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Friday, 6 March 2026

दोस्ती

🌸 दोस्ती 🌸
इंदौर के विजय नगर इलाके में एक छोटी-सी कॉलोनी थी। वहाँ दो मकान बिल्कुल सटे हुए थे। एक में रहता था राजेश, दूसरे में संजय। दोनों में दोस्ती ऐसी थी जैसे सांस और बदन का रिश्ता।

सुबह की पहली किरण निकलते ही दोनों की आवाज़ें गलियों में गूँजने लगतीं। साथ में घूमना , साथ चाय पीना, साथ में ऑफिस जाना। राजेश बैंक ऑफ बड़ौदा में ऑफिसर था। संजय एक नामी कंपनी में अकाउंट्स मैनेजर था। 
दोनों की शादियाँ भी एक ही साल हुईं। राजेश की पत्नी मीना और संजय की पत्नी राधा में भी ऐसी दोस्ती हो गई जैसे सहेलियाँ हों। चारों साथ में बाज़ार जाते, साथ में पिकनिक मनाते, साथ में त्योहार सेलिब्रेट करते। फिर बच्चे हुए। राजेश के घर बेटा हुआ, संजय के घर बेटी। दोनों के बच्चे एक दूसरे को भाई-बहन मानते थे।

हर रविवार की शाम दोनों परिवार छत पर इकट्ठा होते। राजेश की पत्नी मीना सब के लिए चाय बनाती , राजेश पकौड़े लाता। बच्चे खेलते, औरतें गप्पें मारतीं, और दोनों दोस्त ज़िंदगी भर के सपने बुनते।

"संजय, तेरे बिना क्या होगा मेरा?" राजेश अक्सर कहता।

"तू पागल है," संजय हँसता, "हम तो जन्मों के साथी हैं।"

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

संजय को शेयर बाज़ार का थोड़ा शौक था। शुरू में छोटे-छोटे निवेश किए। कभी फायदा होता, कभी नुकसान। फिर एक दिन उसके एक दोस्त ने बताया कि एक कंपनी के शेयर दोगुने होने वाले हैं। संजय ने बैंक से लोन लिया। पाँच लाख। फिर उधार भी लिया। रिश्तेदारों से, दोस्तों से। कुल मिलाकर पंद्रह लाख का कर्ज़ हो गया।

"इस बार पक्का मालामाल हो जाऊँगा," उसने राधा से कहा था। राधा को शेयर बाज़ार में भरोसा नहीं था, पर पति की बात माननी पड़ी।

और फिर वही हुआ जिसका डर था। बाज़ार क्रैश हो गया। सारे पैसे डूब गए। पंद्रह लाख का कर्ज़ सिर पर मंडराने लगा।

सूदखोरों ने परेशान करना शुरू कर दिया। पहले फोन, फिर घर आना, फिर धमकियाँ। राधा रोती, बेटी डरती। संजय का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा। नींद गायब हो गई। खाना गले से नहीं उतरता था।

उसी बीच कंपनी वालों ने नोटिस दे दिया। कंपनी घाटे में चल रही है, सबको निकाला जा रहा है। तीन महीने की तनख्वाह देकर बाहर कर दिया।

एक तरफ कर्ज़, दूसरी तरफ बेरोज़गारी। संजय टूट गया।

उसने राजेश को बताने की बहुत सोची। रातों-रात उसके घर जाकर सब कुछ कह देने का मन किया। पर हर बार सोचता, "राजेश मुझे पैसे देने की कोशिश करेगा। अपनी पूँजी निकालेगा। उसकी भी तो ज़िम्मेदारियाँ हैं। मैं उस पर बोझ नहीं बन सकता।"

एक रात उसने फैसला किया। उसने अपना मकान बेच दिया। कर्ज़ चुकाया। बचे हुए पैंतीस हजार रुपये लेकर उसने राधा से कहा, "दिल्ली चलते हैं। वहाँ नौकरी के अच्छे मौके हैं। जल्दी ही सेटल हो जाएँगे।"

राधा राजी हो गई। उसे क्या पता था कि यह सफर कहाँ जाकर खत्म होगा

संजय के जाने के बाद राजेश की जिंदगी में एक ऐसा सन्नाटा पसर गया जैसे किसी मंदिर से घंटियाँ हमेशा के लिए चुप हो गई हों। सुबह की सैर पर अकेला निकलता तो हर कदम पर संजय याद आता। वही पार्क, वही बेंच, वही चाय की दुकान, पर वह चेहरा गायब। शुरू के दिनों में रोज़ फोन होता। संजय बताता, "यहाँ बहुत अच्छा है, राजेश। कंपनी बहुत बड़ी है, सैलरी भी अच्छी है। जल्दी ही तुझे भी बुलाऊँगा घूमने।" राजेश का मन हल्का हो जाता। फिर धीरे-धीरे फोन कम होने लगे। पहले हफ्ते में एक बार, फिर महीने में एक बार, फिर कभी-कभार। राजेश सोचता, व्यस्त होगा, नई जगह है, नई जिम्मेदारियाँ हैं। लेकिन जब एक दिन उसने फोन लगाया तो नंबर बंद आया। उसने दोबारा लगाया, फिर बंद। तीसरी बार, चौथी बार, हर बार वही आवाज़ - "द नंबर यू हैव डायल इज स्विच्ड ऑफ"। राजेश के हाथ से फोन छूट गया। उसने कंपनी में फोन किया, वहाँ बताया गया कि कंपनी तो दो साल पहले ही बंद हो गई। अब राजेश को असली चिंता हुई। उसने हर संभव जगह ढूँढ़ा - सोशल मीडिया, पुराने दोस्त, रिश्तेदार, यहाँ तक कि उसने दिल्ली पुलिस में भी रिपोर्ट करने की सोची। पर कोई सुराग नहीं मिला। रातों की नींद उड़ गई। मीना उसे सांत्वना देती, "वापस आएँगे भैया, एक दिन ज़रूर आएँगे।" और राजेश हर रात उसी छत पर खड़ा होकर दिल्ली की तरफ देखता, मन ही मन कहता, "कहाँ हो साला? कैसे हो? मुझे एक फोन तो कर ले।" पर साल बीतते गए। आठ साल। आठ लंबे साल, जिनमें हर साल राजेश ने संजय के जन्मदिन पर केक काटा, हर दिवाली उसके लिए दीया जलाया, हर होली उसके नाम का रंग उड़ाया। और हर बार वही खालीपन, वही सवाल - कहाँ हो मेरे भाई?

रात के साढ़े दस बजे होंगे। दिल्ली के लक्ष्मी नगर बाजार में रौनक घटने लगी थी। राजेश बैंक की ट्रेनिंग के सिलसिले में दिल्ली आया था। चार दिन की वर्कशॉप थी। आज आखिरी दिन था और कल सुबह उसे इंदौर के लिए ट्रेन पकड़नी थी।

वह पान खाते-खाते बाजार से गुजर रहा था। इंदौर के पान का आदी था, दिल्ली का पान उसे कुछ खास नहीं लगा। पानवाले से थोड़ी बातें हुईं। वह भी इंदौर से आया था। राजेश को थोड़ा अपनापन महसूस हुआ।

वह आगे बढ़ा। दुकानें बंद हो रही थीं। अचानक उसकी नज़र एक दुकान पर पड़ी। 'गुप्ता जनरल स्टोर'। दुकान के शटर आधे गिरे हुए थे। कैशियर काउंटर पर एक आदमी बैठा था। नीली शर्ट, हाथ में पेन, बिल काट रहा था।

राजेश का दिल एक सेकंड के लिए रुक गया।

उसने पलकें झपकाईं। पान का रस गले से नीचे उतरना भूल गया। वह वहीं जड़ हो गया।

वही माथे पर तिरछी पड़ती लकीर। वही पतली गर्दन। वही आँखें। वही संजय।

"नहीं... ये नहीं हो सकता," राजेश फुसफुसाया।

आठ साल हो गए थे। आठ साल पहले संजय ने अचानक इंदौर छोड़ा था। कहा था, दिल्ली में बेहतर नौकरी मिल गई है। मकान बेच दिया। एक दिन अचानक गायब हो गया। राजेश ने हर जगह ढूँढ़ा। फोन किए तो नंबर बंद आया। कंपनी में पता किया तो पता चला कंपनी तो बंद हो गई। सोशल मीडिया पर कुछ नहीं मिला। रिश्तेदारों से पूछा, किसी को कुछ पता नहीं था।

आठ साल से राजेश सोचता था, उसका भाई कहाँ होगा? कैसा होगा? क्या करता होगा? और आज... आज वही संजय यहाँ... एक किराने की दुकान में कैशियर?

राजेश ने पान थूका और दुकान के अंदर घुस गया। उसके पैर काँप रहे थे।

"भाई साहब, अब दुकान बंद कर रहे हैं," एक लड़के ने आवाज दी।

राजेश ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। वह सीधा काउंटर के पास गया। उस आदमी ने सिर उठाया।

उस आदमी का चेहरा देखते ही देखते सफेद पड़ गया। उसकी आँखें फैल गईं, हाथ से पेन छूटकर ज़मीन पर गिर गया। उसने तुरंत मुँह फेर लिया और सिर झुका लिया। फिर अचानक वह उठा और पीछे जाने लगा।

"संजय!" राजेश चीख पड़ा।

वह आदमी रुक गया। उसके कंधे काँप रहे थे। पर वह मुड़ा नहीं।

राजेश दौड़ा। उसने उसका हाथ पकड़ लिया। जैसे कोई डूबता हुआ आदमी आखिरी सहारा पकड़ता है। "संजय, मैं हूँ राजेश! तेरा राजेश! देख मुझे!"

संजय ने धीरे से आँखें उठाईं। वही आँखें। लेकिन अब उनमें वह चमक नहीं थी। उनमें था तो बस गहरा सन्नाटा और एक अजीब-सी थकान।

"नहीं साहब... आप गलत समझ रहे हैं," संजय ने बड़ी मुश्किल से कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं... मैं संजय नहीं हूँ।"

राजेश ने उसके दोनों कंधे पकड़ लिए। उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी जैसे छोड़ा तो यह सपना टूट जाएगा। "सुन ले, मैं तुझे पहचानता हूँ। हमने बचपन से जवानी तक साथ बिताया है। तेरे माथे पर वह निशान है जो उस दिन पड़ा था जब हम छत से गिरे थे। तेरी गर्दन पर वह दाग है जो उस शादी में उबलती चाय गिरने से हुआ था। तू चाहे कितना भी बदल जाए, मैं तुझे पहचान लूँगा। अब बता, तू यहाँ क्या कर रहा है?"

संजय ने आँखें बंद कर लीं। उसकी पलकों से आँसू टपकने लगे। वह वहीं बैठ गया, जैसे उसके पैरों ने साथ छोड़ दिया हो।

दुकान के उस लड़के ने शटर गिरा दिए और चला गया। अब सिर्फ वे दोनों थे, एक छोटे से कमरे में, जहाँ एक टूटी-फूटी चारपाई पड़ी थी और एक पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था। दीवारों पर पुराने कैलेंडर लगे थे। एक कोने में गत्ते के डिब्बे रखे थे। कमरे में सीलन की बू आ रही थी।

संजय उस चारपाई पर बैठा रो रहा था। राजेश उसके सामने बैठा था। उसकी आँखें भी नम थीं।

"बता, क्या हुआ?" राजेश ने धीरे से कहा।

संजय ने गहरी साँस ली। फिर बोलना शुरू किया।

"शेयर बाज़ार में पैसे डूब गए राजेश। पंद्रह लाख का कर्ज़ हो गया। सूदखोरों ने जान ले ली थी। तुझसे बताता तो तू पागल हो जाता। अपनी पूँजी निकालता, कर्ज़ लेता। मैं तुझ पर बोझ नहीं बनना चाहता था।"

"तो तूने मकान बेच दिया?"

"हाँ। कर्ज़ चुकाया। कुछ पैसे बचे तो सोचा, दिल्ली चलते हैं। वहाँ नौकरी मिल जाएगी। सब ठीक हो जाएगा।"

"और फिर?"

संजय ने आँखें पोंछीं। "आठ साल हो गए राजेश। आठ साल से यहाँ हूँ। पहले एक कंपनी में नौकरी मिली थी, चौदह हजार पर। फिर वह भी चली गई। अब इस दुकान में कैशियर हूँ। बीस हजार मिलते हैं।"

"बीस हजार? दिल्ली में बीस हजार में कैसे चलता है?"

"बड़ी मुश्किल से। शाहदरा में एक कमरा किराए पर लिया है। तीन हजार रुपये महीना। राधा वहीं रहती है। बेटी रिंकू अब दसवीं में है।"

"राधा और रिंकू यहाँ हैं?"

"हाँ। पास ही में रहते हैं। राधा एक पार्लर में काम करती है मिलाकर गुज़ारा हो जाता है।"

"पर तूने मुझे फोन क्यों नहीं किया? एक बार भी?"

संजय ने आँखें नीची कर लीं। "सोचा, थोड़े दिन में ठीक हो जाएगा। फिर महीने बीतते गए। फिर साल। फिर मुझे लगा, अब तू मुझे भूल ही गया होगा। अपनी जिंदगी में व्यस्त होगा। मैं क्या बताता? कि अकाउंट्स मैनेजर से कैशियर बन गया हूँ? अपनी इज्जत ही नहीं रही राजेश।"

"इज्जत? तू मेरे सामने इज्जत की बात करता है?" राजेश की आवाज़ में गुस्सा था। "हमने बचपन में एक दूसरे के घर खाना खाया है। एक दूसरे के कपड़े पहने हैं। तू मुझसे छुपा रहा है?"

राजेश उठा। वह उस छोटे-से कमरे में चक्कर काटने लगा। उसका दिमाग घूम रहा था। आठ साल। आठ साल उसका भाई इस हालत में रहा और उसे पता नहीं चला?

वह अचानक रुका। उसके चेहरे के भाव बदल गए। आँखों में गुस्सा था, दर्द था, और कुछ और भी था।

वह संजय के पास आया। उसने हाथ उठाया और संजय के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ मारा। आवाज़ पूरे कमरे में गूंज गई।

"यह थप्पड़ है तेरे उस भरोसे के लिए जो तूने मुझ पर नहीं किया। हमने कसम नहीं खाई थी साथ रहने की? दुख बाँटने की? तूने मुझे अपने दुख से दूर रखा। यह तूने क्या किया?"

संजय चुपचाप बैठा रहा। उसके गाल पर हाथ के निशान पड़ गए थे।

"और यह थप्पड़," राजेश ने फिर हाथ उठाया, पर इस बार उसका हाथ संजय के गाल पर हल्का सा टिक गया, और फिर वह उसके गाल को सहलाने लगा, "इस थप्पड़ में है मेरा प्यार। आठ साल का प्यार। आठ साल मैं सोचता रहा, मेरा भाई कैसा होगा? क्या खाता होगा? कैसे रहता होगा? और तू यहाँ... इस कोठरी में... अपनी पत्नी और बेटी को हर चीज के लिए तरसता देखता रहा, और मुझे एक फोन नहीं किया?"

राजेश ने उसे गले से लगा लिया। दोनों ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। बाहर सन्नाटा था। पर उस छोटे से कमरे में सिर्फ दो दोस्तों के रोने की आवाज़ थी, जो आठ साल बाद मिले थे।

अगली सुबह संजय राजेश को अपने घर ले गया। शाहदरा की उन गलियों में पहुँचे तो राजेश को यकीन नहीं हुआ। नालियाँ खुली थीं, गंदगी बिखरी थी, तंग गलियों में साँस लेना मुश्किल था। एक छोटे से कमरे के बाहर राधा खड़ी थी।

उसने राजेश को देखा तो पत्थर हो गई। हाथ से बाल्टी छूट गई। 

"राजेश भैया! आप! आप यहाँ?"

राजेश ने उसे उठाया। राधा रो रही थी, उसका पूरा शरीर काँप रहा था।

"उठो राधा। मैं आ गया हूँ। अब सब ठीक हो जाएगा।"

अंदर से रिंकू निकली। वह अब बड़ी हो गई थी। दसवीं की छात्रा। पतली-सी, बड़ी-बड़ी आँखें। उसने राजेश को देखा तो पहचान नहीं पाई। फिर याद आया।

"राजेश चाचा?" वह दौड़ी और राजेश से लिपट गई।

"बेटा, तू इतनी बड़ी हो गई। तुझे देखकर मुझे वो दिन याद आ गए जब तू मेरे घर आती थी और मीना तुझे खिलाती थी।"

तीनों कमरे के अंदर गए। एक छोटा-सा कमरा। एक टूटा-सा बिस्तर, एक पुराना अलमारी, एक टेबल जिस पर रिंकू पढ़ती थी। दीवारों पर उसके स्कूल के सर्टिफिकेट लगे थे।

राजेश ने राधा से सब पूछा। कैसे गुज़ारा होता है, क्या खाते हैं, कैसे रहते हैं। राधा ने बताया, "भैया, संजय के बीस हजार में से सोलह हजार तो किराया , स्कूल फीस और राशन में चला जाता है। बच्ची की पढ़ाई के लिए ट्यूशन नहीं लगवा पाते। खुद ही पढ़ाती हूँ।"

"रिंकू के मार्क्स कैसे हैं?"

"अच्छे हैं भैया। हमेशा टॉप करती है। पर पता नहीं आगे क्या होगा। पैसे नहीं हैं।"

राजेश की आँखें भर आईं। उसने रिंकू को गले से लगा लिया। "बेटा, तू पढ़ाई कर। चाचा हैं ना।"

फिर उसने संजय की तरफ देखा। "सुन, अब तू यहाँ नहीं रहेगा। कल सुबह मेरे साथ इंदौर चलेगा।"

"पर राजेश..."

"कोई पर नहीं। मेरे बैंक में जूनियर अकाउंटेंट का पद खाली है। तू अकाउंट्स मैनेजर रह चुका है। काम आ जाएगा। चालीस हजार शुरू में मिलेंगे। धीरे-धीरे आगे बढ़ जाएगा। और हाँ, मेरे घर में ऊपर के फ्लोर पे two रूम सेट खाली है। उसमें रह लेना।"

संजय कुछ नहीं बोला। सिर्फ रोता रहा।

अगले दिन राजेश, संजय, राधा और रिंकू इंदौर के लिए निकल पड़े। ट्रेन में आठ घंटे का सफर था। रास्ते भर बातें होती रहीं। आठ साल की बातें। रिंकू ने राजेश से पूछा, "चाचा, मैं वहाँ पढ़ पाऊँगी?"

"बेटा, मेरी बेटी तू। मैं देखूँगा तेरी पढ़ाई। तुझे इंदौर के सबसे अच्छे स्कूल में डालूँगा।"

इंदौर स्टेशन पर मीना खड़ी थी। उसने राधा को देखा तो दौड़कर गले लग गई। दोनों बहनें रो पड़ीं। फिर रिंकू को देखा तो उसने भी गले लगा लिया।

"चलो घर चलते हैं," मीना ने कहा। "खाना बनाया है। सब तुम्हारे लिए।"

आज दोनों परिवार फिर से साथ हैं। राजेश बैंक में है, संजय भी अब उसी बैंक में जूनियर अकाउंटेंट है। चालीस हजार मिलते हैं।  
रिंकू इंदौर के एक अच्छे स्कूल में ग्यारहवीं में पढ़ रही है। पढ़ाई में टॉप करती है। वह कहती है, "चाचा, मैं बड़ी होकर बैंक ऑफिसर बनूँगी।"

राजेश हँसता है, "बेटा, तू तो चाचा से भी आगे निकल जाएगी।"

हर रविवार की शाम दोनों परिवार फिर उसी छत पर इकट्ठा होते हैं। मीना और राधा मिल कर चाय और पकौड़े बनाते है,बच्चे आपस में खेलते हैं, और दोनों दोस्त अपनी जिंदगी के पुराने किसी को याद कर के बहुत हंसते है

संजय अक्सर कहता है, "तेरे उस थप्पड़ ने मुझे नई जिंदगी दे दी।"

राजेश हँसता है, "साला, अगली बार तुझसे कोई शिकायत हुई तो थप्पड़ नहीं, रोज़ रात को इंदौरी पान खिलाऊँगा। तेरा बुरा हाल कर दूँगा।"

पर दोनों जानते हैं कि उनकी दोस्ती अब और गहरी हो गई है। क्योंकि उन्होंने जान लिया है कि सच्ची दोस्ती का मतलब सिर्फ खुशियाँ बाँटना नहीं, बल्कि दुख के अंधेरे में भी साथ खड़े रहना है।

और हाँ, कभी-कभी एक थप्पड़ भी हजारों शब्दों से ज्यादा बोलता है।
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