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Saturday, 7 March 2026

निर्भीक सन्यासी स्वामी ओमानंद जी महाराज का प्रभाव

निर्भीक सन्यासी
स्वामी ओमानंद जी महाराज का प्रभाव


                लगभग १९३६ की बात है, में चित्तौड़गढ़ गुरुकुल (राजस्थान) में पढ़ा करता था। गुरुदेव श्री पं० शंकरदेव जो उन दिनों गुरुकुल के उपाचार्य थे। वे महावेैयाकरण माने जाते थे। गुरुकुल के संस्था- पक और आचार्य श्री स्वामी व्रतानन्द जी का भरसक प्रयास रहता था कि उद्भट विद्वान् उनके गुरुकुल में अध्यापक हों और छात्र भी कुशाग्रमति हों। इस लक्ष्य को दृष्टि में रखकर आचार्य स्वामी व्रतानन्द जी ने अच्छे से अच्छे आय दृढ़व्रता अध्यापक गुरुकुल में नियुक्त किये तथा जो छात्र उन्हें कहीं सर्वोत्तम दीख पड़ते थे, अपने यहां लाने का प्रयत्न किया, उसमें वे सफल भी होते थे। इसी सन्दर्भ में श्री स्वामी ओमानन्द जी (तत्कालीन ब्रह्मचारी भगवान्देव जी) उच्च भावनाओं से अभिषिक्त ब्रह्मचर्य को लग्न से सम्पन्न, तेजस्वी सहाध्यायियों के साथ चित्तौड़गढ़ गुरुकुल पहुंचे। भगवान्देव, भद्रसेन, सुखदेव और सत्यवीर जब ये चारो ब्रह्मचारी मास्टर धर्मसिंह जी के संरक्षकता में गुरुकुल में विराजमान हुए तो एकदम वातावरण परिवर्तित-सा दीख पड़ा। इनमें कुछ ब्रह्मचारी आयु में वहां के पूर्ववर्ती ब्रह्मचारियों से बड़े थे । जाड़ों में भी अल्पवस्त्रधारी थे। शरीर सुघटित दर्शनीय कान्तिमान् था, चेहरा ब्रह्मचर्य को दीप्ति से ओजस्वी, तेजस्वी था। गाल लालरंग के थे। ब्रह्मचारी भगवान्देव जी का माथा बहुत चमकता था। चारों में ब्रह्मचारी भगवान्देव बड़े थे एवं सब के निदेशक थे। हम सब इनकी ओर बहुत आकर्षित हुए। ये सभी नमक और मीठा भी न खाते थे और गी के दुग्ध, घृत का ही सेवन करते थे। यह बात हमें अति अनोखी दीखी। केवल एक नींद सोते थे, रात्री को जब भी आंख खुल गई फिर न सोते थे। अपने नित्य-कर्मों में लग जाते, व्यायाम बहुत करते थे। ब्रह्मचयपालन सम्बन्धी कुछ विशिष्ट निर्देश भी हम ब्रह्मचारियों को दिया करते थे।

              मैं आपकी दिनचर्या और खान-पान से प्रभावित हुआ । मैंने भी उस समय नमक छोड़ दिया था। तब मेरा और ब्रह्मचारी भगवान्देव जी का छोटे-बड़े भाई जंसा सम्बन्ध बन गया। सस्कारों का आकर्षण कहें अथवा कुछ और हम दोनों आज तक आबद्ध चले आरहे हैं। हमारी परस्परा की आज तक मेल की कोई बात नहीं हुई। मैं स्वतः ही आपकी आज्ञा का पालन शिरोधार्य समझता हूँ। जब चित्तौड़गढ़ गुरुकुल से स्नातक बनकर आया तो जैसे ही आपने मुझे पं० श्री स्वामी आत्मानन्द जी के सान्निध्य में जान को कहा, मैं एकपदे तैयार हो गया । स्वामी आत्मानन्द जी का मैंने पहले नाम सुना था, न जानता ही था किन्तु मैंने वहां पहुंचकर जो तृप्ति पायी, वह मेरे जीवन नौका की खेवनहार बनी। इस दृष्टि से मैं श्री स्वामी ओमानन्द जी महाराज का अत्यन्त कृतज्ञ एवं आभारी हूँ। आपके और मेरे विचारों में कुछ मतभेद हो सकता है, फिर भी मैं कह नहीं सकता कि वह कौन-सी अदृष्ट शक्ति है, जो मुझसे आपके आदेश का पालन करा देती है। गुरुकुल रावलपिण्डी रहते हुये आपने पूज्य श्री स्वामी आत्मानन्द जी महाराज को आद्योपान्त जीवन घटनाओं को संकलित करने का मुझे आदेश दिया। मैंने उसे स्वीकार कर पूर्ण कर बिया । १९६४ में जीवन-चरित लिखने को कहा, मैंने लिख दिया। श्रीमद्ददयानन्दार्ष विद्यापीठ का परीक्षायें चलाने का निर्देश किया, मैं तैयार होगया। मैं आज देख रहा हूँ कि जिन से मेरे बड़े भाई श्री रामदेव जी एम० ए० आर्टिस्ट का सम्बन्ध रहा, उनसे आपका भी सम्बन्ध चला आरहा है। अथवा जिन से मेरा सम्बन्ध रहा है, उनसे आपका भी सम्बन्ध पहले से ही चला आरहा है। बिना किसी प्रयास के ये बातें चलती आई हैं। ऐसा लगता है आजीवन अब ऐसा ही चलेगा। यदि कदाचित् विछोह हुआ भी तो अटूट सम्बन्ध बना ही रहेगा। कुछ हम एक-दूसरे के पूरक से बन गये हैं।

            कई बार कुछ व्यक्तियों ने मुझ से कहा है कि आप उनके समीप कैसे रहते हैं। जब मुझे ही इस बात का ज्ञान नहीं है तो उत्तर क्या दूं। मैं मन में यही सोचकर मूक रह जाता हूं कि सम्भवतः हम दोनों के उद्देश्य समान हैं। कार्य-क्षेत्र भले ही कुछ पृथक् पृथक् हैं किन्तु वह कार्य परस्पर में विरोधी नहीं हैं। महर्षि दयानन्द वा आर्ष-शैली एवं ईश्वरादेशानुगामी दोनों हैं। ये ही कुछ भावनायें हैं, जो सम्भवतः हमें जोड़े हुये हैं। कुछ जन श्री स्वामी ओमानन्द जी को क्रोधी बताते हैं। पर मैं यह बात उनमें नहीं देखता । क्रोध प्रतीत होता है, पर है नहीं। जन्म-जात एक तो ध्वनि में कड़क है, दूसरे नेतृत्व का गुण है। 'क्षणे रुष्टः क्षणे तुष्टः' अभी क्रोध की झलक और दूसरे ही क्षण प्रसन्नता का आभास । ये आंतरिक लक्षण आप में कल्याणभावना के द्योतक हैं। बेसमझ व्यक्ति ही ऐसे अवसरों पर क्रोध को अनुभूति करते हैं। लोग सब जगह प्रिय-प्रिय ही सुनते हैं, भले ही वह झूठ क्यों न हो, पर स्वामी ओमानन्द जी महाराज यथार्थ कह देते हैं, अतः वह कड़वी लगती है। मन में दुर्भावना तनिक भी नहीं होती। इसीलिये वे समझा-बुझाकर किसी रुष्ट को फिर अपनी तरफ खींच लेते हैं ओर व्यक्ति भी अपनी म्लानता भुला देता है ।

आप ब्रह्मचर्यपालन के धनी माने गये हैं अतः आपने तत्सम्बन्धी पुस्तकें लिखकर युवकों को सहारा दिया है। बालकों का ब्रह्म चर्यपालन एक आश्रम कहा गया है। आश्रम का अर्थ होता है-भरपूर श्रम करना । सारे ही आश्रम ऐसे हैं। अपने-अपने आश्रमों में रहते हुये गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी को भी भरसक प्रयास अपने निर्दिष्ट कत्र्तव्यों के संरक्षण में करना चाहिये । ब्रह्मचारी भगवान्देव जी ने अन्यों के समान इस आश्रम को ऐसे ढीला नहीं छोड़े रखा, अपितु उसमें शास्त्रविधि से पूर्णतया अपने कर्त्तव्यों का अभ्यास किया है।

अपने ब्रह्मचर्य काल में आप में यह विशिष्टता रही है कि ब्रह्मचारी, त्यागी, निःस्पृह, विरक्त, कार्य-कुशल और प्रतिभावान् विद्वान् संन्यासियों को आपने अपना पथ-प्रदशक माना है एवं उनके प्रत्येक निर्देश का आंख मूंदकर पालन किया है। ऐसे यति संन्यासियों में आपने स्वामा आत्मानन्द (५० मुक्तिराम उपाध्याय), स्वामी स्वतन्त्रानन्द और स्वामी वेदानन्द तीर्थ को चुना था। तीनों ही साघु आर्यसमाज में सितारों के मध्य चन्द्रमा के समान देदीप्यमान थे। तीनों अत्यन्त कर्मठ थे। तीनों के गुण ब्रह्मचारी भगवान्दव में प्रविष्ट हुये। कार्य करने को लग्न एवं साहस गुण तो जन्मजात-सा ही था, पर जब इन विचित्र साधुओं की छाप आप पर पड़ी तो जीवन निहाल होगया ओर आपने वह कार्य किया, जिसका गुणगान आज हरयाणावासी करते हैं। कार्य करनेवाले का प्रेरक मिलना चाहिए। फिर कोई कसर नहीं रहती । पूज्य श्री स्वामी आत्मानन्द जी ने आपको प्रेरणा दी कि जब तक इधर हिन्दू प्रदेश हरयाणा में कुछ नहीं करोगे, पंजाब (भविव्यतु के पाकिस्तान) में अल्पसंख्यक हिन्दू बच नहीं सकते। इस आदेश का पालन आपने एक सैनिक के तुल्य किया। विजय, पराजय तो सेनापति वा राजा का ही होता है। पाप-पुण्य का भागी भी वही बनता है, पर सैनिक को गौरव प्राप्ति से भी इन्कार नहीं किया जाता।

         हिन्दी आंदोलन छिड़ जाने पर जितने सत्याग्रही देने का आपको आदेश दिया गया, आपने उससे कहीं अधिक जेल भिजवाये।। इन कार्यों में आपको अनेक असुविधायें एवं कठिनाइयां हुई किन्तु आपने स्वीकृत आदेश से एक पग भी पाछे नहीं हटाया। तपस्या का प्रतिफल स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-

कड़ी धूप हो, शीत हो व झड़ी हो,दुधारा लिए राजसत्ता खड़ी हो।
छुरे से पड़े पेट चाहे चिराना, नहीं धर्म से पैर पीछे हटाना ।। तपस्या यही धार ऊंचे कहाओ, उठो जाति को देशवालो उठाओ।

यह लक्षण आचार्य भगवान्देव जी में पूरा उतरा है। "कार्य वा साधयेयम् देहं वा पातयेयम्" का ध्वज हाथ में लेकर राजसत्ता द्वारा लगाये गये गुप्तचरों आदि की आपने किसी भी आन्दोलन में कोई चिन्ता नहीं की। कुछ भी करना पड़ा, पर राजसत्ता की पकड़ में नहीं आये और अपने कार्य में सफल हुये। इन अप्रत्याशित बलिदानों को देखकर सम्पूर्ण हरयाणा स्वामी ओमानन्द जी सरस्वती के पीछे है।

झज्जर गुरुकुल १९१५ स्थापना काल से १९४२ तक लड़खड़ाता रहा। "दृढ़व्रती एकव्रत-निष्ठ, त्यागी, तपस्वी कोई अप्रतिम पुरुष ही इस शिक्षण संस्थान में अपनी फिर आहुति प्रदान कर इसे जीवित रख सकता है।" ऐसा अनुभव कर जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती आदि की दृष्टि आचार्य भगवान्- देव जी पर गयी। प्रयत्न करके गुरुकुल आपको सम्भलवा दिया गया। आप गुरुकुल के आजीवन आचार्य बने । आपने अपने आचार्यत्व में कहां से कहां तक गुरुकुल को पहुँचा दिया है, यह सर्वविदित है। यहां के सुपठित कुछ स्नातकों ने अन्यत्र गुरुकुल खोले और वैदिक-धर्म का प्रचार भी किया।

स्वामी ओमानन्द जी सरस्वती अपनी अदम्य सेवायों से शिखामणि बने हैं। वर्तमानकाल में भी आार्य साहित्य प्रकाशित करना, वितरण करना, हरयाणावासियों को मांस, शराब से मुक्ति दिलाकर सच्चे आर्य बनाना, सच्ची ऐतिहासिक पृष्ठ-भूमि में रंगे अपने पूर्वजों को स्मृति कराना विशेषतः आपका रात-दिन लक्ष्य है। इस प्रकार में देखता हूं कि आप में ब्रह्मचर्य संरक्षण की भावना एवं उसके लिए पूर्ण प्रयास, महर्षि दयानन्द और पूर्ववर्ती ऋषि, महर्षि , आप्तपुरुषों के एक-एक शब्द पर विश्वास, आर्यसमाज के कार्यों में अनन्य लग्न, उसके लिये प्राणान्त तक का बाजी लगाना, पथ-प्रदर्शकों में अत्यन्त निष्ठा, घृणितकार्यों में फंसे लोगों को उबारने की तड़प आदि कुछ ऐसे गुण हैं जो स्वामी ओमानन्द जी को "लोह पुरुष" की संज्ञा देने में प्रेरित करते हैं। आर्य जनता शताब्दियों तक आपके उपकार स्मरण करती रहेगी।

लेखक - वेदानन्द वेदवागीश
पुस्तक - स्वामी ओमानंद अभिनन्दन ग्रंथ
प्रस्तुति - अमित सिवाहा
साभार - Vivek Ary 

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