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Sunday, 8 March 2026

मानव देह मिलती है तो वह केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि बोध के लिए मिलती है।

॥ॐ॥

       शास्त्रों में 84 लाख योनियों का उल्लेख केवल संख्या बताने के लिए नहीं है, बल्कि यह समझाने के लिए है कि चेतना अनेक स्तरों से गुजरते हुए परिपक्व होती है। जब मानव देह मिलती है तो वह केवल भोग के लिए नहीं, बल्कि बोध के लिए मिलती है। अन्य योनियों में प्राणी मुख्यतः प्रवृत्ति और प्रकृति के नियमों से संचालित होते हैं, पर मनुष्य में विवेक, विचार और आत्मचिंतन की क्षमता है। यही क्षमता उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से ऊपर उठने का अवसर देती है।

लेकिन आज अधिकांश लोग इस अमूल्य अवसर को पहचान नहीं पाते। जीवन का अधिकांश समय संबंधों, इच्छाओं, संग्रह और प्रतिस्पर्धा में निकल जाता है। परिवार और जिम्मेदारियाँ स्वाभाविक हैं, पर जब वही अंतिम सत्य बन जाएँ और आत्मबोध पीछे छूट जाए, तब मनुष्य अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है। हम ऐसे जीते हैं मानो यह शरीर स्थायी है, मानो समय हमारे लिए रुक जाएगा। जबकि सत्य यह है कि जन्म के साथ ही मृत्यु की यात्रा भी प्रारंभ हो जाती है। हर बीतता दिन आयु को घटा रहा है, चाहे हम इसे स्वीकार करें या नहीं।
हम प्रतिदिन वृद्धावस्था और मृत्यु को अपने आसपास देखते हैं। किसी का शरीर ढलता है, कोई अचानक चला जाता है, फिर भी मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि एक दिन यह क्रम हमारे साथ भी होगा। यही माया है—अस्थायी को स्थायी मान लेना। मन भविष्य की योजनाएँ बनाता रहता है, पर यह नहीं सोचता कि यदि आज ही अंतिम दिन हो तो क्या हमने जीवन का वास्तविक प्रयोजन पूरा किया है।

मानव देह का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी जागृत होना है। अपने कर्मों को साधना बनाना, अपने विचारों को शुद्ध करना, और यह स्मरण रखना कि हम केवल शरीर नहीं, चेतना हैं। जब यह स्मरण स्थिर होने लगता है, तब मोह बंधन नहीं रह जाता, वह कर्तव्य बन जाता है। इच्छाएँ हमें खींचती नहीं, हम उन्हें दिशा देते हैं।

समय बहुत सूक्ष्म गति से निकल रहा है। हर श्वास हमें या तो मुक्ति के निकट ले जा रही है या फिर पुनः बंधन की ओर। प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास कितना समय है, प्रश्न यह है कि जो समय है उसका उपयोग किस लिए हो रहा है। यदि मानव देह मिलकर भी हम केवल भोग, क्रोध, लोभ और मोह में उलझे रहें, तो यह अवसर व्यर्थ चला जाएगा। पर यदि जागृति आ जाए, तो यही देह साधन बन सकती है, यही जीवन द्वार बन सकता है उस स्थिति का जहाँ जन्म और मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
शिव अघोरनाथ
श्यामा पीठ रहस्य 

वयं राष्ट्रे जागृयाम