दीनानाथ जी के दो बेटे थे। बड़ा बेटा, आकाश, सात समंदर पार अमेरिका में नामी डॉक्टर था। छोटा बेटा, विकास, उसी शहर का जाना-माना बिल्डर था। लोग शर्मा जी को देखते तो रश्क करते, "क्या किस्मत पाई है! बेटे नहीं, साक्षात हीरे हैं।" दीनानाथ जी मुस्कुरा तो देते, पर उनकी आँखों के कोरों में छिपी नमी वह कड़वा सच बयान कर देती जिसे वह दुनिया से छिपाए बैठे थे।
दीनानाथ जी का वजूद अब उस आलीशान घर के सबसे पिछले और कोने वाले कमरे तक सिमट कर रह गया था। विकास और उसकी पत्नी शालिनी अपनी चमक-धमक वाली दुनिया में इतने मशरूफ थे कि उन्हें यह भी याद नहीं रहता था कि घर के उस अंधेरे कोने में एक बुजुर्ग दिल भी धड़क रहा है।
एक शाम, जब पूरा बंगला रोशनी से नहाया हुआ था और बगीचे में शहर के रईसों की महफ़िल सजने वाली थी, विकास ने अपने पिता के कमरे में कदम रखा। वह प्यार से नहीं, बल्कि एक हिदायत के साथ आया था।
"बाबूजी," विकास ने अपनी महँगी घड़ी ठीक करते हुए कहा,
"आज बहुत वीआईपी मेहमान आ रहे हैं। आप अपने पुराने ख्यालों वाली बातें लेकर बाहर मत आइएगा। मेहमानों के सामने थोड़ा 'ऑकवर्ड' लगता है। आप आज खाना अपने कमरे में ही मँगवा लीजिएगा।"
दीनानाथ जी ने चश्मा उतारकर धुंधली आँखों से अपने बेटे को देखा। उनके गले तक एक बात आई कि 'बेटा, क्या मैं अपनी ही कमाई से बने घर में मेहमान बन गया हूँ?' पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस धीरे से सिर हिला दिया। बाहर संगीत की धमक और ठहाकों का शोर था, और अंदर दीनानाथ जी अपनी स्वर्गीय पत्नी की तस्वीर को सहलाते हुए अपनी तन्हाई से बातें कर रहे थे।
रात के सन्नाटे में जब पार्टी खत्म हुई, तो दीनानाथ जी को प्यास महसूस हुई। रसोई की ओर जाते वक्त उनके कदम ठिठक गए। अंदर विकास और शालिनी के बीच कुछ मंत्रणा चल रही थी।
"विकास, मुझे लगता है अब बाबूजी को यहाँ रखना प्रैक्टिकल नहीं है," शालिनी की आवाज़ में एक अजीब सी बेरुखी थी।
"उनका यह कमरा काफी बड़ा है। इसे तोड़कर हम एक आलीशान 'होम थिएटर' बना सकते हैं। वैसे भी शहर के बाहर जो हमारा पुराना फार्म हाउस है, वहां कितनी हरियाली और शांति है। बाबूजी को वहीं शिफ्ट कर देते हैं।"
विकास ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया, "तुम सही कह रही हो शालिनी। यहाँ शहर के शोर में उनका दम घुटता होगा। मैं कल ही उनसे बात करके सामान पैक करवाता हूँ।"
अंधेरे गलियारे में खड़े दीनानाथ जी के हाथ से पानी का गिलास छूट गया। कांच के टुकड़ों के बिखरने की आवाज़ सन्नाटे को चीर गई। विकास और शालिनी हड़बड़ाकर बाहर आए, पर तब तक दीनानाथ जी अपने कमरे के अंधेरे में ओझल हो चुके थे।
अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही विकास 'फार्म हाउस' का प्रस्ताव लेकर बाबूजी के कमरे में पहुँचा। पर वहां का नजारा देखकर वह ठिठक गया। दीनानाथ जी पूरी तरह तैयार थे, उनका सूटकेस बिस्तर पर रखा था।
"अरे बाबूजी! आप कहीं जाने की तैयारी कर रहे हैं क्या?" विकास ने आश्चर्य से पूछा।
दीनानाथ जी की आवाज़ में आज एक ऐसी खनक और ठहराव था, जो सालों से गायब था। "हाँ विकास, मैंने कल रात तुम्हारी 'शांति' वाली पूरी योजना सुन ली थी। पर बेटे, मैं फार्म हाउस नहीं जा रहा।"
उन्होंने मेज़ पर रखा एक कानूनी लिफाफा विकास की ओर बढ़ाया। विकास ने कांपते हाथों से कागज़ निकाले। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
"ये क्या है बाबूजी? आपने यह बंगला... एक ट्रस्ट को दान कर दिया?" विकास चिल्लाया, "यह मेरा हक है! आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?"
दीनानाथ जी शांत भाव से बोले, "हक अपनों का होता है विकास, अजनबियों का नहीं। तुमने मुझे अपने ही घर में एक 'फालतू सामान' की तरह कोठरी में डाल दिया, तो मैंने तुम्हें इस बोझ से आज़ाद कर दिया। अगले महीने से इस बंगले में मेरे जैसे कई और बेसहारा बुजुर्ग रहेंगे, जिनके पास आलीशान घर तो हैं, पर अपना कहने वाला कोई नहीं।"
विकास हकलाने लगा, "पर आप... आप कहाँ रहेंगे?"
"मैं उसी वृद्धाश्रम में रहूँगा जिसे मैंने शहर के दूसरे छोर पर अपने पेंशन के पैसों से बनवाया है," दीनानाथ जी ने अपना सूटकेस उठाया। "वहां शायद दीवारें संगमरमर की न हों, पर वहां वो सम्मान और अपनापन ज़रूर मिलेगा जो इस 'शांति निवास' की चकाचौंध में कहीं खो गया था।"
दीनानाथ जी भारी कदमों से गेट की ओर बढ़ गए। विकास और शालिनी उस करोड़ों के बंगले में अकेले खड़े रह गए, जो अब कागज़ों पर उनका नहीं रहा था।
सीख: समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि लोग आलीशान घर तो बना लेते हैं, पर अपनों के लिए दिल में जगह बनाना भूल जाते हैं। बुजुर्ग घर का बोझ नहीं, बल्कि वह मज़बूत नींव होते हैं जिस पर खुशियों की इमारत टिकी होती है। जिस घर की नींव का सम्मान नहीं होता, वह मकान तो रह सकता है, पर कभी 'घर' नहीं बन पाता।
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