्वती अपने वास्तविक स्वरूप में खड़ी थीं। उनके आसपास प्रकाश का मंडल फैल गया था। रात जैसे झुककर प्रणाम कर रही थी।

भर्तृहरि तत्काल भूमि पर दंडवत लेट गया, “माँ!”

माता पार्वती ने उसे उठाया। उनकी आँखों में स्नेह था, पर भीतर कहीं एक हल्की लज्जा भी। बोलीं, “मैं तुम्हारी करुणा, संतोष और त्याग से प्रसन्न हूँ। वर माँगो। जो चाहो, वही दूँगी।”

भर्तृहरि ने कुछ क्षण उनकी ओर देखा। फिर शांत स्वर में बोला, “माता, अभी तो आप स्वयं भिखारिन बनकर मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो हाथ फैलाकर माँगे, उससे मैं क्या माँगूँ?”

पार्वती कुछ पल मौन रह गईं। अगले ही क्षण उनके होंठों पर मुस्कान आई। “वत्स, वह मेरी परीक्षा थी, अभाव नहीं। मैं सर्वशक्तिमान शिव की अर्धांगिनी हूँ। सारा ब्रह्मांड मेरे आंचल में समाया है। निस्संकोच माँगो।”

भर्तृहरि ने सिर झुका लिया। उसके स्वर में इतनी सच्चाई थी कि स्वयं श्मशान की हवा थम गई।

“यदि आप सचमुच प्रसन्न हैं, माँ, तो मुझे धन, राज्य, आयु या सिद्धि नहीं चाहिए। मुझे ऐसा हृदय दीजिए कि जो भी मेरे पास आए, मैं उसे बाँट सकूँ। ऐसा मन दीजिए कि अभाव में भी विकल न होऊँ। और ऐसी दृष्टि दीजिए कि मैं दीन-दुखियों में ही आपका चेहरा देखता रहूँ।”

माँ पार्वती की आँखें भर आईं। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा, “एवमस्तु।”

👉कैलाश लौटते समय उनका मन असाधारण रूप से शांत था, पर साथ ही एक प्रश्न अब भी भीतर जगा हुआ था। उन्होंने शिव से कहा, “स्वामी, मैं मान गई कि आपका भक्त महान है। पर संसार? संसार तो बाहरी चीज़ें देखता है। लोग उसके फटे वस्त्र देखेंगे, खाली हाथ देखेंगे, और कहेंगे—यह आदमी सब हार गया। क्या दुनिया उसकी ऊँचाई समझ पाएगी?”
महादेव ने नेत्र मूँदे और बोले, “दुनिया देर से समझती है, देवी, पर सत्य को अंततः स्वीकार करना ही पड़ता है। भर्तृहरि की कथा अभी अधूरी है। अभी समय उसे दुनिया के बीच खड़ा करेगा—जहाँ लोग उसके वैराग्य को पागलपन समझेंगे, फिर उसी के सामने सिर झुकाएँगे।”
अगली सुबह सूरज हल्का-सा चढ़ा ही था कि भर्तृहरि वनमार्ग पर आगे बढ़ रहा था। पैरों में धूल थी, देह थकी थी, पर मन स्थिर था। रास्ते में महुए के पेड़ों की छाँव पड़ती, फिर हट जाती। तभी पीछे से घोड़ों की टाप सुनाई दी।
कुछ राजदरबारी थे—उज्जैन के पुराने मंत्री, सैनिक और सेवक। जैसे ही उन्होंने भर्तृहरि को देखा, घोड़ों से उतरकर उसके चरणों में गिर पड़े।
“महाराज!” प्रधान मंत्री की आवाज़ भर्रा गई, “हमने आपको बहुत ढूँढ़ा। आपके बिना राज्य बिखर रहा है। प्रजा भयभीत है। महल की दीवारें वैभव से भरी हैं, पर उनमें प्राण नहीं रहे। कृपया लौट चलिए।”
एक सैनिक ने आगे बढ़कर रेशमी कपड़े में लिपटी थैली खोली। उसमें स्वर्ण मुद्राएँ थीं, इतनी कि किसी गाँव का भाग्य बदल जाए। दूसरे ने राजसी वस्त्र आगे बढ़ाए। “महाराज, यह स्वीकार कीजिए। कम-से-कम अपनी गरिमा के योग्य तो रहिए।”
भर्तृहरि ने स्वर्ण पर एक नज़र डाली, फिर सामने बैठे एक लकड़हारे पर दृष्टि गई। वह बूढ़ा आदमी थकान से चूर था। उसकी बगल में उसकी दुबली पत्नी बैठी थी, और पास में दो छोटे बच्चे थे, जिनके पेट भूख से फूले हुए थे। लकड़हारे की आँखों में एक असहाय विनती थी, मगर वह बोल भी नहीं पा रहा था।
भर्तृहरि ने बिना कुछ कहे स्वर्ण की पूरी थैली उठाई और उस लकड़हारे की गोद में रख दी।
दरबारी सन्न रह गए।
“महाराज!” मंत्री लगभग चीख पड़े, “यह राजकोष का धन है!”
भर्तृहरि ने शांत स्वर में कहा, “राजकोष का धन? नहीं। यह उस प्रजा का धन है, जो भूखी है। बताओ, अधिक योग्य कौन है—फिर से गद्दी पर बैठा एक वैरागी, या अपने बच्चों को खिलाने को तरसता यह पिता?”
लकड़हारा रो पड़ा। उसके हाथ काँपते हुए थैली को छू रहे थे, जैसे विश्वास ही न हो। “महाराज… मैं तो आपको पहचानता भी नहीं…”
भर्तृहरि मुस्कराया, “पहचान जरूरी नहीं, भूख जरूरी है।”
मंत्री के चेहरे पर पीड़ा थी, “तो क्या आप लौटेंगे नहीं?”
भर्तृहरि ने वृक्ष की छाँव में बैठते हुए कहा, “मैं जब राजा था, तब राज्य मेरा घर था। अब मैं साधु हूँ, तो यह संसार मेरा घर है। जहाँ दुःख है, वहीं मेरा सिंहासन है।”
दरबारी लौट गए, पर जाते-जाते उनके चेहरों पर विस्मय था। उन्हें पहली बार समझ आया कि त्याग शब्द नहीं, निर्णय होता है।
धीरे-धीरे भर्तृहरि की चर्चा उज्जैन से मालवा, मालवा से काशी, काशी से दक्षिण तक फैलने लगी। लोग कहते—एक योगी है, जो भूखा रहकर भी दूसरों को खिला देता है। एक पूर्व राजा है, जो सोना हाथ में आते ही गरीब को दे देता है। एक विरक्त है, जिसके पास कुछ नहीं, फिर भी उसके पास बैठते ही मन हल्का हो जाता है।
पर हर कोई श्रद्धा से नहीं आता था।
एक संध्या वह शिप्रा तट पर बैठे संध्यावंदन कर रहे थे। आसमान में सूर्य की आखिरी लाली तैर रही थी। तभी दूर से पालकी आई। उसके पीछे नौकर, आगे अंगरक्षक। पालकी से एक धनिक उतरा—बहुत कीमती वस्त्र, उँगलियों में हीरे, चाल में अहंकार।

उसने भर्तृहरि को ऊपर से नीचे तक देखा और हल्की हँसी हँसा, “तुम ही हो वो योगी, जिसकी चर्चा सब कर रहे हैं?”

भर्तृहरि ने सिर उठाकर देखा, “लोग जिसे जिस नाम से पुकारें, वही हूँ।”
धनिक ने व्यंग्य से कहा, “सुना है तुम कहते हो कि तुम्हारे पास सब कुछ है। यह कैसी बात है? तुम्हारे पास न महल, न वस्त्र, न धन, न सेवक। मेरे जहाज सात समुद्र पार व्यापार करते हैं। मेरे गोदाम अनाज से भरे हैं। मेरे खजाने में इतना सोना है कि तुम्हारी पूरी पीढ़ी गिन न पाए। अब बताओ—हम दोनों में बड़ा कौन?”

आसपास बैठे लोग साँस रोककर देखने लगे।

भर्तृहरि ने तट की रेत से एक साधारण-सा पत्थर उठाया और उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “यह पकड़ो।”

धनिक ने तिरस्कार से पत्थर लिया। अगले ही क्षण उसकी आँखें फैल गईं—वह साधारण पत्थर चमकदार सोने में बदल चुका था।

भीड़ से एक साथ विस्मय की आवाज़ उठी। धनिक की साँसें तेज हो गईं। उसने सोने को कसकर पकड़ लिया, आँखों में लोभ चमकने लगा।

भर्तृहरि ने उसके चेहरे को पढ़ लिया। “क्या हुआ? अभी तो तुम मुझे निर्धन कह रहे थे। अब इस एक टुकड़े के लिए तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।”

धनिक बुदबुदाया, “यह… यह तो चमत्कार है…”
भर्तृहरि बोले, “नहीं, चमत्कार सोना बनना नहीं है। चमत्कार है—सोने को हाथ में लेकर भी मन का शांत रहना।”

धनिक कुछ कहता, उससे पहले भर्तृहरि उठ खड़े हुए। उनका स्वर अब गहरा था, जैसे किसी ने सीधे आत्मा पर दस्तक दी हो—

“श्रेष्ठ वह नहीं, जिसके पास संग्रह अधिक हो। श्रेष्ठ वह है, जिसे अब और कुछ न चाहिए। तुमने सात समुद्र पार वैभव इकट्ठा किया, पर एक पल की नींद खरीद पाए? एक सच्चा मित्र खरीद पाए? मौत के सामने एक साँस खरीद पाए? तुमने बहुत कुछ जोड़ा, पर शांति नहीं जोड़ी। मैंने बहुत कुछ छोड़ा, इसलिए अब कुछ खोने का भय नहीं रहा। तुम अपने खजाने के चौकीदार हो, मैं अपनी आत्मा का स्वामी हूँ।”

धनिक का चेहरा उतर गया।

भर्तृहरि ने उसके हाथ में रखे सोने की ओर इशारा किया, “इसे ले जाओ। इससे तुम्हारी भूख शायद कुछ देर शांत हो जाए। पर याद रखना—यह सोना तुम्हारी मृत्यु को नहीं टालेगा। और जो आनंद दान में है, वह संचय में कभी नहीं मिलेगा।”

धनिक के होंठ काँपे। उसके भीतर कुछ टूट रहा था। पहली बार शायद किसी ने उसके धन को ललकारा नहीं, उससे बड़ा सत्य सामने रख दिया था। वह धीरे-धीरे घुटनों पर बैठ गया।

“मुझे क्षमा कर दीजिए,” उसने काँपते स्वर में कहा, “मैंने आपको तुच्छ समझा। मैं सबका मालिक बनता रहा, पर आज समझ आया कि मैं अपने लोभ का दास हूँ।”

भर्तृहरि ने उसके सिर पर हाथ रखा, “समझ आ जाए, वही मुक्ति की शुरुआत है। धन बुरा नहीं, धन का घमंड बुरा है। संग्रह बुरा नहीं, संग्रह का मद बुरा है। जो बाँट दे, वह धन भी तप बन जाता है।”
धनिक की आँखों से आँसू गिरने लगे। उसने वहीं प्रतिज्ञा की कि अपने धन का एक बड़ा भाग गरीबों, विधवाओं और भूखे बच्चों के लिए लगाएगा।

कैलाश पर यह दृश्य देखकर माँ पार्वती की आँखें भर आईं। उन्होंने महादेव से धीमे स्वर में कहा, “स्वामी, अब समझी। अभाव उसके वस्त्रों में है, आत्मा में नहीं। उसके पास न रोटी, न राज्य, न स्वर्ण—फिर भी उसके चेहरे पर जो तेज है, वह राजाओं में कहाँ!”

महादेव ने मुस्कराकर कहा, “प्रिय पार्वती, सच्चा भक्त वह नहीं, जो मुझसे अपनी झोली भरने की प्रार्थना करे। सच्चा भक्त वह है, जो स्वयं खाली रहकर भी दूसरों की झोली भरता रहे। दरिद्रता देह के बाहर होती है, भीतर नहीं। जिसने अपनी इच्छाओं को जीत लिया, उससे बड़ा सम्राट कौन?”

समय बीतता गया। भर्तृहरि अब जहाँ जाते, लोग केवल दर्शन के लिए नहीं, सीखने के लिए आते। कोई पूछता, “स्वामी, दुख में टूटें नहीं कैसे?” कोई कहता, “घर में कमी है, मन में आग है, क्या करें?” कोई रोते हुए कहता, “हमें धोखा मिला, अब जीएँ कैसे?”

भर्तृहरि सबकी बातें सुनते, फिर बहुत शांत स्वर में कहते, “जो चला गया, उसे शोक दो; जो बचा है, उसे अर्थ दो। जीवन हमसे सब कुछ छीनकर भी हमें एक चीज़ हमेशा देता है—दूसरों का दर्द समझने की क्षमता। उसी से नई शुरुआत होती है।”

एक दिन एक विधवा स्त्री अपने छोटे बेटे को लेकर उनके पास आई। बच्चे ने पूछा, “बाबा, हम गरीब क्यों हैं?”

भर्तृहरि ने उसे गोद में बिठाया और कहा, “बेटा, जिसके घर में रोटी कम हो, वह गरीब नहीं होता। गरीब वह होता है, जिसके घर में दया कम हो। तुम अपनी माँ का हाथ कभी मत छोड़ना। तुम दोनों के पास प्रेम है—इससे बड़ा खजाना नहीं।”

वह बच्चा मुस्कराया। उसकी माँ फूट-फूटकर रो पड़ी।

उस रात भर्तृहरि शिप्रा तट पर बैठे लंबे समय तक लिखते रहे। चाँदनी पानी पर थिरक रही थी। हवा में कहीं धूप, कहीं राख, कहीं रातरानी की गंध थी। उनके सामने ताड़पत्र रखा था। उँगलियों में कमज़ोरी थी, पर लेखनी में अग्नि।

वे अपने वैराग्य, संतोष, जीवन और मृत्यु के अनुभवों को श्लोकों में उतार रहे थे। हर पंक्ति जैसे भीतर की जली हुई लकड़ियों से निकली राख नहीं, प्रकाश थी। अंततः उन्होंने लेखनी रोक दी।

आखिरी पंक्ति लिखने के बाद उन्होंने आकाश की ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा, “राजा महलों में रहकर इतिहास बन सकता है, पर जो मनुष्य अपनी भूख बाँट दे—वह स्मृति नहीं, प्रेरणा बन जाता है।”

उसी क्षण जैसे कोई अदृश्य आशीष शिप्रा तट पर उतर आई। हवा एकदम शांत हो गई। दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी। भर्तृहरि ने आँखें बंद कर लीं।

कहते हैं, उस दिन से उज्जैन के लोग जब भी श्मशान की ओर देखते, उन्हें भय कम और सत्य अधिक दिखाई देता। क्योंकि उसी भूमि ने एक भूखे आदमी को देवताओं से भी बड़ा बना दिया था—इसलिए नहीं कि उसने चमत्कार किया, बल्कि इसलिए कि उसने भूख से बड़ी करुणा दिखा दी।

और यही उसकी अमरता थी।

जिसने राज्य छोड़ा, वह हारकर नहीं गया था।

जिसने रोटियाँ बाँट दीं, वह खाली नहीं हुआ था।

जिसने सोना ठुकराया, उसने दुनिया का सबसे दुर्लभ धन पा लिया था—संतोष।

भर्तृहरि की कथा आज भी इसलिए जीवित है, क्योंकि वह हमें एक असुविधाजनक, मगर सुंदर सच याद दिलाती है—जीवन का सबसे बड़ा वैभव हमारे पास क्या है, यह नहीं; बल्कि जो थोड़ा है, उसमें से हम किसे कितना दे पाते हैं, यही है।

और शायद इसी कारण, श्मशान की उस राख भरी रात में सेंकी गई चार रोटियाँ किसी राजा के हजारों थालों से कहीं अधिक पवित्र बन गईं।

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