पुरुषार्थो में तीसरा पुरुषार्थ '#काम' है..!!
'काम' सिद्ध होने पर चौथा पुरषार्थ 'मोक्ष' उपलब्ध हो सकता है।
काम की मूलशक्ति #स्त्री है और वह स्त्री-पुरुष में (स्त्री=कुण्डलिनी) शक्ति के रूप में विद्यमान है। वह प्राकृतिक है, स्वयंभू है इसीलिए तांत्रिक साधना में स्त्री का महत्व है।
स्त्री के दो रूप हैं--भोग्यारूप और पूज्यारूप।
भोग्या रूप इस अर्थ में है कि स्त्री में जो नैसर्गिक शक्ति है जिसे हम 'काम की मूल शक्ति' भी कह सकते हैं, वह साधना भूमि में साधक के लिए आन्तरिक रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। उसी के आश्रय से साधना में सफलता प्राप्त करता है साधक और अन्त में प्राप्त करता है उच्च अवस्था को भी।
स्त्री में उसकी नैसर्गिक शक्ति को जागृत करना और उसे 'नियोजित' करना अत्यन्त कठिन कार्य है। यह गुह्य कार्य है और इसके सम्पन्न होने पर विशेष तांत्रिक क्रियाओं का आश्रय लेकर स्त्री को भैरवी दीक्षा प्रदान की जाती है जिसके फलस्वरूप भैरवी में मातृत्व का भाव उदय होता है।
तंत्रभूमि में मातृत्व भाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। तंत्र-साधना के जितने गुह्य और गंभीर अनुभव हैं, उनमें एक यह भी अनुभव है कि विशेष तांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पूज्यभाव से साधक अपने सामने पूर्ण नग्न स्त्री को यदि देख लेता है तो वह सदैव- सदैव के लिए स्त्री और स्त्री के आकर्षण से मुक्त हो जाता है।
संसार में तीन सबसे बड़े आकर्षण हैं धन का आकर्षण, लोक का आकर्षण और स्त्री का आकर्षण। इन्हें 'वित्तैषणा', लोकैषणा' और 'दारैषणा' भी कहा जाता है। दारैषणा का आकर्षण सबसे बड़ा होता है क्योंकि उसके मूल में कामवासना होती है जिसके संस्कार बीज जन्म-जन्मान्तर से आत्मा के साथ जुड़े हुए हैं।
स्त्री के आकर्षण से मुक्त होने के बाद स्त्री साधक के लिए माँ के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती।
तांत्रिक प्रक्रिया द्वारा यदि स्त्री पुरुष को पूर्ण नग्न देख ले तो वह भी सदैव के लिए पुरुष और उसके आकर्षण से मुक्त हो जाती है।
( यह कार्य तभी संभव है जब स्त्री-पुरुष एक दूसरे को सम्पूर्ण रूप से नग्न देखते समय एक विशेष तांत्रिक प्रक्रिया के अनुष्ठान से गुजरते हैं, साधारण रूप से नग्न देखते समय नहीं, क्योंकि उस समय तो कामवासना औ भी ज्यादा बढ़ जाती है।
आज तंत्र-साधना केंद्रों पर यही कुछ हो रहा है। वे अनुकरण परम्परा का तो कर रहे हैं लेकिन वह विशेष तांत्रिक प्रक्रिया को नहीं जानते, अनुष्ठान को नहीं जानते, फलस्वरूप ये केंद्र ऐय्यासी और अभिचार के अड्डे बन गए हैं।)
जलती देह छुअन मिले, उठे भाप सी आह।
इस भीगे से मिलन की, बुझे न रत्ती चाह॥
✍️Madhu Mishra ❣️
No comments:
Post a Comment