प्राचीन काल की बात है, एक घने वन में एक विशाल और अति सुंदर वृक्ष था। वह वृक्ष इतना बड़ा और घना था कि मानो वन का राजा हो। उसकी शाखाएं आकाश को छूती थीं और उस पर लगने वाले फल अत्यंत मीठे और रसीले थे। उस वृक्ष पर हजारों पक्षियों का बसेरा था, जिनमें एक धर्मात्मा तोता (शुक) भी रहता था। वह तोता उसी वृक्ष के कोटर (खोखले तने) में जन्मा था और वर्षों से वहीं निवास कर रहा था।
एक दिन वन में एक शिकारी शिकार की तलाश में आया। उसने एक हिरण को देखा और उस पर अपना विषाक्त (जहरीला) बाण छोड़ दिया। दुर्भाग्यवश, हिरण तो बचकर भाग गया, लेकिन वह जहरीला तीर सीधे उस विशाल वृक्ष के तने में जाकर धंस गया।
बाण का जहर इतना तीव्र था कि उसका प्रभाव धीरे-धीरे पूरे वृक्ष में फैलने लगा। जो वृक्ष कभी फलों और फूलों से लदा रहता था, वह अब सूखने लगा। उसकी हरी पत्तियां झड़ गईं, डालियां काली पड़ गईं और छाल उखड़ने लगी। वृक्ष को मरते देख, उस पर रहने वाले सभी पक्षी, कीड़े-मकौड़े और जीव-जंतु एक-एक करके उसे छोड़कर दूसरे हरे-भरे पेड़ों पर चले गए।
पूरा वृक्ष वीरान हो गया, लेकिन वह एक बूढ़ा तोता कहीं नहीं गया। वह उसी सूखे, ठूँठ हो चुके वृक्ष की डाल पर बैठा रहता। न उसे खाने को फल मिलते, न छाया। भूख और प्यास से तोता भी धीरे-धीरे कंकाल जैसा होने लगा। उसके पंख टूटने लगे और शरीर शिथिल पड़ गया, लेकिन उसने उस वृक्ष का साथ नहीं छोड़ा। उसका यह तप और त्याग देखकर वन के देवता भी हैरान थे।
तोते की इस अद्भुत निष्ठा की चर्चा स्वर्गलोक तक पहुंची। देवराज इंद्र को विश्वास नहीं हुआ कि एक पक्षी में इतना मोह और त्याग हो सकता है। परीक्षा लेने के लिए इंद्र ने एक ब्राह्मण (मानव रूप) का वेश धारण किया और उस सूखे पेड़ के पास पहुंचे।
इंद्र ने तोते को संबोधित करते हुए कहा, "हे पक्षीराज! तुम इस सूखे और निर्जीव पेड़ पर क्यों बैठे हो? देखो, यह अब मर चुका है। न इस पर पत्ते हैं, न फल, और न ही यह तुम्हें कोई छाया दे सकता है। पास ही सुंदर वन है, जहाँ फलों से लदे वृक्ष और स्वच्छ पानी के सरोवर हैं। तुम अपनी जान जोखिम में डालकर यहाँ क्यों प्राण त्याग रहे हो? मूर्खता छोड़ो और कहीं और चले जाओ।"
तोते ने अपनी कमजोर आँखों से इंद्र की ओर देखा और अत्यंत विनम्रता और दृढ़ता से उत्तर दिया:
> "हे पथिक! आप विद्वान प्रतीत होते हैं, पर आपकी बातें धर्म के विरुद्ध हैं।
> मैं इसी वृक्ष पर पैदा हुआ। इसी की गोद में मैंने उड़ना सीखा। इसके मीठे फलों ने वर्षों तक मेरी भूख मिटाई और इसकी घनी छांव ने मुझे आंधी-तूफान और शिकारियों से बचाया। यह वृक्ष मेरे माता-पिता और सखा के समान है।
> जब यह समर्थ था, फल-फूल रहा था, तब मैंने इसका सुख भोगा। आज जब इस पर विपत्ति आई है, तो मैं इसे छोड़कर कैसे जा सकता हूँ? सुख में साथ देना और दुःख में मुख मोड़ लेना, यह तो स्वार्थियों और कायरों का काम है। मैं कृतघ्न (एहसान फरामोश) नहीं बन सकता। मैं इसी के साथ जिया हूँ और इसी के साथ अपने प्राण भी त्याग दूंगा।"
तोते के मुख से धर्म और प्रेम की ऐसी बातें सुनकर देवराज इंद्र का हृदय पिघल गया। वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए।
इंद्र बोले, "हे धर्मात्मा शुक! मैं तुम्हारी कृतज्ञता और वफ़ादारी से अत्यंत प्रसन्न हूँ। मनुष्यों में भी ऐसा त्याग दुर्लभ है। मांगो, तुम जो वरदान मांगना चाहते हो।"
तोते के पास अवसर था कि वह अपने लिए अमरता, शक्ति या ढेर सारा भोजन मांग लेता। लेकिन उसने कहा:
"देवराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो बस एक ही वरदान दीजिये। मेरे इस आश्रयदाता वृक्ष को पुनः जीवित कर दीजिये। इसकी सूखी टहनियों में फिर से जीवन भर दीजिये, ताकि यह पहले की तरह हरा-भरा हो जाए।"
इंद्र ने तोते के निस्वार्थ प्रेम को नमन किया और उस वृक्ष पर अमृत की वर्षा कर दी। देखते ही देखते वह सूखा हुआ ठूँठ फिर से नई पत्तियों, फलों और फूलों से लद गया। वृक्ष की शोभा पहले से भी अधिक बढ़ गई। तोता और वृक्ष, दोनों ने अपना शेष जीवन आनंदपूर्वक व्यतीत किया।
यह कथा हमें जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्यों का पाठ पढ़ाती है:
* सच्ची वफादारी: सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में साथ न छोड़े।
* कृतज्ञता (Gratitude): जिसने हमारा पालन-पोषण किया हो या बुरे वक्त में मदद की हो, उसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए।
* स्वार्थ से ऊपर धर्म: अपना पेट भरने के लिए रिश्तों को छोड़ देना अधर्म है।
जैसा कि भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा था: "सच्चा साथी वही है जो श्मशान तक साथ निभाए, केवल सुख के साथी तो बहुत मिल जाते हैं।"
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वयं राष्ट्रे जागृयाम
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