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Thursday, 25 December 2025

कृतज्ञता की पराकाष्ठा

कृतज्ञता की पराकाष्ठा - एक तोते और सूखे वृक्ष की कथा

प्राचीन काल की बात है, एक घने वन में एक विशाल और अति सुंदर वृक्ष था। वह वृक्ष इतना बड़ा और घना था कि मानो वन का राजा हो। उसकी शाखाएं आकाश को छूती थीं और उस पर लगने वाले फल अत्यंत मीठे और रसीले थे। उस वृक्ष पर हजारों पक्षियों का बसेरा था, जिनमें एक धर्मात्मा तोता (शुक) भी रहता था। वह तोता उसी वृक्ष के कोटर (खोखले तने) में जन्मा था और वर्षों से वहीं निवास कर रहा था।

एक दिन वन में एक शिकारी शिकार की तलाश में आया। उसने एक हिरण को देखा और उस पर अपना विषाक्त (जहरीला) बाण छोड़ दिया। दुर्भाग्यवश, हिरण तो बचकर भाग गया, लेकिन वह जहरीला तीर सीधे उस विशाल वृक्ष के तने में जाकर धंस गया।

बाण का जहर इतना तीव्र था कि उसका प्रभाव धीरे-धीरे पूरे वृक्ष में फैलने लगा। जो वृक्ष कभी फलों और फूलों से लदा रहता था, वह अब सूखने लगा। उसकी हरी पत्तियां झड़ गईं, डालियां काली पड़ गईं और छाल उखड़ने लगी। वृक्ष को मरते देख, उस पर रहने वाले सभी पक्षी, कीड़े-मकौड़े और जीव-जंतु एक-एक करके उसे छोड़कर दूसरे हरे-भरे पेड़ों पर चले गए।

पूरा वृक्ष वीरान हो गया, लेकिन वह एक बूढ़ा तोता कहीं नहीं गया। वह उसी सूखे, ठूँठ हो चुके वृक्ष की डाल पर बैठा रहता। न उसे खाने को फल मिलते, न छाया। भूख और प्यास से तोता भी धीरे-धीरे कंकाल जैसा होने लगा। उसके पंख टूटने लगे और शरीर शिथिल पड़ गया, लेकिन उसने उस वृक्ष का साथ नहीं छोड़ा। उसका यह तप और त्याग देखकर वन के देवता भी हैरान थे।

तोते की इस अद्भुत निष्ठा की चर्चा स्वर्गलोक तक पहुंची। देवराज इंद्र को विश्वास नहीं हुआ कि एक पक्षी में इतना मोह और त्याग हो सकता है। परीक्षा लेने के लिए इंद्र ने एक ब्राह्मण (मानव रूप) का वेश धारण किया और उस सूखे पेड़ के पास पहुंचे।

इंद्र ने तोते को संबोधित करते हुए कहा, "हे पक्षीराज! तुम इस सूखे और निर्जीव पेड़ पर क्यों बैठे हो? देखो, यह अब मर चुका है। न इस पर पत्ते हैं, न फल, और न ही यह तुम्हें कोई छाया दे सकता है। पास ही सुंदर वन है, जहाँ फलों से लदे वृक्ष और स्वच्छ पानी के सरोवर हैं। तुम अपनी जान जोखिम में डालकर यहाँ क्यों प्राण त्याग रहे हो? मूर्खता छोड़ो और कहीं और चले जाओ।"
तोते ने अपनी कमजोर आँखों से इंद्र की ओर देखा और अत्यंत विनम्रता और दृढ़ता से उत्तर दिया:

> "हे पथिक! आप विद्वान प्रतीत होते हैं, पर आपकी बातें धर्म के विरुद्ध हैं।

> मैं इसी वृक्ष पर पैदा हुआ। इसी की गोद में मैंने उड़ना सीखा। इसके मीठे फलों ने वर्षों तक मेरी भूख मिटाई और इसकी घनी छांव ने मुझे आंधी-तूफान और शिकारियों से बचाया। यह वृक्ष मेरे माता-पिता और सखा के समान है।

> जब यह समर्थ था, फल-फूल रहा था, तब मैंने इसका सुख भोगा। आज जब इस पर विपत्ति आई है, तो मैं इसे छोड़कर कैसे जा सकता हूँ? सुख में साथ देना और दुःख में मुख मोड़ लेना, यह तो स्वार्थियों और कायरों का काम है। मैं कृतघ्न (एहसान फरामोश) नहीं बन सकता। मैं इसी के साथ जिया हूँ और इसी के साथ अपने प्राण भी त्याग दूंगा।"

तोते के मुख से धर्म और प्रेम की ऐसी बातें सुनकर देवराज इंद्र का हृदय पिघल गया। वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए।
इंद्र बोले, "हे धर्मात्मा शुक! मैं तुम्हारी कृतज्ञता और वफ़ादारी से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मनुष्यों में भी ऐसा त्याग दुर्लभ है। मांगो, तुम जो वरदान मांगना चाहते हो।"

तोते के पास अवसर था कि वह अपने लिए अमरता, शक्ति या ढेर सारा भोजन मांग लेता। लेकिन उसने कहा:

"देवराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो बस एक ही वरदान दीजिये। मेरे इस आश्रयदाता वृक्ष को पुनः जीवित कर दीजिये। इसकी सूखी टहनियों में फिर से जीवन भर दीजिये, ताकि यह पहले की तरह हरा-भरा हो जाए।"

इंद्र ने तोते के निस्वार्थ प्रेम को नमन किया और उस वृक्ष पर अमृत की वर्षा कर दी। देखते ही देखते वह सूखा हुआ ठूँठ फिर से नई पत्तियों, फलों और फूलों से लद गया। वृक्ष की शोभा पहले से भी अधिक बढ़ गई। तोता और वृक्ष, दोनों ने अपना शेष जीवन आनंदपूर्वक व्यतीत किया।

यह कथा हमें जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्यों का पाठ पढ़ाती है:

 * सच्ची वफादारी: सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में साथ न छोड़े।

 * कृतज्ञता (Gratitude): जिसने हमारा पालन-पोषण किया हो या बुरे वक्त में मदद की हो, उसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए।

 * स्वार्थ से ऊपर धर्म: अपना पेट भरने के लिए रिश्तों को छोड़ देना अधर्म है।

जैसा कि भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा था: "सच्चा साथी वही है जो श्मशान तक साथ निभाए, केवल सुख के साथी तो बहुत मिल जाते हैं।"

✍️ Braham Yugam
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वयं राष्ट्रे जागृयाम 

काँच और हीरे की पहचान

एक राजा का दरबार लगा हुआ था, क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था।
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी .. 
महाराज के सिंहासन के सामने...एक राजसी मेज थी...
और उस पर कुछ मूल्यवान वस्तुएं रखी थीं।
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..
उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा -
“मेरे पास दो वस्तुएं हैं, मैं हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”.. 
अब आपके नगर मे आया हूँ
राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है” 
तो उसने दोनो वस्तुएं....उस राजसी मेज पर रख दीं..
वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..
राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं, तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न.
इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा।
लेकिन रूप रंग सब एक हैं, कोई आज तक परख नही पाया कि 
" कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा.."
कोइ परख कर बताये की....ये हीरा है और ये काँच.. 
अगर परख खरी निकली...तो मैं हार जाऊंगा और..
यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.
पर शर्त यह है कि " यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी..इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से...जीतता आया हूँ..।"
राजा ने कहा मै तो नहीं परख सकूगा.. 
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते 
क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है.. 
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..
हारने पर पैसे देने पडेगे...
इसका कोई सवाल नही था, 
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था, 
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, 
इसका सबको भय था..
कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. .. 
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई 
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा.. 
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो...
मैने सब बातें सुनी हैं...
और यह भी सुना है कि....
कोई परख नही पा रहा है...
एक अवसर मुझे भी दो.. ..
एक आदमी के सहारे....
वह राजा के पास पहुंचा.. 
उसने राजा से प्रार्थना की...
मै तो जनम से अंधा हू....
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..
और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं..
और यदि सफल न भी हुआ...
तो वैसे भी आप तो हारे ही है..
राजा को लगा कि.....
इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है... 
राजा ने कहा कि ठीक है.. 
तो तब उस अंधे आदमी को...
दोनो चीजे छुआ दी गयी..
और पूछा गया.....
इसमे कौन सा हीरा है....
और कौन सा काँच….?? .. 
यही तुम्हें परखना है.. ..
कथा कहती है कि....
उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया.. और बोला....
“सही है आपने पहचान लिया, धन्य हो आप… 
अपने वचन के मुताबिक यह हीरा..... मैं आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..
सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी 
बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला..
उस आदमी, राजा और अन्य सभी लोगों ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे 
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक धूप मे हम सब बैठे है.. मैंने दोनो को छुआ .. जो ठंडा रहा वह हीरा.....
जो गरम हो गया वह काँच.....जीवन मे भी देखना.....
जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये...वह व्यक्ति "काँच" हैं, और जो विपरीत परिस्थिति में भी ठंडा रहे.....
वह व्यक्ति "हीरा" है..!!

Tuesday, 23 December 2025

जायफल से चिकित्सा - सर दर्द माइग्रेन, मुंह के छाले, खांसी जुकाम और चेहरे का तेज

॥ॐ॥
जायफल को पत्थर पर घिसकर चन्दन की तरह सर पर लगा लें 
सिर दर्द माइग्रेन में आराम मिलेगा ।

छाले हो रहें तो थोड़ा आधे चने बराबर सा घिस कर एक गिलास पानी में मिलाकर कुल्ले करें आराम आयेगा।

खांसी नजला जुकाम नजला कफ हो तो चने के दाने बराबर घिस कर छाती पर लगा लो। तीन दिन में ठीक होगा 

यदि मुह पर तेज नहीं हो तो धूप में काला पड़ जाता हैं जायफल घिसकर कर चेहरे पर उबटन की तरह लगा लें आधा घंटे बाद रगड़ कर उतार दें ।मुख खिल जायेगा।

साभार -
✍️ निशांत गुप्ता 
https://www.facebook.com/share/r/1EMa3ea2er/

वयं राष्ट्रे जागृयाम

खांसी का उपचार

॥ॐ॥
एक पान पत्ते में तीन या चार कालीमिर्च रखिए दो तीन तुलसी के पत्ते एक टुकड़ा धागे वाली मिश्री और एक छोटा सा टुकड़ा प्याज का ..
इसका बीड़ा बना कर इतना चबा लें कि मुंह में पानी बन जाये वो पानी पी जाइए।
जिन लोगों को खांसी हैं और ऐसी जो सालों पुरानी है ..
दो बार इस उपाय को करके देखिए ठीक हो जाएगी 
https://www.facebook.com/share/r/1QmyuZJAAZ/
✍️निशांत गुप्ता
वयं राष्ट्रे जागृयाम 

"श्रीचक्र" में प्रतिष्ठित " षोडश नित्याएँ " – चेतना की पूर्णता का रहस्य

शक्ति के 16 रूप हर पल आपकी चेतना को नियंत्रित करते हैं?”
“श्रीचक्र में प्रतिष्ठित षोडश नित्याएँ – चेतना की पूर्णता का रहस्य”
यह ब्रह्मांड का नक्शा है।
इसे कहते हैं श्रीचक्र।
मध्य में:त्रिपुरा सुंदरी (षोडशी / ललिता महात्रिपुरसुंदरी)
 यही श्रीचक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं
 सम्पूर्ण सृष्टि, शक्ति और सौंदर्य की मूल स्वरूपा
चारों ओर स्थित 15 नित्याएँ
ये देवी के 15 चंद्र कलाओं का प्रतीक हैं। हर नित्या एक विशेष शक्ति, भाव और साधना का प्रतिनिधित्व करती है।
1. कामेश्वरी नित्या
2. भगमालिनी नित्या
3. नित्यक्लिन्ना नित्या
4. भेरुंडा नित्या
5. वह्निवासिनी नित्या
6. महावज्रेश्वरी नित्या
7. शिवदूती नित्या
8. त्वारिता नित्या
9. कुलसुंदरी नित्या
10. नित्या (कुल नित्या)
11. नीलपताका नित्या
12. विजय नित्या
13. सर्वमंगला नित्या
14. ज्वालामालिनी नित्या
15. चित्रा नित्या
आध्यात्मिक महत्व:
श्रीचक्र = ब्रह्मांड का प्रतीक
त्रिकोण = शिव-शक्ति का मिलन
नित्याएँ = साधक की चेतना के क्रमिक विकास की अवस्थाएँ
यह साधना कामना, ज्ञान, शक्ति और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ देती है।
“श्रीचक्र हमें सिखाता है कि बाहर की शक्ति नहीं, भीतर की चेतना ही सबसे बड़ी साधना है।”


#सनातन #jaymatadii
संदर्भ 
https://www.facebook.com/share/17trR8KPpx/ 
सुधीर आर्य 
चलो गुरुकुल की ओर माउंट कैलाशा वैदिक ज्ञान गुरुकुल